शनिवार, 22 सितंबर 2012

प्रेस क्लब / अनामी शरण बबल - 14

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    23 सितम्बर   2012
बाबाजी जल्दी चलना..................
कांग्रेस के युवराज राहुल बाबा  यदि आपको अपने नाम के आगे पीछे (भूत) पूर्व लिखवाने का शौक है तो संगठन और पार्टी को मारिए गोली और चट मंगनी और पट विवाह की तरह बस्स पीएम बनने की जुगाड़ में लग जाइए.।. हालांकि यह मेरा  मुफ्त में दिया जा रहा एक फालतू सा ही मशविरा है मगर आप यह तय मान लीजिए कि 2014 ( यदि 2013 में भी चुनाव हो जाए तब भी ) में ना पंजा दमदार रहेगा और ना आपको पीएम बनने का मौका मिलने वाला है । फिर एम एम-2 यानी अपन मनमोहन जी और पचास लाख के टॉयलेट के लिए ख्यात हुए मोंटेक .वालिया पार्टी की जड़ों में रोजाना मट्ठा डाल डाल कर इतना मजबूत बनाने में लगे है कि अब तो भगवान ही राखे। मगर 2014 का सपना भूलकर बस्स, यूपी के सीएम जुनियर मुलायम की सलाह को वेदवाक्य मान कर देश गद्दी और जो जो संभालना हो दामन में थाम ले, । सपा के अपन नेताजी भी पीएम का सपना देखने लगे है, और तय मानिए कि कभी कठोर ..कभी मुलायम को बूझ पाना आपके बूते से बाहर है । यानी खतरा और किसी को नहीं है बस्स भूत बनने से पहले पूर्व होकर अमर होने में ही भलाई और भलमनशाहत है। बाकी तो आपकी मर्जी ?

पहली बार, पहली बार दिखा अपन मुन्ना दबंग    
मेरे दोस्तों प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह को पानी पी पी पी कर कोसने वाले तमाम निंदकों और इडियट चर्चा में अपन मनु जी पर लांछन लगाने वालों अब तो बस्स करो। आठ साल में पहली बार देखा ऐसा जलवा  ....पहली बार... ऐसा जलवा कि बस्स अपन दिल सरदार जी पर आ गया। जर्नादन द्विवेदी की मदद से ककहरा सीखने का इल्जाम समेत रबरछाप, दूसरों के संकेत पर काम करने वाला या मैड़म के घर का रबर छाप दरबारी पीएम का आरोप झेलने वाले अपन मुन्ना साहब ने एक ही झटके में सबको ढेर कर दिया। सबसे पहले तो असरदार तरीके से हिन्दी बोलकर दिखा दिया कि वे भले ही हिन्दी कम बोलता हैं, पर वे जर्नादन द्विवेदी को भी हिन्दी पढ़ा सकते है। एकदम शालीन मगर अटैकिंग लहजे में देशवासियों को बता दिया कि हालात बहुत बुरी है, मगर हम हालात को रोके हुए है। और भी मीठी गोली की तरह तमाम कड़वी बातों को बिना लाग लपेट के कहकर यह बता और समझा दिया कि वोटर को जो करना है वो कर ले मगर अब तो हम रूकने वाले नहीं है और ना थमकर रहेंगे। लगता है कि अपन मन साब मोंटेक छाप च्वणप्राश कुछ ज्यादा ही मात्रा में खाने लगे है ?  

ममता की मर्दानगी के लाभ
तुनकमिजाजी और बेलगाम सी अपन ममता दीदी चाहे कोई भी हालात हो मगर उनको कभी रोका नहीं जा सकता। लाभ के गणित को भले ही मुलायम मित्रों की मदद से हमेशा गलत कर देती हो, इसके बावजूद ममता दीदी की हिम्मत का कोई जवाब नहीं। उन्होने दिखा दिया कि मर्दो से भरे संसद में एकांत्र मर्द नेता वहीं है। 14 खंभों की पालकी पर सवार मनमोहन सरकार की चूलें हिलाने में तो वे सफल रही , मगर नये दोस्तों और दलालों की मदद से मनमोहन जी का मनमोहक राज अभी बाकी रह गया दोस्त। हालांकि ममता के पीछे चलने के लिए कमल फिर लगभग राजी हो गया है। मगर सबों को मोदी राज के चुनाव परिणाम पर नजर है।  कि मनमोहन जी के व्रजास्त्र पर देश की जनता कैसे रिएक्ट करती है ?

