शनिवार, 31 मार्च 2012

हिंदी-पत्रकारिता का पूरा सच / अतुल मिश्र


हिंदी पत्रकारों की पोज़ीशन उस आम आदमी की तरह होती है, जो अपने घरेलू बजट के लिए, स्वतः उत्पन्न हुई महंगाई को दोष ना देकर अपने पूर्वजन्म के किन्हीं पापों को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं. हिंदी-पत्रकारिता का इतिहास बताता है कि शुरूआती दौर में लोगों ने कैसे अपने घर के बर्तन बेचकर अखब़ार निकाले थे और बाद में कैसे वे एक बड़े बर्तन-निर्यातक बन गए ? वे लोग बिना खाए तो रह सकते थे, मगर अखब़ार बिना निकाले नहीं. हिंदी के अखब़ार पढ़ना तब आज की ही तरह बैकवर्ड होने की पहचान थी और लोग अखब़ार खुद ना खरीदकर चने या मूंगफलियां बेचने वालों के सौजन्य से पढ़ लिया करते थे. खुद को विद्वान् मानने वाले कुछ विद्वान् तो यहां तक मानते हैं कि हिंदी के अखबारों में रखकर दिए गए ये चने या मूंगफलियां तब हिंदी-पत्रकारिता को एक नयी दिशा दे रहे थे. इनका यह योगदान आज भी ज्यों का त्यों बरकरार है और अभी भी सिर्फ़ नयी दिशाएं ही देने में लगा हुआ है.
हिंदी का पहला अखब़ार ‘ उत्तंग मार्तंड ‘ जब निकाला गया, तब लोगों ने यह सोचा भी नहीं होगा कि आगे चलकर हिंदी-पत्रकारिता का हश्र क्या होगा ? उन्होंने यह कल्पना भी नहीं की होगी कि इसकी आड़ में ‘ प्रेस-कार्ड ‘ भी धड़ल्ले से चल निकलेंगे और उन लोगों को ज़ारी करने के काम आयेंगे, जो उन्हें अपनी दवाओं के विज्ञापन दे रहे हैं और समाचार लिखना तो अलग, उनको पढ़ पाना भी वे सही ढंग से नहीं जानते होंगे. हिंदी अखबारों के रिपोर्टर या एडीटर पत्रकारिता के स्तम्भ नहीं माने जायेंगे, बल्कि ये वे लोग होंगे, जो मर्दाना ताक़त की दवाइयों के विज्ञापन देकर देश को भरपूर सुखी और ताक़तवर बनाने में लगे हैं. हिंदी-पत्रकारिता को एक नयी दिशा देकर वे आज भी उसकी दशा सुधार रहे हैं और जब तक उनके पास ‘ प्रेस कार्ड ‘ हैं, वे अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेंगे कि हिंदी-पत्रकारिता की जो दशा है, वो सुधरी रहे.
हमसे कल कहा गया कि ‘ हिंदी-पत्रकारिता दिवस ‘ पर ‘ पोज़ीशन ऑफ हिंदी जर्नलिज्म ‘ विषय पर बोलने के लिए इंग्लिश में एक स्पीच तैयार कर लीजियेगा और उसे कल एक भव्य समारोह में पढ़ना है आपको, तो हम खुद को बिना अचंभित दिखाए, अचंभित रह गए. हम समझ गए कि ये लोग इंग्लिश जर्नलिस्ट हैं और हिंदी जर्नालिस्म की ख़राब हो चुकी पोज़ीशन पर मातमपुर्सी की रस्म अदा करना चाहते हैं. हिंदी-पत्रकारिता में चाटुकारिता का बहुत महत्त्व है और इसी की माबदौलत बहुत से लोग तो उन स्थानों पर पहुंच जाते हैं, जहां कि उन्हें नहीं होना चाहिए था और जिन्हें वहाँ बैठना चाहिए था, वे वहाँ बैठे होते हैं, जहां कोई शरीफ आदमी बैठना पसंद नहीं करेगा. लेकिन क्या करें, मज़बूरी है. हिंदी के अखब़ार में काम करना है तो इतना तो बर्दाश्त करना ही पड़ेगा. हिंदी के पत्रकार को पैदा होने से पूर्व ही यह ज्ञान मिल जाता है कि बेटे, हिंदी से प्यार करना है तो इतना तो झेलना ही पड़ेगा.
हिंदी के किसी पत्रकार को अगर आप ध्यान से देखें, तो ऐसा लगेगा जैसे उसके अन्दर कुछ ऐसे भाव चल रहे हों कि ” मैं इस दुनिया में क्यों आया या आ ही गया तो इस आने का मकसद क्या है या ऐसा आख़िर कब तक चलता रहेगा ? ” यह एक कड़वा सच है जिस शोषण के ख़िलाफ अक्सर हिंदी के अखब़ार निकलने शुरू हुए, वही अखब़ार प्रतिभाओं का आर्थिक शोषण करने लग जाता है और फिर वे प्रतिभाएं अपनी वेब साइटें बनाकर अपने घर की इनकम में इज़ाफा करती हैं. क्या करें, हिंदी को इस हिंदुस्तान में पढ़ना ही कितने लोग चाहते हैं ? जो पढ़ना चाहते हैं, उनकी वो पोज़ीशन नहीं कि वे पढ़ सकें. इसलिए हिंदी की दुर्दशा के लिए ऐसी बात नहीं है कि सिर्फ़ हिंदी ही दोषी हो, विज्ञापन देकर ‘ प्रेस कार्ड ‘ हासिल करवाने वालों से लेकर सब वे लोग दोषी हैं, जो हमें हिंदी-पत्रकारिता पर अंग्रेजी में स्पीच देने के लिए निमंत्रित करने आये थे.

बजट में उपेक्षित ग्रामीण भारत / राजीव कुमार गुप्ता


अपने बजट में ग्रामीण भारत के लिए जितनी घोषणाएं वित्त मंत्री ने की है वह अभी अपर्याप्त है परन्तु फिर भी कुछ हद तक स्वागत योग्य है लेकिन यह भी कड़वा सच है आने वाले समय में महंगाई की मार से आम आदमी फिर से और त्रस्त होगा क्योंकि वित्त मंत्री द्वारा सेवा कर में दो प्रतिशत (पहले दस प्रतिशत थी अब बारह प्रतिशत हो जायेगी ) की वृद्धि के प्रयोजन के साथ - साथ आम जनता को दी जा रही सब्सिडी में कटौती का बंदोबस्त कर दिया गया है जिसके कारण लोक - लुभावनी घोषणाओं के साथ - साथ महंगाई का दंश झेल रहा आम आदमी की जेब अब और भी ढीली होगी ! या यूं कहा जाय कि मामला अब एक हाथ दे और एक हाथ ले का हो गया है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी !
बहरहाल इस बजट से कुछ हद तक किसानो को जरूर फायदा होगा और अब किसानों को किसानी घाटे का सौदा नहीं रह जायेगा ! ज्ञातव्य है कि एन एस एस ओ की एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 41 फीसदी किसान अपनी किसानी छोड़ना चाहते है ! 2.5 की ग्रोथ दर से कृषि क्षेत्र जहां अपनी सांसे गिन रहा था तो ऐसे में कृषि एवं सहकारिता विकास के लिए वित्त मंत्री द्वारा चालू वित्त वर्ष आयोजना परिव्यय को 18 फीसदी बढाकर 17123 करोड़ रूपये (2011 -2012 ) से 20 ,208 करोड़ रुपये (2012 -2013 ) करने के साथ-साथ कृषि कर्ज में  भी 1 ,00 ,000  करोड़ रुपये का इजाफा करते हुए 4,75,000 करोड़ रुपये (2011 -2012 ) से 5,75,000 करोड़ रुपये (2012 -2013 ) की व्यवस्था कर दी गयी है जिससे कुछ हद तक सूदखोरों से किसानों को राहत मिलने की उम्मीद है ! साथ ही किसानों को प्रति वर्ष 7 प्रतिशत की दर पर अल्पावधि फसल ऋण के लिए ब्याज आर्थिक सहायता को जारी रखा गया है एवं कर्ज समय से चुकाने वाले किसानो को 3 प्रतिशत की अतिरिक्त राहत की व्यवस्था की जायेगी !

यूरिया उत्पादन - क्षेत्र में अगले पांच वर्ष में आत्म निर्भरता का लक्ष्य स्वागत योग्य है क्योंकि अभी तक लगभग 25 प्रतिशत यूरिया आयत किया जाता है साथ ही उर्वरक सब्सिडी किसानो और रिटेलरों को सीधे देने की घोषणा भी स्वागत योग्य है क्योंकि अभी तक ऐसा माना जाता था कि उर्वरक सब्सिडी के 40 प्रतिशत से ही किसान लाभान्वित होते थे बाकी 60 प्रतिशत उर्वरक उद्योग  उर्वरक सब्सिडी का लाभ उठाते थे ! सरकार ने नंदन नीलकणि जो कि आईटी नीति से संबंधित है की अध्यक्षता वाले कार्यबल की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए कहा है कि सब्सिडी का सीधा अंतरण किया जायेगा और इनके आधार पर एक  मोबाइल आधारित उर्वरक प्रबंध प्रणाली तैयार की गई है जिसे 2012 में पूरे देश में लागू किया जाएगा !  उर्वरकों के दुरूपयोग में कमी और सब्सिडियों पर व्यय कम करने के उपायों से 12 करोड़ किसान परिवारों को लाभ होगा ! वित्त मंत्री ने आगामी वित्त वर्ष 2012 -2013 में कृषि क्षेत्र को और मजबूत करने के लिए कई लुभावनी घोषणाएं की है जो कि स्वागत योग्य है !

राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक - नाबार्ड
समन्वित ग्रामीण विकास एवं ग्रामीण क्षेत्र में संमृद्धि सुनिश्चित करने हेतु कृषि , लघु उद्योगों , कुटीर एवं ग्रामोद्योगों हस्तशिल्प और अन्य ग्रामीण शिल्प कलाओं के विकास में आने वाली ऋण समस्याओ के निपटान हेतु बनाई  गयी इस योजना को वित्त मंत्री ने 10 ,000 हजार करोड़ रुपये प्रावधान किया है !

