शनिवार, 21 अप्रैल 2012

न्यू मीडिया क्या है?





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न्यू मीडिया' संचार का वह संवादात्मक (Interactive)स्वरूप है जिसमें इंटरनेट का उपयोग करते हुए हम पॉडकास्ट, आर एस एस फीड, सोशल नेटवर्क (फेसबुक, माई स्पेस, ट्वीट्र), ब्लाग्स, विक्किस, टैक्सट मैसेजिंग इत्यादि का उपयोग करते हुए पारस्परिकसंवाद स्थापित करते हैं। यह संवाद माध्यम बहु-संचार संवाद का रूप धारण कर लेता है जिसमें पाठक/दर्शक/श्रोता तुरंत अपनी टिप्पणी न केवल लेखक/प्रकाशक से साझा कर सकते हैं, बल्कि अन्य लोग भी प्रकाशित/प्रसारित/संचारित विषय-वस्तु पर अपनी टिप्पणी दे सकते हैं। यह टिप्पणियां एक से अधिक भी हो सकती है अर्थात बहुधा सशक्त टिप्पणियां परिचर्चा में परिवर्तित हो जाती हैं। उदाहरणत: आप फेसबुक को ही लें - यदि आप कोई संदेश प्रकाशित करते हैं और बहुत से लोग आपकी विषय-वस्तु पर टिप्पणी देते हैं तो कई बार पाठक-वर्ग परस्पर परिचर्चा आरम्भ कर देते हैं और लेखक एक से अधिक टिप्पणियों का उत्तरदेता है।
न्यू मीडिया वास्तव में परम्परागत मीडिया का संशोधित रूप है जिसमें तकनीकी क्रांतिकारी परिवर्तन व इसका नया रूप सम्मलित है।

न्यू
 मीडिया संसाधन
न्यू मीडिया का प्रयोग करने हेतु कम्प्यूटर, मोबाइल जैसे उपकरण जिनमें इंटरनेट की सुविधा हो, की आवश्यकता होती है। न्यू मीडिया प्रत्येक व्यक्ति कोविषय-वस्तु का सृजन, परिवर्धन, विषय-वस्तु का अन्य लोगों से साझा करने का अवसर समान रूप से प्रदान करता है। न्यू मीडिया के लिए उपयोग किए जाने वाले संसाधन अधिकतर निशुल्क या काफी सस्ते उपलब्ध हो जाते हैं।

न्यू मीडिया का भविष्य
यह सत्य है कि समय के अंतराल के साथ न्यू मीडियाकी परिभाषा और रूप दोनो बदल जाएं। जो आज नया है संभवत भविष्य में नया न रह जाएगा यथा इसे और संज्ञा दे दी जाए। भविष्य में इसके अभिलक्षणों में बदलाव, विकास या अन्य मीडिया में विलीन होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
न्यू मीडिया ने बड़े सशक्त रूप से प्रचलित पत्रकारिता को प्रभावित किया है। ज्यों-ज्यों नई तकनीक,आधुनिक सूचना-प्रणाली विकसित हो रही है त्यों-त्योंसंचार माध्यमों व पत्रकारिता में बदलाव अवश्यंभावी है।
- रोहित कुमार 'हैप्पी'

 

न्यू मीडिया और ऑनलाइन पत्रकारिता की नई माँगें
वेब पत्रकारिता की भाषा

 


न्यू मीडिया

न्यू मीडिया विशेषज्ञ या साधक
आप पिछले १५ सालों से ब्लागिंग कर रहे हैं, लंबे समय से फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब इत्यादि का उपयोग कर रहे हैं जिसके लिए आप इंटरनेट, मोबाइल व कम्प्यूटर का प्रयोग भी करते हैं तो क्या आप न्यू मीडिया विशेषज्ञ हुए? ब्लागिंग करना व मोबाइल से फोटो अपलोड कर देना ही काफी नहीं है। आपको इन सभी का विस्तृत व आंतरिक ज्ञान भी आवश्यक है। न्यू मीडिया की आधारभूत वांछित योग्यताओं की सूची काफी लंबी है और अब तो अनेक शैक्षणिक संस्थान केवल  'न्यू मीडिया' का विशेष प्रशिक्षण भी दे रहे हैं या पत्रकारिता में इसे सम्मिलित कर चुके हैं।
ब्लागिंग के लिए आप सर्वथा स्वतंत्र है लेकिन आपको अपनी मर्यादाओं का ज्ञान और मौलिक अधिकारों की स्वतंत्रता की सीमाओं का भान भी आवश्यक है। आपकी भाषा मर्यादित हो और आप आत्मसंयम बरतें अन्यथा जनसंचार के इन संसाधनों का कोई विशेष अर्थ व सार्थक परिणाम नहीं होगा। 
इंटरनेट पर पत्रकारिता के विभिन्न रूप सामने आए हैं -
  • अभिमत - जो पूर्णतया आपके विचारों पर आधारित है जैसे ब्लागिंग, फेसबुक या टिप्पणियां देना इत्यादि।
  • प्रकाशित सामग्री या उपलब्ध सामग्री का वेब प्रकाशन  - जैसे समाचारपत्र-पत्रिकाओं के वेब अवतार।
  • पोर्टल व वेब पत्र-पत्रकाएं (ई-पेपर और ई-जीन जिसे वेबजीन भी कहा जाता है)
  • पॉडकास्ट - जो वेब पर प्रसारण का साधन है।
कोई भी व्यक्ति जो 'न्यू मीडिया' के साथ किसी भी रूप में जुड़ा हुआ है किंतु वांछित योग्यताएं नहीं रखता उसे हम 'न्यू मीडिया विशेषज्ञन कह कर 'न्यू मीडिया साधक' कहना अधिक उपयुक्त समझते हैं। 

