रविवार, 29 सितंबर 2013

वर्धा संगोष्ठी पर कहाँ क्या लिखा गया…!









कुलगीत गायन 










वर्धा से लौटकर अपनी नौकरी के दायित्वों को सम्हाल चुका हूँ; लेकिन ध्यान उन पोस्टों पर लगा हुआ है जो हमारे प्रतिभागियों ने  वर्धा से लौटकर लिखी हैं या लिखने वाले हैं। यदि आप किसी कारणवश वर्धा नहीं आ सके तो आपके मन में वहाँ जो कुछ हुआ उसे जानने की जिज्ञासा होगी। मैं तो वहाँ गया था और जो कुछ हुआ उसका साक्षी भी था; लेकिन अंतर्जाल पर इस सेमिनार के बारे में जो कुछ लिखा जा रहा है उसे शब्द-शब्द पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। जिन नये लोगों से परिचय हुआ उन्हें भी हम बहुत नहीं जान पाये। अपने मतलब की बात की, संयोजकीय दायित्वों की परिधि में पड़ने वाले अनिवार्य प्रश्नों से आगे कहाँ बढ़ पाये हम। समय ही कहाँ था उस दौरान। इसलिए अब उन्हे थोड़ा और जानने का मन है। इसका माध्यम तो यह पन्ना ही है।
आप जब वहाँ से लौटे होंगे तो कम से कम एक ब्लॉग पोस्ट भर का चिन्तन तो कर ही चुके होंगे। उसे यदि अभी तक पोस्ट नहीं कर पाये हैं तो तत्काल कर दीजिए। कुछ आदरणीय लिख्खाड़ ब्लॉगर्स ने तो शृंखला ही चला रखी है। अहा…!
एक और बात उन सभी प्रतिभागियों से कहना है कि इस विचारगोष्ठी में यथासंभव सबको अपनी बात कहने का अवसर देने का प्रयास किया गया था; लेकिन संभव है कि आप अपनी पूरी बात वहाँ न कह पाये हों। मन में एक कसक रह गयी हो कि फलाँ प्वाइंट तो रह ही गया। जो कुछ कहा भी, हो सकता है जनता ने उसपर उतना ध्यान न दिया हो, या बहसबाजी के शोर में कहीं खो गया हो। ऐसी सभी बातें मैं ऑन-रिकार्ड लाना चाहता हूँ। यह बहुत ही आसानी से हो सकता है। आप थोड़ा सा समय निकालकर अपनी बात को व्यवस्थित करके अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर दीजिए। ध्यान रहे यह सामग्री वर्धा प्रवास के आपके ‘संस्मरण’ से अलग होगी। वर्धा संगोष्ठी में आपने जो विचार प्रस्तुत किये, या पर्याप्त समय मिलने पर आप जो प्रस्तुत करते उसे अलग पोस्ट बनाकर डालिए। मुझे विश्वास है कि यह एक शानदार संकलन होगा।
मुझे अनिल जी की एक मजेदार बात याद है। उन्होंने बताया कि जब एक बालक गाय पर निबन्ध तैयार करके गया था और उसे पेड़ पर निबन्ध लिखने को कह दिया गया तो उसने लिखा- एक पेड़ था जिसके नीचे एक गाय बँधी थी। वह गाय…आदि-आदि। अनिल जी के अलावा वर्धा संगोष्ठी में कुछ अन्य लोगों के साथ भी ऐसा मजाक हुआ होगा। दर‍असल सबने विषय अपनी पसन्द से तैयार किया था लेकिन सत्र विभाजन में उनकी भूमिका मैंने तय की थी। सभी सत्रों में बराबर लोग हो सकें इसके लिए मैंने उनकी पसन्द को पीछे करके उनकी क्षमता पर ज्यादा भरोसा किया। मुझे विश्वास था कि अनिल जी जैसे लोग किसी भी मुद्दे पर बोल सकते हैं। यद्यपि उन्होंने समय से मुझे अपना शानदार आलेख भेज दिया था लेकिन मैंने उन्हें किसी अन्य सत्र में मंचासीन कर दिया। अब अनिल जी मेरे अनुरोध के अनुसार अपना पसन्दीदा आलेख पोस्ट कर दें तो आनंद आ जाय।
अतः मैं अबतक ज्ञात उन पोस्टों का लिंक यहाँ लगा रहा हूँ जो इस सेमिनार के बारे में लिखी गयी हैं। जो छूट गयी हैं या आगे आने वाली हैं उनका लिंक टिप्पणियों के माध्यम से दीजिए। क्रमशः उन्हें जोड़ता जाऊँगा और भविष्य के पाठकों के लिए सारा मसाला एक ही स्थान पर उपलब्ध हो जाएगा:
  1. वर्धा में फिर होगा महामंथन : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, सत्यार्थमित्र
  2. राष्ट्रीय सेमिनार व कार्यशाला : रूपरेखा, फेसबुक पर सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
  3. आपकी प्रविष्टियों की प्रतीक्षा है : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, सत्यार्थमित्र
  4. हाय रे हिंदी ब्लॉगर पट्टी!: डॉ. अरविन्द मिश्र, क्वचिदन्यतोऽपि
  5. हिंदी की छवि बदलनी होगी : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, सत्यार्थमित्र
  6. सेमिनार फिजूल है: विनीत कुमार : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, सत्यार्थमित्र
  7. भारतीय राजनीति को बदल रहा है सोशल मीडिया : हर्षवर्धन त्रिपाठी, बतंगड़
  8. वर्धा परिसर में अद्‌भुत बदलाव: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, सत्यार्थमित्र
  9. वर्धा राष्ट्रीय संगोष्ठी कुछ यादें : अनूप शुक्ल, फुरसतिया
  10. ब्लॉगर सम्मेलनों की बहार में वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन : डॉ. अरविन्द मिश्र, क्वचिदन्यतोऽपि
  11. हिंदी ब्लॉगिंग का भविष्य बहुत अच्छा है: विभूति नारायन राय सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, सत्यार्थमित्र
  12. अविस्मरणीय वर्धा-यात्रा: वंदना अवस्थी दुबे, अपनी बात
  13. हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में ब्लॉग सेमिनार: डॉ.शकुन्तला शर्मा, शाकुन्तलम्‌
  14. मेरी रणनीति कामयाब रही, अनूप जी दूसरे कक्ष में धरे गये: डॉ. अरविन्द मिश्र, क्वचिदन्यतोऽपि
  15. ब्लॉग में उबाऊ लेखन से बचना चाहिए: राजेश यादव, विश्वविद्यालय का ब्लॉग
  16. हिंदी विश्वविद्यालय में हिंदी ब्लॉगिंग व सोशल मीडिया पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्‍घाटन: राजेश यादव, विश्वविद्यालय का ब्लॉग
  17. वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन जो किसी ने नहीं लिखा!: डॉ. अरविन्द मिश्र, क्वचिदन्यतोऽपि
  18. हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में शुरू हुई ब्लॉगरों की अड्डेबाजी सुनीता भास्कर, भड़ास4मीडिया
  19. ब्लॉग, फ़ेसबुक, टिव्टर की तिकड़ी-विकल्प या पूरक : अनूप शुक्ल, फुरसतिया
  20. वर्धा ब्लॉग सेमिनार 2013 : फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग की जंग में जीत किसकी? रविशंकर श्रीवास्तव (रवि रतलामी) छींटे और बौछार
  21. 15 अक्टूबर,2013 को ‘चिट्ठा समय’ एग्रीगेटर का जन्म हो रहा है: वर्धा हिंदी ब्लॉगर सेमिनार की उपलब्धि : आओ जश्न मनाएं ; अविनाश वाचस्पति, नुक्कड़
  22. वर्धा में जेएनयू ! : हर्षवर्धन त्रिपाठी, बतंगड़
  23. हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में ब्लॉग सेमिनार डॉ. शकुन्तला शर्मा, शाकुन्तलम्‌
  24. वर्धा सम्मेलन के सबक : संतोष त्रिवेदी, बैसवारी
  25. ‘हिंदी ब्लॉगिंग और सोशल मीडिया’ राष्ट्रीय गोष्ठी संपन्न: वंदना अवस्थी दुबे, अपनी बात
  26. उद्देश्य ब्लॉगिंग का- सतीश सक्सेना, मेरे गीत
  27. सोशल मीडिया और हिंदी ब्लॉगिंग : वर्धा में सत्य के प्रयोग, संजीव तिवारी- आरंभ
  28. वर्धा सम्मेलन पार्ट-4… कुछ और अबतक अनकहा!: डॉ. अरविन्द मिश्र, क्वचिदन्यतोऽपि
  29. हिंदी चिठ्ठाकारिता को मिला नवजीवन, संजीव कुमार सिन्हा, प्रवक्ता.कॉम
  30. वर्धा में जो हमने देखा: रचना त्रिपाठी, टूटी-फूटी
  31. इति श्री वर्धा ब्लॉगर एवं सोशल मीडिया सम्मेलन : अनूप शुक्ल, फुरसतिया
  32. ब्लॉगरस से ब्लॉग ब्लॉग हृदय : वर्धा से लौटकर : ब्लॉ.ललित शर्मा, ललित डॉट कॉम
  33. मोहिं वर्धा विसरत नाहीं!  : डॉ. अरविन्द मिश्र, क्वचिदन्यतोऽपि
  34. अभिव्यक्ति का आकार – ब्लॉग, फेसबुक व ट्विटर, प्रवीण पांडेय, न दैन्यं न पलायनम्‌
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

