शनिवार, 29 मार्च 2014

धर्मयुग की पत्रकारिता से संवाद लेखन में मुड़ गया-संजय मासूम


October 16, 2013

-अजय ब्रह्मात्‍मज 
संजय मासूम ने पहली फिल्‍म 'जोर' से ही जोरदार दस्‍तक दी। उनकी अगली फिल्‍म 'कृष 3' नवंबर में आ रही है। संजय ने यहां संवाद लेखन के प्रति अपने झुकाव,चुनौती और स्थिति की बातें की हैं।
-काफी व्यस्त हो गए हैं आप?अभी क्या-क्या काम चल रहा है?
0 अभी राजश्री की फिल्म ‘सम्राट एंड कंपनी’ खत्म की। उसकी शूटिंग शुरू हुई है। साथ ही यूटीवी की एक फिल्म है। कुणाल देशमुख उसके डायरेक्टर हैं। उसमें इमरान हाशमी और परेश रावल हैं। इसी महीने उसके डायलॉग खत्म किए हैं। वह अक्टूबर के एंड फ्लोर पर जा रही है। उसके बाद दो फिल्मों की रायटिंग शुरू करनी है। एक प्रवीण निश्चल और ई ़ निवास की फिल्म है। उसके बाद एक और इमरान हाशमी की फिल्म है। उसकी रायटिंग करनी है। पांच-छह जगहों में बातचीत चल रही है।
- ज्यादातर डायलॉग रायटिंग ही चलती है या स्क्रिप्ट रायटिंग, कहानी  ...
0 अभी तक संवादों पर ही अपना ध्यान केंद्रित किया है, लेकिन अब धीरे-धीरे सोच रहा हूं कि लेखन को थोड़ा सा विस्तार दिया जाए। हालांकि स्क्रीनप्ले लिखने की पहले भी कोशिश की है। डायलॉग में एक पहचान मिल गई है तो लोग डायलॉग की बात करते हैं। उसके चक्कर में स्क्रीनप्ले रह जाता है। अभी मैं एक फिल्म करूंगा जिसमें स्क्रीनप्ले भी कर रहा हूं। कमाल की बात है कि स्क्रीनप्ले भी ऐसी फिल्म का करने जा रहा हूं जो कि मर्डर मिस्ट्री है। हू डन इट फिल्म है।
- इधर कौन सा काम अच्छा हुआ,जिनसे बड़ी उम्मीदें हैं?
0 अभी तो सबसे ज्यादा उम्मीद हमलोग लगा कर बैठे हैं ‘कृष 3’ से और इस लेवल पर क्या होगा यह पता नहीं, लेकिन इतना भरोसा है कि दर्शकों को फिल्म पसंद आएगी। फिल्म बहुत अच्छी बनी है। हर विभाग ने मेहनत की है तो मुझे लगता है कि रिजल्ट बहुत अच्छा आएगा। ‘कृष 3’ से उम्मीद है। अगले साल आएगी यशराज की ‘गुंडे’ जिसमें मैंने को-राइट किया है डायरेक्टर के साथ। वह भी अच्छी फिल्म है। ‘शातिर’ है।
- कैसा लग रहा है? जो सोच कर चले थे, उस मंजिल के तरफ कितना आगे बढ़ गए हैं या मंजिल मिल गई?
0 सोच कर तो नहीं चला था मैं। दरअसल थोड़ा सा पहले जाना पड़ेगा मुझे इस सवाल का जवाब देने के लिए। मैं मुंबई आया था ‘धर्मयुग’ की पत्रकारिता करने। साहित्य के करीब की वैचारिक पत्रकारिता भी कह सकते हैं। वहां पत्रकारिता करने में मजा आया। धर्मयुग बंद हो गई और मजबूरी में हमें नवभारत टाइम्स शिफ्ट किया गया।  