शनिवार, 30 सितंबर 2017

कुलपति डा. प्रियरंजन त्रिवेदी से अनामी की बातचीत


 

 

बीए ऑनर्स को चार साल का करना एक गलत फैसला है : ड़ा. त्रिवेदी





दो यूनीवर्सिटी के कुलपति डा. प्रियरंजन त्रिवेदी से 2013 में अनामी शरण बबल ने बातचीत की। पेश है बातचीत के मुख्य अंश




दिल्ली यूनीवर्सिटी  द्वारा 2013 -14 से बीए विद ऑनर्स  पाठ्यक्तम को चार साल का कर दिया गया है। इसको लेकर  यूनीवर्सिटी सहित इसका जमकर विरोध भी हो रहे है। चार साला पाठ्यक्रम का देश के जाना माने शिक्षाविद डॉ प्रियरंजन त्रिवेदी  ने कड़ा विरोध जताया है। वे इस पैसले को ही बेकार और केवल समय की बर्बादी माना है। देश में दो दो यूनीवर्सिटी ग्लोबल ओपन युनिवर्सिटी (नागालैण्ड)  तथा इंदिरा गांधी टेक्नोलॉजिकल एंड मेडिकल साइंसेज यूनिवर्सिटी (अरुणाचल प्रदेश)  के संस्थापक कुलाधिपति डॉ प्रियरंजन त्रिवेदी एक अनूठे चिंतक हैं। शैक्षणिक चिंतक होने के साथ साथ पर्यावरण और कृषि विशेषज्ञ डा. त्रिवेदी ज्यादातर देशी समस्याओं पर गहरी पकड़ और बेबाक नजरिया से तल्ख टिप्पणी करते है। इनकी टिप्पणियों में तलख्यित के साथ साथ सरकार और नौकरशाही की बेऱूखी को लेकर काफी रोष है.। जल जंगल जमीन जानवर जनजीवन पर्यावरण प्रदूषण बाढ़ सूखा अकाल  और प्राकृतिक – मानवीय आपदा पर भी ये काफी चिंतित हैं। मगर शिक्षा और सेहत के अंधाधुंध व्यावसायिक करण से स्वास्थ्य और शैक्षणिक वातावरण में पैसे की चमक दमक से  डा. त्रिवेदी  विचलित है। तमाम ज्वलंत मुद्दों पर संस्थापक कुलाधिपति डॉ प्रियरंजन त्रिवेदी से वरिष्ठ  पत्रकार अनामी शरण बबल ने लंबी बातचीत की। प्रस्तुत है बातचात के मुख्य अंश: ---
सवाल – इसी साल से दिल्ली यूनीवर्सिटी ने बैचलर कोर्सेज विद ऑनर्स के तीन साल के पाठ्यक्रम को चार साल का कर दिया है। इसे आप किस तरह देखते है ?
जवाब – यह एक गलत और बेकार सा फैसला है, जिसे दो चार साल के बाद वापस लेना पड़ सकता है।   दिल्ली यूनीवर्सिटी जैसे केंद्रीय यूनीवर्सिटी  द्वारा इस तरह के अवैज्ञानिक और अतार्किक फैसलों से ही शिक्षा में अंतरविरोध बढ़ता और पनपता है। चार साल के पाठ्यक्रम  से छात्रों को केवल एक साल की बर्बादी के अलावा कुछ और नहीं हासिल होने वाला है।. एक तरफ सरकार के पास नौकरियों की कमी है लिहाजा मुझे तो लग रहा है कि ज्यादा से ज्यादा समय तक छात्रों को पढ़ाई में व्यस्त रखने की यह केवल एक सरकारी चाल भी हो सकती है। ,जिसे दिल्ली यूनीवर्सिटी के जरिये लागू किया जा रहा है। एक तरफ सरकार नौकरियों की उम्र सीमा तो बढ़ा नहीं रही है ?  लिहाजा सरकार का यह फैसला लाखों छात्रों के कैरियर को प्रभावित करने वाला है।
सवाल – डीयू के इस फैसले के खिलाफ क्या होना चाहिए  ?
जवाब – आप देखते रहे हमलोगों को कुछ करने से ज्यादा काम दो एक साल के अंदर ही यहां के छात्रों,  छात्र संगठनो और पोलिटिकल पार्टियां ही कर देंगी। यह समय का तकाजा और मांग भी है कि इस तरह के बेकार और एक साल बेकार करने वाले पाठ्यक्रमों को समाप्त कराने  में लोग एकजुट होकर खड़ा हो।
सवाल – सरकार से इस मामले में क्या अपेक्षा रखते है ?
जवाब – सरकार से क्या उम्मीद करेंगे ?   सारा फितूर ही सरकार का करा कराया है। डीयू चूंकि राजधानी में है लिहाजा इसको लेकर होने वाले हंगामे को सरकार अपने सामने ही देखना चाहती है।  एक तरफ चुनावी फायदे के लिए सरकार नौकरी की उम्र बढ़ाकर 65 साल करने पर आमादा है तो दूसरी तरफ देश में करोड़ो बेकार और बेरोजगार युवक उबल रहे है। सरकार का ध्यान इनकी तरफ नहीं है। सत्ता के मोह से बाहर  निकल कर अब देश हित के लिए काम  करने का समय आ गया है।  
सवाल – भारत की शिक्षा नीति पर आपकी क्या धारणा है ?
जवाब --  यह पूरी तरह दोषपूर्ण अवैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला है ।. शिक्षा को बाजार और समय के साथ जोड़ा ही नहीं गया है। शिक्षा को केवल कागजी ज्ञान का माध्यम बनाया गया है.। शिक्षा में सुधार के नाम पर इसको और बदतर किया जा रहा है। तकनीकी शिक्षा के नाम पर छात्रों को तकनीक का प्रवचन पिलाया जाता है, बगैर यह जानने की मनोवैज्ञानिक पहल  किए कि  तकनीकी शिक्षा को एक छात्र द्वारा कितना और किस स्तर तक ग्रहण किया गया। एक इंजीनियर भी मौके पर रहते हुए काम को अपने सामने निरीक्षण करने की अपेक्षा एक हेड मिस्त्री या कारीगर की दक्षता पर निर्भर करता है। इनलोगों की कार्यदक्षत्ता पर देश के बड़े बड़े प्रोजेक्ट की मजबूती का पैमाना तय होता है.।  एक तकनीकी शिक्षा प्राप्त अधिकारी केवल कागजों पर पूरी योजना को साकार करता है, मगर उसको वास्तविक आकार में एक कारीगर ही साकार रूप देता है। , जो रोजाना के अनुभव से दक्ष या माहिर होकर पारंगत बनता है। मौजूदा शिक्षा नीति की यह दुखदाई हालत है कि शिक्षा समाप्त होने के बाद एक छात्र अपना बायोडॉटा बनवाने के लिए भी वह कोई साईबक कैफे के उपर निर्भर होता है.। शिक्षा में प्रैक्टीकल शिक्षा या अभ्यास की भारी कमी है। इस वजह से एक छात्र सही मायने में चार पांच साल की पढ़ाई को अपने जीवन और कैरियर में उतार नहीं पाता। . कागजी शिक्षा से नौकरी तो मिल जाती है, मगर वहां पर भी किसी क्लर्क या सहायक द्वारा ही काम को बताया जाता है।
सवाल – इसमें क्या खराबी है ? कोई भी आदमी किसी काम को समझने पर ही तो बेहतर तरीके से कर सकता है ?
जवाब – क्या आपको इसमें कोई खराबी नजर नहीं आती। एक डॉक्टर, इंजीनियर या वैज्ञानिक को गहन विषयों के बारे में सामान्य सी जानकारी कोई टेक्निशियन या कोई हेल्पर बताएगा ?  यह हमारी शिक्षा प्रणाली का क्या दोष नहीं है कि वह पांच छह साल में भी एक छात्र को पारंगत नहीं कर पाता ?
सवाल – देश की शिक्षा में एकरूपता की भारी कमी है। हर राज्य का अपना अलग शिक्षा बोर्ड या परिषद है। राष्ट्रीय स्तर पर भी सीबीएसई के अलावा और भी कई बोर्ड या परिषद है। अलग अलग जातियों या खास समुदायों के अपने पाट्यक्रम और शिक्षा संविधान तक है। इस विभिन्नता या अनेकता को क्या एक दायरे  में करने की जरूरत नहीं लगती ?  
जवाब--  देखिए , अगर किसी देश में शिक्षा के कई बोर्ड या परिषद है तो इसमें को खराबी नहीं है, और ना किसी को इस पर कोई आपति ही होनी चाहिए। हमारा देश अधिक आबादी वाला एक विशाल और विभिन्नताओं वाला देश है। हर प्रांत और उसमें रहने वाले लोगों का अपनी संस्कृति, मान्यता  .लोकाचार और भाषा का अलग संस्कार होता है, जिसे जीवित रखना और संरक्षित करना भी आवश्यक है। इस तरह स्थानीय बोर्ड अकादमी या शैक्षणिक माध्यमों के जरिये ही इन पर पूरा ध्यान दिया जा सकता है। मगर मेरी मान्यता है कि देशज संस्कारों को सहेजने के साथ साथ प्रांतीय लोगों के दृष्टिकोण को राष्ट्रीय और  वक्त के साथ उनको भी अवगत कराने की जरूरत है. एक आधुनिक राष्ट्रीय नजरिये के बिना देश की शिक्षा के स्तर को एकरूप नहीं किया जा सकता। छात्रों पर ज्यादा निगरानी रखने के लिए अलग अलग बोर्ड या राज्य शैक्षणिक बोर्डो का होना आवश्यक है जो एक दूसरे के लिए सहायक भी है। मगर पाठ्यक्रमों में एकरूपता और परीक्षा प्रणाली को लेकर भी एक समान दृष्टि का होना जरूरी है, तभी तो कोई छात्र चाहे मुबंई से हो या किसी दूरदराज इलाके से हो , मगर सबके अध्ययन का पैमाना एक समान ही हो। मगर इसको लेकर देश में अभी तक एक नजरिया नहीं हो सका है । सरकारी और निजी स्कूलों के पाठ्यक्रमों और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी एक रूपता का घोर अभाव है। देश के सभी संस्थानों को इसमें पहल करनी चाहिए।।
सवाल – पहले तो केवल प्राईवेट स्कूल होते थे मगर आज तो देश में एक दो नहीं सैकड़ों प्राईवेट यूनीवर्सिटी भी खुल चुके है. जहां पर लाखों छात्र पढ़ाई कर रहे है ?