बुधवार, 25 सितंबर 2013

विदर्भ की 30 - 40 जनजातीय बोलियां लुप्त होने की कगार पर








विनय यादव | Aug 09, 2013, 07:52AM IST



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विदर्भ राज्य की 30 से 40 जनजातीय बोलियां लुप्त होने की कगार पर!
मुंबई। राज्य की 30 से 40 जनजातीय बोलियां लुप्त होने की कगार पर हैं। इनमें विदर्भ की आदिवासी कबीलों की बोलियां सर्वाधिक हैं। इसके अलावा मराठवाड़ा और खानदेश की कई जनजातीय बोलियां भी शामिल हैं। यह जानकारी देश में पहली बार कराए गए भाषाओं के अध्ययन में सामने आई है।
एक शताब्दी पहले ग्रियर्सन की ओर से सर्वेक्षण के बाद देश में पहली बार भारतीय लोकभाषा का सर्वे पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया की ओर से किया गया है। इस सर्वे में हिंदी, मराठी, उर्दू, सिंधी, गुजराती जैसी महत्वपूर्ण भाषाओं के साथ अनुसूचित व जनजाति वर्ग की बोलियों को शामिल किया गया है।
देश की 780 भाषाओं व बोलियों के अलावा 66 लिपियों का भी सर्वे किया गया है।
सर्वे की योजना तैयार करनेवाले डॉ. गणेश देवी के अनुसार विदर्भ, मराठवाड़ा व खानदेश में कई अनुसूचित बोलियां लुप्त होने की कगार पर हैं। राज्य की 30 से 40 बोलियां अंतिम पड़ाव पर हैं।
दो बस्ती में सिमटी नेहाली, सिद्दी लुप्त :डॉ. देवी के अनुसार विदर्भ के बुलढाणा जिले में कभी नेहाली भाषा बोली जाती थी। अब केवल जलगांव-जामोद तहसील की दो आदिवासी बस्तियों में यह भाषा बोली जाती है। इसी तरह आदिवासियों की भाषा हलवी और कुर्को बोलनेवालों की तादाद भी घटी है। कोंकण में बोली जानेवाली सिद्दी भाषा लुप्त हो चुकी है।
अंचल में कई बोलियां
डॉ. देवी ने बताया कि जनगणना के समय जिन भाषाओं को बोलनेवालों की संख्या 10 हजार से कम होती है, उन भाषाओं  को सरकारी दस्तावेजों में शामिल नहीं किया जाता। मध्यप्रदेश का हिस्सा रहा विदर्भ महाराष्ट्र में शामिल किया गया। विदर्भ में हिंदी व मराठी भाषा बोली जाती है। परंतु मुंबई व पुणे से यह भाषाएं अलग हैं। विदर्भ के अधिकांश इलाके जंगल से घिरे हैं। आदिवासियों के अलग-अलग कबीले में अलग-अलग बोलियां बोली जाती हैं।
इसी तरह नाशिक, ठाणे व अन्य इलाकों के आदिवासियों की बोली में भी भिन्नता पाई गई है।
भाषाओं में बदलावडॉ. देवी ने कहा कि भाषाओं में संशोधन कर या दूसरी भाषाओं के शब्दों का इस्तेमाल करना अच्छी बात है लेकिन भाषाओं के व्याकरण को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए। कोई भाषा स्थाई नहीं रह सकती। साल-दर साल भाषाओं में बदलाव होते रहते हैं। सर्वेक्षण में महाराष्ट्र की 14 क्षेत्रीय व जनजातीय तथा गुजरात की छह क्षेत्रीय विविधताओं का अध्ययन किया गया है।
पीएलएसआई के भारतीय भाषाओं के लोक सर्वेक्षण की 50 खंडों में 35 हजार पृष्ठों की पुस्तक तैयार की गई है। इस पुस्तक को 5 सितंबर को पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन की 125वीं वर्षगांठ पर दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में देश को समर्पित किया जाएगा।
भाषाएं युद्ध नहीं बल्कि आर्थिक विकास की सशक्त माध्यम
विशेषज्ञों का मानना है कि भाषाएं युद्ध नहीं बल्कि आर्थिक विकास की सशक्त माध्यम हैंं। डॉ. देवी के मुताबिक अधिक भाषाओं का ज्ञान न केवल उन्नति की ओर ले जाता है बल्कि भाषाएं आय का सबसे बढिय़ा साधन भी बन सकती हंै। भाषाएं संवाद के लिए होती हैं न कि युद्ध के लिए