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वेब पत्रकारिता लेखन व भाषा 

वेब पत्रकारिता, प्रकाशन और प्रसारण की भाषा में आधारभूत अंतर है। प्रसारण व वेब-पत्रकारिता की भाषा में कुछ समानताएं हैं। रेडियो/टीवी प्रसारणों में भी साहित्यिक भाषा, जटिल व  लंबे शब्दों से बचा जाता है। आप किसी प्रसारण में, 'हेतु, प्रकाशनाधीन, प्रकाशनार्थ, किंचित, कदापि, यथोचित इत्यादि' जैसे शब्दों का उपयोग नहीं पाएँगे।   कारणप्रसारण ऐसे शब्दों से बचने का प्रयास करते हैं जो उच्चारण की दृष्टि से असहज हों या जन-साधारण की समझ में न आएं। ठीक वैसे ही वेब-पत्रिकारिता की भाषा भी सहज-सरल होती है।
वेब का हिंदी पाठक-वर्ग आरंभिक दौर में अधिकतर ऐसे लोग थे जो वेब पर अपनी भाषा पढ़ना चाहते थे, कुछ ऐसे लोग थे जो विदेशों में बसे हुए थे किंतु अपनी भाषा से जुड़े रहना चाहते थे या कुछ ऐसे लोग जिन्हें किंहीं कारणों से हिंदी सामग्री उपलब्ध नहीं थी जिसके कारण वे किसी भी तरह की हिंदी सामग्री पढ़ने के लिए तैयार थे। आज परिस्थितिएं बदल गई हैं मुख्यधारा वाला मीडिया आनलाइन उपलब्ध है और पाठक के पास सामग्री चयनित करने का विकल्प है।
इंटरनेट का पाठक अधिकतर जल्दी में होता है और उसे बांधे रखने के लिए आपकी सामग्री पठनीय, रूचिकर व आकर्षक हो यह बहुत आवश्यक है। यदि हम ऑनलाइन समाचार-पत्र की बात करें तो भाषा सरल, छोटे वाक्य व पैराग्राफ भी अधिक लंबे नहीं होने चाहिएं। 

विशुद्ध साहित्यिक रुचि रखने वाले लोग भी अब वेब पाठक हैं और वे वेब पर लंबी कहानियां व साहित्य पढ़ते हैं। उनकी सुविधा को देखते हुए भविष्य में साहित्य डाऊनलोड करने का प्रावधान अधिक उपयोग किया जाएगा ऐसी प्रबल संभावना है।  साहित्यि क वेबसाइटें स्तरीय साहित्यका प्रकाशन कर रही हैं और वे निःसंदेह साहित्यिक भाषा का उपयोग कर रही हैं लेकिन उनके पास ऐसा पाठक वर्ग तैयार हो चुका है जो साहित्यिक भाषा को वरियता देता है।
सामान्य वेबसाइट के पाठक जटिल शब्दों के प्रयोग व  साहित्यिक भाषा से उकता जाते हैं और वे आम बोल-चाल की भाषा अधिक पसंद करते हैं अन्यथा वे एक-आध मिनट ही साइट पर रूककर साइट से बाहर चले जाते हैं।

सामान्य पाठक-वर्ग को बाँधे रखने के लिए आवश्यक है कि साइट का रूप-रंग आकर्षक हो, छायाचित्र व ग्राफ्किस  अर्थपूर्ण हों, वाक्य और पैराग्राफ़ छोटे हों, भाषा सहज व सरल हो। भाषा खीचड़ी न हो लेकिन यदि उर्दू या अंग्रेज़ी के प्रचलित  शब्दों का उपयोग करना पड़े तो इसमें कोई बुरी बात न होगी। भाषा सहज होनी चाहिए शब्दों का ठूंसा जाना किसी भी लेखन को अप्रिय बना देता है।
- रोहित कुमार 'हैप्पी'