कभी मुलायम कभी कठोर

यूपी (इटावा) के सैफई गांव के पहलवान मास्टर मुलायम सिंह यादव को पहलवानी छोड़े भले ही 40 साल हो गए हो, मगर दांवपेंच और  रणनीति बनाकर पटखनी देने के मामले में तो नेताजी और भी स्मार्ट तथा अजेय होते जा रहे दिख रहे है। ममता मनमोहन और इस्तीफा नौटंकी के दो सप्ताह में नेताजी का नाटक सबों के ले मनभावन प्रहसन बना गया ।  इस दौरान कभी मुलायम तो कभी कठोर रूप धारण करके अपन नेताजी ने जनता समेत कांग्रेसी आलाकमानों और भाजपा समेत खुद को भी परेशान करने से नहीं चूके । हालांकि नेताजी कभी यकीन वाले नेता नहीं रहे है, मगर मनमोहन जी के लिए आक्सीजन सिलेण्डर लेकर नेताजी ही दरबार के बाहर हमेशा खड़े रहे। अपनी विश्वसनीयता को इस बार कुछ ज्यादा ही गंवाने वाले नेताजी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा। कल तक मन में संकोच रखने वाले नेताजी ने तो अभी से ही  खुलकर खुद को 2014 में भावी प्रधानमंत्री का दावा पेश करके वामपंथियों को अपना लग्गू बना लिया। जय हो नेताजी , मगर अपनी नजर के साथ ही साथ जनता पर भी भरोसा को कायम रखे, नहीं तो क्या होगा यह लिखने से ज्यादा आप खुद दी समझदार हैं। वहीं पीएम बनने के लिए आतुर मायावती जी से भी सावधान रहे, जिनका पत्ता 09 अक्टूबर को खुलने वाला है।

अपन बारी की फिर जगी आस

मनमोहन राज को चाहे जितनी भी गाली क्यों ना दिया जाए, मगर मनमोहन मंत्रीमंडल में जगह पाने वालों के लिए फिर से उम्मीदों का दरवाजा खुला है। ममता दीदी के आधा दर्जन मंत्रियों नें अभी  इस्तीफा सौंपा भी नहीं था कि  ज्यादातर लोगों ने अपनी गोटी फिट करना स्टार्ट कर दिया। सबसे तेजी से पूर्व रेलमंत्री रहे लालू और पासवान भी रेस में शामिल हो गए, मगर अभी तक इन्हें कहीं घास तक नहीं मिला। आईआईटीएएन मुबंईया रह चुके योग्य नेता जयराम रमेश को लेकर नाम रेल की तरह दौड़ने लगा है, मगर इस बार मनमोहन ज्यादा सख्त होकर अपनी टीम को चुनने के लिए पसंद नापसंद को तरजीह दे रहे है। भला हो उन नेताओं को जिन्हें इस बार मौका मिल सकता है।

शिंदे जी जुबांन..........
कांग्रेस में सबसे योग्य दलित नेता के रूप में मान्य उर्जा मंत्री रहे शिंदे का पार्टी में बड़ा सम्मानजनक स्थान है। इस बार होम मिनिस्टर बनते ही शिंदे साहब इतने पावर में आ गए कि संसद में फिल्मी सितारों को संसद में सलीका बताने से नहीं बाज आए। मामला जया बच्चन का था लिहाजा पूरा विपक्ष ही शिंदे पर बरस पड़ा। मामले को बेकाबू होने से पहले शिंदे साहब को माफी मांगकर रफा दफा करना पड़ा। मनमोहन राज के सबसे बड़े कोल घोटाला की आंच अभी मंद भी नहीं हुआ कि एक बार फिर शिंदे साहब यह कहने से नहीं चूके कि लोग बोफोर्स की तरह भविष्य में कोल घोटाला को भी भूल जाएगी। शिंदे की जुबानी आग से मामला इतना प्रज्जवलित हो उठा कि शिंदे समेत बहुतों को इफ बट लगाकर मामले को शांत करना पड़ा। हालात तो काबू में आ गया, मगर सबसे घाटे में शिंदे ही रहे, क्योंकि ओवर स्मार्ट बनने और साबित करने के फिराक में वे यह भूल गए कि मौका आने पर अब कांग्रेसी ही शिंदे साहब को भूल सकते हैं ?