सोमवार, 23 सितंबर 2013

न्यू मीडिया : परिचय





धरती पर उपस्थित हर एक जीव आपस में सूचनाएँ आदान-प्रदान करने हेतु एक माध्यम का उपयोग करता है| ये माध्यम इशारे, आवाज या कोई दूसरे संकेत व साधन भी हो सकते है| मनुष्य ने भी पृथ्वी पर आने के बाद आपसी सूचनाएँ प्रेषित करने के लिए कई माध्यम अपनाए और इन माध्यमों का समय व जरुरत के अनुसार समय समय पर विकास भी किया| अपने विकास के शुरू में हो सकता है मानव ने भी जानवरों की तरह आपसी सूचनाएँ संप्रेषित करने के लिए इशारों का माध्यम के रूप में प्रयोग शुरू किया जिसका विकास करते हुए भाषा का अविष्कार किया| भाषा के अविष्कार के बाद मानव एक दूसरे से बातचीत करके व अपनी बात कहकर आपस में सूचनाओं और विचारों का आदान-प्रदान करने लगा| पर भाषा के अविष्कार करने के बाद भी मानव की सूचनाएँ प्रेषित करने के माध्यम की अपनी एक सीमा ही रही| वह उन्हीं लोगों तक सूचनाएँ पहुंचा सकता था जहाँ तक उसकी पहुँच बन पाती थी| अत: मानव ने दूर दूर तक सूचनाएँ प्रेषित करने के लिए लिपि का अविष्कार किया| लिपि के माध्यम से पत्र लिखकर उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजकर अपने दूर रहने वालों तक सूचनाएँ भेजना शुरू किया|


शुरू में यह पत्र व्यवहार व्यक्तिगत सूचना भेजने के माध्यम तक सीमित रहा पर उसके बाद मानव ने इसे व्यक्तिगत के साथ सार्वजनिक सूचना प्रेषित करने के माध्यम में भी प्रयोग करना शुरू कर दिया | एक पत्र पर सार्वजनिक संदेश लिखकर उसे सार्वजनिक स्थल पर चिपका कर वह संदेश ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाया जाने लगा या पत्र में लिखी सूचना किसी एक व्यक्ति द्वारा जगह जगह लोगों को इकठ्ठा कर सुना कर प्रेषित की जाने लगी| समय के साथ मानव ने कागज पर लिखने के लिए मशीनों का अविष्कार किया जो प्रिंटिंग प्रेस के नाम से जानी जाने लगी| इन टंकण मशीनों पर मानव ने सूचनाएँ भेजने के लिए थोक में एक जैसे पत्र छापकर घर घर पहुँचाने शुरू किये|
इन्हीं पत्रों को हमने समाचार पत्रों का नाम दिया जिसे अखबार के नाम से भी जाना जाता है| ये समाचार पत्र शुरू में एक शहर में शुरू हुए पर धीरे धीरे ये अपनी शहर की सीमाएं लांघते राज्य स्तर फिर राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचने लगे| मानव समाज द्वारा ये समाचार पत्र सूचनाएँ आदान-प्रदान करने के आज भी सशक्त माध्यम बने हुए है|

अख़बारों के बाद मानव ने सूचनाएँ त्वरित गति से जन-जन तक पहुँचाने हेतु पहले रेडियो व बाद में टेलीविजन का अविष्कार कर उसे माध्यम बनाया| चूँकि अख़बारों की छपाई व एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाने में काफी समय लगता है जबकि रेडियो व टेलीविजन पर सूचना मिलते ही उसे प्रसारित कर लोगों तक त्वरित गति से पहुंचाई जा सकती है| आज मानव समाज इन माध्यमों का बहुतायत से उपयोग कर रहा है| इस तरह मानव जीवन में सूचनाएँ प्रेषित करने के अखबार ,रेडियो व टेलीविजन सशक्त माध्यम बन गए| आधुनिक समाज ने अखबार को प्रिंट मीडिया व टेलीविजन को टी.वी. मीडिया के नाम से संबोधित कर इन दोनों, तीनों माध्यमों को सामूहिक रूप से “मीडिया” नाम दिया|