जवाब --  प्राईवेट यूनीवर्सिटी से कोई आपति नहीं है , मगर सरकार को यूनीवर्सिटी या डीम्ड यूनीवर्सिटी या इसके समतुल्य मान्यता देते समय पाठ्यक्रमों में एक समान संयोजन की नीति को अनिवार्य करना होगा। मगर आज जितने यूनीवर्सिटी हैं उतने ही प्रकार के प्रयोग और एक दूसरे से बेहतर पाठ्यक्रम को लागू करने की अंधी प्रतियोगिता हो रही है। यह जाने बगैर कि इसका एक छात्र पर क्या असर पड़ रहा है। छात्रों की परवाह किए बगैर केवल अपनी इमेज को औरों से बेस्ट करने की नीयत के पीछे एक छात्र को एक क्लासरूम की बजाय एक शैक्षणिक अनुसंधान के प्रयोगशाला में बैठा दिया जाता है,। जहां पर होने वाले रोजाना के प्रयोगों से एक छात्र किस तरह किस रूप में बाहर निकल रहा है यह किसा से छिपा नहीं है। एक छात्र को उसकी मौलिकता उसके विचारों और उसके नजरिये का सम्मान होना चाहिए। मगर,उसको अपनी प्रतिभा के आधार पर विकसित होने का मौका नहीं दिया जा रहा है।
सवाल –  इसका कारण आप क्या मान रहे हैं ?
जवाब – दरअसल लगभग सभी अभिभावकों को अपने बच्चों पर भरोसा नहीं है। . उनको निजी स्कूल ट्यूशन या ट्यूटर पर ज्यादा यकीन होता है। पढाई के अलावा किसी बच्चें की मौलिक प्रतिभा का परिवार द्वारा अनादर किया जाता है। केवल कागजी ज्ञान या कट पेस्ट की पढ़ाई को ही परिवार टैलेंट की तरह देखता है। बच्चे की मौलिकता के प्रति सामाजिक और पारिवारिक दृष्टिकोण में बदलाव की जरूरत है। खेलों को ज्यादातर परिवारों में सबसे बेकार और बुरा माना जाता है, मगर केवल खेल की वजह से ही दर्जनों खिलाड़ी घर घर के हीरो माने जा रहे है। पारिवारिक समर्थन के बगैर क्या कोई सचिन या धोनी सामने उभर पाते। मेरी धारणा है कि केवल खेल ही नहीं हर तरह की विभिन्नता और लीक से अलग चलन को प्रथा को सम्मान और प्रोत्साहन देना होगा।
सवाल -- शिक्षा में क्या होना चाहिए ?
जवाब – शिक्षा पर लॉर्ड मैकाले के सांस्कृतिक हमले को खत्म करना होगा।. देश को बर्बाद और  विनाश करने की मैकाले पद्धति को हटाना होगा। मैकाले ने शिक्षा को औजार बनाकर देश की संस्कृति पर हमला किया था। हमें बाबूओं वाली शिक्षा से हटकर एक आधुनिक शिक्षा को पढाई में शामिल करना होगा। .शिक्षा को सर्वसुलभ करना और बनाना होगा। आज की शिक्षा गरीबों को केवल अंगूठाटेक साक्षर करने की है। पढ़ाई काफी महंगी हो गयी है, जिसको सबके लिए बनाना होगा। नहीं तो जिसके पास पैसा है वहीं आज पढ़ और अफसर बन रहा है। इससे समाज में असंतुलन की खाई और चौड़ी होगी। सरकार को पहल करनी होगी। हमारे ग्लोबल यूनीवर्सिटी में 3000 पाठ्यक्रम है। .45 पाठ्यक्रम स्पेशल है। ग्रामीणों किसानों को कृषि पर पढाई का पूरा संचार है। ओपन यूनीवर्सिटी में करीब 50 हजार छात्र है जिनको पाठ्यक्रम और गाईड के माध्यम से जोडा जाता है।यह एक अनोखा और अनूठा प्रयास है, जहां पर पैसे से ज्यादा गुण और कौशल को तराशने की चेष्टा की जाती है। पढाई बाजार की जरूरत है।  विदेशों में उसका उपयोग किया जाता है, जबकि हमारे यहां शिक्षा बाजार और रोजगार से ना जुड़कर व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का आधार माना जाता है। यही वजह है कि पढ़ा लिखा आदमी सामाजिक ना होकर समाज के लिए सबसे बेकार हो जाता है, क्योंकि उसकी कोई उपयोगिता ही नहीं रह जाती। मूल्यपरक शिक्षा होने पर ही एक आदमी को अपनी सामाजिक उपयोगिता और दायित्व का भान होगा। जिसके ले सामाजिक समरसता और कार्य के प्रति सम्मान को भाव होना जरूरी है। सरकार को युवाओं के रोजगार के लिए बाजार देना होगा तभी तो समाज का हर तरह का आदमी कुटीर उधोग के मार्फत भी समाज के साथ जुड़ा रहेगा।
सवाल – आपने दो दो यूनीवर्सिटी की स्थापना की है । इसकी क्या जरूरत पड़ी और आपके ये यूनीवर्सिटी औरों से अलग और बेहतर किस तरह है ?
जवाब – हमने देखा कि शिक्षा के नाम पर जो होना चाहिए वो नहीं हो पा रहा है, तभी मैंने  द ग्लोबल ओपन युनिवर्सिटी (नागालैण्ड)  तथा इंदिरा गांधी टेक्नोलॉजिकल एंड मेडिकल साइंसेज यूनिवर्सिटी अरुणाचल प्रदेश की स्थापना की  मैं इसका संस्थापक कुलाधिपति हूं। इसमें सैकड़ों वो पाठ्यक्रमों को लागू किया गया है जो कहीं नहीं शिक्षा का आधार बना है। मैनें शिक्षा को रोजगार और बाजार से जोड़ा है.। 2100 से ज्यादा पाठ्यक्रमों की मान्यता के लिए मेरी फाईले सरकारी टेबलों पर रूकी पड़ी है। जिससे सरकार को अपनी शिक्षा में दोशी मान्यताओं से जोड़ने का मौका मिलेगा। देश की प्राचीनतम 355 दवा रहित चिकित्सा प्रणालियों की मान्यता के लिए मैं सालों से सरकार से लड़ रहा हूं। मगर मैंने पहले ही कहा था कि हम नवीनती पर विचार करने की बजाय पीछलग्गू की तरह पुरानी लीक पर ही चलना चाहते है। 355 पैरामेड़िकल चिकित्सा प्रणाली की मान्यता से सरकार को घाटा तो नहीं है पर करोड़ों लोगों को इसका फायदा तो मिल सकता है। इसकी पढाई होगी और तमाम साधनों को एक पहचान मिलेगी। इससे लाखो लोग रोजगार पाएंगे। ये चिकित्सा पद्धति हमारे देश में प्रचलित भी है पर सरकार को इसको अपना मानकर दावा करना चाहिए। इस पर दुनियां भर में काम हो रहे है और लाखो लोग इसके इलाजा से ठीक भी हो रहे है। मगर सरकार की उपेक्षा कब टूटेगी ?  यही इच्छाशक्ति सरकार और नौकरशाहों में नहीं है। हमारे देश में हजारों कॉलेजों की कमी है। तमाम तकनीकी संस्थानों को देश के उधोगों से जोडा जाना चाहिए ताकि वे एक छात्र को तराश कर अपने यहां रोजगार दे और उनको प्रशिक्षित करने का खर्चा वहन करे। शिक्षा के व्यय को कम किया जा सकता है, मगर इसके लिए सरकार को ही तो उपाय और साधनो को आकार देना होगा।
सवाल – सरकारी लापरवाही या उदासीनता को आप किस तरह देखते है ?
जवाब --   आज देश का हाल बेहाल ही उदासीनता या काम को फौरन करने  की बजाय कल पर टालने की नीति से हो रही है।  कड़ाके  की ठंड़ में भी देश की रक्षा के लिए हौसले को बनाए रखना पड़ता है।  मगर देश के नौकरशाह और सरकार का रवैया इन बहादुरों के प्रति भी नकारात्मक है। पड़ोसी देशों से रिश्ते जगजाहिर है।. बांग्लादेश जैसा देश जिसको अलग देश बनवाने में भारत की भूमिका रही है वो भी हमारे सैनिकों को मारकर जानवरों की तरह फेंकता है और हमारे नेता केवल रेड़ियों और न्यूज चैनलों पर धमकी देकर चुप हो जाते है। पाकिस्तान के सामने हम पिछले सात दशक से दब्बू बने हुए है।  मामला बाहरी या आंतरिक सुरक्षा का हो मगर, हर मामले को निपटारे से पहले लाभ हानि को देखा और परखा जाता है। देश के भीतर ही देखिये लगभग हर राज्य में कोई ना कोई बड़ी समस्या उबल रही है। उदासीनता या वोट बैंक की वजह से मामले को दशकों तक लटकाया जाता है। बाद में वही समस्या भयानक हो जाती है, तब जाकर मामले पर गौर किया जाता है. ।  
सवाल –  इसे जरा और स्पष्ट करे ?
जवाब – देश को आजाद हुए करीब करीब 70 साल होने वाले है।  इस दौरान 14 दफा लोकसभा चुनाव हुए.। देश में करीब 50 साल से भी अधिक समय तक एक ही पार्टी सत्ता में रही है, इसके बावजूद एक सभ्य  समाज और देश के विकास के लिए सबसे जरूरी पानी बिजली परिवहन सड़क शिक्षा सफाई और  स्वास्थ्य की सुविधाओं का भी पूरा इंतजाम नहीं किया जा सका है। गांव हो या शहर या फिर राजधानी दिल्ली हो या कोई भी महानगर,  हर जगह नागरिकों को इसकी कमी है। इंतजाम पर करोड़ों खर्च होने के बाद भी सुविधा का अभाव क्या दर्शाता है।. सरकारी स्कूल हो या कॉलेज,  सरकारी अस्पताल की बजाय लोग प्राईवेट अस्पताल में जाना ज्यादा पसंद करते है। काम के प्रति लापरवाही का मुख्य कारण एक कर्मचारी के मन से नौकरी के खतरे का भय का नहीं होना है. जिससे एक कर्मचारी बेखौफ होकर उदंड़ हो जाता है।  