 

न्यू मीडिया क्या है?
न्यू मीडिया और ऑनलाइन पत्रकारिता की नई माँगें
वेब पत्रकारिता की भाषा 
न्यू मीडिया विशेषज्ञ या साधक
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न्यू मीडिया और ऑनलाइन पत्रकारिता की नई माँगें 
नि:संदेह न्यू मीडिया बड़े सशक्त रूप से परंपरागतप्रचलित मीडिया को प्रभावित कर रहा है। आज पत्रकारों को  न्यू मीडिया से जुड़ने के लिए नई तकनीक, आधुनिक सूचना-प्रणाली, सोशल-मीडिया, सर्च इंजन प्रवीणता और वेब शब्दावली से परिचय होना अति-आवश्यक हो गया है। केवल ब्लागिंग मात्र करने से आप संपूर्ण वेब-पत्रकार नहीं कहलाते। वेब-पत्रकारिता का क्षेत्र काफी विस्तृत है और आपको पत्रकारिता के अतिरिक्त वेब, मल्टीमीडिया, सर्च इंजन और उनकी कार्यप्रणाली व ग्रॉफिक की समझ होनी चाहिए। इन तत्वों के बिना भी आप न्यू मीडिया में काम तो कर सकते हैं परंतु एक सक्षम वेब पत्रकार के लिए इनमें प्रवीणता हासिल करना उपयोगी होगा।
आइए, देखें एक वेब पत्रकार के लिए किन-किन योग्यताओं की आवश्यकता होती है:
  • पत्रकारिता का ज्ञान
  • इंटरनेट का उपयोग
  • सर्च इंजन उपयोग में दक्षता
  • इंटरनेट इंवेस्टिगेश
  • एच टी एम एल ( html ) का आधारभूत ज्ञान
  • यदि हम हिंदी वेब पत्रकारिता में काम करना चाहते हैं तो हिंदी यूनिकोड का ज्ञान व हिंदी टंकण
  • ब्लागिंग जैसे वर्डप्रैस, गूगल ब्लाग्स इत्यादि
  • सर्च इंजन आप्टिमज़ैशन (एस सी ओ)
  • सी एम एस (कांटेंट मैनेजमैंट स्सिटम) जैसे जुमला, वर्ड प्रैस, सी एम एस एम एस इत्यादि
  • यू ट्यूब इत्यादि पर वीडियो अपलोड कैसे करे, मैटा टैग कैसे लिखे इत्यादि
  • बेसिक ग्रॉफिक का ज्ञान जैसे अडोबी फोटोशॉप पर फोटो को संपादित करना व उसे वेब के लिए तैयार करना
  • बेसिक वीडियो व ऑडीओ एडटिंग
  • पॉडकास्ट
  • आर एस एस फीड
  • सोशल नेटवर्क (फेसबुक, माई स्पेस, गूगल प्लस, ट्विटर),
  • विकिपीडिया
उपरोक्त अधिकतर योग्यताओं में यदि पूर्ण निपुणता न भी हो लेकिन इनका आधारभूत ज्ञान न होने पर वेब-पत्रकारिता का सफल होना संभव नहीं। हाँ, आप परंपरागत पत्रकारिता को ही वेब-पत्रकारिता कहते या समझते रहे तो अलग बात है।
- रोहित कुमार 'हैप्पी'



गाँधी जी, पत्रकारिता और स्वतंत्रता आंदोलन--- विद्या विनोद गुप्त



FRIDAY, NOVEMBER 27, 2009



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स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है - इसे हम लेकर रहेंगे, का नारा देने वाले स्वंतत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक का निधन जब 31 जुलाई 1920 को हुआ तो मोहनदास करमचंद गांधी ने राष्ट्रीय आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ली और असहयोग आंदोलन का शुभारंभ हुआ । हंदर आयोग की सिफारिशों के फलस्वरूप कार्यवाही पर देश भर में जो आजादी की लहर चली उससे उनके आंदोलन को बल मिला। गांधी जी अपने कार्यक्रम को राष्ट्रव्यापी बनाने में समाचार पत्रों की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते थे। कलकत्ता से भारत मित्र, कलकत्ता समाचार और विश्व बंधु का प्रकाशन होता था। कानपुर से प्रताप का और इलाहाबाद से भविष्य का।