नवभारत टाइम्स की पत्रकारिता यानी दैनिक पत्रकारिता में मेरी रुचि थी। अगर दैनिक पत्रकारिता करनी होती तो मैं इलाहाबाद में ही करता। खबरें आज भी वही हैं। सिर्फ जगह और तारीख बदल जाती है। शीर्षक तो वही रहता है ‘एक युवती का शव बरामद’। परिवार साथ में है। बच्चे हैं। जिम्मेदारी है तो कोई ऐसा डिसीजन तुरंत ले नहीं सकते। एक बैचेनी थी कि कुछ करें। इस मामले में खुशकिस्मत हूं कि मेरी रचनात्मकता को फिल्म के जरिए मौका मिला। पहली फिल्म ही बहुत बड़ी फिल्म थी। इस तरह से मैंने सोचा नहीं था मैंने कि मंजिल क्या होगी और क्या सफर होगा? शुरू की कुछ फिल्में नहीं चली, लेकिन मुझे नियमित तौर पर काम मिलता रहा । मैं ईमानदारी से अपनी प्रतिभा और क्षमता केहिसाब से काम करता रहा। आज यह जरूर लगता है कि बतौर लेखक एक पहचान बना पाया हूं और दर्शकों के बीच मेरे संवादों की पहचान बन चुकी है।
- पहली फिल्म कौन सी थी?
0 मेरी पहली फिल्म ‘इंडियन’ थी। वह फिल्म नहीं बन पाई थी। उसमें सनी देओल साहब और ऐश्वर्या राय थे। वह फिल्म बनी नहीं। ‘जोर’ मेरी पहली रिलीज फिल्म थी । सनी देओल, सुष्मिता सेन, ओमपुरी, मिलिंद गुनाजी काम कर रहे थे। उस समय के हिसाब से बड़ी फिल्म थी। उसमें मेरे डायलॉग पसंद भी किए गए। बस वहां से सफर शुरू हुआ।
- लेकिन डायलॉग रायटिंग ही क्यों चुना आप ने?
0 मैंने नहीं चुना कि संवाद लिखना है। संवाद के लिए भाषा आनी चाहिए। भाषा के साथ उस पर नियंत्रण आना चाहिए। यह मुझे थोड़ा आसान सा लगा। मुझे लगा कि मैं भाषा जानता हूं। धर्मयुग के दिनों में लिखे लेखों पर अच्छे फीडबैक मिलते थे। मुझे लगा कि यह काम ज्यादा बेहतर तरीके से कर पाऊंगा। पहली फिल्म में लोगों ने पहचाना  कि कुछ बात है, कुछ थॉट लेकर आया है यह लेखक। मुझे लगा कि ठीक है जो काम पसंद किया जा रहा है,उसी पर आगे बढ़ते हैं। उस तरह धीरे-धीरे संवाद तक ही रह गया।
- संवाद वास्तव में है क्या? ये सिर्फ हिंदी फिल्मों में डिवीजन है। अंग्रेजी फिल्मों में यह डिवीजन नहीं है। अपने यहां कहानी, स्क्रिप्ट, डायलॉग रायटर सब अलग-अलग होते हैं। एक आम आदमी को समझाएं तो क्या है यह चीज?
0 मुझे लगता है कि हमारे यहां सिनेमा का फैलाव बहुत है। उसके दायरा बहुत व्यापक हैं। ऑडियेंश भी काफी फैला हुआ है। अगर आप आज की दौर का बात करें तो भी मल्टीप्लेक्स है,सिंगल स्क्रीन है, पढ़े-लिखे, कम पढ़े लिखे, अनपढ़ सभी फिल्में देखते हैं। उन तक भी बात पहुंचनी चाहिए। इस तरह से मुझे लगता है कि यह रेंज बहुत बड़ा है। उसकी वजह से लोगों को इनवॉल्व करना पड़ता है। कहानी,पटकथा और संवाद तीनों काम के विशेषज्ञ हैं। विदेशों में कहानी सुनाने की भाषा और चरित्र की भाषा एक ही रहती है। उन्हें संवाद लेखक की जरूरत नहीं पड़ती। अपने यहां संवाद लेखन के लिए ऐसे आदमी को चुना जाता है,जो भाषा जानता है। वहां फिर डायलॉग का खेल शुरू होता है। यह काम थोड़ा चुनौतीपूर्ण होता है। जिंदगी में सब की भाषा भले ही हिंदी है, लेकिन सब का लहजा अलग होता है।तरीका अलग होता है। शब्दों को बोलने का अंदाज अलग होता है। डायलॉग रायटिंग करते समय समस्‍या आती है कि हर चरित्र ऐसा नहीं लगे कि एक जैसा ही बात कर रहा हो। सब अलग-अलग दिखें, उनकी अलग शैली हो,उनकी अलग भाषा हो।