पत्रकार से ज्यादा नेता बन गए राजीव शुक्ला

मौके का फायदा उठाने और गिरगिट की तरह रंग बदलने में भूत (पूर्व) पत्रकार राजीव शुक्ला वाकई में असली नेता और नकली पत्रकार साबित हो गए। हालांकि मनमोहगन के संकट मोचक सारथी की तरह अपने पत्रकारीय संपर्को के बूते हालात को अनुकूल बनाने में राजीव हमेशा खरे उतरे हैं। मगर मनमोहन संकट और संसद ठप्प को रूकवाने में फेल रहे शुक्ला ने इस बार दम लगाकर एक्सरसाईज किया और ममता के भाग खड़े होने के बावजूद मनमोहन को बेखौफ रखकर अपनी सारी कसर पूरी कर दी। और तो और मनमोहन के मर्दोवाली सफाई को भी भूत( ? ) पत्रकार रह चुके शुक्ला ने ही शब्दबद्ध किया। जिससे मनमोहन की भोला भाला  और दब्बू छवि से भी उन्हें राहत मिली। मीडिया और खबरों की जमकर आलोचना कर रहे शुक्ला  इस बार सपाई नेताजी पर इस तरह की दमदार सवारी की है कि नेताजी को लाभ हो न हो मगर अपनी विश्वसनीयता को हासिल करने में वे जरूर कामयाब हो गए। कांग्रेसी प्रमोद महाजन के रूप में (कु) ख्यात शुक्ला जी फिलहाल मनमोहन सिंह की तरह ही चैन की वंशी बजा सकते हैं।

यह जनता के साथ घात है अन्ना- अरविंद

चले तो थे इस दावे के साथ कि देश की तस्वीर और तकदीर बदल देंगे, मगर अभी साल डेढ़ साल भी नहीं हुआ कि सारे के सारे सब बिखर गए। टीम अन्ना नहीं रही। ना रहा जोश और ना रहा कुछ करने का हौसला। सब पस्त हो गए। कभी गांधी मान लिए गए तो कभी कबीर की तरह जो घर फूंके आपना का ......नारा बुलंद करके लोकपाल के बूते देश के नए सिपाही और सिपहसालार बनने का सपना पूरे देश को दिखाया। इसी बहाने करप्शन के खिलाफ नारा बुलंद करके देशवासियों से करोड़ों की सहयोग राशि से वारे न्यारे कर लिए। अब अन्ना अरविंद कथा पर बात करके हम अपने पाठकों का मूड खराब करना नहीं चाहते। भगवान दोनों को सेहतमंद रखे।, मगर मेरे मन में यह सवाल बार बार खड़ा ही रह जा रहा है कि करोड़ों रूपये का जो चंदा जनता से मिली थी उसका क्या हुआ ?  करप्शन के कमांडरों से यह निवेदन है कि उस रकम का भी हिसाब जनता को दें, कि जनता के धन का जनता के लिए खर्च करने के बाद कितना धन शेष महेश बचा रह गया है।
इडियट (बॉक्स) चर्चा
देश की संसद से भी बड़ी ताकत के रूप में इन दिनों इडियट बॉक्स दिखने लगा है। संसद में तो इन दिनों अवकाश का माहौल है। रोज रोज के बंद और ठप्प से लोग बेहाल और नेता लोग खुशहाल हैं, मगर इडियट बॉक्स  पर होने वाली रोजाना की इडियट (बॉक्स) चर्चा से देश का जनमानस बिह्वल बेहाल और व्याकुल है। प्राइम टाईम के नाम पर न्यूज की जगह नेता और बहस के नाम पर गाली गलौज और जोरदार भाषम चालू हो गया है। अब टीवी नेताओं को कौन बते और समझाएं कि जुबानी जमग से इमेज खराब और भद्दा हो जाता है। हमारे इडियट (बॉक्स चर्चा) नेता इसे कब मानेंगे।

बिहार विज्ञापन घोटाला'' उजागर

 

 

 

 

 

 

बिहार वित्त अंकेक्षण विभाग ने 2006 में ही अरबों का ''हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाला'' उजागर कर दिया था

: लेकिन नेताओं-अफसरों-संपादकों की तिकड़ी ने कार्रवाई नहीं होने दी, फाइल को ही दबा दिया : दैनिक हिन्दुस्तान के लगभग दो सौ करोड़ के सरकारी विज्ञापन घोटाले के बारे में नित नई जानकारियां सामने आ रही हैं. बिहार सरकार के वित्त अंकेक्षण विभाग ने वित्तीय वर्ष 2005-06 में ही बिहार में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, पटना की मिलीभगत से दैनिक हिन्दुस्तान द्वारा किए जा रहे सरकारी विज्ञापन के फर्जीवाड़े को उजागर किया था.
यही नहीं, दैनिक हिन्दुस्तान से अवैध ढंग से सरकारी विज्ञापन के प्रकाशन के मद से लगभग एक करोड़, पन्द्रह हजार नौ सौ पचपन रुपए की वसूली की सिफारिश भी की थी. इस तथ्य को मुंगेर के पुलिस अधीक्षक पी. कन्नन के निर्देशन में हुई जांच की रिपोर्ट में सहायक साक्ष्य के रूप में जोड़ा गया है. पुलिस उपाधीक्षक अरूण कुमार पंचालर ने अपनी पर्यवेक्षण टिप्पणी के पृष्ठ-05 और 06 में बिहार सरकार के वित्त अंकेक्षण विभाग के अंकेक्षण प्रतिवेदन (संख्या-195।2005-06) के मूल तथ्य को उद्धृत किया है.