पर मानव द्वारा सूचनाएँ सम्प्रेषण के माध्यम की विकास यात्रा इसके बाद भी रुकी नहीं और इसी विकास यात्रा में मानव ने इन्टरनेट का अविष्कार किया| इन्टरनेट के माध्यम से अपने घर बैठे अपने कंप्यूटर पर अपना संदेश टंकण कर सुदूर बैठे अपने रिश्तेदार व सम्बंधित व्यक्ति को त्वरित गति से कुछ ही क्षणों में भेजना शुरू किया| शुरू में इस माध्यम में भी सूचनाएँ सिर्फ आपस में ही भेजी जाने लगी पर धीरे धीरे इन्टरनेट पर कुछ ऐसी वेब साईटस का प्रयोग शुरू हुआ जहाँ व्यक्तियों के समूह बनने लगे और समूह के लोग आपसी सूचनाओं व संदेशों का आदान-प्रदान करने लगे| इस सूचनाओं ने परम्परागत मीडिया की गति को तो पीछे छोड़ दिया साथ ही इसकी सीमाएं भी असीमित हो गई| हालाँकि इन वेब साईटस को बनाने वालों का मुख्य उद्देश्य लोगों द्वारा आपसी मेल मुलाकात व जान-पहचान बढ़ाकर अपना सामाजिक दायरा बढ़ाना था|
लोगों द्वारा अपना सामाजिक दायरा बढाने हेतु समूह बना कर आपसी सूचनाओं का आदान-प्रदान करने की सुविधाएँ उपलब्ध कराने वाली ऐसी वेब साईटस को लोगों ने सोशियल मीडिया का नाम दिया| उतरोतर ये सोशियल वेब साईटस काफी लोकप्रिय हुई और इनके उपयोगकर्ता बढते गए और यह संख्या आज भी बढती ही जा रही है| विश्व में पिछले कुछ वर्षों में हुए कई देशों के आन्दोलनों में इस सोशियल मीडिया का प्रभाव व उपयोगिता स्पष्ट देखी गई है| मिश्र,लीबिया,सीरिया, भारत में अन्ना आंदोलन व अभी हाल ही मैं दिल्ली बलात्कार कांड के खिलाफ छिड़े आंदोलन में आंदोलनकारियों द्वारा सोशियल मीडिया सूचनाएँ संप्रेषित करने का मुख्य माध्यम बना|

पर चूँकि सोशियल मीडिया में व्यक्ति अपनी सूचनाएँ सिर्फ एक समूह तक भेजने तक ही सीमित रहता है| साथ ही उसके द्वारा दी गई सूचनाओं की सूचना जगह पर टिके रहने की उम्र या कहें समय सीमा बहुत कम होती है अत: व्यक्ति को ऐसे माध्यम की जरुरत होती है जो उसकी सूचना को असीमित व्यक्तियों तक पहुंचा सके| मानव की यह जरुरत पुरी करता है इन्टरनेट पर उसका “ब्लॉग” या कहें उसकी “वेब साईट”| ब्लॉग या वेब साईट पर कोई भी व्यक्ति सूचनाएँ लिखकर एक क्लिक में लोगों की असीमित संख्या और विश्व के किसी भी कोने में पहुंचा सकता है| यही नहीं ब्लॉग या वेब साईट पर लिखी गई सूचनाएँ असीमित समय तक इन्टरनेट पर मौजूद रहती है जो समय समय पर लोगों के सामने आती रहती है|

आज कितने ही लोग व संस्थाएं अपनी वेब साईट या ब्लॉग के माध्यम से लोगों तक अपनी बात, अपने विचार, अपने द्वारा प्रायोजित कार्यक्रमों की सूचनाएँ विश्व के कोने कोने में फैले लोगों तक पहुंचा कर वैश्विक रूप धारण किये इस नए माध्यम जिसे ‘न्यू मीडिया” के नाम से जाना जाता है, का उपयोग कर रहें है|

अत: उपरोक्त विवेचन से साफ है कि- परम्परागत प्रिंट मीडिया, टी.वी. मीडिया व रेडियो जिसे “मीडिया” के नाम से जाना जाता है वैसे ही ब्लॉगस, वेब साईटस और सोशियल वेब साईटस को “न्यू मीडिया” के नाम से जाना जाता है| हालाँकि “न्यू मीडिया” पारंपरिक मीडिया की तरह संगठित नहीं नहीं है फिर भी असंगठित होते हुए भी “न्यू मीडिया” ने हाल ही विश्व में हुए बड़े बड़े आन्दोलनों में प्रमुख भूमिका निभाकर अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज करायी है| न्यू मीडिया की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसका हर उपयोगकर्ता स्वयं एक पत्रकार है, स्वयं संपादक है, स्वयं प्रकाशक है| इसमें दी गई सूचना एक क्लिक में ही पुरे विश्व में पहुँच जाती है| “न्यू मीडिया” के किसी भी तरह के बंधन से मुक्त होने, त्वरित गति होने व वैश्विक पहुँच होने जैसी विशेषताओं के चलते आने वाले समय में इसकी उपयोगिता व महत्त्वपूर्णता बढ़नी तय है|

नोट : आगे के लेखों में भी न्यू मीडिया के बारे में चर्चा की जाएगी|
New Media, blogging,websites, social sites, facebook, blog, newspaper

Read more: http://www.gyandarpan.com/2013/01/new-media-bloging.html#ixzz2fhIcybBF

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

प्रेस क्लब - 18 / अनासी शरण बबल










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रागो vs नमो  नमो

कांग्रेस के सिपहसालारों को ये क्या हो गया कि भीषण आंतरिक कलह के बाद कमल वालों द्वारा जब नरेन्द्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री का प्रत्याशी घोषित करते ही कांग्रेसियों के सूर बदल गए। मोदी एंड पाटी फेमिली पर हमला करते हुए पंजा पाटी के सीडी टाईप के नेताओं ने गौरव भाव से यह कहना चालू कर दिया कि यह परंपरा हमारे यहां नहीं है। दरअसल लोकतंत्र में तो लड़ाई विवाद संभव है पर फैमिली दादागिरी में तो केवल चाटूकारिता ही संभव है। पंजा के अधेड़ बाबा को अभी तक पीएम बनने का मन नहीं हुआ है। अपने तमाम पाटी जनों की वंदना याचना मान मनौव्वल के बाद भी बाबा पसीज नहीं रहे है। और खासकर नमो दामोदर के हमलावर तरीके से सामने आने के बाद तो पंजू बाबा की हलक सूखने लगी है।