किसान क्रेडिट कार्ड - केसीसी
किसान क्रेडिट कार्ड - केसीसी  का उद्देश्य मौसमी कृषि परिचालनो के लिए  पर्याप्त , कम लागत पर और समय पर बिना किसी झंझट के अल्पावधि ऋण प्राप्त करने में कृषको को होने वाली कठिनाइयों को दूर करना है ! मौखिक पट्टेदार , काश्तकारों और बटाईदारों आसी सहित सभी कृषक वर्गों को इस योजना में शामिल किया गया है ! कृषि यंत्र , खाद व अन्य खेती से जुड़े समानो की खरीदारी के लिए उपयोग में आने वाला किसान क्रेडिट कार्ड से अब एटीएम की तर्ज पर नकदी भी प्राप्त किया जा सकेगा ! इससे किसानो को फसल के समय कृषि यंत्र, बीज, उर्वरक इत्यादि के लिए ऊंचे दरों पर ब्याज लेने की आवश्यकता नहीं होगी ! साथ ही किसान क्रेडिट कार्ड की खरीद सीमा बढ़ाने पर भी सरकार विचार कर रही है ! गौरतलब है कि वर्तमान समय में किसानो को 25,000 रूपये तक की सीमा का किसान क्रेडिट कार्ड दिया जा रहा है !

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम - मनरेगा
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम - मनरेगा के तहत ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले हर एकल परिवार जिसमे माता , पिता और उन पर आश्रित बच्चे शामिल है का साल में सौ दिन का अकुशल शारीरिक काम मांगने और प्राप्त करने का हक बनता है ! इसके अंतर्गत उपेक्षित समूहों को रोजगार प्रदान किया गया ! फरवरी 2011 तक अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की भागीदारी क्रमशः 28 व 24  प्रतिशत रही वही महिलाओ की भागीदारी वित्त वर्ष 2010 -2011 में 47 प्रतिशत तक हो गयी ! ऐसा कहा जाता है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम - मनरेगा से पलायन रोकने में काफी मदद मिली है ! इस महत्वपूर्ण महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के लिए आगामी वित्त वर्ष 2012 - 2013 में सरकार ने 33 ,000 हजार करोड़ रूपये देने का प्रावधान किया गया है ! हालाँकि पिछले वित्त वर्ष में मनरेगा को 40 ,000 करोड़ रूपये देने का प्रावधान किया गया था !

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन - एनआरएलएम
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अधिदेश में सभी निर्धन परिवारों तक पहुँच सुनिश्चित करना, उन्हें स्थाई जीविका के अवसर उपलब्ध करवाना और गरीबी से ऊपर आने तक उनका पोषण करना निहित है ! एनआरएलएम के माध्यम से बेरोजगार ग्रामीण निर्धन युवाओं के कौशल विकास तथा विशेष रूप से विकसित क्षेत्रों में नौकरियों में रोजगार उपलब्ध कराने अथवा लाभकारी स्वरोजगार एवं लघु उद्योगों में रोजगार उपलब्ध कराने का उद्देश्य है ! सरकार ने आगामी वित्त वर्ष 2012 -2013 एनआरएलएम को 34 प्रतिशत के बढ़ोत्तरी करते हुए 3915 करोड़ रूपये का प्रायोजन किया है !

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना - एनआरएचएम
इस बार ग्रामीणों के  स्वास्थ्य  की चिंता करते हुए वित्त मंत्री ने आगामी वित्त वर्ष 2012-2013  के लिए  विगत वर्ष में किये गये 18,115 करोड़ रुपए आबंटन को बढ़ाकर 20,822 करोड़ रुपए करने का प्रस्‍ताव किया है!

बुनकर क्षेत्र को विशेष राहत 
स्‍वचालित शटल-रहित करघों को 5 प्रतिशत के बुनियादी सीमा-शुल्‍क से पूर्ण छूट देने का प्रस्‍ताव किया गया है और स्‍वचालित रेशम चरखी और प्रसंस्‍करण मशीनरी और इनके पुर्जों को भी बुनियादी शुल्‍क से पूरी छूट दे दी गयी है ! एक तरफ जहां 5 प्रतिशत की बुनियादी सीमा-शुल्‍क की इस छूट और मौजूदा रियायती दर को केवल नई टेक्‍सटाईल मशीनरी तक सीमित रखा गया तो दूसरी तरफ सेकेंड हैंड मशीनरी के लिए 7.5 प्रतिशत के बुनियादी शुल्‍क का प्रस्‍ताव किया गया जिससे बुनकर समाज को थोड़ी राहत जरूर मिलेगी !

इसके साथ - साथ ग्रामीण पेयजल और स्‍वच्‍छता के लिए बजटीय आबंटन को 27 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ातें हुए वर्ष 2012-13 में 14,000 करोड़ रुपए करने का प्रस्‍ताव, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के लिए आबंटन को 20 प्रतिशत बढ़ाते हुए 24,000 करोड़ रुपए करने का प्रस्‍ताव किया गया है! साथ ही पिछड़े क्षेत्रों के विकास पर अपना ध्‍यान केन्‍द्रि‍त करते हुए उन्‍होंने पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि की धन राशि में लगभग 22 प्रतिशत वृद्धि करते हुए वर्ष 2012-13 में आबंटन राशि 12,040 करोड़ रुपए करने की वित्त मंत्री द्वारा घोषणा की गयी! ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि के अ‍धीन आबंटन को बढ़ाकर 20,000 करोड़ रुपए करने का प्रस्‍ताव किया गया एवं सर्वशिक्षा अभियान के लिए 25,555 करोड़ रुपए उपलब्‍ध कराने की घोषणा भी की गयी, जो विगत वर्ष की तुलना में 21.7 प्रतिशत अधिक है ! इसी प्रकार राष्‍ट्रीय कृषि विकास योजना के परिव्‍यय को 7860 करोड़ रुपए से बढ़ाकर वित्त वर्ष 2012-13 में 9217 करोड़ रुपए करने का भी प्रस्‍ताव किया गया है!

भारत के राज्‍यों में हरित क्रांति लाने के उपायों के परिणामस्‍वरूप धान के उत्‍पादन और उत्‍पादकता में उल्‍लेखनीय वृद्धि हुई है! हरित क्रांति में भाग लेने वाले राज्यों ने 70 लाख टन चावल पैदा कर एक नयी मिशाल कायम की परिणामतः धान के उत्‍पादन को और बढ़ाने के लिए 400 करोड़ रुपए के आबंटन को बढ़ाकर वर्ष 2012-13 में 1000 करोड़ रुपए करने का प्रस्‍ताव किया गया! साथ ही राष्‍ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत विदर्भ सघन सिंचाई विकास कार्यक्रम के लिए 300 करोड़ रुपए आबंटित करने का भी प्रस्‍ताव किया गया ! राष्‍ट्रीय प्रोटीन पूरक आहार मिशन को सुदृढ़ बनाने और डेयरी क्षेत्र में उत्‍पादकता बढ़ाने के उद्देश्‍य से विश्‍व बैंक की सहायता से 2242 करोड़ रुपए की परियोजना की घोषणा एवं मछली पालन आदि के लिए वर्ष 2012-13 में परिव्‍यय को बढ़ाकर 500 करोड़ रुपए किया जाना स्वागत योग्य कदम है ! देश में सिंचाई सुविधा के विस्‍तार के लिए आबंटन को 13 प्रतिशत बढ़ाकर वर्ष 2012-13 के दौरान 14,242 करोड़ रुपए करने का प्रस्‍ताव एक सराहनीय कदम के साथ - साथ अपर्याप्त है!

देश में खुले आसमान के नीचे लाखो - करोड़ों टन सड़ते अनाजों को बचाने के लिए   खाद्यान्‍नों की अतिरिक्‍त भंडारण क्षमता सृजित करने के उद्देश्‍य से भी कई उपायों की घोषणा तो की परन्तु उन भंडारण में बिजली पहुँचाने की व्यवस्था कैसे होगी यह नहीं बताया गया ! बहरहाल वित्त मंत्री द्वारा ग्रामीण भारत को सशक्त और सुदृढ़ करने के लिए उठाया गया कदम अपर्याप्त परन्तु कुछ हद तक सराहनीय है बशर्ते इन घोषणाओं के पालन एवं उसमे पारदर्शिता हो! भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबी वर्तमान यूंपीए - 2  सरकार से ईमानदारी की अपेक्षा करना थोडा मुश्किल जरूर है परन्तु समुचित राशि अगर उन्ही के हाथो में पहुचे जिनके लिए आबंटित की गयी है तो निश्चित ही ग्रामीण भारत का जीवन आगामी वित्त वर्ष में थोडा सुधरेगा!

पत्रकारिता का बदल-बदल कर बदल गयी!