गांधी जी के अहिंसा त्याग और सत्याग्रह के सिद्धांत की सफलता ने भारत का मन मोह लिया था - सारा जनमत गांधी जी के साथ था और अनेक नए शक्तिशाली समाचार पत्रों का प्रकाशन भी आरंभ हुआ। जबलपुर, खंडवा से कर्मवीर का कलकत्ता से स्वतंत्र का, काशी से आज का और कानपुर से वर्तमान का। इसी बीच पंजाब में अमृतसर, लाहौर और गुजरावाला में कलकत्ता में गुजरात के अहमदाबाद, वीरम गांव, नडियाड में जो हिंसक घटनाएं हुई जिनसे गांधी जी को अत्यधिक दुख हुआ। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ समाचार छापने पर अधिकांश समाचार पत्र जप्त कर दिए गये। प्रेस बंद कर दिए गए। उन पर जुर्माना कर दिया गया । जुर्माना न पटाने पर जेल की सजा दी गई। अनेक पत्र पत्रिकाएं भूमिगत हो गई । उस समय जितना महत्व गणेश शंकर विद्यार्थी के संपादन में कानपुर से निकलने वाले पत्र प्रताप का था उतना ही महत्व मध्य प्रांत में कर्मवीर का था। कर्मवीर के संपादक थे पं. माखनलाल चतुर्वेदी एक भारतीय आत्मा। उन्होंने मातृभूमि और मनुष्यता पर बलि होने का आव्हान किया और राजद्रोह के अपराध में उन्हें सजा हो गई । कर्मवीर के नाम के प्रेरणा उन्हें उस नाम से मिली जिसके द्वारा उस समय की जनता गांधी जी को संबोधित करती थी। कई बार उन्हें जेल जाना पड़ा । 63 बार उनके घर और समाचार के दफ्तर की तलाशी ली गई। वर्धा के सुमति और नागपुर के संकल्प के संपादकों को परेशान किया गया धमकी दी गई। फिर दिल्ली से अर्जुन निकला, कलकत्ता से मतवाला और नागपुर से प्रणवीर और श्री शारदा।

महात्मागांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन चलाने का समर्थन करने के लिए मासिक पत्रिकाओं का प्रकाशन भी प्रारंभ हुआ जिससे गांधी जी के आंदोलन को बल मिला साथ ही हिंदी की श्री वृद्धि हुई। पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित सरस्वती, दुलारे लाल भार्गव द्वारा लखनऊ से प्रकाशित माधुरी रामरख सिंह सहगल द्वारा इलाहाबाद से प्रकाशित चांद तथा उपन्सास सम्राट मुंशी प्रेमचंद द्वारा वाराणसी से प्रकाशित हंस ने गांधी के सत्य और अहिंसा पर हिंदी का अभिषेक किया। भार्गव ने एक दूसरी पत्रिका सुधा निकाली और रामवृक्ष बेनीपुरी ने वीणा । कुछ पत्रिकाएं सरस्वती की परंपरा से हटकर राजनीतिक विषयों पर भी टिप्पणियां तथा साहित्यिक कृतियां जैसे कविताएं, कहानियां, लेख, निबंध, नाटक आदि भी प्रकाशित करती थीं।

भारत मित्र के संपादक लक्ष्मण नारायण गर्दें ने गांधी जी द्वारा लिखित पुस्तक हिंदू स्वराज्य का पहला हिंदी रूपांन्तर अपने पत्र में प्रकाशित किया । उन्होंने गांधी जी की अनुमति लेकर ऐसा प्रबंध किया कि गांधी जी के यंग इंडिया में प्रकाशित होने वाले लेख की अग्रिम प्रति उन्हें उपलब्ध हो जाती थी इस व्यवस्था के कारण गांधी जी का लेख अंग्रेजी समाचार पत्रों से एक दिन पूर्व हिंदी समाचार पत्रों में छप जाता था । 7 मई 1922 के आज के अंक में जब छपा कि हमारा उद्देश्य अपने देश के लिए सब प्रकार से स्वतंत्रता उपार्जन है। हम हर बात में स्वतंत्र होना चाहते हैं । हमारा लक्ष्य यह है कि हम अपने देश का गौरव बढ़ावें । अपने देशवासियों में स्वाभिमान का संचार करें, उनको ऐसा बनावे कि भारतीय होने का उन्हें अभिमान हो इसमें तनिक भी संकोच नहीं। गांधी जी के इस उद्बोधन से देश के चारों ओर से गांधी जी जय-जयकार गूंजने लगी । नरम-गरम दल के सभी लोग गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस के ही मंच पर आ गए। मोतीलाल नेहरू,पं. जवाहरलाल नेहरू, राजगोपालचार्य, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, डॉ. अंबेडकर, विपिन चंद्र पाल, लाला लाजपतराय, विजय लक्ष्मी पंडित, डॉ. राधाकृष्णन, अब्दुल गफ्फार खां, मोरारजी देसाई, पं. रविशंकर शुक्ला, पं. द्वारिका प्रसाद मिश्रा, रवींद्र नाथ टैगोर, पुरुषोत्तम दास दंडन, सुभाष चंद्र बोस, ठा. छेदीलाल बैरिस्टर, ठा. प्यारेलाल सिंह, मदन मोहन मालवीय, ईश्वर चंद्र विद्या सागर, सरोजनी नायडू, इंदिरा गांधी, जय प्रकाश नारायण, भूलाभाई देसाई, सरदार पटेल, गोविंद वल्लभ पंत, कृपलानी, जगजीवनराम, अरविंद घोष, राजकुमारी अमृत कौर, गोपाल कृष्ण गोखले, गुलजारी लाल नंदा, देशबधु चितरंजनदास, भगिनी निवेदिता दास, जमुना लाल बजाज, बिड़ला तेज बहादुर, वीरसावरकर, सुहरा वर्दी, शेख अब्दुला, अरूणा आसफ अली, आदि लाखों की संख्या में स्वतंत्रता सेनानियों ने स्वतंत्रता संग्राम में गांधी जी का मनोयोग से साथ दिया तथा इस आंदोलन को आगे बढाने में समाचार पत्रों की भूमिका महत्वपूर्ण रही ।