सवाल -- चलिए मान लेते है कि हर जगह गलत और गलत ही हो रहा है, मगर शिक्षा नीति से कोई समाधान आपके पास है ?
जवाब – क्यों नहीं। भारतकी दोषपूर्ण शिक्षा नीति या प्रणाली से बेकारी अशांति हिंसा आतंकवाद और प्रदूषण की समस्या सिर उठा चुकी है. इनके सामने सरकार और सरकारी आलाकमानों ने समर्पण सा कर दिया है। इसको नियोजित तरीके से ही समाधान किया जा सकता है। बेकारी से समाज में अशांति का माहौल बढ़ता है। . अशंति में हिंसा आंतकवाद और तस्करी बढ़ जाती है। युवावर्ग को छोटे छोटे साधनों और स्वार्थो के लिए खरीदा जा रहा है। समाज में हर तरफ प्रदूषण का साम्राज्य है. हर तरह का प्रदूषण का बोलबाला है। यहां पर सबसे अच्छा समाधान है कि इन तमाम समस्याओं को आपस में मैत्री करा दी जाए। इससे तमाम समस्याओं में एक समन्वय संतुलन पैदा होगा। समाज में इको  फ्रेणडली इकोलॉजी पनपेगा। देश भर में नर्सरी बनाए जाए। पौधों की नर्सरी से समाज में पर्यावरणीय प्रबंधन को लेकर नयी दृष्टि का विकास होगा। कचरा प्रबंधन को लेकर समाज में नये उधोग का विकास होगा। इस तरह बेकारी अशांति हिंसा अपराध और लूटमार की बजाय कूड़ा सबके लिए रोजगार और कमाई का साधन बन जाएगा। इससे जैविक खाद्य बनाया जाएगा और देश भर में एक नए समाज की रूपरेखा प्रकट होगी। विदेशों में भी कचरा प्रबंधन को लेकर शोध होंगे। ( हंसते हुए ) पाकिस्तान को यदि इस कचरा प्रबंधन और जैविक खाद्य के बारे में पत्ता चल जाए तो आतंकवाद और सोने की तस्करी को छोड़कर इसके माध्यम से अपने देश की तकदीर बदलने में लग जाएगी.।
सवाल---, एक सौ मे 99 बेईमान, फिर भी अपना भारत महान, चारो तरफ जय जयकार है और आदमी यहां पर बेबस लाचार है। इस तरह की छवि और आम धारणा के बीच आप देश और देश के संचालकों नीति नियंताओं पर क्या राय रखते है ?
जवाब – देश एक गंभीर संकट के दौर में है। स्वार्थी शासकों लालची नौकरशाहों और अदूरदर्शी संचालकों की समाज निर्माण के प्रति उदासीन नीतियों से देश संचालित हो रहा है। देश को विकासशील देशों की कतार में लाने की ठोस पहल की बजाय नेताओं की जुबानी बयान से ही देश आगे बढ़ रहा है। देश की सुरक्षा को लेकर भी यहीं जुबानी जंग जारी है।  पूरी दुनियां हमारे देश के नेताओं और नौकरशाहों की कागजी बहादुरी को जान गयी है। सरकार  किसी समस्या को सुलझाने की बजाय उसे यथावत बनाए रखना चाहती है। देश को बेहतर बनाने की बजाय कोई आफत ना हो। बस इसी सावधानी से सरकार चलाते है। डर डर कर सरकार चलाने वाली पार्टियां करप्शन घोटालो और देश को बेचने वाली नीतियों को लागू करते समय तो नहीं डरती है पर देश हित के लिए कोई भी कड़ा फैसला लेते समय वोट बैंक का ख्याल करके लाचार हो जाती है। इस तरह के शासकों से देश को कभी आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी नहीं बनाया जा सकता।  
सवाल—इसका देश पर क्या असर पड़ता है ?
जवाब – इसका असर तो आप हर तरफ हर स्तर पर देख ही रहे है।. नेताओं के चरित्र को देखकर सत्ता की पूरी कमान आज नौकरशाहों और बाबूओं के हाथों में चली गयी है। इनके भीतर शासकों का डर खत्म हो गया है। यहां पर शासकों में ही नौकरशाहों और बाबूओं को लेकर डर व्याप्त है। सत्ता में रहने वाली हर पार्टी के नेता अपनी पसंद के ब्यूरोक्रेट को अपना सारथी बनाता है। मंत्री अपने सारथी नौकरशाह पर निर्भर रहते है और वो ब्यूरोक्रेट अपनी अंगूलियों पर नेता को नचाता है.। उसको लाभ पहुंचाता है और मंत्री के नाम पर अपने खजाने और ताकत को बढ़ाता रहता है। उसके लिए अपने मंत्री को खुश रखना और चापलूसी करके उस पर कायम अपने विश्वास को अटल बनाये ऱखना जरूरी है। हमारे नेताओं का नौकरशाहो पर निर्भर होने का ही नतीजा है, कि वे लोग एक दूसरे के रक्षक बनकर लूटमार में लगे है। सत्ता, नौकरशाहों और बाबूओं की तिकड़ी के एक साथ हो जाने का असर सरकारी सेवाओं साधनों और संस्थानों पर दिखने लगता है। खुलेआम करप्शन और सुविधा शुल्क के बगैर कामकाज नहीं हो पाता। लोग लाचार बेबस है फिर भी ज्यादातर सरकारी कर्मचारियो में डर संकोच नहीं रह गया है। लोगों की लाचारी पर भी सरकार और नौकरशाहों का ध्यान नहीं जाता।  
सवाल – क्या आप अपने विचारों और साधनों को लेकर सरकार से कभी वार्ता की है  ?
जवाब – एक बार नहीं कई बार, मगर सरकारी प्लानरों और विशेषज्ञों को इन चीजों में ना कोई दिलचस्पी है और ना ही वे इस तरह के समाधान को लेकर कोई उत्सहित है। देश की बेकारी से लेकर तमाम ज्वलंत मुद्दों पर भी नौकरशाहों की उदासीनता सबसे बड़ी कठिनाई बन जाती है।
सवाल – विदेशों में आपके विचारों और उपायों को लेकर क्या धारणा है  ?