AUGUST 23, 2011

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सन 1947 के दौरान और उसके बाद की पत्रकारिता का उद्देश्य शुद्ध जानकारीय्यों को समाज तक पहुंचाकर जागरुक करना था। जैसे-जैसे वक्त गुजरता गया, पत्रकारिता का मतलब काफ़ी हद तक बदलता गया। आजादी से पहले और उसके बाद की पत्रकारिता पर नजर डालें और आज की पत्रकारिता की ओर देखे तो दोनो पत्रकारिता के बीच एक बहुत बडा फ़ासला दिखाई दे जाता है। 21वी सदी की पत्रकारिता का अर्थ “व्यवसाय” होकर रह गया है। कहना अनुचित न होगा कि इसी व्यवसायीकरण  ने ही पत्रकारिता को पूरी तरहं बदल डाला है। अब पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सूचनाओं को समाज तक पहुंचाना नही रह गया बल्कि समाज का मनोरंजन कर किसी तरहं जल्द से जल्द शोहरत और पैसा बटोरा जाये यह रह गया है। 
प्रोफ़ेसर अनंद कुमार का यह कहना कि आज की मीडिया “ट्रिप्पल-सी” यानी क्राईम,सिनेमा,क्रिकेट के इर्दगिर्द ही घूमती दिखाई देती है आज की मीडिया पर बिलकुल सटीक ठहरता है इसके साथ ही मीडिया कार्यप्रणाली कहां तक सीमित हो गई है, इसको बखूबी बयान करता है। आज अगर देखा जाये तो न्यूज चेनल हो या न्यूज पेपर सभी इन्ही “ट्रिप्पल-सी” के इर्दगिर्द की खबरे बडे चाऊ के साथ प्रकाशित और प्रसारित करते दिखते है। कहना गलत न होगा कि समाज भी बडे ही चाऊ के साथ इसे पढता, देखता और सुनता दिखाई देता है। 
इस बात से हम सभी बखूबी वाकिफ़ होगें कि हमारा देश गांवो का देश है। आज भी हमारी जनसंख्या के सत्तर प्रतिशत नागरिक ग्रामीण इलाको में ही निवास करते हैं। इसके अलावा चाहे हम कितना ही क्यों ना इस भ्रम में रहकर ये भले ही सोच लें कि आज हमारे देश में अंधविश्वास खतम हो गया है। लेकिन सच्चाई यही है कि आज भी हमारे भारत में रह रहा एक बडा तबका अंधविश्वास को अपना धर्म मान चुका है। ऐसे में सभी जानते है कि इस अंधविश्वास की इस समस्यां को काफ़ी हद तक खत्म करने में लोकतंत्र के चौथे खम्भे का एक सबसे मजबूत और ताकतवर भाग इलेक्ट्रोनिक मीडिया यानी न्यूज़ चेनल्स बहुत ही कामयाब भूमिका निभा सकते है। पर ऐसा सोचना ठीक है लेकिन शायद ऐसा हो पाना मुशकिल लगता है। क्योंकि आज के समाचार चेनल्स टी० आर० पी० रूपी कैंसर से पूरी तरह पीडित हो गये हैं। अब तो चेनल को क्या चाहिये सिर्फ़ टी० आर० पी०, क्योंकि जितनी टि० आर० पी० सातवे आसमान पे होगी उतनी ही मोटी कमाई होगी यानी जितने ज्यादा लोग चैनल को देखेगें चैनल उतना प्रसिद्धि की सीढीयां चढेगा तो जाहिर सी बात है कि बड़ी-बड़ी और नामी गिरामी कंपनीया अपने उत्पाद को बेचने के लिये उनके पास दौड़ी चली आयेगीं जो समाचार चैनलों के लिये एक ऐसा होगा जैसे किसी जन्मो से प्यासे को पानी मिल गया हो। नोएडा के एक मकान में सात महीने से बंद रहने वाली दोनो बहनो के प्रकरण की कवरेज को लगभग सारे समाचार चैनलों ने इतनी ज्यादा तवज्जो दी कि चैनल पर तीन दिन तक कोई भी दूसरी खबर का खुल कर विवरण दिया ही नही गया और घूम-फ़िर बार-बार बस एक ये ही खबर दिखाई जाती रही। लग तो ऐसा रहा था मानो पता नही कितने दिनो से चैनल बस ऐसी ही अलग खबर का जोर-शोर से इंतजार कर रहे थे। कुछ कवरेज में तो लगभग सभी चनलों ने मनोवैज्ञानिको के थोड़े बहुत विश्लेषणों के माध्यम से दिखाए कि दोनो बहने “डिप्रेशन” रूपी भयंकर बिमारी का शिकार हो गयी थी जिसके चलते उन्होने ऐसा कदम उठाया पर इन वैज्ञानिक सटीक विश्लेषणों से खबर को ज्यादा बढा चढा कर पेश नही किया जा सकता था और चेनलो को अलग खबर जब तक नही मिलनी थी तब तक तो टी० आर० पी० को कायम तो रखना ही था। अब जहां इंडिया टी०वी अपनी भारी भरकम डरावनी आवाज के इस्तेमाल के लिये जाना जाता है वही सभी चेनलो का खबर बताने का तरिका डरावनी भारीभरक आवाज में तबदील तब होता दिखा जब बड़ी बहन की डायरी में काला जादू का जिक्र आया। सभी चेनलो ने एक-एक करके काले जादू के जिक्र को इतना उठाया कि कितनो को तो ऐसा लगने लगा होगा कि शायद दोनो बहनो की ये हालत काले जादू के कारण ही हुई थी। अगर चेनल चाहते तो परिवार की हालत के पीछे काले जादू की प्रभाव होने वाली बात को खण्डित कर सकते थे। पर ऐसा क्यों करेगें वे! क्योंकि आज चेनलो का लक्ष्य लोगो को जागरुक करना नही बल्कि लोगो को भ्रम में रख कर मोटी कमाई करना है। अगर हालिया के किये गये एक सर्वे कि बात की जाये तो करीब 70 प्रतिशत लोगो ने इस बात को मना कि आज भी गांवो में क्या शहरो में अंधविश्वास कम नही हुआ है। चैनलों के ऐसे रवये को देखते हुये तो यही कहा जा सकता है कि अंधविश्वास के प्रति लोग जागरुक होने बजाये इसकी गहरी खाई में लगातार गिरते चले जायेगें और चेनल अपने लालच रूपी तीर को साधते हुये आम जनता के मन में काले जादू जैसे अंधविश्वास के आकार को फ़ेलाने में अपनी भूमिका निभाते जायेगें।
पेड न्यूज:-  पेड+न्यूज के बारे में हम सभी परिचित क्योंकि कोई भी जानकारी जब किसी संचार माध्यम से लोगो तक पहुंचती है वही न्यूज कहलाती है और अब बात आयी कि अखिर यह पेड न्यूज क्या है भला? पेड न्यूज को हम इस प्रकार समझ सकते है कि जब किसी घटना स्थल मोजूद व्यक्ति से पैसे लेने के बाद न्यूज को किसी प्रकार तोड-मरोडकर दिखाना है, ये फ़िक्स कर लिया जाता है और जानकारी या न्यूज को पैसे देने वाले के बताये अनुसार चाहे वह गलत हो या सही सीधा लोगो तक संचार माध्यम से पहुंचा दिया जाता है। अब सवाल उठता है कि लोकतंत्र या समाज को अखिर पेडन्यूज से क्या नुकसान है? तो सीधी बात समज आती है कि एक जानकारी ही मानव को उसके आस-पास क्या घटित हो रहा है एक न्यूज के रूप में उस तक पहुंचती है और अगर वही जानकारी गलत न्यूज के रूप में लोगो तक पहुंचेगी तो उसका कोई अच्छा प्रभाव तो पडने वाला है नही! जाहिर सी बात है कि अगर जानकारी लोगो तक पहुंचेगी तो उनका नजरिया भी एक गलत दिशा में जाने लगेगा यानी अगर सीएजी जांच कमेटी की रिपोर्ट में दि गई पडताल को ठीक उलट बताकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की छ्वी को मीडिया पैसे लेने के बाद बिलकुल पाक-साफ़ बता कर प्रसारित और प्रकाशित कर देती तो शायद हमारा नजरिया भी यही कहता कि शीला दीक्षित ने भ्रष्टाचार में कोई भूमिका नही निभाई। अब क्या कहे आज की पत्रकारिता को बस यही कह सकते है कि पत्रकारिता बदल-बदल कर बदल गयी!

पत्रकारिता नए युग का प्रारंभ / ओशो रजनीश




Anirudh joshi द्वारा 23 जुलाई, 2008 8:05:00 PM IST पर पोस्टेड #

ओशो रजनीश

यह देश दो हजार वर्षों तक गुलामी में रहा है। इस कारण लोगों में आध्यात्मिक गुलामी पैदा हो गई है। यद्यपि राजनीतिक दृष्टि से हम स्वतंत्र हैं लेकिन मानसिक रूप से हम सभी अभी भी गुलाम हैं।

पत्रकारिता पश्चिम की पैदाइश है और वहां जो भी होता रहता है, उसकी हम नकल करते रहते हैं, वह हमारा अपना निर्माण नहीं है। पश्चिम आध्यात्मक में विश्वास नहीं करता। इस वजह से वह तीव्र संताप और तनाव में जी रहा है। वहां आत्महत्या की दर पूरब से चार गुना ज्यादा है। लोग भूख के कारण, भोजन के अभाव के कारण आत्महत्या करते हैं। तुम्हें उन पर करुणा करनी चाहिए, पश्चिम में लोग इसलिए आत्महत्या करते हैं क्योंकि उनके पास सब कुछ है और जीवन निरर्थक मालूम पडता है। उनके पास भरपूर धन है, वह सब है जो धन खरीद सकता है, लेकिन कुछ ऐसी भी बातें हैं जिन्हें धन नहीं खरीद सकता। वे मौन नहीं खरीद सकते, वे आनन्द नहीं खरीद सकते, वे प्ेम नहीं खरीद सकते, ध्यान नहीं खरीद सकते।

पत्रकारिता पश्चिम की देन है। तुम अभी भी उस चीज की नकल कर रहे हो, जो तुम्हारी संस्कृति में विकसित नहीं हुआ है, तुम्हारे वातावरण में नहीं पला है, जो इस मिट्टी का अंश नहीं है, यहां नहीं खिला है, तो तुम एक प्लास्टिक के फूल को हाथ में लिए हो। उसकी कोई जड़ें नहीं है।

पश्चिम में समाचार माध्यम को आध्यात्मिकता में कोई रस नहीं है क्योंकि पश्चिम में एक भी व्यक्ति का आध्यात्म में रस नहीं है। इस कारण वे दु:ख पा रहे है। कितने ही लोग मनोविश्लेषण करवा रहे हैं। कितने ही लोग मनोचिकित्सा के रुग्णालयों में हैं। कितने ही लोग पागल हो रहे हैं, आत्महत्या कर रहे हैं, खून कर रहे हैं। वे ये सब बातें इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें जीवन अर्थहीन लगता है, व्यर्थ लगता है।

तुम पूछ रही हो, हमारी पत्रकारिता के प्रशिक्षण कोर्स में आध्यात्मिक विकास,आध्यात्मिक आयाम बिलकुल ही अपेक्षित रह जाता है। क्योंकि तुम पत्रकारिता को इस मिट्टी में विकसित नहीं कर रहे हो, उसमें इस मिट्टी की सुगन्ध नहीं है। तुम सिर्फ नकल कर रहे हो।

और तुम इस समाज को भयंकर नुकसान पहुँचा रहे हो। क्योंकि यहां आध्यात्म सबसे मूलभूत बात है। लेकिन तुम्हारी शिक्षा प्णाली के साथ भी वही हो रहा है। तुम्हारे विद्यालय हर कहीं पश्चिम की मानसिक दासता है। पश्चिम में जो भी हो रहा है उसकी नकल करनी है। वह तुम्हारी अचेतन आदत बन गई है। पत्रकारिता को अपना ढंग खुद खोजना होगा। अपनी निजता खुद विकसित करनी होगी। उसी तरह शिक्षा को भी अपनी वैक्तिकता विकसित करनी होगी।

आध्यात्मिकता जीवन का सारभूत अर्थ है। आत्मा के बिना आदमी सिर्फ एक शव है और आध्यात्मिकता के बिना कुछ भी शिक्षा, पत्रकारिता सिर्फ शव है। उससे दुर्गन्ध आती है। तुम्हारी राजनीति पश्चिम की नकल है इसलिए चालीस साल की आजादी के बाद कुछ भी बदला हुआ नहीं लगता। वही नौकरशाही-वह तो और भी बदतर हो गई है। क्योंकि नकल असल से बेहतर नहीं हो सकती है।

तुम्हारी शिक्षा सिर्फ एक नकल है। मैं विश्वविद्यालय में शिक्षक रहा हूँ। मुझे विश्वविद्यालय से निरंतर लड़ना पड़ा है। वे विश्वविद्यालय के कोर्स में योग या ध्यान को सम्मिलित करने को तैयार नहीं थे, लेकिन इस बात पर गर्व करते हैं कि यह गौतम बुध्द की, महावीर की, बौध्द धर्म और पंतजली की, कबीर और नानक की भूमि है। वे बड़ा सीना तानकर बोलते रहते हैं, लेकिन उन्हें दिखाई नहीं देता कि वे क्या कर रहे हैं। उनकी पत्रकारिता में, उनकी शिक्षा में, उनकी राजनीति में कबीर, नानक, पतंजलि या बुध्द का कोई चिन्ह नहीं है। वे लोग पश्चिमी चिन्तकों से प्भावित हैं।