- डायलॉग में पंच क्या होता है? कई बार इतना पंच आता है कि वह पंचर हो जाता है।
0पंच जरूरी है। पंच का मतलब यह है कि जो बात कही जा रही है उसे तारीफ के साथ सुनें। मतलब सुनते हुए मुंह से तारीफ भी निकले। जाहिर सी बात है कि सिनेमा देख रहे हैं तो लोग सीटी बजाते हैं, ताली बजाते हैं। आप सुनें तो वाह के साथ सुनें। दिल में वह बात लगे। वाह क्या बात कही है। मुस्कराहट आ जाए। पंच इसलिए जरूरी होता है।  मैंने ‘कृष 3’ लिखी तो मेरी कोशिश थी कि पंच डाल के करें। राकेश जी ने मुझे कहा था कि अगर किसी सीन में लोगों हंसाना है तो हंसाना है। रुलाना है तो रुलाना है। उसमें कोई समझौता नहीं। बिना नाटकीय हुए पंच आ जाए तो कमाल का हो।
- कुछ लोगों को शिकायत है कि फिल्म बनाते हैं हिंदी में लेकिन बोल-व्यवहार की भाषा अंग्रेजी हो गई है?
0 यह बात तो सही है। इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसा नहीं है कि इरादतन ऐसा किया जा रहा हो। जो रायटर आ रहे हैं, उनकी पृष्ठभूमि अंग्रेजी की है। वे अंग्रेजी में सोचते हैं तो अंग्रेजी में ही लिख रहे हैं। नए एक्टर्स की पृष्ठभूमि अंग्रेजी स्कूलों और अंग्रेजी माहौल की है। विदेशों से पढ़ कर आ रहे हैं। उनको भी अंग्रेजी पढऩे में ही ज्यादा समझ में आता है। वह हिंदी को रोमन में पढ़ते हैं। यह इरादतन नहीं है। रितिक रोशन आज के जनरेशन का हीरो हैं, लेकिन उन्हें डायलॉग देवनागरी में ही चाहिए। पर एक माहौल ऐसा बन गया है नो डाउट। रायटिंग का, स्क्रीनप्ले रायटिंग का डिसक्रिप्शन रायटिंग का सारा काम अंग्रेजी में ही होता है। क्योंकि अंग्रेजी में सोचने वाले ही काम कर रहे हैं। इसके बावजूद समझ लें कि भले ही अंग्रेजी कितनी भी हावी हो जाए, व्यापक लोगों तक पहुंचने वाले सिनेमा की भाषा हिंदुस्तानी ही रहेगी।
- नए लेखकों को क्या टिप्स देंगे? वे कैसे तैयारी करें?
0 सबसे बड़ी और पहली बात कि पढऩा जरूरी है। फिल्म की रायटिंग करनी है तो फिल्मों को देखना, फिल्मों को जानना, फिल्मों के बारे में पढऩा बहुत जरूरी है। जिस तरह की फिल्में बन रही हैं,उनको लगातार देखते रहना बहुत जरूरी है। यह समझते रहना बहुत जरूरी है कि दर्शकों को क्या पसंद आ रहा है, क्या नहीं आ रहा है? फिल्मों के प्रोसेस से जुडऩा जरूरी है। भाषा तो आनी चाहिए। गलतफहमी में रह के कोई कोशिश नहीं करनी चाहिए। आपको एहसास होना चाहिए कि आप किस लेवल के रायटर हैं। कितनी प्रतिभा है? जैसे मैं कहूं कि ‘कॉकटेल’ जैसी फिल्म मैं नहीं लिख सकत