जवाब -  मैं एक भारतीय हूं, लिहाजा मेरी पहली जिम्मेदारी और सपना अपने देश के लिए है। विदेशों में तो नवीन विचारों मौलिक उपायों को गंभीरता से सुना और लिया जाता है। वहां की ब्यूरोक्रेसी और पोलटिशियन को लगता है कि इससे देश का भला हो सकता है तो त्तत्काल एक कमेटी द्वारा उसका विशेलेषण किया जाता है और खर्चे से लेकर अंतिम निराकरण और लाभ घाटे का हिसाब लगाकर मान्यता दी जाती है , या ज्यादा लाभप्रद ना मानकर उसको रद्द कर दिया जाता है। इसके बावजूद दोनों ही हालात में छोटे स्तर पर एक पायलेट प्रोजेक्ट शुरू होता है। पूरी टीम की मेहनत और सलाह मशविरा के उपरांत चर्चा होती है। उसको ज्यादा लाभप्रद और बजट पर लेकर माथा पच्ची की जाती है। तब कहीं जाकर उसको देश में लागू किया जाए या लंबित रखा जाए इसका फैसला किया जाता है। यह सब हमारे देश में संभव नहीं है। हम नयेपन को तरजीह देने की अपेक्षा पीछे पीछे चलने के रास्ते को ज्यादा आरामदेह मानते है। यही वजह है कि देश की प्रतिभाएं देश से बाहर जाकर ही अपना सिक्का मनवा पाती है। देश में नाना प्रकार की दिक्कतों और उदासीनता से जूझने के बाद जब देश का टैलेंट बाहर जाकर नया काम करते हुए नाम कमाता है तब कहीं जाकर हमारा देश उसकी आरती उतारने और सम्मान देकर भारतीय होने पर गौरव मान लेती है। देश की प्रतिभाओं ने विदेशों में जाकर हर जगह अपना ड़ंका बजाया है, और बजा रहे है, मगर देश में उनको तमाम साधनों के ज्यादा समस्याओं से लड़ना पड़ता है। हमें नकलची बनने की बजाय टैंलेंट को मान सम्मान देना होगा । केवल जुबानी बयानबाजी या महज औपचारिकता के लिए बयान देने की बजाय सार्थक तरीके से काम करना होगा।
सवाल – क्या आपको यह मुमकिन लग रहा है ?
जवाब— नामुमकिन तो इस संसार में कुछ भी नहीं है, मगर उसके लिए स्वार्थ और दलगत भावना से उपर उठकर देश समाज और आम नागरिकों के लिए कुछ कर गुजरने की चाहत जरूरी है। हमारे यहां युवा आ तो रहे है, मगर नया कुछ करने की बजाय करप्शन में नया नया रिकार्ड बना रहे है। इस तरह के नैतिक मंद युवाओं से देश का तो कभी भला हो ही नहीं सकता। इसके लिए शिक्षा कार्यप्रणाली में आमूल परिवर्तन की नए सोच की और देश को एक समय के भीतर टारगेट मानकर काम करने की जरूरत है। फिर देश में इस समय युवाओं की तादाद काफी है, लिहाजा उनको अपने साथ लेकर कुछ करना होगा। पर्यावरण, खेती किसान और पैदावार को बचाना होगा। देश की नदियों को लेकर सरकार को गंभीर होना पड़ेगा। तभी पर्यावरण और देश की कृषि को नया जीवन मिलेगा। हर राज्य में किसानों की असेम्बली बनानी होगी तथा किसाल और उनकी समस्.ओं को मुख्यधारा में रखना पड़ेगा। विकास तो मानवीय बनाना होगा, मगर देश में विकास की नीति ही मानव विरोधी है।. पेड़ों पहाड़ों नदियों प्राकृतिक संसाधनों को खत्म करके हमारे देश में जो विकास का मॉडल है वो पूरी तरह सामाजिक नरसंहार जैसै है. पेयजल सहित जल जंगल और पर्यावरण की चिंता किए बगैर किया जा रहा है। यह कैसा विकास है जहां पर मानव ही सुरक्षित ना हो।  पर्यावरण शिक्षा से ही धरती माता को बचाया जा सकता है,  जिसके लिए युवाओं को आगे आना होगा। विश्व पर्यावरण महासम्मेलन के आयोजनों को पूरी दुनियां में लगातार करते रहना होगा, तभी इसके प्रति लोगों में जागरूकत्ता आएगी.
सवाल –  लोकतंत्र की धारणा है कि यह जनता द्वारा जनता की जनता के लिए बनाई गई सरकार होती है , और इसमें सबसे बड़ी भूमिका एक जनता की ही होती है ?    
जवाब – आपका कहना एकदम सही है। देखने में तो यह सत्ता की एक अनोखी परम्परा सी दिखती है, मगर लोकतंत्र वास्तव में एक समय के बाद भीड़तंत्र या अराजक आपराधिक चेहरों की समूह बन जाती है।  तमाम दलों को अपने वोटरों के रूख और समर्थन का पत्ता होता है। ज्यादातर पार्टियां पूरे देश को अपना मानने की बजाय एक खास वर्ग या समूह को ही सत्ता की पूंजी मान लेती है। यहां पर सोच का दायरा सिकुड़ जाता है। छोटे छोटे दलों का एक महाजनी चेहरा प्रकट होता है जो भले ही देश की बात करते हो, मगर उनका पूरा ध्यान केवल अपने इलाके अपने वोट बैंक और अपने हितों पर रहता है। और वे सत्ता में ज्यादा से ज्याद ब्लैकमेल करके अपनी मांगे मनवाने पर ध्यान देते हैं।
सवाल – लगता है कि हमारी बातचीत का पूरा लाईन ही चेंज हो गया है । कहां तो बातचीत शिक्षा से शुरू होनी थी और हमलोग कहां आकर ठिठक गए ?  
जवाब – नहीं हमें तो लग रहा है कि बातचीत पटरी पर है, क्योंकि जब जीवन बचेगा समाज है और समाज की मुख्यधारा में आशाओं और विश्वास की संजीवनी बची रहेगी, तब तक लोगों में और समाज में संघर्ष का माद्दा भी बना रहेगा। शिक्षा तो समाज और लोगों के उत्थान की केंद्र बिंदू है। मगर आज तो समाज और इसके मुख्य स्त्रोतो को बचाने की जरूरत है। हमारे यहां की नदियां सूख चली है. देश के 90 फीसदी तालाब झील और गांवो के पोखर सूख गए है। जलस्तर पाताल में चले जाने से हैंड़पंप और कुंए बेकार हो गए। शहरी कचरा नदी के किनारे के शहरों और बस्तियों को लील रही है। जीवन दायिनी होने की बजाय नदियां मानव विनाशकारी हो गयी है। पानी की कमी को पूरा करने के लिए गंदे पानी को रीट्रीट करके गंदे पानी को ही शोधित पेयजल के तौर पर दिया जा रहा है। खाने के नाम पर हमलोग जहर खाने को लाचार है.। खेतो में खाद और कीटनाशक दवाईयों के नाम पर पेस्टीसाईज का जम कर छिड़काव हो रहे है, जिससे खेतों की उर्वरा क्षमता पर ही असर पड़ रहा है। दवाईयों के नाम पर जिस तरह मानव सेहत से  खिलवाड़ हो रहा है। बिजली की कमी को पूरा करने के लिए बड़ी बड़ी नदियों के प्रवाह को रोका जा रहा है, तो पहाड़ों को काटा जा रहा है । बिजली के नाम पर भूकंप जलप्रलय और विभीषिका को हमारे प्लानर और इंजीनियर न्यौता दे रहे हैं। उत्तराखंड विनाश के भयानक तांड़व से भी कुछ  सीखने के लिए हम तैयार नहीं है। है। ।  