राजनीतिक दृष्टि से तुम स्वतंत्र हो लेकिन मानसिक रूप से बिलकुल स्वतंत्र नहीं हो। पत्रकारिता को स्वयं को पश्चिम से मुक्त करना है और फिर अपने को एक प्रामाणिक मौलिक आकार देना है। तुम आश्चर्यचकित होओगे कि यदि तुमने पत्रकारिता को आध्यात्मिक आयाम दिया तो आज नहीं कल, पश्चिम तुम्हारा अनुसरण करेगा। क्योंकि वहाँ तीव्र भूख है, गहन प्यास है। दूसरों की नकल करने की बजाय तुम मौलिक क्यों नहीं हो सकते और दूसरों को तुम्हारी नकल क्यों नहीं करने देते? ऐसा हुआ तो पहली बार इस देश में स्वतंत्रता के कुछ फूल खिलेंगे।

और आध्यात्मिकता किसी प्कार की धर्मान्धता नहीं है। आध्यात्मिकता का यह अर्थ नहीं है कि तुम्हें धर्म का प्चार करना है या जैन धर्म का प्रचार करना है या इस्लाम का प्रचार करना है। आध्यात्मिकता का अर्थ इतना ही है कि तुम्हें सब धर्मों के मूलभूत तत्वों का प्सार करना है, जो कि समान हैं।

क्या प्रेम हिन्दू या मुसलमान हो सकता है? क्या शांत चित्त हिन्दू या बौध्द हो सकता है? क्या करुणापूर्ण व्यक्ति को ईसाई या यहूदी होना जरूरी है?

प्रामाणिक आध्यात्मिकता के कोई विशेषण नहीं होंगे। यह सभी धर्मों के सिर्फ सार तत्वों की शिक्षा होगी। पत्रकारिता को अपनी सूची में उसको प्थम स्थान देना चाहिए, वह पहले नम्बर पर होना चाहिए। राजनीति आखिरी नम्बर पर। लेकिन दुर्भाग्य से राजनीति का प्रथम क्रमांक है और आध्यात्म का अन्तिम भी नहीं है।

तुम लगातार गुलामी में कैसे रहते हो, यह मेरी समझ के बाहर है। क्या अब समय नहीं आ गया है कि हम पश्चिम से मुक्त हो जाएं-हमारी अपनी शिक्षा हो, हमारी अपनी पत्रकारिता हो, हमारी अपनी सुगन्ध हो और हमारा अपना अर्थ हो।

समय आ गया है। पत्रकारिता एक नये युग का आरम्भ बन सकती है। राजनीति को जितने पीछे ढकेलो- तुम्हारे अखबार के बिल्कुल अंतिम पृष्ठ पर। राजनीति हमारी आत्मा नहीं है। वह सबसे गंदा खेल है, जिसका तुम लोगों में प्रसार कर रहे हो। राजनीतिक को इस बात का स्पष्ट अहसास दिलाना अत्यन्त आवश्यक है कि उसके पास कोई प्रज्ञा नहीं है कि उसे देश की नियति का नियंता नहीं बनना है और वह सिर्फ जनता का सेवक है। उसकी भूमिका सिर्फ कामकाज की है।

पोस्टमास्टर जनरल कौन हो? इसके लिए तुम बहुत शोरगुल नहीं मचाते। उसकी भूमिका सिर्फ कामकाज के लिए है। रेलवे विभाग का प्मुख कौन हो, इसके लिए बहुत माथापच्ची नहीं करते। उसकी क्या जरूरत है? वह अपना काम कर रहा है, उसे उसका वेतन मिल रहा है, बात खत्म हुई। तुम राजनीतिज्ञों की ओर इतना ध्यान क्यों देते हो? तुम्हारी पचास प्रतिशत से भी अधिक ऊर्जा उन पर व्यय होती है, जिनकी राजनीतिक आयु केवल चार साल की है। कल वे विस्मृत हो जाएंगे।

वे ठीक तुम्हारे अखबारों जैसा है। कल का अखबार उतना ही कचरा होता है, जितना तुम्हारा कल की राजनीति।

लेकिन इन क्षणाजीवी बातों को इतना महत्व क्यों देना? आध्यात्म का अर्थ है ऐसी बातों को महत्व देना, जिनका चिरस्थायी मूल्य है, जो जीवन को सदा मार्गदर्शन और प्रकाश दे सकते हैं, जो सनातन है, शाश्वत है। शाश्वत मूल्य आध्यात्मिकता का अंग है, क्षणिक मूल्य राजनीति का अंग है। राजनीति और आध्यात्म दो विपरीत ध्रुव हैं।

राजनीति देश के कोने-कोने में धर्म को दबाने की कोशिश कर रही है। राजनीतिज्ञों को एकमात्र खतरा है धर्मों से, क्योंकि धर्म के कारण ही लोगों में अधिक प्रज्ञा जाग सकती है।

उदाहरण के लिए मैं किसी भी समस्या को इतनी बड़ी नहीं मानता कि देश उससे संघर्ष करता रहे और उसे सुलझा न पाए। दस साल के भीतर उस देश की सब समस्याएं सुलझाई जा सकती है। लेकिन राजनीतिज्ञ समस्याओं को सुलझाना नहीं चाहते है, वे उन्हें पैदा करना चाहते है। वस्तुत: उनकी जिन्दगी ही इन समस्याओं पर निर्भर करती है।

एडोल्फ हिटलर ने अपनी आत्मकथा में एक बड़ा अर्थपूर्ण वक्तव्य दिया है। अगर राजनीतिज्ञ को महान राजनीतिज्ञ बनना है, जनता का महान नेता बनना है तो वह इस बात की फिक्र करे कि राज्य में शांति कभी न हो। उसे हमेशा कुछ न कुछ उपद्रव पैदा करना चाहिए, वह लोगों में भय पैदा करे, उन्हें असुरक्षित चिंतित और उद्विग्न बनाये रखे। वह लोगों को हमेशा इस स्थिति में रखे कि उन्हें उसकी जरूरत हो। वह पड़ोसी राष्ट्रों से सदा दुश्मनी पैदा करे-वास्तविक या काल्पनिक। लेकिन सीमा के पार सदा से दुश्मन हो। और जैसे ही तुम्हे गता है कि नेतृत्व कमजोर हो रहा है, युध्द पैदा करो क्योंकि युध्द काल में ही महान नेता पैदा होते हैं।

वह ठीक कह रहा है। इसका निष्कर्ष क्या निकलता है? निष्कर्ष यह निकलता है कि राजनीतिज्ञ को समस्याएं सुलझाने में कोई रस नहीं है, वह उन्हें यथासंभव जटिल बनाने में लगा रहता है। इसलिए उसका होना अत्यन्त आवश्यक हो जाता है। तुम्हें सदा उसकी जरूरत होती है। वह तुम्हें सदा दुश्मनों से डराता रहता है-चीन-पाकिस्तान। वे अणु-बम इकट्ठे कर रहे हैं, आणविक शस्त्रास्त्र इकट्ठे कर रहे हैं तो तुम्हें अपने नेताओं की जरूरत होती है फिर वे दो कौड़ी के क्यों न हों। युध्दकाल में जो सत्ता में होता है उसका पूरा समर्थन करना चाहिए क्योंकि वह संकट की स्थिति है। चालाक राजनीतिज्ञ हर देश को हमेशा संकट में बनाए रखता है।

पत्रकारिता में बड़ी से बड़ी क्रांति जो होगी वह है अगर वह इस देश में एक अलग किस्म की पत्रकारिता पैदा कर सके, जो राजनीति के द्वारा नियंत्रित न हो, लेकिन देश के प्रज्ञावान लोगों द्वारा प्रेरित हो। तुम इसे बिल्कुल सुनिश्चित रूप से जान लो कि किसी भी देश के प्रज्ञावान लोग चुनाव नहीं लड़ेंगे। वे जनता से वोट नहीं मांगेंगे तो प्रज्ञावान लोग, उनके स्वभाव के कारण ही, सत्ता से बाहर रहेंगे।

पत्रकारिता का यह एक मूलभूत कार्य रहेगा कि जनता के सामने प्रज्ञावान लोगों को और उनकी प्रज्ञा को प्कट करें।

राजनीति पर अधिक ध्यान मत दो। वह खतरनाक है। उनकी जितनी हो सके, उतनी उपेक्षा करो। उन पर तभी ध्यान देना चाहिए जब वे प्रामाणिक रूप से कुछ शुभ कार्य करें।

स्वस्थ पत्रकारिता से मेरा मतलब है ऐसी पत्रकारिता जो मनुष्य के पूरे व्यक्तित्व का पोषण करे-उसका शरीर, उसका मन, उसकी आत्मा, ऐसी पत्रकारिता जो बेहतर मनुष्यता को निर्मित करने में संलग् है। सिर्फ घटनाओं के वृतान्त नहीं इकट्ठे करती। पत्रकारिता सिर्फ एक समाचार माध्यम न हो, वह एक अच्छा साहित्य भी होना चाहिए, तभी वह स्वस्थ है। आज भी उसे पढ़ा जा सके । वह इतना क्षणजीवी न रहे। लेकिन तुम सिर्फ एक समाचार माध्यम ही रहे, तो फिर स्वभावत: वह दिन बीत गया कि समाचार पुराना हो जायेगा। तुम्हें ऐसी चीज निर्मित करना चाहिए जो कभी पुरानी नहीं होती, सदा नई रहती है।

महान साहित्य का यही अर्थ है। दोस्तोवस्की के उपन्यास या लियो टालस्टाय, एन्टन चैखव, तुर्गनेव या रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास, ये तब तक अर्थपूर्ण रहेंगे, जब तक मनुष्यता रहेगी और सदा ताजा बने रहेंगे। तुम्हारी पत्रकारिता में कुछ वैसी गुणवत्ता होनी चाहिए। वह गुणवत्ता लाई जा सकती है। तुम समाचार को स्थान दे सकते हो, लेकिन वह गौण होना चाहिए। क्योंकि वे समाचार-वृत्तान्त आखिर है क्या? उनसे क्या होने वाला है? कोई चोरी करता है उसका समाचार छापने में क्या सार है? उसे व्यर्थ ही क्यों खबर बनाना? तुम अपने पन्ने बिल्कुल ही गैर जरूरी बातों से भर रहे हो।