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

सामाजिक आंदोलन और न्यू मीडिया




August 17, 2011




समाचार पत्रों और चैनलों में व्यावसायीकरण के प्रभाव के कारण निष्पक्ष विचारों का प्रभाव बहुत कम होता जा रहा है। निष्पक्ष विचार रखने वालों को मीडिया जगत में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में न्यू मीडिया एक वरदान के रूप में उभर कर सामने आया है। सस्ता व सुलभ संचार माध्यम होने के कारण इसने काफी कम समय में प्रसिद्धि पाई है। वहीं न्यू मीडिया ने सामाजिक आंदोलनों में भी सक्रिय भूमिका निभाई है।

अरब देशों में हुई जनक्रांति के पीछे न्यू मीडिया का बड़ा योगदान रहा है। सरकार द्वारा समाचार पत्रों और चैनलों पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद वहां की जनता एक-दूसरे से सोशल साइटों के जरिए जुड़ी और जनक्रांति को एक नई दिशा मिली। भारत में भी पिछले कुछ दिनों में हुए आंदोलनों में न्यू मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आरूषि तलवार को इंसाफ दिलाने के लिए कैंडल लाइट मार्च से लेकर अन्ना हजारे व बाबा रामदेव के आंदोलनों में जनसमर्थन प्राप्त करने के लिए न्यू मीडिया के माध्यम से लोगों से संपर्क साधा गया। इसके लिए एक ओर फेसबुक जैसी सोशल साइट पर एक पेज बनाकर लोगों को आंदोलन व उसके समय, स्थान की जानकारी दी गई, वहीं मोबाइल फोन पर भी एसएमएस द्वारा लोगों को सूचित किया गया। फेसबुक, ऑरकुट व ट्विटर जैसी सोशल साइट्स पर अब लोग राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर भी जमकर बहस करने लगे हैं जिससे आम जन के बीच जागरूकता आई है।
ब्लॉग व वेब पोर्टल तो अपना विचार निष्पक्ष रूप से रखने वालों के लिए वरदान साबित हुए हैं। न्यू मीडिया जगत में तो वेब पोर्टलों की बाढ़ सी आ गई है। ख्याति पाने के लिए अधिकतर लोग अपना निजी वेब पोर्टल बनाते हैं। पोर्टलों और ब्लॉग पर राष्ट्रीय मुद्दों पर परिचर्चा होने लगी है। इसका फायदा यह है कि इसमें सभी लोगों को अपने विचार व्यक्त करने का स्थान मिल जाता है जिसके परिणामस्वरूप वह उस मुद्दे में विशेष रूचि लेने लगते हैं।
यू-ट्यूब पर तो किसी भी मुद्दे से संबंधित वीडियो देखे जा सकते है जिसके कारण इसकी लोकप्रियता तीव्र गति से बढ़ी है। न्यू मीडिया से राजनीतिक हल्कों की नींद भी उड़ गई है। गूगल द्वारा जारी की गई ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार की ओर से गूगल को कई बार प्रधानमंत्री, कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों और अधिकारियों की आलोचना करने वाली रिपोर्ट्स, ब्लॉग और यू-ट्यूब वीडियो हटा देने को कहा गया।
जुलाई 2010 से लेकर दिसंबर 2010 के बीच गूगल के पास इस तरह के 67 आवेदन आए जिनमें से 6 अदालतों की ओर से, बाकी सरकार की ओर से आए। यह आवेदन 282 रिपोर्ट्स को हटाने के थे जिनमें से 199 यू-ट्यूब के वीडियो, 50 सर्च के परिणामों, 30 ब्लॉगर्स की सामग्री हटाने के थे। हालांकि गूगल ने इन्हें नहीं हटाया और केवल 22 प्रतिशत में बदलाव किया।
न्यू मीडिया ने समाज में अलग पहचान बनाई है और इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि इससे युवा पीढ़ी ज्यादा जुड़ रही है। भविष्य में मीडिया के इस नए माध्यम की संभावनाएं और अधिक बढे़गी।

मिशन, प्रोफेशन और कमर्शियलाइजेशन...के बाद ...???






‘‘एक समय आएगा, जब हिंदी पत्र रोटरी पर छपेंगे, संपादकों को ऊंची तनख्वाहें मिलेंगी, सब कुछ होगा किन्तु उनकी आत्मा मर जाएगी, सम्पादक, सम्पादक न होकर मालिक का नौकर होगा।’’