पुलिस उपाधीक्षक ने पर्यवेक्षण टिप्पणी में लिखा है --‘अनुसंधान में प्रगति-पर्यवेक्षण के क्रम में अभियोजन पक्ष की तरफ से निम्नांकित दस्तावेज प्रस्तुत किए गए। (1) बिहार सरकार के वित्त अंकेक्षण विभाग के पत्रांक -178। वि0अं0, दिनांक 08-05-2006 जिसके माध्यम से  अंकेक्षण प्रतिवेदन संख्या निर्गत है। इसके अवलोकन से विदित होता है कि अंकेक्षण के दौरान अंकेक्षण दल ने यह पाया कि हिन्दुस्तान दैनिक को पटना संस्करण के अतिरिक्त मुजफफरपुर  तथा भागलपुर मुद्रण केन्द्रों को स्वतंत्र प्रकाशन दिखाकर उनके विज्ञापन के लिए अलग दर पर वर्ष 2002-03 एवं 2003-04 में कुल एक करोड़ पन्द्रह हजार नौ सौ पचपन रुपये का अवैध भुगतान किया गया था जबकि मुजफफरपुर तथा भागलपुर कोई स्वतंत्र प्रकाशन या संस्करण नहीं है, वरन् पटना संस्करण के केवल मुद्रण केन्द्र हैं। इनके लिए अलग से कोई पंजीयन संख्या आर0एन0आई0 से नहीं प्राप्त हुआ था। पटना संस्करण की पंजीयन संख्या-44348।1986।पटना। ही इनका पंजीयन के रूप में अंकित था। अंकेक्षण के क्रम में उक्त दोनों मुद्रण केन्द्रों को स्वतंत्र प्रकाशन होने का कोई प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं पाया गया, क्योंकि इनके लिये अलग से कोई प्रिंट लाइन नहीं थी और न अलग पंजीयन था।

अंकेक्षण के दौरान पाया गया कि मुजफफरपुर और भागलपुर लाइन से कोई प्रकाशन नहीं होता है। इस बात की पुष्टि अंकेक्षण के दौरान हिन्दुस्तान दैनिक के प्रतिनिधियों द्वारा भी किया गया कि मुजफ्फरपुर एवं भागलपुर के लिये पंजीयन एवं मास्ट हेड वही है जो पटना के लिए है। इस आधार पर केवल मुजफ्फरपुर या भागलपुर में विज्ञापन छापने के लिए हिन्दुस्तान दैनिक तैयार नहीं था एवं संयुक्त रूप से पटना, मुजफफरपुर तथा भागलपुर तीनों में छापने के लिये सरकार को बाध्य किया।
अंकेक्षण के दौरान यह पाया गया कि दिनांक 28-03-2001 से मुजफफरपुर एवं दिनांक 03 अगस्त, 2001 से भागलपुर में मुद्रण केन्द्र प्रारंभ किया गया। प्रेस पुस्तक पंजीयन  अधिनियम-1867 के तहत प्रकाशन का कार्य प्रारंभ करने के पूर्व जिलाधिकारी के समक्ष विहित प्रपत्र में घोषण करना, कंपनी रजिस्ट्रार से अनुमति प्राप्त करना और भारत सरकार के समाचार पत्र पंजीयक से पंजीयन कराना अनिवार्य था, जो नहीं कराया गया।

सभी अभियुक्तों के विरूद्ध प्रथम दृष्टया आरोप प्रमाणित
मुंगेर पुलिस ने कोतवाली कांड संख्या-445।2011 में सभी नामजद अभियुक्त ।1। शोभना भरतिया, अध्यक्ष, दी हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, नई दिल्ली ।2। शशि शेखर, प्रधान संपादक, दैनिक हिन्दुस्तान, नई दिल्ली ।3। अकु श्रीवास्तव, कार्यकारी संपादक, हिन्दुस्तान, पटना संस्करण ।4। बिनोद बंधु, स्थानीय संपादक, हिन्दुस्तान, भागलपुर संस्करण और ।5। अमित चोपड़ा, मुद्रक एवं प्रकाशक, मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, नई दिल्ली के विरूद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420।471।476 और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की धाराएं 8।बी0।,14 एवं 15 के तहत लगाए गए सभी आरोपों को अनुसंधान और पर्यवेक्षण में ‘सत्य‘ घोषित कर दिया है। देश के सांसद और बिहार के विधायक इस विज्ञापन घोटाले को आगामी संसद सत्र व बिहार विधानसभा और विधान परिषद में उठाने की तैयारी कर रहे हैं।