बुधवार, 20 सितंबर 2017

राजरंग में है फूलों की खुश्बू





रंग बिरंगे फूलों से सुसज्जित एक मोहक गुलदस्ता

अनामी शरण बबल

साक्षात्कार लेना सरल नहीं होता। पत्रकार एक हमलावर सा उन तमाम सवालों को सामने रखता है, जिससे अमूमन सामने वाला व्यक्ति साफ बचना चाहता है। आरोपों-प्रत्यारोपों, हमलावर सवालों और साफ साफ बच निकलने की यथा-कोशिशों के बीच ही मूलत: साक्षात्कार केंद्रित होता है। ज्यादातर आम पाठकों को भी साक्षात्कार पढ़ने की ललक होती है। बिना लाग लपेट साफ साफ बातों की प्रस्तुति ही एक साक्षात्कार की सफलता और पत्रकार की कार्यकुशलता वाकपट्टुता, हाजिरजवाबी, तथा अपने कार्य की निष्ठा को प्रदर्शित करता है।

आम पाठकों में काफी लोकप्रिय होने के बाद भी आमतौर पर साक्षात्कारों पर आधारित या बहुत सारे साक्षात्कारों को संकलित करके एक किताब की तरह प्रस्तुत करने की परम्परा अभी खासकर हिन्दी जगत में प्रचलित नहीं है। यही कारण है कि कविता कहानी नाटक उपन्यास आदि की तो अनगिनत किताबें बाजार से लेकर रेहड़ी पटरी की दुकानों पर पुरानी किताबों के बाजारों मेलों में मिल जाएंगी, मगर साक्षात्कारपरक पुस्तकों का नितांत अभाव है। प्रकाशन क्षेत्र में इस दुर्लभ श्रेणी की परम्परा को पाठकों के बीच हाजिर करने की इस महत्ती प्रयास की  सराहनीय है। बतौर एक पत्रकार 20-25 पहले किए गए साक्षात्कारों को इतने लंबे समय तक सहेजकर रखने और इसकों किताब के रूप में प्रस्तुत करने की ललक के लिए पत्रकार संजय सिंह को बहुत बहुत बधाई कि महानगरीय पत्रकार का चोला ओढने के बाद भी इनके भीतर का एक कोमल संवेदनशील पत्रकार अभी जिंदा है।

किसी कथा कहानी संग्रह की तरह ही इस किताब राजरंग को भी साक्षात्कार संग्रह ही कहा जाना ही इस किताब की मान्यता और इस रचनात्मक परम्परा के प्रति ज्यादा न्याय-संगत  होगा। साक्षात्कार संग्रह राजरंग में कुल 25 लोगों के 32 साक्षात्कार संकलित है। ज्यादातर इंटरव्यू बहुत लंबें नहीं है,,जिससे पाठकों को पल भर में देख लेने की एक और सुविधा मिलती है। मगर आकार प्रकार में लंबोदर नहीं होने के बाद भी इंटरव्यू की गुणवत्ता सहजता सरलता सटीकता और मारक प्रभावी उद्देश्यों से कहीं भी कोई इंटरव्यू  कहीं भटकता हुआ नहीं दिखता है। हर इंटरव्यू का एक उद्देश्य परिलक्षित होता है। खासकर बेहद बेहद पुराने और लगभग अप्रांसगिक से हो गए इंटरव्यू को ( हर साक्षात्कार के साथ) एक समकालीन टिप्पणी के साथ यह बताया गया है कि लिया गया इंटरव्यू कब और क्यों है और उस समय की तात्कालिक स्थितियां कैसी थी। इस तरह के परिचायक टिप्पणी के बाद पुराने इंटरव्यू को पढ़ने देखने और समझने की मानसिकता को बल मिलता है। लगभग अप्रांसगिक से हो गए उसी इंटरव्यू के प्रति फिर नजरिया भी बदल जाता है।
खासकर लालू यादव और शरद यादव के तीन तीन इंटरव्यू है। जिसमें लालू की तीन हालातों में बयान और टिप्पणियों पर भी अलग छाया दिखती है। खुद को ईमानदार और बेदाग दिखने दिखाने की उत्कंठा के बीच लालू यादव एक ताकतवर नेता होने के बाद भी आमलोगों के लिए प्रेरक कभी नहीं बन सके। दूसरों की केवल गलती देखने की भूख ने ही यादव परिवार को सपरिवार कटघरे में खड़ा कर दिया है। इसके बावजूद सपरिवार लालू यादव में आत्म मूल्यांकन से बचने की कमी ही इस परिवार की विफलता का मुख्य वजह है। पत्रकार संजय के साथ अनौपचारिक रिश्तों के कारण ही लालू में ही यह दम था (और है) कि कांग्रेस मुखिया के आसपास घेरा डाले कुर्सीछाप नेताओं पर कमेंट्स करके भी वे सोनिया के लिए संकटमोचक बने रहे। शरद यादव के भी इसमें तीन इंटरव्यू है। ज्ञान जानकारी और शिष्टता के मामले में काफी संयमित (आक्रामक भी) संतुलित से शरद यादव के इंटरव्यू को पढ़ना ज्यादा रोचक लगता है। कहीं कहीं पर आक्रामक तो कभी मीडिया से भी शिकायत करने और रखने वाले शरद की बातों में एक खास तरह की सहजता है जिससे तीखी बातें भी बहुत खराब नहीं लगती। समय की पदचाप को भांपने में विफल या देश को ज्यादा प्रमुऱता देने वाले शरद इस समय एनडीए के सहयोगी बनकर मंत्री बन सकते थे। ताजा मंत्रीविस्तार में जेडीयू को केंद्र में कोई जगह नहीं मिली। शायद शरद यदि जेडीयू में होते तो प्रधानमंत्री इनकी उपेक्षा नहीं कर पाते, क्योंकि शरद यादव में ही परिणाम की परवाह किए बगैर यह  कहने का दम है कि देश की सबसे बड़ी बीमारी जातिवाद है।