यही संभव लग रहा है


कांग्रेस के सबसे काबिल ईमानदार कुशल और कभी कभार बोलने वाले यांत्रिक रोबोट से लगने वाले लोकप्रिय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का पूरा जादू उतार पर है। जैसा कि अंदाजा लगाया जा रहा है कि नवम्बर में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में नतीजा यदि पंजे के काबू से बाहर निकला तो तो मनमोहन सिंह की विदाई तय लग रही है. पाटी के भीतर ही मुन्ना को लेकर भारी संतोष के साथ उबाल चरम पर है। माना जा रहा है कि विस चुनाव खराब रहे तो युवा बाबा राहुल गांधी पर दवाब बनाकर दिसंबर माह में ही पीएम की गद्दी को बतौर उपहार सौंप दिया जाए। और पूरे देश मे मोदी के खिलाफ बाबा को पीएम की तरह पेश करते हुए जनता से एक मौका देने की मांग की जाए। ज्यादातर पंजू नेताओं को लग रहा है कि मौजूदा पीएम रहे तो बाजी का हाथ से निकलना तय है, लिहाजा बाबा के नाम पर एक चांस लिया जा सकता है। फिर मात्र चार पांच माह के पीएम को फूल टाईमर पीएम बनाने का अपील शायद काम कर जाए। मोदी के खिलाफ मनमोहन को रास्ते से हटाने के लिए विस चुनाव कांग्रेस यह मानकर चल रही है कि इलमें हार से ही बाबा को उपहार मिलेगा।  और लगता है कि ईमानदारी के प्रतीक माने जाने वाले अपने पीएम मनमोहन साहब भी वाकई समय की मौज और अपने विरोधियों की फौज के मूड को पहचान गए है। तभी तो बिना कहे सरेंडर के बहाने अपने लिए भी जगह की गारंटी की चाहत है।


मुंगेरी लाल के हवाई सपने से होता है विकास......


एक गंवई कहावत है कि घर में नहीं दाने और अम्मां चली मयखाने  यही हसीन सपना कांग्रेस के युवराज बाबा का सपना है कि भाषण देने से कुछ नहीं होता। सबकुछ होता है तो केवल सपना देखने से। बाबा का कहना है कि एक मजदूर को भी यह सपना देखना चाहिए कि बड़ा होकर उसका बेटा हवाई जहाज उडाये। वाह हवाई जहाज के बूते हवाई सपने या मुंगेरी लाल बाबा के हसीन सपने को साकार करना है जिसके लिए मुंगेरी बाबा मे क्या गजब का नफासत है कि एक ही साथ बाबा ने वोटरों को ताली बजाने के लिए मजबूर कर दिया। हम इस सपने के लिए मुंगेरी बाबा को बधाई देने की बजाय इनके स्क्रिप्ट राईटर को ज्यादा बधाई देना चाहूंगा। सही मायने में राईटर महोदय को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाना चाहिए क्योंकि बाबा के  हवाई स्क्रिप्ट से नरेन्द्र मोदी को पंजे पर हमला करने का जो मौका दिया जाएगा उसका सामना तो फिलहाल बाबा सोगा या ममोसि के पास नहीं है    


लौट के घर आए..........


भाजपा के शिखर नेता लाल जी के बारे में कुछ कहने से पहले शोले मे गब्बर का एक डॉयलाग याद आया कि तेरा क्या होगा कालिया . पहले तो लगा कि लाल जी का हाल भी कुछ कालिया वाला ही होने वाला है पर कमाल हो गया। अपनी नाराजगी से नागपुर से लेकर सबको बेहाल कर देने वाले लाल जी ने अपना जबरदस्त विरोध जताने के बाद इस तरह यू टरन लिया कि लोग देखते ही रह गए. लोगों को यह पचाना भारी पडने लगा कि कल तक लाल पीले हो रहे लालदी इतने खुशहाल कैसे बन गए। इनके मुखारबिंद से मोदी के तारीफों की बारिश होने लगी। सच में मौके की नजाकत को भांपकर लाल जी ने पाला बदल लिया नहीं तो वाकई तेरा क्या होगा मेरे लाल की हालत भगवान जाने कैसा होता।



दंगो में झुलसा मौलाना की इमेज


मुस्लमान मतदाताओं से ज्यादा प्यार नेह लगाव रखने वाले नेताजी को मौलाना की उपाधि मिली है। वे इससे ज्यादा खुश भी होते है। मुजफ्फरनगर के दंगों में लखनउ से आए एक फोन ने कि जो हो रहा है होने दो ने धमाल कर दिया। कोई आजम साहब के नाम से आए फोन के बाद मुख्य दंगाईयों को छोड़ दिया गया और जब दंगा लीला पूरे शबाब के साथ समाप्त हुआ तो आजम साहब का ताव और नेताजी का मुलायम चेहरा दिखा रहा है कि दंगों मे मारे गए लोगों से ज्यादा जरूरी है मौलाना की इमेज को बनाये रखना. धन्य है अखिलेश राज में आजम छापनेताजी की समाजवादी राजनीति जहां पर सबकुछ जायज है। लाशों की बिसात पर राजनीति करने वाले इन नेताओं को शत शत नमन।


झाडू चलेगी मगर किसपर ????

अपने मियां मिठ्ठू बनने से कुछ भी हासिल नहीं होता। खासकर एक हंगामे के बाद खुद को खुदा मानने की भूल में रहना ज्यादा खतरनाक होता है।  अन्ना हजारे का यूज कर फेंक देने वाले और खुद को सब पर भारी साबित करने की ललक में केजरीवाल एंड टोली कुछ ज्यादा ही मुगालते में है। चुनावी आंकलन में आप को कुछ सीटे मिल रही है , पर नयी दिल्ली रेंज में तो आप का खाता भी नहीं खुल रहा है जहां से आप के बाप शीला को ललकारेगे.। क्या परिणाम होगा यह तो बाद की बात है पर खुद को दिल्ली का बेस्ट सीएम दिखाने और बताने की जुगाड़ में वे अभी से लग गए है । खुद को 41 फीसदी और शीला को 20 फीसदी अंक देकर बाप ने दिखा दिया कि झाडू तो चलेगी मगर ज्यादा आशंका है कि बाप के हसीन सपनो पर ही झाडू चल जाएगी।

     


विनाश काले विपरीत बुद्धि


बिहार के धीर गंभीर मुख्यमंत्री अब ज्योतिषी  भी बनते दिख रहे है। अपने कल को छोड़कर वे दूसरे के कल को बड़ी आसानी से पलक झपकते ही झटपट बता देते है। जी हां नरेन्द्र  मोदी को प्रधानमंत्री पद के दावेदार घोषित करते ही हमारे कुमार साहब कैमरा के सामने प्रकट होते हुए  टिप्पणी की, विनाश काले विपरीत बुद्धि । कुमार की यह टिप्पणी खिसियानी बिल्ली खंभा नोंचे वाली है या जलन वाली कुछ समझ नहीं आ रहा। मगर मोदी साहब का कल क्या होगा यह तो पूरा देश देखेगा , मगर विनाश काल में बिना पतवार के एनडीए को तोड़ और छोड़ कर एकला चलो की राह पकड़ने से  क्या हासिल कर लिए। 2015 विस चुनाव में अकेले डूबना तो अभी से पक्का है। हालांकि कमल को भी कुछ नहीं मिलेगा पर जोड तोज में माहिर चारा छाप लालू कुमार की फसल को चर जरूर जाएंगे।, इसका भय कुमार को अभी से सता रहा है। पर कुमार साहब क्या करे विनाश काले......... ?..
     