स्वतंत्रता आंदोलन को अपनी कलम के माध्यम से तेज करने वाले बाबूराव विष्णु पराड़कर जी ने यह बात कही थी। उस समय उन्होंने शायद पत्रकारिता के भविष्य को भांप लिया था। पत्रकारिता की शुरूआत मिशन से हुई थी जो आजादी के बाद धीरे-धीरे प्रोफेशन बन गया और अब इसमें कमर्शियलाइजेशन का दौर चल रहा है।
स्वतंत्रता आंदोलन को सफल करने में पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उस समय पत्रकारिता को मिशन के तौर पर लिया जाता था और पत्रकारिता के माध्यम से निःस्वार्थ भाव से सेवा की जाती थी। भारत में पत्रकारिता की नींव रखने वाले अंग्रेज ही थे। भारत में सबसे पहला समाचार पत्र जेम्स अगस्टस हिक्की ने वर्ष 1780 में बंगाल गजटनिकाला। अंग्रेज होते हुए भी उन्होंने अपने पत्र के माध्यम से अंग्रेजी शासन की आलोचना की, जिससे परेशान गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने उन्हें प्रदत्त डाक सेवाएं बंद कर दी और उनके पत्र प्रकाशन के अधिकार समाप्त कर दिए। उन्हें जेल में डाल दिया गया और जुर्माना लगाया गया। जेल में रहकर भी उन्होंने अपने कलम की पैनी धार को कम नहीं किया और वहीं से लिखते रहंे। हिक्की ने अपना उद्देश्य घोषित किया था- अपने मन और आत्मा की स्वतंत्रता के लिए अपने शरीर को बंधन में डालने में मुझे मजा आता है।
हिक्की गजट द्वारा किए गए प्रयास के बाद भारत में कई समाचार पत्र आए जिनमें ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाजें उठने लगी थी। समाचार पत्रों की आवाज दबाने के लिए समय-समय पर प्रेस सेंसरशिप व अधिनियम लगाए गए लेकिन इसके बावजूद भी पत्रकारिता के उद्देश्य में कोई परिवर्तन नहीं आया। भारत में सर्वप्रथम वर्ष 1816 में गंगाधर भट्टाचार्य ने बंगाल गजट का प्रकाशन किया। इसके बाद कई दैनिक, साप्ताहिक व मासिक पत्रों का प्रकाशन प्रारंभ हुआ जिन्होंने ब्रिटिश अत्याचारों की जमकर भर्त्सना की।
राजा राम मोहन राय ने पत्रकारिता द्वारा सामाजिक पुनर्जागरण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। ब्राह्मैनिकल मैगजीनके माध्यम से उन्होंने ईसाई मिशनरियों के साम्प्रदायिक षड्यंत्र का विरोध किया तो संवाद कौमुदीद्वारा उन्होंने महिलाओं की स्थिति में सुधार करने का प्रयास किया। मीरात-उल-अखबारके तेजस्वी होने के कारण इसे अंग्रेज शासकों की कुदृष्टि का शिकार होना पड़ा।
जेम्स बकिंघम ने वर्ष 1818 में कलकत्ता क्रोनिकलका संपादन करते हुए अंग्रेजी शासन की कड़ी आलोचना की, जिससे घबराकर अंग्रेजों ने उन्हें देश निकाला दे दिया। इंग्लैंड जाकर भी उन्होंने आरियेंटल हेराल्डपत्र में भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों को उजागर किया।
हिन्दी भाषा में प्रथम समाचार पत्र लाने का श्रेय पं. जुगल किशोर को जाता है। उन्होंने 1826 में उदन्त मार्तण्डपत्र निकाला और अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों की आलोचना की। उन्हें अंग्रेजों ने प्रलोभन देने की भी कोशिश की लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया और आर्थिक समस्याओं से जूझते हुए भी पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्रवाद की मशाल को और तीव्र किया।
1857 की विद्रोह की खबरें दबाने के लिए गैगिंग एक्टलागू किया। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन के नेता अजीमुल्ला खां ने दिल्ली से पयामे आजादीनिकाला जिसने ब्रिटिश कुशासन की जमकर आलोचना की। ब्रिटिश सरकार ने इस पत्र को बंद करने का भरसक प्रयास किया और इस अखबार की प्रति किसी के पास पाए जाने पर उसे कठोर यातनाएं दी जाती थी। इसके बाद इण्डियन घोष’, ‘द हिन्दू’, ‘पायनियर’, ‘अमृत बाजार पत्रिका’, ‘द ट्रिब्यूनजैसे कई समाचार पत्र सामने आए।
लोकमान्य तिलक ने पत्रकारिता के माध्यम से उग्र राष्ट्रवाद की स्थापना की। उनके समाचार पत्र मराठाऔर केसरीउग्र प्रवृत्ति का जीता जागता उदाहरण है। गांधीजी ने पत्रकारिता के माध्यम से पूरे समाज को एकजुट करने का कार्य किया और स्वाधीनता संग्राम की दिशा सुनिश्चित की। नवभारत’, ‘नवजीवन’, ‘हरिजन’, ‘हरिजन सेवक’, ‘हरिजन बंधु’, ‘यंग इंडियाआदि समाचार पत्र गांधी जी के विचारों के संवाहक थे। गांधी जी राजनीति के अलावा अन्य विषयों पर भी लिखते थे। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों को भी उजागर कर इसे समाप्त करने पर बल दिया। गणेश शंकर विद्यार्थी ने कानपुर से प्रतापनामक पत्र निकाला जो अंग्रेजी सरकार का घोर विरोधी बन गया। अरविंद घोष ने वंदे मातरम‘, ‘युगांतर’, ‘कर्मयोगीऔर धर्मआदि का सम्पादन किया। बाबू राव विष्णु पराड़कर ने वर्ष 1920 में आजका संपादन किया जिसका उद्देश्य आजादी प्राप्त करना था।