क्रांतिकारियों के दमन तथा खुदीराम बोस, सरदार भगत सिंह को फांसी की सजा, आजाद की हत्या के कारण समाचार पत्र क्रांतिकारियों के साहस और वीरता के गीत गा रहे थे । फांसी पर चढ़ने वाले युवकों के गुण गा रहे थे । स्वराज ने अपने संपादकीय लेख में शंखनाद किया कि देशवासी निद्रा से जागें और देखें कि कितनी बुरी तरह से विदेशी अंग्रेजी ने इस देश का शोषण किया है ।

गांधी जी द्वारा लिखित हिंद स्वराज, सर्वोदय आत्मकथा, सत्याग्रह समाचार और हरिजन नामक पत्र में गांधी जी ने जो दिशा निर्देश दिए थे बिलकुल नए ढंग के थे । जनता ने उन्हें अवतार के रुप में देखती थी । वे राजनैतिक और सामाजिक वातावरण पर छा गए थे जैसे देशवासियों पर जादू कर दिया हो। उस समय स्थान-स्थान और गली-गली में अधनंगे बच्चे भी गांधी जी की जय के नारे लगाते दौड़ते दिखाई देते थे । इसका परिणाम यह हुआ कि हर शहर और ग्राम में जहां समाचार पत्र नहीं पहुंच सकते थे नए बुलेटिन और पाम्पलेट बांटे जाने लगे ।

मध्यप्रांत में भी कर्मवीर ही नहीं श्री शारदा, प्रणवीर, साहस, देहाती दुनिया, छात्र सहोदर, महाकौशल आदि का प्रकाशन आरंभ हुआ और राष्ट्रीय आंदोलन को आगे बढ़ाया । कलकत्ता समाचार ने लिखा - सारे देश की निगाह महात्मा गांधी पर केंद्रित है तो नागपुर के श्री शारदा के लिखा - जेल जाना भारत को स्वाधीन कराने का मार्ग है और कलकत्ता से साप्ताहिक मतवाला ने लिखा गांधी विहीन स्वराज यदि स्वर्ग से भी सुंदर हो तो वह नरक के समान त्याज्य है । उस एक महात्मा पर शत शत स्वराज न्यौछार कर देने योग्य है । यदि अपने देशमें स्वराज की प्रतिष्ठा चाहते हैं तो तन मन धन से अपने नेता महात्मा गांधी के आदेशों का पालन करना आरंभ कीजिए । समाचार पत्रों में संपादकीय लेख लिखे जाने लगे- रोलेट एक्ट पर, पंजाब की दमन नीति पर, जलिया वाला बाग पर, खिलाफत आंदोलन पर, अली बंधुओं एवं अन्य की गिरफ्तारी पर, अहिंसात्मक सत्याग्रह पर, गांधी जी की जेल यात्रा पर, उनकी प्रार्थना सभाओं पर, विदेशी वस्त्रों की होली जलाने पर, चौरा चौरी कांड पर, नमक सत्याग्रह पर, युवराज प्रिंस आफ वेल्स के आगमन के बहिष्कार पर, इस तरह समाचार पत्र राष्ट्रीयता के प्रतीक बन गए ।