शीला राज का प्याजी प्यार

दिल्ली की राजनीति में प्याज का बड़ा ही महत्व है। प्याज के बुखार से  भाजपा सरकार का चेहरा इस तरह बदरंग हुआ की आज 15 साल के बाद तक दिल्ली में इसके जले हुए चेहरे पर प्याज की बू आती है। इस बार प्याज के बुखार से शीला सरकार का हाल बेहाल है, मगर मामले को हल्का दिखाने के लिए शीला एंड कंपनी माहौल सामान्य जताने में लगी है। खासकर फूड मंत्री राजकुमार चौहान और मुख्यमंत्री प्याज को सस्ते दर पर बेचने के लिए चारो तरफ सरकारी दुकान लगाने का दावा ठोक रहे है, मगर सरकारी दुकान में ही प्याज 60 रूपये किलो मिल रहा है। बेहाल मतदाताओं से शीला सरकार क्या इस चुनाव में प्याजी बुखार से बच पाएंगी? लगता है कि 15 साल के बाद इतिहास खुद को दोहरा रहा है।


लालू की है बोलती बंद

चारा कांड के फैसले के दिन ज्यों ज्यों करीब आता दिख रहा है तो बिहार के सुकुमार  लालू का चेहरा मलीन होता जा रहा है। मगर मोदी के चलते लालू एक बार फिर  से अग्नि उगलना चालू कर दिया है। मोदी को बिहार प्रवेश पर रोक लगाने की पुरजोर वकालत कर रहे लालू मोदी को आंतकवादी करार देने में लगे है। अपने मियां मिठ्ठू बनते हुए लालू  यह जताने और बताने में लगे हैं कि किस तरह आडवाणी के रथ को रोक कर देश हित में कितना बड़ा काम किया था। परम दुश्मन नीतिश कुमार से लालू भी यही कुछ कराना चाह रहे है। मगर देखना यही है कि मोदी को आंतकवादी कहकर लालू खुद अपने जनाधार को कितना संभाल पाते है ?  `



बिहार में पुत्रो की धमाल


बिहार में भले ही विधानसभा चुनाव नही है, और लोकसभा चुनाव में भी आठ माह का अभी समय शेष है, इसके बावजूद आजकल क्रिकेटर और हीरो बनते बनते रह गए लालू और पासवान पुत्र बिहार में धमाल मचा रहे है। वातानुकूल गाड़ी में पूरे लाव लश्कर के साथ पिकनिक मनाते हुए दोंनो पुत्र बिहार की धरती को धन्य करने में लगे है। अपने अपने पिताओं की तारीफ और मौजूदा सीएम की निंदा करते हुए फिर से राज सौंपने की याचना करने में लगे है। एक तरफ पूरे बिहार को एकजुट करने का हुंकार भर रहे लालू को अपने बड़े बेटे पर नियंत्रण नहीं है जिससे आजकल वे उत्पात मचाने में जुटे है और गावस्कर बनते बनते रह गए तेजस्वी अपनी तेज और चिराग पासवान बिहार में अपने लिए चिराग जलाने की कोशिश में लगे है। अपने कैरियर में फेल रहे दोनों पुत्रों की नयी पारी के आगाज से बिहार दुविधा में है कि इनकी पोलिटिकल पारी पर .कीन किस तरह करे


आशा के पीछे राम राम

परम आदरणीय संत बापू आशाराम आजकल दिक्कत में है। एक कन्या के साथ यौनाचार जैसे आरोप से सुशोभित होकर महाराद की रोजाना जेल में पोल जिसे कलई भी कह सकते है, खुल रही है.। जमीन कब्जाने से लेकर नाना प्रकार के अशोभनीय आरोपो में फंसे आशा राम के पीछे राम भी बेइज्जती महसूस रहे हां पर राम भी क्या करे आशा के साथ जीवन के बाद भी तक का साथ निभाने का नाता जो जोड रखा है.। आसा को बचाने के लिए एक और राम प्रकट हुए है। मशहूर वकील राम जेठमलानी मगर अदालत ने राम की दलीलों को राम तक भेज दिया। मैं भी आसा के ले ज्यादा चिंचित हूं नको इस उमर में बुढापे में राम छोड़कर यदि चले गए तो इस आशा का क्या होगा मेरे राम। मगर मानना पड़ेगा कि इस इमर में भी आशा का यौवन बरकरार है और हो भी क्यों ना जब चंद्रास्वामी हाजमोले की गोली को सेक्स पावर टेबलेट के नाम पर बेचने में माहिर थे तो अपन आशा तो बाकायदा बांह उठाकर पावर का दिखावा तक करते थे। इस आरोप के बाद तोवे अपने भक्तों में और आदरणीय होकर निकलने वाले है बाबा।
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प्रेस क्लब- 18  / अनामी शरण बबल
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रागो vs नमो  नमो

कांग्रेस के सिपहसालारों को ये क्या हो गया कि भीषण आंतरिक कलह के बाद कमल वालों द्वारा जब नरेन्द्र मोदी को भावी प्रधानमंत्री का प्रत्याशी घोषित करते ही कांग्रेसियों के सूर बदल गए। मोदी एंड पाटी फेमिली पर हमला करते हुए पंजा पाटी के सीडी टाईप के नेताओं ने गौरव भाव से यह कहना चालू कर दिया कि यह परंपरा हमारे यहां नहीं है। दरअसल लोकतंत्र में तो लड़ाई विवाद संभव है पर फैमिली दादागिरी में तो केवल चाटूकारिता ही संभव है। पंजा के अधेड़ बाबा को अभी तक पीएम बनने का मन नहीं हुआ है। अपने तमाम पाटी जनों की वंदना याचना मान मनौव्वल के बाद भी बाबा पसीज नहीं रहे है। और खासकर नमो दामोदर के हमलावर तरीके से सामने आने के बाद तो पंजू बाबा की हलक सूखने लगी है।