आजादी से पहले पत्रकारिता को मिशन माना जाता था और भारत के पत्रकारों ने अपनी कलम की ताकत आजादी प्राप्त करने में लगाई। आजादी मिलने के बाद समाचार पत्रों के स्वरूप में परिवर्तन आना स्वाभाविक था क्योंकि उनका आजादी का उद्देश्य पूरा हो चुका था। समाचार-पत्रों को आजादी मिलने और साक्षरता दर बढ़ने के कारण आजादी के बाद बड़ी संख्या में समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं का प्रकाशन होने लगा। साथ ही रेडिया एवं टेलीविजन के विकास के कारण मीडिया जगत में बड़ा बदलाव देखा गया। स्वतंत्रता से पहले जिस पत्रकारिता को मिशन माना जाता था अब धीरे-धीरे वह प्रोफेशनमें बदल रही थी।
वर्ष 1947 से लेकर वर्ष 1975 तक पत्रकारिता जगत में विकासात्मक पत्रकारिता का दौर रहा। नए उद्योगों के खुलने और तकनीकी विकास के कारण उस समय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में भारत के विकास की खबरें प्रमुखता से छपती थी। समाचार-पत्रों में धीरे-धीरे विज्ञापनों की संख्या बढ़ रही थी व इसे रोजगार का साधन माना जाने लगा था।
वर्ष 1975 में एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर काले बादल छा गए, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर मीडिया पर सेंसरशिप ठोक दी। विपक्ष की ओर से भ्रष्टाचार, कमजोर आर्थिक नीति को लेकर उनके खिलाफ उठ रहे सवालों के कारण इंदिरा गांधी ने प्रेस से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली। लगभग 19 महीनों तक चले आपातकाल के दौरान भारतीय मीडिया शिथिल अवस्था में थी। उस समय दो समाचार पत्रों द इंडियन एक्सप्रेसऔर द स्टेट्समेनने उनके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की तो उनकी वित्तीय सहायता रोक दी गई। इंदिरा गांधी ने भारतीय मीडिया की कमजोर नस को अच्छे से पहचान लिया था। उन्होंने मीडिया को अपने पक्ष में करने के लिए उनको दी जाने वाली वित्तीय सहायता में इजाफा कर दिया और प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी। उस समय कुछ पत्रकार सरकार की चाटुकारिता में स्वयं के मार्ग से भटक गए और कुछ चाहकर भी सरकार के विरूद्ध स्वतंत्र रूप से अपने विचारों को नहीं प्रकट कर सकें। कुछ पत्रकार ऐसे भी थे जो सत्य के मार्ग पर अडिग रहें। आपातकाल के दौरान समाचार पत्रों में सरकारी प्रेस विज्ञप्तियां ही ज्यादा नजर आती थी। कुछ सम्पादकों ने सेंसरशिप के विरोध में सम्पादकीय खाली छोड़ दिया। लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी एक पुस्तक में कहा है- ‘‘उन्होंने हमें झुकने के लिए कहा और हमने रेंगना शुरू कर दिया।’’
1977 में जब चुनाव हुए तो मोरारजी देसाई की सरकार आई और उन्होंने प्रेस पर लगी सेंसरशिप को हटा दिया। इसके बाद समाचार पत्रों ने आपातकाल के दौरान छिपाई गई बातों को छापा। पत्रकारिता द्वारा आजादी के दौरान किया गया संघर्ष बहुत पीछे छूट चुका था और पत्रकारिता अब पेशे में तब्दील हो चुकी थी।
भारत में एक और ऐसी घटना घटी जिसने पत्रकारिता के स्वरूप को एक बार फिर बदल दिया। वर्ष 1991 की उदारीकरण की नीति और वैश्वीकरण के कारण पत्रकारिता पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा और पत्रकारिता में धीरे-धीरे कमर्शियलाइजेशनका दौर आने लगा। आम जनता को सत्य उजागर कर प्रभावित करने वाले मीडिया पर राजनीति व बाजार का प्रभाव पड़ना शुरू हो गया। पत्रकारों की कलम को बाजार ने प्रभावित कर खरीदना शुरू कर दिया। वर्तमान दौर कमर्शिलाइजेशन का ही दौर है, जिसमें मीडिया के लिए समाचारों से ज्यादा विज्ञापन का महत्व है। बाजार में उपलब्ध उत्पादों का प्रचार समाचार बनाकर किया जा रहा है। आज समाचार का पहला पृष्ठ भी बाजार खरीदने लगा है। वहीं पिछले कुछ दिनों में पत्रकारिता में भ्रष्टाचार के जो मामले सामने आए उसको देखकर पत्रकारिता का उद्देश्य धुंधला होता नजर आता है। 2जी स्पेक्ट्रम मामले में जिस तरह कुछ पत्रकारों की भूमिका सामने आई उसको देखकर अब आम जन का विश्वास भी मीडिया से हट रहा है।
आजादी से पहले पत्रकारों ने किसी भी प्रलोभनों में आए बिना निःस्वार्थ भाव से अपना कर्तव्य निभाया था। अंग्रेजों द्वारा प्रेस पर रोक लगाने के बाद भी उन्होंने अपनी कलम को नहीं रोका, लेकिन आज परिस्थितियां बदलती नजर आ रहीं हैं। पत्रकारिता आज सेवा से आगे बढ़कर व्यवसाय में परिवर्तित हो चुकी है। यहां पर एक बार फिर पराड़कर जी के वही शब्द याद आते हैं जिनमें उन्होंने पत्रकारिता के भविष्य को भांप लिया था- ‘‘एक समय आएगा, जब हिंदी पत्र रोटरी पर छपेंगे, संपादकों को ऊंची तनख्वाहें मिलेंगी, सब कुछ होगा किन्तु उनकी आत्मा मर जाएगी, सम्पादक, सम्पादक न होकर मालिक का नौकर होगा।’’