आवश्यक बात को जगह दो। तुम्हारे पास कवि हैं, चित्रकार हैं, लेखक हैं, आध्यात्मिक महामानव हैं, तुम उन सबको ला सकते हो। राजनीति तीसरे पृष्ष्ठ पर हो या चौथे पृष्ठ पर या शायद किसी भी पृष्ठ पर नहीं। तुमने इन राजनीतिज्ञों को इतना बडा बना दिया है, उनके बारे में इतनी अतिश्योक्ति कर दी है कि उसकी वजह से पूरे देश को परेशानी उठानी पड़ती है। पूरी दुनिया इन लोगों से परेशान है। उसकी जिम्मेदारी तुम्हें अपने सिर पर उठानी पड़ेगी। इन लोगों के गुब्बारे में जो हवा भरी है उसे निकालना होगा, उनका सही स्थान उन्हें दिखाना होगा। कोई व्यक्ति देश का राष्ट्रपति होगा, वह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। सवाल यह है कि वह एक अच्छा राष्ट्रपति है या नहीं, उसकी गुणवत्ता का सवाल है।

जब अब्राहम लिंकन राष्ट्रपति हुए, तब ऐसी घटना घटी। सीनेट के पहले दिन.... वहां का अभिजात्य वर्ग बहुत नाराज था, उनके अहंकार को ठेस लगी थी क्योंकि वह रईस खानदान से नहीं था। वह चमार का बेटा था। उनमें से एक रईसजादे से नहीं रह गया। वह खडा होकर बोला, ''श्रीमान लिंकन, इससे पहले कि आप अपना भाषण शुरू करें-वह उद्धाटन का भाषण था-मैं आपको याद दिलाना चाहूंगा कि आप एक चमार के बेटे हैं।''

पूरासीनेट तालियाँ बजाने लगा और हंसने लगा। वे अब्राहिम लिंकन का अपमान करना चाहते थे। लेकिन तुम उसके जैसे आदमी का अपमान नहीं कर सकते। वह शांति से खड़ा हुआ और जब सब शोरगुल खत्म हुआ तब उसने कहा, ''मैं आपके प्रति अनुग्रहीत हूं कि आपने मुझे मेरे महान पिताजी की याद दिलाई। मैं अपनी कमियां, अपनी कमजोरियां जानता हूं। वे जितने बड़े चमार थे, उतना बड़ा राष्ट्रपति मैं कभी नहीं हो पाऊंगा। मैं उनकी तुलना में कुछ भी नहीं हूं। मेरे पिताजी एक महान कलाकार थे। मैं यथासम्भव पूरी कोशिश करूंगा, लेकिन मैं जानता हूं, मैं उनसे श्रेष्ठतर नहीं हो पाऊंगा।''

पूरा सीनेट सन्नाटे में आ गया। लेकिन उन्होंने एक बात जान ली कि इस आदमी को तुम अपमानित नहीं कर सकते।


जिस आदमी ने यह सवाल पूछा था उससे उसने कहा, ''आपको उनकी याद कैसे आई? क्योंकि मुझे अच्छी तरह याद है कि मेरे पिताजी आपके घर भी जाया करते थे। क्या आपने मेरे पिताजी के द्वारा बनाए हुए जूते पहन रखे हैं? क्या वे काट रहे हैं? मैं भी कुछ जानता हूँ, मैं उन्हें ठीक कर सकता हूँ। मैं बहुत बड़ा कलाकार नहीं हूं, लेकिन मेरे पिताजी के साथ काम करते-करते मैं थोड़ा-बहुत सीख गया हूं। तो आप लोगों में से किसी के भी जूते में कोई तकलीफ हो तो आप कभी भी मेरे पास आ सकते हैं।'' राष्ट्रपति केवल राष्ट्रपति होने से बड़ा नहीं हो जाता, उनकी गुणवत्ता क्या है... गुणवत्ता के सम्बन्ध में बात करो, व्यक्ति के सम्बन्ध में नहीं। प्रधानमंत्री सिर्फ प्रधानमंत्री होने से कुछ नहीं होता, उसके गुणों की चर्चा करो-उसने देश के लिए क्या किया है, वह क्या कर रहा है, उसे यह करने के लिए प्ेरित करो। दिन बीतते जाते हैं ... इन सालों को गुजरते हुए मैं दैख रहा हूं। मेरा पूरा परिवार आजादी की लडाई में संलग् था। सब लोग कारावास में थे। हम बच्चों ने बहुत कष्ट उठाए। बचपन में मैं अपने पिताजी से पूछता था, ''क्या आपको भरोसा है कि जिस आजादी के लिए आप लड़ रहे हैं, वह कभी आएगी? हो सकता है कि अंग्रेज यह देश छोड़ दें लेकिन उनकी जगह जो आएंगे क्या वे उनसे बेहतर होंगे? मैं समझ सकता हूँ कि आप गुलामी के खिलाफ लड रहे हैं, लेकिन मैं नहीं सोचता कि आपको यह बात साफ है कि आप आजादी के लिए लड़ रहे हैं। आपके पास कोई विधायक कार्यक्रम नहीं है।''

भारत का पूरा स्वतन्त्रता आन्दोलन बिना विधायक कार्यक्रम के हो रहा था। इसका परिणाम यह है कि चालीस साल बीत गए और देश नीचे से नीचे गिर रहा है।

तीस साल पहले, जब मैंने बोलना शुरू किया, इस देश की आबादी 40 करोड़ थी। मैं संतति निरोध के पक्ष में बोल रहा था। मुझे पत्थर मारे गए, मेरी सभा को अस्त-व्यस्त कर दिया गया। अगली दफा जब मैं उस शहर गया तो मुझे रेलगाड़ी से नीचे उतरने नहीं दिया गया। दो सौ कट्टर हिन्दू प्लेटफार्म पर खडे थे, वे मुझे नीचे उतरने नहीं दे रहे थे। देश की आबादी नब्बे करोड़ हो गई है। इस सदी के अंत तक वह एक अरब पार कर चुकी होगी। इतिहास में पहली बार भारत-चीन से आगे होगा। अब तक चीन सबसे मूढ़ देश था, अब भारत उससे आगे होगा। चीन अपनी आबादी को रोकने में सफल हो गया है। लेकिन तुम्हारे राजनीतिज्ञों में हिम्मत नहीं है, वे लोगों से सच कहने से डरते हैं क्योंकि उन्हें अपने वोटों से मतलब है। पत्रकारों को किसी से डरने की जरूरत नहीं है। तुम तो किसी के वोटों पर निर्भर नहीं हो। तुम्हें लोगों के सामने सत्य को प्रकट करना चाहिए- तुम बच्चे पैदा कर रहे हो लेकिन वस्तुत: तुम मौत को जन्म दे रहे हो। इस सदी के अंत तक आधा देश- इसका मतलब 50 करोड़ लोग भूख से मर जाएंगे, दो में से एक आदमी। तुम लाशों से घिर जाओगे। तुम्हारे राजनीतिज्ञ इस सम्बन्ध में क्या कर रहे हैं? अगर मैं संतति निरोध के साधनों के पक्ष में बोलता हूँ तो शंकराचार्य मेरी निन्दा करते हैं राजनीतिज्ञ मेरे प्रवासों को नष्ट करने की कोशिश करते हैं क्योंकि यह बात लोगों के धार्मिक अन्धविश्वासों के खिलाफ जाती है।

किसी राजनीतिक के पास, मेरे पास आकर मुझसे मिलने का साहस भी नहीं है। इंदिरा ने पूछा था... छह दफा उसने मुलाकात के लिए समय लिया था और सिर्फ एक दिन पहले वह उसे रद्द कर देती। अंतत: मैंने अपनी सचिव को उसके पास भेजा, ''यह क्या पागलपन है? आपको आना हो तो आ जाइए और हीं आना हो तो आपको कोई निमंत्रण नहीं दे रहा है। आप ही पूछ रही थी।'' तब मेरी सचिव से कहा, ''मेरे सहयोगी मुझे रोकते हैं। वे कहते हैं, मैं वहां गई तो इससे मेरे राजनीतिक भविष्य को खतरा पैदा होगा।'' क्योंकि मेरे पास कोई वोट नहीं है। सब शंकराचार्य, इमाम और बिशप अपने वोट वापिस ले लेंगे, यदि वे देखते हैं कि एक राजनीतिक मेरे पास आ रहा है। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि उनमें से कोई भी तर्क नहीं कर सकता। मैं उनको चुनौती देता रहा हूं कि मैं किसी के भी साथ किसी भी विषय पर सार्वजनिक विवाद के लिए तैयार हूं। ये कायर... इनमें से कोई भी खड़ा नहीं होता।

जो लोग उन कारणों के लिए लड़ रहे हैं जो लोकप्रिय नहीं हैं, उन्हें जनता के सामने लाना पत्रकारों का कर्तव्य है। क्योंकि ये अप्रिय कारण अतीत है, इसकी सड़ी-गली धरोहर है। राजनीतिज्ञों के पास वह साहस नहीं हो सकता लेकिन पत्रकार के पास हो सकता है और होना चाहिए। मैं यह कह रहा हूं कि सिर्फ नकारात्मक समाचार पर निर्भर मत रहो। विधायक को उसकी पूरी सुन्दरता में प्रकट करो और नकारात्मकता को पृष्ठ भूमि में रखो। उस पर तुम्हारा ध्यान केन्दि्त न हो। मैं यह नहीं चाहता कि तुम सिर्फ विधायक होओ, मैं चाहता हूँ कि तुम यथार्थवादी होओ। माना कि नकारात्मकता जीवन का हिस्सा है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि तुम्हें अपनी श्मशान भूमि बीच बाजार में बनानी चाहिए। तुम अपनी श्मशान भूमि शहर के बाहर बनाते हो, जहां तुम सिर्फ एक बार जाते हो और फिर वापस नहीं लौटते। तुम उसे बीच बाजार में क्यों नहीं बनाते ताकि आने-जाने वाला राहगीर रोज उसे देख सके कि लोग जलाए जा रहे हैं।

वह जीवन का हिस्सा है, इसलिए कभी-कभार तुम अंतिम संस्कार की चर्चा कर सकते हो। लेकिन उस पर ध्यान केन्द्रित मत करो। मृत्यु सुनिश्चित है लेकिन जीवन अधिक महत्वपूर्ण है। जीवन की चर्चा करो, जीवन को उत्सव बनाओ। लोगों को मृत्यु से अत्यधिक भयभीत मत करो। नकारात्मकता की मानसिकता को कुंठा मत बनाओ, यह मेरे कहने का मतलब है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि माध्यम सिर्फ विधायक समाचार पर जिंदा रह सकता है। वह गलत होगा, वह अधूरा होगा। नकारात्मक को प्रकट करना ही है, लेकिन उस पर जोर नहीं दिया जाना चाहिए। उसकी निंदा की जानी चाहिए। विधायक को सहारा देना चाहिए और नकारात्मक की निंदा की जानी चाहिए।