दुर्भाग्य की बात है कि आर्थिक अपराधियों के विरूद्ध युद्ध चलाने की घोषणा करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की सरकार के उंचे पदों पर विराजमान अधिकारियों ने वित्त अंकेक्षण विभाग  की अंकेक्षण रिपोर्ट को कूड़ेदान में डाल दिया है। कालांतर में वित्त अंकेक्षण विभाग की आपत्तियों को रहस्यमय ढंग से विलोपित कर दिया गया। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, पटना ने वित्त अंकेक्षण विभाग की एक करोड़ पन्द्रह हजार नौ सौ पचपन रूपए के अवैध भुगतान की हिन्दुस्तान से वसूली की सिफारिश को भी कूड़ेदान में डाल दिया। केन्द्र और राज्य सरकार की सभी जांच एजेंसियों और सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों के लिए यह जांच का विषय है कि किन-किन लोगों ने किन-किन स्तर पर दैनिक हिन्दुस्तान के सरकारी विज्ञापन घोटाले की संचिकाओं को जमीन के अन्दर गाड़ने का काम किया?

प्रिंट मीडिया के आर्थिक भ्रष्टाचार में लिप्त होने के पर्याप्त कागजी साक्ष्य आने के बाद भी 2006 से 2012 तक किसी भी स्तर से सरकारी जांच एजेंसियों ने दैनिक हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण के सरकारी विज्ञापन घोटालों की जांच शुरू नहीं की। जांच शुरू नहीं होने से आम लोगों की आस्था केन्द्र और राज्य सरकारों की घोषणाओं पर से उठती जा रही है। बिहार सरकार को हर स्तर पर कागजात के साथ दैनिक हिन्दुस्तान के विज्ञापन घोटाले में कानूनी कार्रवाई का अनुरोध किया गया, परन्तु सरकार ने 2006 से लेकर अब तक अपने स्तर से दोषी कारपोरेट प्रिंट मीडिया के मालिकों और संपादकों के विरूद्ध कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की। अंत में हार कर सामाजिक कार्यकर्ता मन्टू शर्मा ने मुंगेर में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के न्यायालय में परिवाद पत्र दायर किया और न्यायालय ने पूरे मामले में अनुसंधान का आदेश मुंगेर कोतवाली को दिया। इस कांड के पर्यवेक्षण में अभियोजन पक्ष ने वित्त अंकेक्षण विभाग के अंकेक्षण प्रतिवेदन -195।2005-06 को जांच कर रहे पुलिस अधिकारी के समक्ष सहायक साक्ष्य के रूप में पेश कर दिया।
मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट.

इससे संबंधित पिछली सभी रिपोर्टों को पढ़ने के लिए आगे दिए गए रंगीन शीर्षक पर क्लिक करें- हिंदुस्तान अखबार ने बिहार में किया अरबों का घोटाला

कमर वहीद नकवी की मदद से हिन्दी सुधारें

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सिंहावलोकन :
शरद सिंह जी ने पूछा है कि सिंहावलोकन का अर्थ क्या है और इसका कहाँ और कैसे प्रयोग होता है. जवाब है:
सिंहावलोकन का अर्थ होता है सिंह का दृष्टिपात. यानी जैसे सिंह पहले पीछे देख कर फिर आगे देखता है और फिर आगे चलता है, उसी तरह पीछे का जायज़ा लेकर फिर आगे की ओर देखनायही सिंहावलोकन है. किसी विषय की पृष्ठभूमि पर दृष्टि डाल कर फिर आगे अवलोकन करना--- यही सिंहावलोकन है.
सिवा या सिवाय :
विनीत क...
ुमार जी का सवाल है कि सिवा सही है या सिवाय? सही है सिवा.
लाश और शव :
सैयद उम्र ने पूछा है कि लाश और शव में क्या अन्तर है और इनमें से क्या लिखना बेहतर है? जवाब है:
अपने वाक्य में आप "लाश और शव"---इन शब्दों के निकट क्या शब्द लिख रहे हैं, इस पर निर्भर करेगा कि आप इनमें से कौन-सा शब्द चुनेंगे. सामान्य नियम है कि दो निकटतम शब्दों में भाषागत तालमेल रखा जाये. जैसे क्षत-विक्षत लाश के बजाय क्षत-विक्षत शव लिखना ज़्यादा बेहतर होगा क्योंकि पहले नमूने में क्षत-विक्षत (हिन्दी) और लाश (उर्दू, मूलतः फ़ारसी) का अटपटा मेल हो रहा है, जबकि दूसरे नमूने यानी क्षत-विक्षत शव में सभी शब्द हिन्दी के हैं.