दलित आधारित साक्षात्कार होने के बाद भी रामविलास पासवान के मानवीय संस्कार और पारिवारिक धरातल को खंगालने की पहल ज्यादा है। पसंद नापसंद विफल अभिनेता बेटे और सिनेमा आदि पर भी पासवान के जवाब पाठकों को सुकून देता है। दलबदल और समय के साथ समझौता नहीं हो पाने या मुलायम परिवार के प्रस्ताव को यह कहकर नकार देना कि मेरी कर्मभूमि बिहार है। यह निष्ठा ही पासवान की सबसे बड़ी ताकत है कि बिहार की राजनीति में (से) इनको कभी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
कर्नाटक में कई बार मुख्यमंत्री रहे समाजवादी नेता और पूर्व पीएम चंद्रशेखर के बतौर शिष्य की तरह मान्य रामकृष्ण हेगडे के इंटरव्यू से इस किताब की शुरूआत होती है। इस बेहतरीन इंटरव्यू में एक नेता के राजनीतिक सामाजिक पारिवारिक वैज्ञानिक सोच तथा साहित्यिक संस्कारों की रोचक अभिव्यक्ति हुई है. बहुत सारे सवालों को जिस सहजता और सौम्यता के साथ जवाब दिया गया है वह हेगड़े के कद को ज्यादा सम्मानजनक बनाता है। यह हेगडे जैसे ही बड़े दिल वाला कोई नेता कहने का साहस कर सकता है कि तमाम दलों और नेताओं के प्रति अपनी क्या धारणा है। इसे पढना हर पाठक को सुहाएगा।
दिल्ली की सीएम से भूत (पूर्व) सीएम हो गयी शीला दीक्षित के इंटरव्यू में चालाकी और दूसरों के प्रति निंदारस झलकता है। शांत और बेहतरीन व्यावहार कुशल होने की यह कौन सी खासियत (?) है कि नाना प्रकारेण आरोपों के बाद भी खुद को बेदाग और जमाने को चोर कहकर निकल जाए। यह पब्लिक सब जानती है मैड़मजी कि यदि 70 सदस्यीय विधानसभा में आप को 67 /3  के सुपर जीत के परिणाम में यदि कांग्रेस का खाता भी ना खुले और खुद शीला जी भी चुनावी भौसागर में डूब जाए तो इस हाल में बेदाग कहना अपनी ही बेइज्जती मानी जाएगी।     
चमत्कारी व्यक्तित्व के स्वामी योगी आदित्य का इंटरव्यू भी बेहद रोचक और पठनीय है। सांसद और यूपी के सीएम के तौर पर काम कर रहे योगी के इंटरव्यू पर लिखित टिप्पणी भी बेहद रोचक और संबंधों को नया आयाम देता है। पौड़ी गढ़वाल से किस तरह गोरखपुर आए और बतौर गोरक्षपीठ के महंत से लेकर सासंद और अब मुख्यमंत्री का दायित्व संभाल रहे योगी को गोरखपुर में लोग महाराज जी कहते है। इनसे अपने संबंधों की निकटता को प्रदर्शित करते हुए पत्रकार नें एकदम खांटी पत्रकार बनकर इंटरव्यू किया है। जहां पर रिश्तों का संकोच नहीं दिखता। संबंधों को दरकिनार करके पत्रकारीय मूल्यों के साथ न्याय करना संभव नहीं होता मगर चरण स्पर्श करके मान देने वाले पत्रकार संजय सिंह का यह बेलौस धाकड़ इंटरव्यू इनकी पेशेगत ईमानदारी को सम्मानजनक बनाता  है।
कांग्रेसी नेताओं में बौद्धिक इमेज रखने वाले जयराम रमेश का इंटरव्यू दलगत खाने से बाहर निकलने वाले एक नेता की छवि को मजबूत करता है। ज्यादातर सवाल आप और केजरीवाल पर ही है मगर लगता है कि दिल्ली के सीएम ने जयराम रमेश की एक बात मान ही ली है । रमेश ने केजरीवाल को एक सलाह दी थी वे प्रॉमिस कम करे, काम ज्यादा करे। गवर्नेस इज नॉट राकेट साइंस। ही शुड टॉकलेस। लगता है कि सलाह मानकर ही अब केजरीवाल बातें कम और काम ज्यादा करने की नीति को अपना सूत्र बना लिया है। सलमान खुर्शीद के इंटरव्यू में भी पार्टी के भीतर मुस्लिमों अल्पसंख्यकों के वोट छिटकने का दर्द है, तो इस वोट को सहेजने की चिंता भी है । वहीं महाराष्ट्रीयन पृष्टभूमि से आने वाले अब्दुल रहमान अंतुले का इंटरव्यू भी पठनीय है। भारत के मुस्लमानों की सामाजिक आर्थिक शैक्षणिक दशा दिशा पर सच्चर समिति की रिपोर्ट के संसद में रखे जाने के बाद यह इंटरव्यू लिया गया है। जिसमें तमाम विवादों हालातों तथा सामाजिक हालातों पर बातचीत की गयी है। बातचीत जितनी उम्दा और सारगर्भित बनती जा रही थी उसके हिसाब से यह एक संक्षिप्त और पाठकों को प्यासा रखने वाला  इंटरव्यू है। इसको और विस्तार देने की जरूरत थी, ताकि बहुत सारे प्रसंग और स्पष्ट हो पाते। उतराखंड के सीएम रहे हरीश रावत के इंटरव्यू से भी इनकी पीडा और दुर्बलता जाहिर होती है।
हरियाणा के राज्यपाल रहे महावीर प्रसाद और किस्मत से बिहार के मुख्यमंत्री बन गए जीतनराम मांझी  का इंटरव्यू आत्मश्लाघा से प्रेरित है। अपने आपको महाबलि समझने की भूल करने वाले इन नेताओं को अपने बौनेपन का अहसास नहीं होना भी भारतीय लोकतंत्र का एक कमजोर पक्ष है। किताब में स्वामी प्रसाद मौर्य मोहम्मद युनूस, क्रिकेटर कीर्ति आजाद, नरेश अग्रवाल, दिनेश त्रिवेदी, डा. सैफुद्दीन सोज, और जोलम ओरम के इंटरव्यू से अलग अलग पीडा और चिंता सामने आती है। मगर इंटरव्यू की संक्षिप्तता से पाठकों का मन नहीं भरेगा।
कुछ अलग हटकर देखे तो जवाहरलाल नेहरू यूनीवर्सिटी के छात्र नेता रहे डी.पी.त्रिपाठी के इंटरव्यू में इस शिक्षा संस्थान की सोच और खुलेपन को समझने में आसानी होगी। पत्रकार से एक नेता की दूसरी बीबी बनी और बाद में वैवाहिक खटास के बाद खुद को राजा मतंग सिंह कहलवाने के शौकीन मंतग सिंह की नंगई और उससे संघर्ष कर रही बीबी नंबर टू मनोरंजना सिंह की पीड़ा और सामाजिक हालात के विरूद्ध होकर युद्ध करने की मानसिकता को समझना रोचक लगेगा। समलैंगिको के अधिकारों के लिए संघर्षशील नाज फाउण्डेशन इंडिया की अंजलि गोपालन का साक्षात्कार और लंबा होता तो और बेहतर बन पाता। महामंडलेश्वर सच्चितानंद गिरि महाराज की आत्मस्वीकृति ही इनकी सबसे बड़ी ताकत और साहस का परिचायक है। किस किस तरह के लोग किस तरह महामंडलेश्वर बन जा रहे हैं यह जानना आस्थावान लोगों के विश्वाल पर गहरा आघात से कम नहीं है। और अंत में यूपी के दिवंगत मुख्यमंत्री वीरवहादुर सिंह के बेटे फतेह बहादुर सिंह का अति संक्षिप्त इंटरव्यू इस बात को जगजाहिर नहीं कर पाता कि किस तरह कांग्रेसियों ने इनके पिता और केंद्रीय संचार मंत्री की फ्रांस पेरिस में दौरे के समय हत्या करायी थी?
साक्षात्कारों के संग्रह की इस किताब की भूमिका हिन्दी के युवा आलोचक  डा. ज्योतिष जोशी और वरिष्ठ पत्रकार अरूणवर्धन की है। डा. जोशी की यह टिप्पणी सौ फीसदी सही है कि कहना न होगा कि संजय सिंह जैसे कर्मठ और विचारवान  पत्रकार ने इस पुस्तक के माध्यम से भारतीय नागरिकों को सचेत करने के साथ साथ नागरिक धर्म के प्रति जिम्मेदार बनाने का कार्य किया है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। जबकि  अरूणवर्धन की यह टिप्पणी बड़ी मूल्यवान है कि पुस्तक इस दृष्टि से अर्थवान है कि इसमें संकलित नेताओं की चर्चा के बिना भारतीय राजनीति की कोई भी चर्चा अधूरी मानी जाएगी। सबसे महत्वपूर्ण है कि इस पुस्तक कगा प्रकाशन ऐसे मोड़ पर हो रहा है जबकि भारतीय राजनीति के मुहाबरे बदल रहे हैं। शाहदरा के लोकमित्र प्रकाशक ने बड़ी लगन के साथ इस पुस्तक को प्रकाशित किया है। मगर इससे भी ज्यादा उल्लेखनीय पत्रकार संजय सिंह का यह कहना है कि मैं न अपने अतीत में जीता हूं और न भविष्य मे। मैं तो बस अपने वर्तमान से मतलब रखता हूं। और आभार जताने में कहीं से भी किसी से भी कोई कोताही ना करने और रखने वाले पत्रकार संजय की यही खासियत है जो उन्हें भीड़ से अलग करके एक स्वायत्त पहचान देती और दिलाती है।
अंतत इस पुस्तक में भारतीय राजनीति और समाज के विभिन्न प्रकारेण के रंग बिरंगे फूलों को संयोजित करके एक जगह एक सुदंर मोहक और आर्कषक मनभावन गुलदस्ते का रूप दिया गया है। जिसमें कई तरह की खुश्बू और गंध मिश्रित है। कुलमिलाकर सामाजिक संदर्भो को समझने में यह एक उपयोगी और पठनीय संकलन है. जिसका स्वागत किया जाना चाहिए।