उस भांति तुम सिर्फ विधायक पर रोशनी नहीं डालोगे, तुम दोनों को प्रकट करोगे। लेकिन नकारात्मक पहलू कुरूप होता है। तुम जानते हो कि जीवन में हम नकारात्मक को रास्ते से हटा देते हैं और विधायक को सामने ले आते हैं। यही स्वस्थ पत्रकारिता का रूख होना चाहिए, विधायकता लक्ष्य होना चाहिए, नकारात्मकता उस मंजिल तक पहुंचाने वाली सीढ़ी होनी चाहिए। लेकिन उस पर जोर नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि उससे लोगों के मन में यह ख्याल पैदा हो जाता है कि जीवन सिर्फ इतना ही है। यह आत्मा का बड़ा खतरनाक कैंसर है। मैं सत्य को वैसा ही प्रकट करता हूं, जैसा देखता हूं-फिर मैं न्यस्त स्वार्थों की परवाह नहीं करता। उसके कोई भी परिणाम हों, मैं उन परिणामों को पुरस्कार समझकर स्वीकार करता हूं। जीवन के संबंध में मेरे मन में कोई पश्चाताप नहीं है, मैंने उसे वैसा ही जीया है, जैसा चाहा है। पूरी दुनिया मेरे खिलाफ क्यों न हो, मैंने कभी समझौता नहीं किया। तुम इसे मेरा रहस्य कह सकते हो। मैं समझौतावादी आदमी हूं। या तो मैं सही हूं या गलत हूं। मैं अपने सत्य के लिए जी-जान से लड़ता हूं। अपने सत्य के लिए लड़ता हुआ मैं पूरी दुनिया में घूमा हूं। इसे देखने में बड़ा मजा आता है कि एक अकेला आदमी पूरी दुनिया को अपना दुश्मन बना सकता है। अमेरिका, जर्मनी, इंग्लैंड और ग्रीस जैसे ताकतवर देश भी बौखला जाते हैं, उनके पास कोई जवाब नहीं होता। मुझे इक्कीस देशों में प्रवेश करने के लिए प्रतिबंधित किया गया है। क्योंकि उन्हें डर है कि मैं तीन हफ्ते के लिए उनके देश में प्रवेश करूं तो मैं उनके धर्म को, उनकी नीति और परंपरा को नष्ट कर दूंगा। मैं उनसे पूछता रहा हूं ''जिस धर्म को दो हजार साल पूर्व स्थापित किया गया हो, क्या वह इतना कमजोर है कि तीन हफ्ते में ही उसे नष्ट किया जा सकता है? यदि तुम्हारी नीति इतनी लचर है कि तीन हफ्ते के पर्यटक वीसा पर आया हुआ एक यात्री उसे गिरा दे तो फिर वह गिराने जैसा ही है। मैं जाऊं या न जाऊं, तुम स्वयं यह काम कर दो।''


तुम्हें जानकर आश्चर्य होगा कि जर्मनी जैसे देशों ने उनके संसद में कानून बनाया है कि मैं उनके देशों में प्रवेश नहीं कर सकता। मैंने कभी उनके देशों में प्रवेश नहीं किया है। न ही मैंने कभी कहा है कि मुझे तुम्हारे देश में प्रवेश करना है। यह खबर सिर्फ काल्पनिक है। लेकिन यह भय, यह पेरानामा पूरे विश्व में फैल गया है। अन्य देश भी वही कर रहे थे- पहले इंग्लैंड ने किया, अमेरिका ने, फिर जर्मनी ने किया। यह बात दावानल की तरह फैल गई। वे भूल ही गए कि तुम जो कर रहे हो, तुम्हें कम से कम कुछ बुध्दिमानी दिखानी चाहिए। जर्मनी ने कानून बनाया है कि मैं उनके देश में प्रवेश नहीं कर सकता। इतना ही नहीं, मेरा हवाई जहाज जर्मनी के किसी हवाई अड्डे पर ईंधन लेने या और किसी कारणवश उतर नहीं सकता। उनको यह डर है कि शायद हवाई जहाज में बैठे-बैठे ही मैं जनता को नष्ट और भ्रष्ट कर सकता हूं। कितनी कमजोर मनुष्यता है हमारी। क्या यही वह देश है, जहां कांट, हीगल, फ्युअर बाख और कार्ल मार्क्स जैसे महान प्रतिभाशाली लोग हुए हैं? क्या यही वह देश है जिसने बड़े-बड़े मनीषी पैदा किए हैं? कौन भयभीत है?


ग्रीस में मेरे पास चार हफ्ते का पर्यटक वीसा था। मैं अपने निवास स्थल से कभी बाहर नहीं गया, मैं कभी नहीं जाता। जिसे आना होता है वह आता है। मैं सिर्फ एक कुंआ हूं, अगर तुम प्यासे हो तो तुम्हारा स्वागत है। अगर तुम्हें प्यास ही नहीं है तो यह कुआं तुम्हारे पीछे दौड़ने वाला नहीं है। वह तो बड़ा विचित्र दृश्य होगा। मैं अपने घर से बाहर नहीं आया। मेरे साथ घर में और भी लोग थे- पच्चीस लोग। और जिन्हें मुझसे मिलना था वे मिलने आते थे। विश्व के सबसे प्राचीन चर्च, ग्रीक चर्च के आर्च बिशप ने मेरे खिलाफ अभियान शुरू किया। और उसने कहा, ''यदि मुझे बारह घण्टे के भीतर देश से बाहर नहीं निकाला जाता तो देश की नैतिकता को खतरा होगा और युवा पीढ़ी भ्रष्ट हो जाएगी।'' ये ही वे लोग हैं जो शांति के बारे में बातचीत करते हैं, प्रेम के बारे में बात करते हैं। ये कहते हैं परमात्मा प्रेम है। वे जीजस को शांति का राजपुत्र कहते हैं। उस आर्च बिशप ने शासन को धमकी दी कि अगर बारह घण्टे के भीतर मैं ग्रीस नहीं छोड़ता तो वह मेरा मकान, वहां रहने वाले सभी लोगों के साथ डायनामाइट से उड़ा देगा और सबको जला देगा।

अब ये तुम्हारे धार्मिक नेता हैं। प्रधानमंत्री डर गया। उस वक्त... मैं सो रहा था। मेरी निजी सचिव ने पुलिस को रोका और कहा, ''जरा रुकें, मैं अंदर जाकर उन्हें जगाती हूं।'' लेकिन पुलिस के हाथों में भी डायनामाइट था और वे कह रहे थे, ''तुमने हमें अंदर नहीं जाने दिया तो पूरा मकान उड़ा देंगे।''

उन्होंने मेरी सचिव को जो कि एक युवती थी, दूसरी मंजिल से नीचे पत्थरों में गिरा दिया और उसे घसीटते हुए जीप में ले गए। मैं सो रहा था। उस शोरगुल में मेरी नींद खुली, क्योंकि वे लोग एक सुंदर महल पर पत्थरों और चट्टानों की वर्षा करने लगे, जहां मैं रुका हुआ था। मुझे कुछ पता नहीं चला कि क्या हो रहा है क्योंकि मैं तीसरी मंजिल पर सो रहा था। तभी एक सन्यासी भागा हुआ आया। बोला कि लगता है पुलिस आपे से बाहर हो गई है। हम उनसे कह रहे थे कि हम उन्हें जगाने ही वाले हैं, लेकिन उन्होंने पत्थर फेंकना और खिड़कियां तोड़ना शुरू कर दिया। तो मुझे कपड़े बदले बगैर ही वैसे ही नीचे जाना पड़ा। उन्होंने कहा, ''आप यहां एक क्षण भी नहीं रह सकते।'' न कोई गिरफ्तारी का वारंट, न तलाशी का वारंट... बंदूकें मेरे सीने पर तानकर उन्होंने मेरे साथ जबरदस्ती की। एक निहत्थे आदमी के सामने चालीस भरी बंदूकें। जो कभी अपने घर से बाहर नहीं निकला। मैंने ग्रीक पुलिस के प्रमुख से कहा- क्योंकि वह उन चालीस लोगों में से एक था कि ''अब मैं समझ सकता हूं कि सुकरात को किस तरह के लोगों ने जहर दिया। तुम उन लोगों में एक रहे होओगे, जो फिर पैदा हो गए हो।''

मैंने कहा, ''क्या इसमें तुम्हारा कोई तर्क है? मैंने कोई जुर्म नहीं किया, मैंने तुम्हारे समाज के खिलाफ कुछ गलत व्यवहार नहीं किया। मैं अपने घर से बाहर भी नहीं निकला और तुम्हारी नीति नष्ट हो गई, तुम्हारा धर्म खतरे में पड़ गया?''

मैं पूरे विश्व में घूमा हूं और मैंने दुनिया का कुरूप चेहरा देखा और मुर्दा मनुष्यता देखी। मैंने इस बात का बहुत मजा लिया कि एक आदमी पूरी दुनिया में आग लगा सकता है और वह भी किसी डायनामाइट के बिना, सिर्फ शब्दों े। मेरा कोई रहस्य नहीं है, मैं सिर्फ उस बात को कहता गया जिसे मैंने अपनी आत्मा की गहराई से सत्य जाना। तुम लोगों की अस्वस्थ जरूरतों को पूरा कर रहा हो। इसके लिए तुम्हें स्वयं को जिम्मेदार समझना चाहिए। जरूरतों को पूरा करना चाहिए, लेकिन तुम्हें इनके बीच एक गहरा फर्क करना चाहिए कि अस्वस्थ जरूरतें क्या हैं और स्वस्थ जरूरतें क्या हैं? उदाहरण के लिए, अश्लील साहित्य, एक जरूरत है। लाखों अश्लील साहित्य, फोटो सब तरह की अश्लील फिल्में, 'ब्लू फिल्में' पैदा कर रहे हैं। निश्चित ही वे किसी जरूरत को पूरा कर रहे हैं।

सदियों-सदियों से लोग इतने दमित रहे हैं कि वे नग्न स्त्री को देखने के लिए भूखे हैं। निश्चय ही तुम्हारा धंधा खूब चलता है, लेकिन वह लोगों का अत्यंत कुरूप ढंग से शोषण करके जी रहा है।

पत्रकारिता का उत्तरदायित्व बहुत बड़ा है। पत्रकार लोगों को इस बात के प्रति सचेत करें कि अश्लील साहित्य की जरूरत क्यों है। आदिवासी समाज का अश्लील साहित्य में किसी प्रकार का रस नहीं होता। क्योंकि वे लोग लगभग नग्न होते हैं, वे कपड़े नहीं पहनते हैं। बचपन से ही लड़के और लड़कियां एक-दूसरे के शरीर को देखते रहते हैं, उनका एक सहज स्वाभाविक परिचय हो जाता है। इसलिए वे ताक-झांक नहीं करते रहते। प्ले बॉय जैसी पत्रिकाओं में उनकी कोई रुचि नहीं होती।