इंजीनियरों या इंजीनियर्स
समीर वाजपेयी ने पूछा है कि "इंजीनियरों" लिखना चाहिए या "इंजीनियर्स?"
समीर जी, आपने बहुत सही सवाल किया. अंग्रेजी के शब्दों को अगर हिन्दी में लिया जाय तो उनके बहुवचन बनाने में हिन्दी व्याकरण के नियम लिए जायें या अंग्रेजी के--- इस बारे में अच्छा- ख़ासा मतभेद है और आजकल कई अख़बार और टी वी चैनल "इंजीनियर्स" और "स्टुडेंट्स" आदि लिख रहे हैं. मेरे विचार से यह बिलकुल ग़लत है. कोई भी...
भाषा संसार की किसी भी भाषा से शब्द ले सकती है और लेती है, लेकिन उन्हें अपने व्याकरण में ही ढालती है. उदहारण के तौर पर "पंडित" और "बाज़ार" जैसे शब्द अंग्रेजी में आज धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे हैं, लेकिन क्या आप यह कल्पना कर सकते हैं कि अंग्रेजी में “PUNDITS” के बजाय “PUNDITON” लिखा जाय. इसी तरह "रोटी", "जुगाड़" और "क़मीज़" जैसे शब्द भी हाल में अंग्रेजी में शामिल हुए हैं. रोटी और जुगाड़ तो हिन्दी के शब्द हैं और क़मीज़ शब्द (मूल अरबी क़मीस) हिन्दी से होते हुए अंग्रेजी में शामिल हुआ है, लेकिन अंग्रेजी में तो इन्हें अंग्रेजी व्याकरण के हिसाब से ही इस्तेमाल किया जायेगा न कि हिन्दी या अरबी व्याकरण के अनुसार. क़मीज़ शब्द हिन्दी में आया भले अरबी से होगा, लेकिन हिन्दी में तो उस पर हिन्दी का ही व्याकरण लागू होगा. इसलिए मेरा मानना है कि शब्द कहीं से आये, हिन्दी में उसे हिन्दी व्याकरण के अनुसार चलना चाहिए.

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कहाँ लगेगा नुक़्ता?

ये समस्या बहुत लोगों की है कि उर्दू और अंग्रेज़ी के शब्दों में कहाँ नुक़्ता लगता है और कहाँ नहीं. अकसर ऐसा होता है कि जहाँ नुक़्ता लगना चाहिए, वहाँ तो लोग लगाते नहीं और जहाँ नुक़्ते की ज़रूरत नहीं, वहाँ इसे लगा दिया जाता है. आइए आज इसी पर बात करते हैं.

सबसे पहले तो यह बात नोट करें कि नुक़्ता संस्कृत या हिन्दी के मूल शब्दों में नहीं लगता क्योंकि संस्कृत या हिन्दी में वैसी ध्व...
नियाँ हैं ही नहीं. कृपया इसमें हिन्दी के "ड़" और "ढ़" को मत गिन लीजिएगा. ये दोनों स्वतंत्र अक्षर हैं और इनके नीचे लगनेवाली बिन्दी के बिना इनका अस्तित्व सम्भव नहीं. इनके नीचे बिन्दी ऐसे ही लगेगी, जैसे यहाँ दिखायी गयी है.

इसलिए पहला सूत्र यह है कि सबसे पहले यह निश्चित करें कि शब्द मूल रूप से हिन्दी का है क्या? अगर उत्तर हाँ है, तो नुक़्ता लगना ही नहीं है. मैंने बहुत बार "सफल" के "फ" के नीचे लोगों को नुक़्ता लगाते देखा है, जो सरासर ग़लत है. सफल का मतलब है स+फल यानी फल सहित. फल में कैसे नुक़्ता लगेगा? अब मुझे यह नहीं मालूम कि ZUTSHI सरनेम का मूल क्या है. इसमें नुक़्ता लगेगा और इसे "ज़ुत्शी" लिखा जायेगा.

अब अंग्रेज़ी शब्दों की बात. ध्यान दें कि केवल उन्हीं अंग्रेज़ी शब्दों में नुक़्ता लगने की सम्भावना हो सकती है, जिनमें F, PH या Z आते हों. F और PH के लिए फ के नीचे और Z के लिए ज के नीचे नुक़्ता लगा दीजिए. ध्यान रखें कि अंग्रेज़ी में "फ" का उच्चारण है ही नहीं, इसलिए वहाँ जब भी आयेगा "फ़" ही आयेगा. जिन अंग्रेज़ी शब्दों में Z हो, वहाँ "ज" के नीचे नुक़्ता लगा कर "ज़" लिखें. बस.