4 comments:

  1. अच्छा विषय उठाया है आपने... पराड़कर जी की पंक्तियों ने पहले ही भविष्य को आंक लिया था कि आज के दौर में कैसे पत्रकार उभरने वाले हैं.. लेकिन मै बस एक चीज कहना चाहूँगा कि पत्रकार आज भी अपने काम को पहले जैसे ही कर रहे हैं.. विषय वास्तु को खोज रहे हैं, उसकी जांच कर रहे हैं, उसके बाद ही ख़बरों को कागजों पर स्थान दे रहे हैं... बस अंतर ये हैं कि एक खबर किसी के लिए फायदेमंद साबित हो रही है तो दूसरे को बिकी हुई नजर आती है...

    इसलिए पत्रकारिता को गलत ठहराना ही गलत है, पत्रकार के लिए मिशन जैसी कोई चीज भला कैसे रहे, आज इतनी जरूरते हैं लोगो की कि वह समाज सुधारक बनेगा तो उसका घर ही समाज के आईने से ओझल हो जाएगा.... ये दुनिया पूंजीवाद के धरातल पर खड़ी है! जहाँ आपको सोचना है कि लोगो को रौशनी पहुंचाए या फिर अपने घर के चूल्हे में आग जलाये....

    आपके शानदार लेख पर आपको बधाई, पढ़ के मजा आया... लगा कि फिर से स्नातक की कक्षा में बैठा हूँ, और पत्रकारिता के सही मूल्यों को सीखने कि कोशिश में लगा हूँ.... पर फिर वर्तमान के बेईमान थपेड़ों ने मेरे पूर्व के मंत्र-मुग्ध आभास को तोड़ दिया... कि पहले खाने कि सोचो समाज बदलने को बहुत समय मिलेगा....!
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  2. एक जमाने की पत्रकारिता चिलचिलाती धूप,कड़कड़ाती ठंड एवं वर्षा-आँधी के बीच पहुँचकर जानकारी एकत्र कर ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ हमारे समक्ष प्रस्तुत करने को कहा जाता था,ऐसा मैंने किताबों में padha है लेकिन आज की पत्रकारिता वातानुकूलित कक्ष, अंतर-जाल, सूचना-तंत्र, ए. सी. वाहनों और द्रुतगामी वायुयान-हेलिकॉप्टरों से परिपूर्ण व्यवस्था ने ले ली है, लेकिन बावज़ूद इसके लगातार पत्रकारिता के मूल्यों का क्षरण चिंता का विषय है.
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  3. रोमांचक फ्लैशबैक में चला गया था पढ़के। क्लाईमैक्स की कमी खल गयी। क्लाईंमेक्स बड़ा निर्लज्ज है....उसके आइने में सिद्धांत और पैसे का फर्क साफ झलकता रहा है। पत्रकारिता के अतीत को वर्तमान ने सरेआम कुचल दिया है। नेहा जी....पत्रकारिता में ईमानदारी की नसबंदी करके ही आते हैँ। जब पेशा से पैशन जुड़ता है तो मायने बदल जाते हैं। प्रोफेशन में सिद्धांत...मूल्य...आदर्श...और इंसानियत नहीं होता। सिर्फ मुनाफा संप्रभु होता है। जिसके बदौलत रूतबा...शोहरत और बुलंदी मिलती है। अब तो पैसा ही सेंसर है। पैसा ही जज्बा और पैसा ही हिम्मत है। यानी सबकुछ पैसा। वक्त बदली...वक्त की तासीर बदली। मालवीय जी की "छाया”...पराड़कर जी की "बातें”...समझकर गर्व महसूस होता है। लेकिन "वक्त के फ्रेम" में ये गर्व अब "बोझ" बन गया है। सम्पादक किसी " ज्ञानदेव" का नाम नहीं अब एक ऐसा पद बन गया है जिसकी अहमियत पैसे के कद से नीचे रहेगी।
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  4. प्रतिक्रया के लिए आप सभी का धन्यवाद... इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज पत्रकारिता में बाजार का प्रभाव स्वाभाविक है. लेकिन भ्रष्टाचार को उजागर करने के माध्यम मीडिया में भी भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत हो रही है. यहाँ पत्रकारिता की बदलती तस्वीर को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है...

‘हरिजन’ का फैसिमाइल संस्करण होगा जारी










बापू के साप्ताहिक ‘हरिजन’ का फैसिमाइल संस्करण होगा जारी




बापू के साप्ताहिक ‘हरिजन’ का फैसिमाइल संस्करण होगा जारी
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (फाइल फोटो)
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जिस साप्ताहिक ‘हरिजन’ की शुरूआत की थी उसका फैसिमाइल संस्करण जारी किया जाएगा.
उस संस्करण में भारत तथा विश्व की सामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं को उठाया जाएगा.