भूमिगत समाचार पत्रों के नाम भी खूब थे- चिंगारी, बवंडर, चंद्रिका, रणडंका, शंखनाद, ज्वालामुखी, तूफान, रण चंद्रिका, जन संग्राम बोल दे धावा आदि । उन दिनों पायनियर और लीडर आदि एक-एक आने में, आज आदि दो-दो पैसे में बिकते थे । हाकर चिल्लाता था- ब्रिटिश सरकार की छाती कूटने वाला अखबार इनडिपेंडेंस डे लो । अंतिम चरण में 1942 के भारत छोड़ो करो या मरो आंदोलन के समय प्रेस इमरजेंसी अधिनियम के अंतर्गत समाचार पत्रों को कुचलने का भरसक प्रयास किया गया । दिल्ली के हिंदुस्तान और कितने ही अन्य समाचार पत्र बंद हो गए । देश के प्रस्तावित विभाजन के साथ 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिली और समाचार पत्रों का गांधी जी को भरपूर समर्थन मिला उस समय चार प्रमुख दैनिक समाचार पत्र थे, विश्व मित्र, आर्यावर्त, हिन्दुस्तान और राज । सभी ने उस दिन के अपने अग्रलेख में सारे देशवासियों की भावनाओं को चित्रित करते हुए लिखा-अब वह दिन दूर नहीं जब भारत सभी दिशाओं में उन्नति करता हुआ विश्व का महानतम लोकतंत्र बन जाएगा और विश्व में उसका महत्वपूर्ण स्थान होगा ।

30 जनवरी 1948 को प्रार्थना सभा मे एक उत्तेजक युवक की गोली से गांधी की हत्या हो गयी । अंतिम समय भी हे राम कहते हुए प्राण छोड़ा और अनंत में विलीन हो गये । कौन कहता है गांधी जी मर गए- लोग भले ही गांधी जी को भूल जावें पर जब तक समाचार पत्र रहेंगे गांधी जी अमर रहेंगे ।

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

भारतीय सिनेमा की १००वीं वर्षगांठ/ Puneet Bisaria


आज २१ अप्रैल २०१२ को भारतीय सिनेमा की १००वीं वर्षगांठ है. आज से ९९ साल पहले २१ अप्रैल १९१३ को 
भारत की पहली फिल्म सत्य हरिश्चंद्र धुन्धिराज फाल्के (दादा साहब फाल्के) ने तत्कालीन बम्बई के 
ओलंपिया थियेटर में रिलीज़ की थी. आज से संपूर्ण देश में भारतीय सिनेमा के जन्मशताब्दी वर्ष की
शुरुआत होने जा रही है. इस महत्वपूर्ण अवसर पर मैं आभासी दुनिया के अपने मित्रों को बताना चाहता हूँ 

कि भारतीय सिनेमा का सफरनामा शीर्षक से मेरे संपादन में प्रकाशित होने वाली पुस्तक शीघ्र ही आपके 
हाथों में होगी. यह पुस्तक अटलान्टिक पब्लिशर्स प्राइवेट लिमिटेड ७/२२ अंसारी रोड दरिया गंज नयी दिल्ली 
११०००२ से प्रकाशित हो रही है.
Puneet Bisaria