उर्दू में नुक़्ता वाले उच्चारण सिर्फ़ ये पाँच हैं: क़, ख़, ग़, ज़, और फ़. इसलिए आपको केवल इन पाँचों पर ध्यान केन्द्रित करना है और काॅपी में इन पाँच कैरेक्टरों से बने उर्दू शब्दों को तौलना है कि यहाँ नुक़्ता लगेगा या नहीं. अब अगर ऐसे शब्द व्यक्तियों या स्थानों के नाम हैं और आपके पास समाचार की मूल काॅपी अंग्रेज़ी में (जैसे PTI आदि के समाचार) आयी है तो काम थोड़ा आसान हो जाता है. इसलामी देशों के जिन नामों में अंग्रेज़ी का Q अक्षर आता हो, वहाँ Q के स्थान पर नुक़्ते वाला "क़" लगायें. जैसे : QAZI क़ाज़ी, QAIDA क़ायदा, QAISER क़ैसर, TARIQ तारिक़, SAQLAIN सक़लैन, QUTUB क़ुतुब, IRAQ इराक़. लेकिन इसके एकाध अपवाद भी हैं, जैसे पाकिस्तान का QUETTA शहर, जिसका उच्चारण है क्वेटा और इसमें "क" के नीचे नुक़्ता नहीं लगता.
दूसरा उच्चारण है "ख़" का. अंग्रेज़ी में प्रायः इस उच्चारण को KH से व्यक्त करते हैं. जैसे KHAN ख़ान, AKHTAR अख़्तर, BAKHT बख़्त, KHUSHBU ख़ुशबू, KHADIM ख़ादिम. इसका अपवाद है KHAR. पाकिस्तानी विदेश मंत्री बिना रब्बानी का सरनेम है खर, जिसे अंग्रेज़ी में KHAR ही लिखा जायेगा. लेकिन उर्दू में एक और शब्द है ख़ार, इसे भी अंग्रेज़ी में KHAR ही लिखेंगे. इसी तरह, एक नाम है निकहत. अंग्रेज़ी में इसे NIKHAT ही लिखेंगे, इसलिए इसे "निख़त" या "निखत" न लिखें.
तीसरा उच्चारण है "ग़" का, जिसे अंग्रेज़ी में GH से व्यक्त करते हैं: जैसे GHULAM ग़ुलाम, GHAZANFAR ग़ज़नफ़र, GHAUS ग़ौस, GHALIB ग़ालिब, GHAZALA ग़ज़ाला, GHAZAL ग़ज़ल, SAGHIR/ SAGHEER सग़ीर, ASGHAR असग़र. ध्यान रखें कि GH के लिए "ग़" केवल नामों के लिए ही लिखा जायेगा.
चौथा उच्चारण है "ज़" का, जिसके लिए अंग्रेज़ी के Z अक्षर का प्रयोग होता है. जैसे ZAIN ज़ैन, ZOHRA ज़ोहरा, ZULFIQAR ज़ुल्फ़िक़ार, HAZRAT हज़रत, AZHAR अज़हर, MUZAFFAR मुज़फ़्फ़र.
पाँचवाँ और अन्तिम उच्चारण है "फ़" का. ध्यान रखें कि उर्दू नामों में केवल F ही "फ़" का उच्चारण देता है. PH से उर्दू में "फ" का उच्चारण ही होगा और नुक़्ता नहीं लगेगा. इसलिए AFROZ अफ़रोज़, FIRDAUS फ़िरदौस, FASIH/FASEEH फ़सीह, FAISAL फ़ैसल, FAIZAL फ़ैज़ल, TUFAIL तुफ़ैल लिखा जायेगा.
उम्मीद है कि इससे उर्दू नामों में नुक़्ते की समस्या सुलझ जायेगी.

"इनाम" और "ईमान"; "इराक़" और "ईरान"
सर्वेश जी ने पूछा है कि "इनाम" सही है या "ईनाम" और "इनामी" सही है या "ईनामी"?
मैंने देखा है कि अकसर लोगों को यह दुविधा होती है कि "इनाम" में छोटी "इ" लगेगी या बड़ी.
"
इनाम" और "इनामी" में छोटी "इ" लगेगी.
"
ईमान" और "ईमानदार" में बड़ी "ई" लगती है.
इसी तरह, अकसर लोग "इराक़" और "ईरान" को लेकर दुविधाग्रस्त होते हैं कि इनमें छोटी "इ" लगेगी या ब ड़ी? कारण यह है कि अंग्रेज़ी में ये दोनों नाम लगभग एक ही तरीक़े से लिखे जाते हैं: IRAQ और IRAN. अंग्रेज़ी के कारण ऐसी दिक़्क़तें बहुत जगह आती हैं और इनका कोई समाधान भी नहीं है.
आप तो बस इतना याद रखें कि "इराक" में छोटी "इ" और "ईरान" में बड़ी "ई" लगेगी.