लेकिन हमारे इस तथाकथित समाज में लोग भगवद्गीता में और पवित्र बाइबिल में प्ले बॉय को छुपाते रहते हैं। किसी चीज को छुपाना हो तो सबसे सुरक्षित जगह है क्योंकि उन्हें कोई खोलता ही नहीं है। श्रीमद्भागवद्गीता को या बाइबिल को उठाकर देखने की फुरसत किसे है? मैंने एक आदमी के बारे में सुना है। वह विक्रेता था, और विश्वकोष, एनसाइक्लोपिडिया घर-घर जाकर बेचता था। उसने एक द्वार पर दस्तक दी। एक स्त्री ने द्वार खोला और जैसे ही उसने अपना विक्रेता भाषण शुरू किया वह स्त्री बोली, ''हमारे पास एक अच्छा विश्वकोष है ही, अब हमें और एक विश्वकोष की जरूरत नहीं है। आप देख सकते हैं, वह वहां कोने में टेबल पर पड़ी है, तो क्षमा करें, मुझे नहीं खरीदना है।'' वह विक्रेता बोला, ''मैं निश्चित रूप से कह सकता हूं कि वह विश्वकोष नहीं है, वह बाइबिल है।'' उस स्त्री ने कहा, ''आप बड़े अजीब आदमी दिखाई देते हैं। आप इतने निश्चयपूर्वक कैसे कह सकते हैं?'' उसने कहा, ''क्योंकि उस पर इतनी धूल जमी हुई है। उसे कोई खोलता ही नहीं है। विश्वकोष को लोग खोलते हैं, उसको पढ़ते हैं। बाइबिल को कौन पढ़ता है।'' वह आदमी बोला, ''मैं शर्त लगाने को तैयार हूं।'' उस स्त्री ने कहा, ''नहीं इसकी कोई जरूरत नहीं है। वह बाइबिल ही है। आपसे झूठ बोलने के लिए क्षमा करें।''

उस पर जमी हुई धूल की पर्त इतनी मोटी थी कि वह यह सिध्द करने के लिए काफी थी कि वह विश्वकोष नहीं है, बल्कि कोई पवित्र किताब है। तो लोग सब तरह की कुरूप बातें पवित्र गीताओं में, बाइबिलों में, कुरानों में छुपाते हैं। समाज को इस बात की शिक्षा देने की जरूरत है कि किसी भी तरह का दमन अप्राकृतिक है। इस बात की हवा पैदा करनी है कि जो भी प्राकृतिक है वह स्वीकृत हो, उसका इंकार न हो। एक तरफ तुम जो प्राकृतिक है, उसे दबाओगे और उधर दूसरे द्वार से तुम्हारी सहज वृत्ति अपनी तृप्ति करना चाहेगी। यह जो जरूरत है, यह तुम्हारी विकृत जरूरत होगी। बड़े अजीब ढंग से, तुम्हारे अश्लील साहित्यिकारों की साजिश है। वे एक ही धंधे के साझीदार हैं।

संत लोगों से कहे चले जाते हैं कि सेक्स का दमन करो, ब्रह्मचर्य का व्रत लो और ये दमित लोग भूखे हैं। तुम जानते हो। अगर तुमने कभी उपवास किया हो तो दिनभर तुम अकेले भोजन के संबंध में सोचते रहते हो, और कुछ नहीं सोचते। सामान्यत: तुम भोजन के संबंध में कभी नहीं सोचते हो। तुम जो चीज खाना चाहते हो और जो तुम्हारी जरूरत होती है, वह तुम रोज खाते हो। तुम उसके संबंध में सोचते नहीं हो, उसके सपने नहीं देखते। तुम्हें किसी अश्लील साहित्य की जरूरत नहीं होती कि किसी स्वादिष्ट व्यंजनों के चित्र देखें। लेकिन मैं ऐसे लोगों को जानता हूं जो उपवास करते हैं फिर उनका पूरा चिंतन भोजन के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। वे स्वादिष्ट व्यंजनों के सपने देखते हैं। यदि तुम उन्हें बाजार में घूमाने ले जाओ तो उन्हें सिर्फ भोजन की दुकानें, रेस्तरां, होटल ही दिखाई पड़ते हैं, और कुछ नहीं दिखाई पड़ता। कुछ भी आकर्षित नहीं करता।

मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के द्वारा यह पता चला है कि किसी आदमी से अगर तीन हफ्ते का उपवास कराया जाए तो उसका अशील चित्रों में रस खो जाता है। उसकी बजाय वह किसी पकवान का चित्र देखना पसंद करेगा। यह आश्चर्यजनक बात नहीं है कि स्त्रियों को सुंदर पकवान (ब्यूटीफुल डिशेज)कहा जाता है।

यह अपमानजनक है, कुरूप है, लेकिन एक तरह से देखा जाए तो अन्य किसी भूख की तरह सेक्स भी एक भूख ही है। समस्या और जटिल इसलिए हो जाती है क्योंकि लोगों को अश्लीलता की जरूरत है। यदि तुम उस जरूरत को पूरा करते हो तो तुम्हारी बिक्री होती है, तुम पैसे कमाते हो। और अगर इस जरूरत को पूरा नहीं करते हो तुम्हारे अखबार का, तुम्हारी पत्रिका का वितरण एकदम कम हो जाता है। तुम बड़ी कठिन उलझन में फंस जाते हो, या तो व्यवसाय में घाटा हो या फिर तुम्हें ऐसा कुछ करना पड़ता है, जो बिल्कुल ही कुरूप है। जब तक पूरी परिस्थिति नहीं बदलती, जब तक पूरा प्रसार माध्यम इस बात के प्रति जागता नहीं कि लोग अश्लीलता में क्यों रस लेते हैं और लेख और कहानियां लिखकर, कविताएं रचकर, फिल्मों के, दूरदर्शन के और वीडियो के माध्यम से यह हवा पैदा नहीं करते कि दमन जीवन-विरोधी हैं... जिस दिन संसार में कोई दमन नहीं होगा, उस दिन अश्लीलता का नामोनिशान नहीं रहेगा। जिस दिन संसार में कोई दमन नहीं होगा, उस दिन कोई विकृति शेष नहीं रहेगी, कोई समलैंगिकता नहीं होगी। पत्रकारिता को इस स्थिति की जटिलता को समझ लेना जरूरी है।

उदाहरण के लिए, फिलहाल एक बहुत भयंकर बीमारी पूरी दुनिया में फैल रही है-एड्स। यह समलैंगिंकता के कारण पैदा हुई है। कैथोलिक धर्मगुरु पोप तथा अन्य धर्मों के प्रमुख समलैंगिकता की निंदा कर रहे हैं। लेकिन समलैंगिकता सिर्फ एक लक्षण है, असली बीमारी है ब्रह्मचर्य की शिक्षा। क्योंकि समलैंगिकता मठों में, सैनिकों के कैंपों में, लड़कों के स्काउट के शिविरों में, लड़कों और लड़कियों के छात्रावासों में पैदा हुई है। जहां भी हमने स्त्रियों और पुरुषों को अलग किया, वहां विकृति पैदा हुई है।

टेक्सास में वहां के शासन ने एक कानून जारी किया है कि अब समलैंगिकता एक जुर्म होगा जिसके लिए पांच साल की कैद की सजा दी जा सकती है। और वहां दस लाख समलैंगिक लोग हैं। किसी ने कल्पना भी न की होगी कि टेक्सास में इतने अधिक समलैंगिक लोग होंगे। दस लाख लोगों ने विधान परिषद् भवन के आगे विरोध प्रकट किया और उनमें टेक्सास के सभी समलैंगिक शामिल नहीं थे। निश्चित ही, उस मेले में सभी ने भाग नहीं लिया था। उन्होंने घोषित किया कि अगर आप कानून वापिस नहीं लेते हैं तो हम भूमिगत हो जाएंगे। यहां पर 'गेक्लब' हैं, 'गे' रेस्टारेंट है और सभी तरह के समलैंगिक समूह हैं, जो खुलेआम काम कर रहे हैं। अगर आपने उसे जुर्म बना दिया तो हम भूमिगत हो जाएंगे। एक बार समलैंगिकता भूमिगत हो गई तो उस बीमारी से लड़ना और भी मुश्किल हो जाएगा, जो उसके कारण पैदा हो रही है। यह बीमारी दावानल की तरह फैल रही है, और हर शासन इस बात को छुपाने की कोशिश कर रहा है कि उनके देश में कितने समलैंगिक लोग हैं और एड्स वाइरस के लिए की गई जांच में कितने लोग 'पॉजिटिव' सिध्द हुए। क्योंकि एड्स का कोई इलाज नहीं है, उस व्यक्ति का मरना सुनिश्चित है। वैज्ञानिक नि:संदिग्ध रूप से इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इसका इलाज कभी नहीं मिलेगा। यह बीमारी ऐसी है कि वह लगभग एक धीमी मौत है। यह कोई साधारण बीमारी नहीं है। यह प्रकृति के खिलाफ आचरण करने से पैदा हुई है। अब प्रकृति उसका पूरा-पूरा बदला ले रही है।

अभी मुझे दक्षिण अफ्रीका के संबंध में एक समाचार सुनने को मिला है। एक अस्पताल में उन्होंने एक सर्वेक्षण किया- सिर्फ एक महीने पहले की बात है। पूरे शहर में सत्तर प्रतिशत वेश्या एड्स से ग्रसित हैं। एक महीने बाद जब उन्होंने फिर सर्वेक्षण किया तो शत-प्रतिशत वेश्याओं में एड्स फैल चुका था। लेकिन यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, इससे भी अधिक आश्चर्यजनक बात जो सामने आई है, वह यह कि अस्पताल में जो औरतें, बच्चे पैदा करने के लिए आई थीं, उनमें से सत्तर प्रतिशत औरतों को एड्स था- वही प्रतिशतता जो वेश्याओं की थी। ये वेश्याएं नहीं हैं, ये घरेलू औरतें थीं। उनके बच्चे एड्स को लेकर पैदा होंगे।

लेकिन पूरी दुनिया खामोश है। यह रोग आणविक शस्त्रास्त्रों से भी अधिक खतरनाक है। क्योंकि आणविक शस्त्र ऐसे हैं कि कम से कम उन पर नियंत्रण रखा जा सकता है, वह किसी हद तक हमारे हाथों में है। लेकिन लगता है कि एड्स हमारे हाथों से बाहर है।

यह पत्रकारों की जिम्मेदारी है कि लोगों के सामने प्रामाणिक तथ्यों को लाएं ताकि उन्हें पता चले कि विकृतियों से कैसे बचा जाए। समलैंगिकता कोई रोग नहीं है, वह किसी रोग का लक्षण है। असली रोग है ब्रह्मचर्य जिसकी शिक्षा हर धर्म देता रहता है।
चैनल: Blog, माय फिलॉसफी
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'यूपी में स्मारकों पर अतिरिक्त ख़र्च हुआ'



स्मारक
सीएजी के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार ने दो स्मारकों पर ज़रुरत से अधिक ख़र्च किया.
भारत के नियंत्रक और महालेखाकार ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने दो प्रोजेक्टों में 66 करोड़ रुपए ज़रुरत से अधिक ख़र्च किए हैं.
ये दो परियोजनाएं हैं लखनऊ स्थित भीमराव अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल और मान्यवर कांशी राम स्मारक स्थल.
इन्हें बनवाने का जिम्मा राजकीय निर्माण निगम के पास था. महालेखाकार ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इन परियोजनाओं के लिए 15 करोड़ रुपए में राजस्थान से पत्थर मंगवाए और फिर उन्हें वापस राजस्थान भेजा गया.
इसके अलावा परियोजनाओं के ठेकों में संशोधन कर भी सरकार ने 22 करोड़ रुपए का टाला जा सकने वाला ख़र्च किया.
इस रिपोर्ट के शुक्रवार को उत्तर प्रदेश विधान सभा में रखा गया है.