मेरा पक्ष: पत्रकारिता की भूमिका

मेरा पक्ष: पत्रकारिता की भूमिका

पत्रकारिता की भूमिका यह एक बड़ा ही गंभीर और चुनौतीपूर्ण सवाल है। ज्यों-2 प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया का विस्तार हो रहा है, उसी तरह से इसका क्षरण भी भयानक तरीके से ही होता जा रहा है। आज मीडिया की उपयोगिता और बढ़ गयी है, मगर शुद्ध लाभ कमाने की नीयत से मीडिया में काबिज नवीन पीढ़ी पत्रकारिता को एक दुकान की तरह देख और माप तौल रही है। सत्ता से करीबी का मादक अवसर और ब्लैकमेलिंग के साथ साथ प्रीपेड़ पत्रकारिता के इस चलन में (फैशन भी कह सकते है।) तमाम आदर्शो और मूल्यों की बलि (सूली) दे दी गयी है। मीडिया एक साधन सा हो गया है जिसके बूते सता और नौकरशाहों पर लगाम रखकर अरना उल्लू सीधा किया जा रहा है। यह  चिंता की नहीं घोर चिंता की बात है। समाज हित के लिए प्रहरी की तरह काम तरने वाले ज्यादातर अखबार ही करप्ट संस्कृति के वाहक बनते जा रहे है।
एक दौर था जब कहा जाता था कि
जब तोप मुकाबिल हो तो अकबार निकालो
मगर आज तो अकबार और मीडिया का स्वरूप ही बदलता जा रहा है। समाज के दर्पण की तरह अखबार जनता के समक्ष एक सामाजिक आईना की तरह रोजाना सुबह आता है , जिसमें समाज के नब्ज का हाल पता चलता है। डालटेनगंज पलामू के दिवंगत शायर विनोद कुमार गौहर का एक शेर याद आ रहा है जिसमें उन्होनें कहा था या खुदा ये कौन सा दौर है आया हुआ, देखकर अखबार मेरा दिल है घबराया हुआ
इसी तरह औरंगाबाद के हाल ही में दिवंगत हुए युवा शायर प्रदीप कुमार रौशन मीडिया के बारे में कहते हैं कि - मेरे युग में कृष्ण है टीवी ौर गीता अखबार है
सुन ओ नीली छतरी वाले ये दुनिया बीमार है
सही मायने में आज पत्रकारिता अपनी भूमिका भूल गयी है और कहीं से किरण उम्मीद की दिख नहीं रही है, क्योंकि हालात बेहतर होने की बजाय बदतर से हो रहे है। देखना है कि क्या हम इस हालात में आत्मपरीक्षण करने के लिए या अपनी भूमिका से पीछे हटते रहने के सामाजिक कलंक और दाग (लांछन) के प्रति क्या सोच भी रहे हैं ?
इसका उत्तर यदि नहीं है तो मान लिया जाे कि पत्रकारिता का लंका कांड दौर चालू हो गया है , जहां पर संपादकों की तरह ही पत्रकारों (असली पत्रकार) का भी लापत्ता होने का दौर चालू हो गया है। और भयानक तरीके से पत्रकारिता अपनी भूमिका और दायित्व से भटक गयी है।

पत्रकारिता का इतिहास



देवर्षि
 नारद घूम-घूम कर संवाद-वहन करनेवालों में अग्रणी थे। उन्हें जनसंचार का आदि आचार्य कहा जाता सकता है। ``बुद्धिमतांवरिष्ठम्´´ हनुमान जनसंचार के नायक थे। महाभारत के कुरूक्षेत्र के 18 दिनों के महायुद्ध का आँखों देखा हाल को सुनानेवाले संजय संचारमाध्यम के पुरोधा माने जाते हैं। भारतीय साहित्य में मेघहंसतोतावायु संचार के माध्यम के रूप में विर्णत है।
बाईबिल में स्वर्ग की पुष्पवाटिका में बाबा आदम और अम्मा हौवा की जो कथा हैवह एक प्रकार से संचार का प्रारिम्भक स्वरूप है। अम्माहौवा ने कहा, `` क्यों  हम वह फल खाँए जो ज्ञान के वृद्ध पर लगता हैजिसको खाने से हमें पाप और पुण्य का ज्ञान हो जायेगा। यहफल हमारे लिए वर्जित तो भी हमें कोई परवाह नहीं करनी चाहिए।´´ यही छोटी-सी वार्ता जनसंचार की एक कड़ी बन गयी।
प्राचीन काल में पठन-पाठनमुद्रण के साधन के अभाव में जनसंचार के माध्यम गुरू या पूर्वज थे जो मौखिक रूप से सूचनाओं को एकपीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाते थे। लेखन के प्रचलन के बाद भी पत्रों पर संदेश लिखे जाते थे। मौर्यकाल एवं गुप्ताकाल में शिलालेखों द्वाराधार्मिक एवं राजनीतिक सूचनाएँ जन सामान्य तक पहुँचायी जाती थीं। उसी समय वाकयानवीस (संवाददाता), खुफियानवीस (गुप्तसमाचार लेखक), सवानहनवीस (जीवनी लेखकतथा हरकारा (संदेशवाहकसंचार सम्प्रेषण के क्षेत्र में कार्यरत थे।
इस प्रकार मुट्ठीभर लोगों के अध्ययनचिन्तन-मनन और आत्माभिव्यक्ति की प्रवृत्ति तथा `सब जनहिताय सब जनसुखाय´ के प्रतिव्यग्रता ने पत्रकारिता को जन्म दिया।
पत्रकारिता के प्रकार
सांस्कृतिक पत्र-पत्रिकाएँशिक्षा सम्बन्धी पत्रिकाएँधार्मिक पत्र-पत्रिकाएँकृषि पत्रिकाएँस्वास्थ्य सम्बन्धी पत्रिकाएँविज्ञान विषयकपत्रिकाएँउद्योग सम्बन्धी पत्रिकाएँचलचित्र सम्बन्धी पत्रिकाएँमहिल सम्बन्धी पत्रिकाएँखेल सम्बन्धी पत्रिकाएँबाल सम्बंधीपत्रिकाएँ