अभिषेक गर्ग ने पूछा है कि पानी "पिएँ", "पियें' और "पीयें" में कौन-सा सही है. इस पर विनय सिंह ने लिखा कि "पीयें" सही है. विनय जी "पीयें" बिलकुल सही नहीं है. दरअसल, मैं इस विषय पर लिखने ही वाला था कि यह मुद्दा उठ गया.
हिन्दी में जब दीर्घ "ई" का "य" से संयोग होता है तो आमतौर पर "ई" का उच्चारण लघु यानी "इ" हो जाता है. जैसे निम्नलिखित कुछ बहुवचन देखिए.
मेहरबानी से मेहरबानियाँ, मेहरबानियों,
सावधानी से...
सावधानियां, सावधानियों,
सीढ़ी से सीढ़ियाँ, सीढ़ियों,
शादी से शादियाँ, शादियों,
दवाई से दवाइयां, दवाइयों,
खाई से खाइयाँ, खाइयों,
भाई से भाइयों आदि.
इसी तरह पानी पीना से "पिया", "पिये", "पियें" और "पियेंगे" बनेगा. जैसे, कृपया पानी पियें, या क्या आप पानी पियेंगे?
दी (देना के अर्थ में) से दिया, दिये बनेगा जैसे : मैंने उसको पानी दिया, या क्या आपने उसे रुपये दे दिये?
लेकिन इस नियम के कुछ अपवाद भी हैं, जैसे दीया (दीपक), घीया (कद्दू). ध्यान रहे कि यहाँ "दीया" का अर्थ दीपक से है, देने की क्रिया से उसका कोई लेना-देना नहीं है.


परसों एक हिन्दी चैनल पर महाराष्ट्र के शहर DHULIYA का नाम चल रहा था---"धुलिया". सही नाम "धुलै" है. ज़्यादातर हिन्दी चैनलों और अखबारों में "धुलै" को "धुलिया" या "धूलिया" लिखा जाता है, जो ग़लत है. इसी तरह महाराष्ट्र के दो और शहरों के नाम अकसर ग़लत लिखे जाते हैं. "सातारा" को प्रायः "सतारा" और "सोलापुर" को "शोलापुर" लिखा जाता है, जो ग़लत है. इनके सही नाम हैं --- "सातारा" और "सोलापुर". यही नहीं, "आम्बेडकर"...
, "गावसकर" और "तेंडुलकर" भी हिन्दी में ग़लत ढंग से क्रमशः "अम्बेडकर", "गावस्कर" और "तेन्दुलकर" लिखे जाते हैं. हमारे यहाँ अखबारों और टीवी चैनलों के न्यूज़ रूम की विडम्बना यह है कि जिन नामों के सही उच्चारण लोगों को पता नहीं हैं, उनके बारे में सही जानकारी हासिल करने का कष्ट कोई करता ही नहीं है. और अगर बता भी दिया जाय तो ग़लती सुधारने की तकलीफ़ भी कोई उठाना नहीं चाहता. और यह बात सिर्फ हिन्दी के पत्रकारों पर ही लागू नहीं होती. मैं आज से बत्तीस साल पहले जब १९८० में ट्रेनी हो कर नवभारत टाइम्स, मुंबई पहुंचा, तो कुछ महीनों बाद मेरी नज़र एक मराठी अखबार पर पड़ी, जिसमें एक शहर का नाम "मीरत" लिखा हुआ था. (अंग्रेजी में स्पेलिंग होती है: MEERUT). मुझे बड़ी हैरानी हुई. मैंने उनके एक वरिष्ठ सम्पादक से कहा कि यह खबर तो यू. पी. के मेरठ शहर की है लेकिन आप के अखबार में "मीरत" छपा है. इस ग़लती को सुधारा जाना चाहिए. मुझे जवाब मिला कि हम जानते हैं कि सही नाम मेरठ है लेकिन बरसों से हम इसे "मीरत" लिखते आ रहे हैं, इसलिए अब इसे नहीं बदला जा सकता. अजीब तर्क था. ग़लती का जब पता चल जाय, उसे सुधार लेने में क्या हर्ज है?
वैसे ऐसी ज़्यादातर ग़लतियों का बड़ा कारण उनकी अंग्रेजी स्पेलिंग भी हैं. अंग्रेजी के टीवी चैनलों में होनेवाले ग़लत उच्चारण को प्रायः हिन्दीवाले आँख मूँद कर उठा लेते हैं. अब जैसे "कसाब" (KASAB) को ही लें. अंग्रेजी के लोग उसे "कसब" ही कह कर पुकारते हैं, जबकि सबको मालूम है कि सही उच्चारण "कसाब" है.