टाला जा सकने वाला ख़र्च

स्मारक
सीएजी के अनुसार चुनार के पत्थरों को राजस्थान भेजना और वहां से वापस लखनऊ लाना ग़ैर-ज़रुरी था.
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन दोनों परियोजनाओं के लिए शुरू में 881.22 करोड़ रुपए का बजट था. इसमें से भीमराव अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल के 366.82 करोड़ रुपए और मान्यवक कांशीराम स्मारक स्थल के लिए 514.4 करोड़ का बजट था.
लेकिन 31 दिसंबर 2009 को ये ख़र्च 2451.93 करोड़ तक पहुंच गया.
रिपोर्ट में कहा गया है कि इसमें 2261.19 करोड़ रुपए नवंबर 2007 से दिसंबर 2009 के बीच जारी किए गए.
नियंत्रक और महालेखाकार की रिपोर्ट में कहा गया है कि इन दोनों परियोजनाओं के लिए मिर्ज़ापुर के चुनार से पत्थर राजस्थान के बयाना में ले जाए गए जहां उनपर कारीगरी करने के बाद उन्हें वापस लखनऊ लाया गया.
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर मिर्ज़ापुर के चुनार में ही पत्थरों को तराशा जाता तो 15.6 करोड़ रुपए बच जाते.
रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि राजकीय निर्माण निगम ने कुछ काम ऊंची कीमतों पर करवाए जिसके चलते कई करोड़ रुपए अधिक ख़र्चा हुए.

बुधवार, 28 मार्च 2012

Srikant Pratyush in the media are a large broker!



AB Srikant Pratyush journalists in the media are a large broker!

shrikant_press dalal


Rajnama. Com,  senior journalist Srikant Pratyush of journalism in Bihar has no parallel. Here's the official non-government - the largest Jugadhulal system is considered. Dignitaries as well as the media has created this statement to which the stage, he will be successful more quickly. Kthartha, Srikant proved that there are people like that in this system as a broker, he as a journalist.The rest ... guy - Gara, Ntthu - Kara.
Says that Lalu - Rabri rule of law that, even when they roost, and this is Suraj Kumar G, is still calling the shots. Mr. Pratyush is an ordinary journalist.
Sir, what is interesting about this is reported, they are quite startling. The street now Sir private channel Zee News Bureau chief of the Patna. From Patna in the Swmitv Pitian news channel called Pratyush new state run newspapers. Daily virtuous path in the hands of the law, Patna edition is published. This is unique for them at the moment सरकारी ad media house Jugadh Ko Kitna appoint or not appoint or appoint a deal so much with so what should be, sir, the more set. Of course once the bane of bohemian life of millions of AB Journalism in the legend to play what is hidden in secret.  
Your state. ORG According to a report
"The Media Mafia Biada Bihar Srikant Pratyush (relative to IG Gupteshwar Pandey) Industrial area 20 thousand square feet on the ground of Pataliputra provided so that the press and Mr. Pratyush the channel can open. The fun is that Mr. Pratyush's proposal was not brought before Saipibi. The evidence still you will find on the website of Industries Department, Government of Bihar. "
Hindi media. Com, despite the
"In addition to politicians and bureaucrats, journalists have been obliged in the sharing. Srikant Pratyush Zee News related to the virtuous path and there are journalists. The daily newspaper 'Nvvihar' own too. 20,000 square feet of land has also Biada. "
Outburst media. Com also open Polः
"His name is Srikanth. Poor senior journalist. Regardless of their academic qualifications peon, but these large senior journalist. Raj Yadav was the first in the province, the minister took his hand made Khaini used to be cool. Dear Srikanth, senior journalists when they hand the heart of the garden - the garden was to arise. After the collapse of Mr. Yadav Raj Srikanth G has also defected. "
However, the act of journalism in the name of the stigma Srikant Pratyush Kumar exposes the secrets of the frame of the media, the commercial nature of journalism is also a shame. The force is being said even the media business, the business of prostitution has been outdone. Srikant Pratyush brokers in this country to deal with such a constitutional or moral responsibility does not belong?

बिहारी मीडिया में एक बड़े दलाल हैं पत्रकार श्रीकांत प्रत्युष !


बिहारी मीडिया में एक बड़े दलाल हैं पत्रकार श्रीकांत प्रत्युष !

shrikant_press dalal


राजनामा.कॉम, आज बिहार की पत्रकारिता में वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत प्रत्युष का कोई सानी नहीं है। उन्हें यहां की सरकारी गैर सरकारी-तंत्र में सबसे बड़ा जुगाड़ूलाल माना जाता है। ऐसे ही महानुभावों के कारण पत्रकारिता में इस उक्ति का सृजन हुआ है कि जो जितना जुगाड़ करेगा,वह उतना ही अधिक जल्दी सफल माना जायेगा। कथार्थ, श्रीकांत जैसे लोग यह साबित कर रहे हैं कि आज व्यवस्था में जो जितना बड़ा दलाल है,वह उतना ही बड़ा पत्रकार है। बाकी सब…ऐरा-गैरा,नत्थु-खैरा।
कहते हैं कि जब लालू-राबड़ी जी का राज था, तब भी इनकी तूती बोलती थी और आज जब नीतीश जी का सुराज है,तब भी उनकी तूती बोल रही है। श्री प्रत्युष कोई साधारण पत्रकार नहीं हैं। यदि आप इनकी पत्रकारिता की व्यापकता का आंकलन करेगें तो दंग रह जायेगें और आश्चर्य व्यक्त करेगें कि आखिर देश के इकलौते ऐसे पत्रकार का नाम गिनीज बुक रिकार्ड में अब तक क्यों नहीं दर्ज किये गये हैं।
इस महाशय के बारे में जो रोचक जानकारी मिली है,वे काफी चौंकाने वाले हैं। ये महोदय फिलहाल मशहुर प्रायवेट चैनल जी न्यूज के पटना ब्यूरों चीफ हैं। पटना से ही अपने स्वमित्व में एक पीटीएन न्यूज चैनल के साथ प्रत्युष नव बिहार नामक अखबार भी चला रहे हैं। ये साहब के हाथ में दैनिक सन्मार्ग,पटना संस्करण का प्रकाशन भी है। यही नहीं इनका जुगाड़ कितना बेजोड़ है कि फिलहाल सरकारी विज्ञापन किस मीडिया हाउस को दिया जाय या न दिया जाय या फिर दिया जाय तो किस सौदेबाजी के साथ कितना दिया जाये,ये श्रीमान ही अधिक तय करते हैं। जाहिर है कि कभी फक्कड़ जीवन जीने को अभिशप्त बिहारी पत्रकारिता के इस महारथी के करोड़ों में खेलने का राज किस चीज में छुपी है।  
अपना बिहार.ओआरजी एक रिपोर्ट के अनुसारः
” बियाडा ने बिहार के मीडिया माफ़िया श्रीकांत प्रत्युष (आईजी गुप्तेश्वर पांडेय के रिश्तेदार) को पाटलिपुत्र इंडस्ट्रीयल एरिया में 20 हजार वर्ग फ़ीट की जमीन उपलब्ध कराया, ताकि श्री प्रत्युष वहां एक प्रेस और चैनल खोल सकें। सबसे मजेदार यह है कि श्री प्रत्युष के प्रस्ताव को एसआईपीबी के समक्ष लाया ही नहीं गया। इसका सबूत अभी भी आपको बिहार सरकार के उद्योग विभाग के वेबसाइट पर मिल जायेगा।”
हिन्दी मीडिया.कॉम के अनुसारः
” नेताओं और नौकरशाहों के अलावा पत्रकारों को भी इस बंदरबांट में उपकृत किया गया है। श्रीकांत प्रत्युष सन्मार्ग और ज़ी न्यूज से जुड़े हुए पत्रकार तो हैं ही। साथ ही दैनिक अखबार ‘नवविहार’ के मालिक भी हैं। इन्हें भी बियाडा ने 20,000 वर्ग फीट जमीन दी है। “
भड़ास मीडिया.कॉम में भी खुली पोलः
” उनका नाम श्रीकांत है। बेचारे वरिष्ठ पत्रकार हैं। भले ही इनकी शैक्षणिक योग्यता चपरासी की है, लेकिन हैं ये बड़े वरिष्ठ पत्रकार। पहले जब सूबे में लालू यादव का राज था, तब इनके हाथ की बनाई गई खैनी खाकर श्री यादव मस्त हो जाया करते थे। इनका हाथ पड़ने पर वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत महोदय का दिल बाग-बाग हो उठता था। बाद में जब श्री यादव की राज का पतन हुआ तो श्रीकांत जी ने भी पाला बदल लिया। “
बहरहाल, पत्रकारिता के नाम पर कलंक श्रीकांत प्रत्युष का जारी कारनामा जहां नीतीश सरकार की मीडिया फ्रेम के रहस्यों को उजागर करता है, वहीं पत्रकारिता के व्यवसायिक स्वरुप भी शर्मसार हो रही है। जिसके बल अब यहां तक कहा जाने लगा है कि मीडिया का व्यवसाय वेश्यावृति के धंधे को भी मात दे रही है। क्या इस देश में श्रीकांत प्रत्युष जैसे दलालों से निपटने की संवैधानिक या नैतिक जिम्मेवारी किसी की नहीं है?