Press and Letters
1631 E 0 in the France of the ' Gazette de France ", 1667 in Beiljaym the ` Gazette van gut ' 
Mughal period in the
मुगल काल में संवाद-लेखकों की नियुक्ति हुई जिन्हें `वाकयानवीस´ कहा जाता था। `वाकयानवीस´ द्वारा प्रेषित खतों के सारांश को बादशाहोंको सुनाया जाता था। अखबाराते--दरबारे-झुपल्लापैगामें हिन्दपुणे अखबार जैसे हस्तलिखित पत्रों को पत्रकारिता का पूर्वज कहा जासकता है।
Press and Mr. Bolt
1780 E 0, ` Bengal Journal '1784 and ` Indian Blrd ' 
उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में मद्रास के गवर्नर से सर टॉमस मुनरों ने प्रेस की आजादी को आंग्ल सत्ता समाप्ति का पर्याय माना।उनके ही शब्दों में, ``इनको प्रेस की आजादी देना हमारे लिए खतरनाक है। विदेशी शासन और समाचारपत्रों की स्वतन्त्रता दोनों एक-साथनहीं चल सकते। स्वतंत्र प्रेस का पहला कर्तव्य क्या स्वतन्ता दोनों एक-साथ नहीं चल सकते। स्वतंत्र प्रेस का पहला कर्तव्य क्या होगा?यही कि देश को विदेशी चंगुल से स्वतंत्र कराया जाएइसलिए अगर हिन्दुस्तान में प्रेस को स्वतंत्रता दे दी गयी तो इसका जो परिणामहोगावह दिखायी दे रहा है।´´
आजादी पूर्व पत्रकारिता में प्रवेश करने का तत्पर्य आंग्ल सत्ता के फौलादी पंजे से मुकाबला करना थाआर्थिक संकट से जूझना तथा सदैवकंटकाकीर्ण पथ का अनुगामी बनना था।

(1829),
सन 1885 में ही हिन्दुस्तान में राष्ट्रीय जागरण के भैरवी मंत्र को फूँकने के लिए राजा रामपाल सिंह ने प्रथम हिन्दी दैनिक`हिन्दोस्थान´ का प्रकाशन प्रारम्भ किया। अत: 1885 से 1919 अवधि को `जागरण काल´ के नाम से अभिहित करना सुसंगत होगा।
सन 1885 से 1919 तक की अवधि के पत्रों ने राष्ट्रीय चेतना को पल्लवित किया तथा `स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है´ इसनारे को सार्थक करने के लिए जन-जन में जागरण का संचार किया। एक और `भारत ´ के `अभ्युदय´ हेतु `हिन्दी केसरी´ स्वराज´ का मंत्रफँूकता था तो दूसरी और भावात्मक एकता के लिए `देवनागर´ सबसे एक सूत्र में बंध जाने की अपील करता थाजैसा कि स्वतंत्रता केअक्षय-स्रोत वीर सावरकर का लक्ष्य था-
एक देवएक देशएक भाषा
एक जातिएक जीवएक आशा

सन 1920 से 1947 तक संघर्षोंअभावोंअभिशापों और प्रताड़नाओं के बीच दबे रहकर पत्र-पत्रिकाओं ने आग और शोलों से भरीउत्तेजक कथा सुनायी। पत्रकारों की हुंकार और फुँफकार वाली वाणी ने भारतीयों को झकझोर दिया। सामूहिक उत्पीड़नबेबसीवेदना केकरूण-क्रन्दन को  सुनाकर पत्र-पत्रिकाओं ने फिरंगियों के प्रति घोर गर्जन किया। हो उथल-पुथल अब देश बीच खौले खून जवानों का।

बलिवेदी पर बलि चढ़ने को अब चले झुंड मर्दानों का।



क्रान्तिकारी पत्रकार पराड़करजी ने भी 1930 में `रणभेरी´ में लिखा:-

Revolution ',' uprisings ', ` trick '( malignancy ), ` mutiny '

tirade ', ` spark ', windstorm ,
गांधी जी ने स्वतंत्रता का अर्थ राजनीतिक आजादी ही नहीं बतलाया बल्किा उसक सािा आर्थिकसामाहिकसंास्कृति नवनिर्माणपर जोर दिया। उन्होनें कहा-``स्वराज्य का अर्थ है-विदेशी शासन से पूर्ण स्वतंत्रता और पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता। इस प्रकार स्वराज्य के एकसिरे पर राजनीतिक स्वतंत्रता है तो दूसरे सिरे पर आर्थिक स्वतंत्रता। उसके दो सिरे और है। तीसरा सिरा हैनैतिक या सामाजिक औरचौथा है धर्म का।