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

मोदी के बीजेपी में जेडीयू का साथ रहना गवारा नहीं : केसी त्यागी







22 साल के बाद राज्यसभा के रास्ते संसद में जनतादल( यूनाईटेड) के नेता केसी त्यागी की राजनीति की मुख्यधारा में फिर से वापसी हुई है। इनकी छवि वेस्ट यूपी के एक दिग्गज और धाकड़ नेता की है। तमाम बड़े और दिग्गज नेताओं की कसौटी पर भी ये हमेशा खरे साबित हुए है।  कुशल संयोजक और हर तरह के हालात को मैनेज करने में दक्ष जुझारू और मशहूर होना इनकी सबसे बड़ी खासियत है। तमाम धाकड़ नेताओं में लोकप्रिय रहे राष्ट्रीय यूनाईटेड  के सांसद (  राज्यसभा  )  और अब प्रवक्ता केसी त्यागदी से 2013 में अनामी शरण बबल ने लंबी बातचीत की। उस समय जेडीयू और भाजपा कहे या एनडीए से तलाक हो चुका था। दोनों एक दूसरे को नीचा दिखाने और आरोप प्रत्यारोप  लगाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते थे। मगर सुशासन कुमार के बिहार के दबंग और राजद लालटेन छाप नेता लालू यादव से भी तलाक हो गया। तलाकशुदा जेडीयू पलक झपकते ही पहले सनम एनडीए की अंकशायिनी हो गयी। बदले हाल और हालात में भाजपाईयों पर कटाक्ष को देखना सुनना और पढ़ने का एक अलग सुख होता है। पेश है चार साल पहले लिए गए इंटरव्यू के  मुख्य अंश  : -अनामी शरण बबल-  

सवाल – राष्ट्रीय  जनतांत्रिक गठबंधन ( एनडीए) से जनतादल यूनाईटेड के अलगाव के बाद नयी योजना या रणनीति क्या है ?
जवाब—एनडीए से अलग होना एक बेहद कष्टदायक फैसला रहा, जिसको लेकर घोषना करने में करीब एक साल का समय लग गया। आजादी के बाद गैरकांग्रेसवाद का यह सबसे लंबा और टिकाउ गठबंधन बना था। रोजाना इस तरह के गठबंधन नहीं बनते हैं, जिसमें एक कार्यक्रम को लेकर 17 साल तक साथ साथ रहे। गठबंधन टूटने के बाद भाजपा का रूख हमलावर हो गया है और वो पूरी तरह जेड़ीयू को दोषी ठहराना चाहती है। जिसके खिलाफ बिहार और खासकर अपने इलाके में गोष्ठी सेमिनार पैदल यात्रा जुलूस जनसभा वाद विवाद और नुक्कड़ सभाओं के जरिये बीजेपी की चाल को रखाजा रहा है। हम जनता को बताना चाहते हैं कि इस गठबंदन को तोड़ना क्यों जरूरी हो गया था।
सवाल – जरा हमें भी बताइए न कि क्या ऐसी मजबूरी आ गई कि जब लगने लगा कि बस अब मामला बर्दाश्त से बाहर हो चला है ?
जवाब – देखिए, जब तक बीजेपी में माननीय अटल बिहारी बाजपेयी और लाल कृष्ण आड़वाणी का प्रभाव और दबदबा था, तब तक सामान्य तौर पर हमें कोई तकलीफ नहीं थी, क्योंकि वे लोग आदर के साथ गठबंधन की मर्यादा को समझते थे।  मगर इन वरिष्तम नेताओं के बाद की पीढ़ी में गठबंधन को लेकर पहले जैसा सम्मान नहीं रह गया था।
सवाल – क्यों राजनाथ सिंह का यह दूसरा कार्यकाल है और वे तो इन सीमाओ की मर्यादा को जानते है ?
जवाब-  राजनाथ जी भले ही वहीं है, पर भाजपा ही पूरी तरह बदल गयी है। एक समय दिवगंत श्रीमती इंदिरा गांधी को अपने आप पर इतना घमंड़ हो गया था कि खुद अपने आप को ही इंदिरा इज इंड़िया मानने लगी थी।.इंदिरा इज इंड़िया और कांग्रेस का फल तो आपलोगो ने 1975 के बाद देख ही लिया। यही हाल आजकल भाजपा की हो गयी है।, अटल जी और आड़वणी की जोड़ी से भाजपा एक अलग दिशा में चलती थी, मगर आज बीजेपी मोदी की हो गयी है।  मोदी इज बीजेपी या बीजेपी इज मोदी के इस आधुनिक  संस्करण को कम से कम जेड़ीयू तो बर्दाश्त नहीं कर सकती है। , लिहाजा हमें एनड़ीएक को और बदतर या बदनाम होने से ज्यादा जरूरी यह लगा कि इसको अब तोड़ दिया जाए या इसका साथ छोड़ दिया जाए।
सवाल— एनडीए से अलग होने के बाद आपलोंगों की भावी योजना और रणनीति पर क्या प्रभाव पड़ा है ?
सवाल--  इस पर चिंतन और मंथन हो रहा। सही मायने में देखे तो एनडीए छोड़कर तो हमलोग सड़क पर आ गए है। छत से बाहर निकलने पर तो आशियाना बनाने की नौबत और जरूरत आ पड़ी है।.इस दौर में अपने आप को सुरक्षित रखने की बीजेपी से ज्यादा जरूरत और खतरा तो हमलोंगों के साथ है।
सवाल – इतनी बुरी हालत भी नहीं है त्यागी जी  एक तरफ राहुल गांधी का नीतिश प्रेम जगजाहिर हो चुका है ?
जवाब— (मुस्कुराते हुए) देखिए जब कोई एक जवान लड़की सड़क पर आकर खड़ी हो जाती है, तो उसके पीछे लाईन मारने वालों की फौज लग जाती है। जेड़ीयू के सामने कई ऑफर है, मगर हमें यह तो सोचने का मौका और अधिकार है कि कौन सा बंधन हमारे लिए सबसे भरोसेमंद रहेगा।
सवाल – अच्छा, इसीलिए पूरे ताव के साथ एनडीए को छोड़ भी दिया और गरिया भी रहे है ?
जवाब--  नहीं एकदम नही। आपके आरोप में कोई सत्यता नहीं है। .यह एक दिन का फैसला नहीं था, और ना ही रोज रोज इस तरह के गठबंधन बनते हैं। एनडीए के संयोजक भी शरद यादव जी थे, लिहाजा अपनी पकड़ और प्रभाव भी था,। मैंने पहले भी जिक्र किया था कि अटल और आड़वणी के रहते कभी भी दिक्कत नहीं हुई। 2002 में गुजरात दंगों के बाद एनडीए में तनाव हुआ था, मगर अटल जी ने पूरे मामले को संभाला और काफी हद तक मामले को शांत भी कर दिया। मोदी का प्रसंग सामने आकर भी  मंच से बाहर हो गया। उस समय गठबंधन के अनुसार हमलोग भी इसे  एक राज्य का मामला मान कर छोड़ देना पड़ा। मगर 2011 से ही मोदी प्रकरण उभरने लगा और देखते ही देखते मोदी सब पर भारी होते चले गए। बार बार कहने पर भी मामले को साफ नहीं किया गया, जिससे मोदी को लेकर एनडीए में विवाद हुआ।
सवाल—  यह तो एकदम सच हो गया कि मोदी के चलते ही यह अलगाव हुआ है ?
जवाब – नहीं इस बात में पूरी सत्यता नहीं है। मोदी एक मुद्दा रह है। हमारे बार बार कहने के बाद भी पीएम को लेकर उनकी दुविधा से जनता के बीच भी भम्र बढ़ रहा था। आड़वाणी द्वारा बेबसी जाहिर करने या गतिविधियों को लेकर बीजेपी की उपेक्षा के चलते ही एनडीए में पहले वाली सहजता नहीं रह गयी थी। कई बड़े नेताएं की उदासीनता से संवाद खत्म हो गया था। बीजेपी के नये चेहरो में भी इसको लेकर उत्सुकता नहीं थी, जिसके चलते हमलोगों को एनड़ीए से बाहर होना पड़ा। और हमलोंगो को इसका कोई मलाल भी नहीं है।
सवाल – 2013 में होने वाले कई राज्यों में विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव को आप किस तरह देख और आंक रहे है ?  
जवाब – इन चुनावों को लेकर अभी कोई रणनीति नहीं बनी है।  हम 2013 विधानसभा के परिणाम को देखकर ही अपनी तैयारी और कार्यक्रमों को अंतिम रुप देंगे। 100 से भी कम लोकसभा सीटों पर हमारे प्रत्याशी होंगे, लिहाजा सबों को समय पर मैनेज कर लिया जाएगा।
सवाल – भाजपा के साथ मिलने पर बिहार में जेड़ीयू एक पावर थी, मगर साथ खत्म होने पर आज दोनों कुछ नहीं है। क्या 2015 में होने वाले विधानसभा चुनाव में लालू यादव और रामविलास  पासवान समेत बीजेपी से टकराना क्या जेडीयू के लिए नुकसानदेह हो सकता है ?
जवाब – हो सकता है। इन  तमाम खतरों के बाद भी केवल अपने लाभ या स्वार्थ के लिए घटक में बने रहना हमें गवारा नहीं था। बिहार में 2015 के चुनावी परिणाम कुछ भी हो सकते है। हमें नुकसान भी हो सकता है, इसके बावजूद मोदी के बीजेपी में रहना जेडीयू को गवारा नहीं है। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह से व्यक्तिगत संबंध अलग है मगर पार्टी के संबंधों की एक लक्ष्मण रेखा होती है। फिर अध्यक्ष होकर भी राजनाथ बेबस है। आप देख रहे हैं कि आज हालत यह है कि जो मोदी का जाप करेगा, वही बीजेपी में रहेगा। 1996
सवाल – यानी जेडीयू को लगा कि मोदी से मामला संतुलित नहीं हो पा रहा था ?
जवाब –  गुजरात में मोदी को लेकर कोई दिक्कत नहीं थी, मगर एक विवादास्पद आदमी को एक राज्य में तो सहन किया जा सकता है, मगर एकदम नेशनल हीरो की तरह पेश करने के मामले में जेडीयू बीजेपी के साथ कभी नहीं है।
सवाल – तो क्या मान लिया जाए कि देश में अब विपक्ष की भूमिका समाप्त सी हो चली है ?
.जवाब --  जी नहीं विरोध और खासकर लोकतंत्र में विपक्ष और विरोध कभी खत्म नहीं हो सकता। लोकतंत्र में विरोध और विपक्ष संजीवनी की तरह है, लिहाजा यह तो एक राजनैतिक परम्परा है और यह खत्म नहीं हो सकती। 1969-70 में दीन दयील उपाध्याय और तमाम गैरकांग्रेसी नेताओं ने पूरे देश में इस तरह की हवा बनायी कि देश के करीब 10 राज्यों में गैरकांग्रेसी दलों की सरकार बनी  थी। लिहाजा विपक्ष की भूमिका कब एकाकएक मुख्य हो जाए यह कहना आसान नहीं है।