यही संभव लग रहा है


कांग्रेस के सबसे काबिल ईमानदार कुशल और कभी कभार बोलने वाले यांत्रिक रोबोट से लगने वाले लोकप्रिय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का पूरा जादू उतार पर है। जैसा कि अंदाजा लगाया जा रहा है कि नवम्बर में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में नतीजा यदि पंजे के काबू से बाहर निकला तो तो मनमोहन सिंह की विदाई तय लग रही है. पाटी के भीतर ही मुन्ना को लेकर भारी संतोष के साथ उबाल चरम पर है। माना जा रहा है कि विस चुनाव खराब रहे तो युवा बाबा राहुल गांधी पर दवाब बनाकर दिसंबर माह में ही पीएम की गद्दी को बतौर उपहार सौंप दिया जाए। और पूरे देश मे मोदी के खिलाफ बाबा को पीएम की तरह पेश करते हुए जनता से एक मौका देने की मांग की जाए। ज्यादातर पंजू नेताओं को लग रहा है कि मौजूदा पीएम रहे तो बाजी का हाथ से निकलना तय है, लिहाजा बाबा के नाम पर एक चांस लिया जा सकता है। फिर मात्र चार पांच माह के पीएम को फूल टाईमर पीएम बनाने का अपील शायद काम कर जाए। मोदी के खिलाफ मनमोहन को रास्ते से हटाने के लिए विस चुनाव कांग्रेस यह मानकर चल रही है कि इलमें हार से ही बाबा को उपहार मिलेगा।  और लगता है कि ईमानदारी के प्रतीक माने जाने वाले अपने पीएम मनमोहन साहब भी वाकई समय की मौज और अपने विरोधियों की फौज के मूड को पहचान गए है। तभी तो बिना कहे सरेंडर के बहाने अपने लिए भी जगह की गारंटी की चाहत है।


मुंगेरी लाल के हवाई सपने से होता है विकास......


एक गंवई कहावत है कि घर में नहीं दाने और अम्मां चली मयखाने  यही हसीन सपना कांग्रेस के युवराज बाबा का सपना है कि भाषण देने से कुछ नहीं होता। सबकुछ होता है तो केवल सपना देखने से। बाबा का कहना है कि एक मजदूर को भी यह सपना देखना चाहिए कि बड़ा होकर उसका बेटा हवाई जहाज उडाये। वाह हवाई जहाज के बूते हवाई सपने या मुंगेरी लाल बाबा के हसीन सपने को साकार करना है जिसके लिए मुंगेरी बाबा मे क्या गजब का नफासत है कि एक ही साथ बाबा ने वोटरों को ताली बजाने के लिए मजबूर कर दिया। हम इस सपने के लिए मुंगेरी बाबा को बधाई देने की बजाय इनके स्क्रिप्ट राईटर को ज्यादा बधाई देना चाहूंगा। सही मायने में राईटर महोदय को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाना चाहिए क्योंकि बाबा के  हवाई स्क्रिप्ट से नरेन्द्र मोदी को पंजे पर हमला करने का जो मौका दिया जाएगा उसका सामना तो फिलहाल बाबा सोगा या ममोसि के पास नहीं है    


लौट के घर आए..........


भाजपा के शिखर नेता लाल जी के बारे में कुछ कहने से पहले शोले मे गब्बर का एक डॉयलाग याद आया कि तेरा क्या होगा कालिया . पहले तो लगा कि लाल जी का हाल भी कुछ कालिया वाला ही होने वाला है पर कमाल हो गया। अपनी नाराजगी से नागपुर से लेकर सबको बेहाल कर देने वाले लाल जी ने अपना जबरदस्त विरोध जताने के बाद इस तरह यू टरन लिया कि लोग देखते ही रह गए. लोगों को यह पचाना भारी पडने लगा कि कल तक लाल पीले हो रहे लालदी इतने खुशहाल कैसे बन गए। इनके मुखारबिंद से मोदी के तारीफों की बारिश होने लगी। सच में मौके की नजाकत को भांपकर लाल जी ने पाला बदल लिया नहीं तो वाकई तेरा क्या होगा मेरे लाल की हालत भगवान जाने कैसा होता।



दंगो में झुलसा मौलाना की इमेज


मुस्लमान मतदाताओं से ज्यादा प्यार नेह लगाव रखने वाले नेताजी को मौलाना की उपाधि मिली है। वे इससे ज्यादा खुश भी होते है। मुजफ्फरनगर के दंगों में लखनउ से आए एक फोन ने कि जो हो रहा है होने दो ने धमाल कर दिया। कोई आजम साहब के नाम से आए फोन के बाद मुख्य दंगाईयों को छोड़ दिया गया और जब दंगा लीला पूरे शबाब के साथ समाप्त हुआ तो आजम साहब का ताव और नेताजी का मुलायम चेहरा दिखा रहा है कि दंगों मे मारे गए लोगों से ज्यादा जरूरी है मौलाना की इमेज को बनाये रखना. धन्य है अखिलेश राज में आजम छापनेताजी की समाजवादी राजनीति जहां पर सबकुछ जायज है। लाशों की बिसात पर राजनीति करने वाले इन नेताओं को शत शत नमन।


झाडू चलेगी मगर किसपर ????

अपने मियां मिठ्ठू बनने से कुछ भी हासिल नहीं होता। खासकर एक हंगामे के बाद खुद को खुदा मानने की भूल में रहना ज्यादा खतरनाक होता है।  अन्ना हजारे का यूज कर फेंक देने वाले और खुद को सब पर भारी साबित करने की ललक में केजरीवाल एंड टोली कुछ ज्यादा ही मुगालते में है। चुनावी आंकलन में आप को कुछ सीटे मिल रही है , पर नयी दिल्ली रेंज में तो आप का खाता भी नहीं खुल रहा है जहां से आप के बाप शीला को ललकारेगे.। क्या परिणाम होगा यह तो बाद की बात है पर खुद को दिल्ली का बेस्ट सीएम दिखाने और बताने की जुगाड़ में वे अभी से लग गए है । खुद को 41 फीसदी और शीला को 20 फीसदी अंक देकर बाप ने दिखा दिया कि झाडू तो चलेगी मगर ज्यादा आशंका है कि बाप के हसीन सपनो पर ही झाडू चल जाएगी।

     


विनाश काले विपरीत बुद्धि


बिहार के धीर गंभीर मुख्यमंत्री अब ज्योतिषी  भी बनते दिख रहे है। अपने कल को छोड़कर वे दूसरे के कल को बड़ी आसानी से पलक झपकते ही झटपट बता देते है। जी हां नरेन्द्र  मोदी को प्रधानमंत्री पद के दावेदार घोषित करते ही हमारे कुमार साहब कैमरा के सामने प्रकट होते हुए  टिप्पणी की, विनाश काले विपरीत बुद्धि । कुमार की यह टिप्पणी खिसियानी बिल्ली खंभा नोंचे वाली है या जलन वाली कुछ समझ नहीं आ रहा। मगर मोदी साहब का कल क्या होगा यह तो पूरा देश देखेगा , मगर विनाश काल में बिना पतवार के एनडीए को तोड़ और छोड़ कर एकला चलो की राह पकड़ने से  क्या हासिल कर लिए। 2015 विस चुनाव में अकेले डूबना तो अभी से पक्का है। हालांकि कमल को भी कुछ नहीं मिलेगा पर जोड तोज में माहिर चारा छाप लालू कुमार की फसल को चर जरूर जाएंगे।, इसका भय कुमार को अभी से सता रहा है। पर कुमार साहब क्या करे विनाश काले......... ?..
     

शीला राज का प्याजी प्यार

दिल्ली की राजनीति में प्याज का बड़ा ही महत्व है। प्याज के बुखार से  भाजपा सरकार का चेहरा इस तरह बदरंग हुआ की आज 15 साल के बाद तक दिल्ली में इसके जले हुए चेहरे पर प्याज की बू आती है। इस बार प्याज के बुखार से शीला सरकार का हाल बेहाल है, मगर मामले को हल्का दिखाने के लिए शीला एंड कंपनी माहौल सामान्य जताने में लगी है। खासकर फूड मंत्री राजकुमार चौहान और मुख्यमंत्री प्याज को सस्ते दर पर बेचने के लिए चारो तरफ सरकारी दुकान लगाने का दावा ठोक रहे है, मगर सरकारी दुकान में ही प्याज 60 रूपये किलो मिल रहा है। बेहाल मतदाताओं से शीला सरकार क्या इस चुनाव में प्याजी बुखार से बच पाएंगी? लगता है कि 15 साल के बाद इतिहास खुद को दोहरा रहा है।


लालू की है बोलती बंद

चारा कांड के फैसले के दिन ज्यों ज्यों करीब आता दिख रहा है तो बिहार के सुकुमार  लालू का चेहरा मलीन होता जा रहा है। मगर मोदी के चलते लालू एक बार फिर  से अग्नि उगलना चालू कर दिया है। मोदी को बिहार प्रवेश पर रोक लगाने की पुरजोर वकालत कर रहे लालू मोदी को आंतकवादी करार देने में लगे है। अपने मियां मिठ्ठू बनते हुए लालू  यह जताने और बताने में लगे हैं कि किस तरह आडवाणी के रथ को रोक कर देश हित में कितना बड़ा काम किया था। परम दुश्मन नीतिश कुमार से लालू भी यही कुछ कराना चाह रहे है। मगर देखना यही है कि मोदी को आंतकवादी कहकर लालू खुद अपने जनाधार को कितना संभाल पाते है ?  `



बिहार में पुत्रो की धमाल


बिहार में भले ही विधानसभा चुनाव नही है, और लोकसभा चुनाव में भी आठ माह का अभी समय शेष है, इसके बावजूद आजकल क्रिकेटर और हीरो बनते बनते रह गए लालू और पासवान पुत्र बिहार में धमाल मचा रहे है। वातानुकूल गाड़ी में पूरे लाव लश्कर के साथ पिकनिक मनाते हुए दोंनो पुत्र बिहार की धरती को धन्य करने में लगे है। अपने अपने पिताओं की तारीफ और मौजूदा सीएम की निंदा करते हुए फिर से राज सौंपने की याचना करने में लगे है। एक तरफ पूरे बिहार को एकजुट करने का हुंकार भर रहे लालू को अपने बड़े बेटे पर नियंत्रण नहीं है जिससे आजकल वे उत्पात मचाने में जुटे है और गावस्कर बनते बनते रह गए तेजस्वी अपनी तेज और चिराग पासवान बिहार में अपने लिए चिराग जलाने की कोशिश में लगे है। अपने कैरियर में फेल रहे दोनों पुत्रों की नयी पारी के आगाज से बिहार दुविधा में है कि इनकी पोलिटिकल पारी पर .कीन किस तरह करे


आशा के पीछे राम राम

परम आदरणीय संत बापू आशाराम आजकल दिक्कत में है। एक कन्या के साथ यौनाचार जैसे आरोप से सुशोभित होकर महाराद की रोजाना जेल में पोल जिसे कलई भी कह सकते है, खुल रही है.। जमीन कब्जाने से लेकर नाना प्रकार के अशोभनीय आरोपो में फंसे आशा राम के पीछे राम भी बेइज्जती महसूस रहे हां पर राम भी क्या करे आशा के साथ जीवन के बाद भी तक का साथ निभाने का नाता जो जोड रखा है.। आसा को बचाने के लिए एक और राम प्रकट हुए है। मशहूर वकील राम जेठमलानी मगर अदालत ने राम की दलीलों को राम तक भेज दिया। मैं भी आसा के ले ज्यादा चिंचित हूं नको इस उमर में बुढापे में राम छोड़कर यदि चले गए तो इस आशा का क्या होगा मेरे राम। मगर मानना पड़ेगा कि इस इमर में भी आशा का यौवन बरकरार है और हो भी क्यों ना जब चंद्रास्वामी हाजमोले की गोली को सेक्स पावर टेबलेट के नाम पर बेचने में माहिर थे तो अपन आशा तो बाकायदा बांह उठाकर पावर का दिखावा तक करते थे। इस आरोप के बाद तोवे अपने भक्तों में और आदरणीय होकर निकलने वाले है बाबा।
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