सवाल --  शायद अब फिर इस तरह का मुहिम ना हो ?
जवाब –  राजनीति में इस तरह का कोई दावा करना बेकार है।
सवाल --   बीजेपी द्वार नरेन्द्र मोदी को फोकस करने के बाद पूरा विपक्ष जिस तरह मोदी के खिलाफ हमलावर होकर पीछे पड़ गयी है, , विरोध के इस शैली को किस तरह देख रहे है ?
जवाब – मोदी का जिस तरह विरोध हो रहा है, मैं उसको एक स्वस्थ्य परम्परा नहीं मान रहा हूं।  चारो तरफ मोदी विरोध की धूम है। मोदी पर इस तरह कांग्रेस हमलावर हो गयी है कि जबरन विवाद  के लिए विवाद हो रहा है। इससे मैं काफी आहत और चकित भी हूं कि एकाएक यह क्या हो रहा है। इसके कई खतरे है। हो सकता है कि जनमानस में मोदी को लेकर इस तरह की इमेज भी बने कि मोदी के बहाने बीजेपी को भी लोग नकार दे और काफी नुकसान हो सकता है , मगर इसका उल्टा असर भी हो सकता है। विरोध करने वाले तमाम नेता जनता की कसौटी पर परखे गए है, मगर नेशनल स्तर पर मोदी एक नया फेस है। विरोध को देखते हुए यह भी मुमकिन है कि बाकी दलों को भारी नुकसान झेलना पड़े और जनता मोदी सहित बीजेपी की नैय्या पार लगा दे। कांग्रेस समेत सभी दलों को इस खतरे पर गौर करना होगा।   
सवाल --  और क्या क्या खतरे है ?
जवाब --   कांग्रेस को भी मोदी विरोध को और हवा देने में मजा आ रहा है, क्योंकि मोदी का हौव्वा इतना बड़ा बन गया है कि पीएम मनमोहन सिंह के 10 साला कुशासन पर कहीं कोई चर्चा नहीं है। करप्शन से बेहाल कांग्रेस की सारी असफलता छिप गयी है। यूपीए के कुशासन और देश बेचने की साजिश का मुद्दा ही गौण हो गया है। मंहगाई मुद्दे को लेकर कहीं कोई धरना प्रदर्शन नहीं हो रहा है। देश बंद करने की बात ही छोड़ दीजिए। जनहित के तमाम मुद्दों पर किसी का ध्यान नहीं है। कांग्रेस की इससे पहले कोई भी इतनी खराब लाचार बेबस और दिशाहीन जनविरोधी सरकार नहीं बनी थी। मोदी को मुद्दा बनाकर यूपीए सत्ता में फिर आने का रास्ता बना रही है।
सवाल –  आपलोग भी तो यूपीए के बैंड बाजा बाराती के संग जुड़ने के लिए अपनी बारी देख रहे है ?  राहुल गांधी तो सालों से नीतिश कुमार पर लाईन दे रहे है ?
जवाब --  नहीं इस मामले में अभी कुछ भी नहीं कह सकते। नीतिश को पसंद करने का मतलब केवल व्यक्तिगत माना जा सकता है।
सवाल – नीतिश कुमार पीएम के एक साईलेंट प्रत्याशी की तरह है, जो खुद को खुलकर ना पेश कर पा रहे हैं, ना ही किसी और को बर्दाश्त कर पा रहे है  ?  
जवाब –  एकदम नहीं ,नीतिश जी बार बार और हर बार इसका खंड़न करते आ रहे है, और मात्र 30-32 सांसद के बूते पीएम बनने का सपना देखना भी उनके लिए संभव नहीं है। वे लगातार कहते रहे हैं और मैं फिर आज कहना चाहूंगा कि इस तरह की बातें करने वाले लोग और नेता जेडीय के सबसे बड़े दुश्मन है।, जिससे सावधान रहने की जरूरत है। नीतिश जी बिहार को लाईन पर लाने के मिशन में लगे हैं और यहीं उनका मकसद है, बस्स।
सवाल --   कमाल है  माना तो यह जा रहा है कि मंत्रीमंडल के विस्तार में आप सहित कई लोग मनमोहन के सहयोगी बनने जा रहे है ?
जवाब --  ( मुस्कुराते हुए) हमें तो पत्ता नहीं है , मगर जब आपको कोई जानकारी मिले तो हमें भी सूचना दे दीजिएगा।।