नवजीवन ट्रस्ट के प्रबंध न्यासी विवेक देसाई ने बताया ‘‘बापू के दो मुख्य प्रकाशनों में से एक ‘हरिजन’ है. ‘यंग इंडिया’ का प्रकाशन पहले से ही हो रहा है लेकिन ‘हरिजन’ का प्रकाशन किया जाना है.’’

बापू से जुड़े साहित्य के प्रकाशन के अधिकार नवजीवन ट्रस्ट के पास हैं.

देसाई ने बताया कि ‘हरिजन’ के 19 खंडों को पहली बार फिर से प्रिंट किया जाएगा और इसका आधिकारिक उद्घाटन सोमवार को होगा.

उन्होंने बताया कि ‘हरिजन’ को पुन: प्रिंट कर पुन: प्रकाशित करने का उद्देश्य बापू तथा उस समय आजादी के लिए लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के लेखों और उनके संदेशों का लोगों के बीच प्रचार प्रसार करना है.

देसाई के अनुसार, एक अन्य साप्ताहिक ‘यंग इंडिया’ का पुन:प्रिंट वाला संस्करण करीब 20 साल पहले लाया गया था.

नवजीवन ट्रस्ट की स्थापना बापू ने मोहनलाल मगनलाल भट्ट के साथ की थी और  इसकी ‘डीड ऑफ ट्रस्ट’ का पंजीकरण 26 नवंबर 1929 को हुआ था.

बापू ने साप्ताहिक अखबार ‘हरिजन’ का अंग्रेजी में प्रकाशन 1933 में शुरू किया था और यह प्रकाशन 1948 तक जारी रहा. इस दौर में बापू ने गुजराती में ‘हरिजन बंधु’ का और हिन्दी में ‘हरिजन सेवक’ का प्रकाशन किया. ये तीनों अखबार स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारत तथा वि की सामाजिक आर्थिक समस्याओं पर केंद्रित थे.

हरिजन का मतलब ‘‘ईर का बच्चा’’ होता है और बापू इस शब्द का उपयोग दलित जाति के लोगों के लिए करते थे.

‘यंग इंडिया’ अंग्रेजी साप्ताहिक था जिसका प्रकाशन बापू ने 1919 से 1932 तक किया था. इस जर्नल में लिखे बापू के सूत्र वाक्यों ने कई लोगों को प्रेरणा दी.

अपने अपनी अनोखी विचारधारा तथा संगठित आंदोलनों में अहिंसा के उपयोग के बारे में अपने विचारों को बापू ‘यंग इंडिया’ के जरिये लोगों के सामने रखते थे तथा पाठकों से आग्रह करते थे कि वह भारत को ब्रिटेन से आजाद कराने के बारे में सोचें और योजना बनाए

हरिजन


 



 

 


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हरिजन समाचार-पत्र
हरि का अर्थ है "ईश्वर या भगवान" और जन का अर्थ है "लोग" महात्मा गाँधी ने "हरिजन" शब्द का प्रयोग हिन्दू समाज के उन समुदायों के लिये करना शुरु किया था जो सामाजिक रूप से बहिष्कृत माने जाते थे। इनके साथ ऊँची जाति के लोग छुआछूत का व्यवहार करते थे अर्थात उन्हें अछूत समझा जाता था। सामाजिक पुर्ननिर्माण और इनके साथ भेदभाव समाप्त करने के लिये गाँधी ने उन्हें ये नाम दिया था और बाद में उन्होंने "हरिजन" नाम से एक समाचार-पत्र भी निकाला जिसमें इस सामाजिक बुराई के लिये वे नियमित लेख लिखते थे। लेकिन अब हरिजन शब्द को प्रतिबन्धित कर दिया गया है! हरिजन शब्द के स्थान पर अनुसूचित जाति का स्तेमाल करना अनिवार्य कर दिया गया है !
हरिजन शब्द पाकिस्तान के दलितों के लिये भी प्रयुक्त होता है जिन्हें हरी कहा जाता है और जो मिट्टी के झोपड़े बनाने के लिये जाने जाते हैं।

गांधीजी के प्रकाशन

गांधीजी हरिजन नाम वाले तीन पत्रों का प्रकाशन करते थे।
  • हरिजन बन्धु (गुजराती में)
  • हरिजन सेवक (हिन्दी में)
  • हरिजन (अंग्रेजी में)
इन तीन पत्रों में महात्मा गांधी देश के सामाजिक एवं आर्थिक मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त करते थे।
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वर्तमान मीडिया … झूठ का फैलता व्यापार / श्याम नारायण रंगा





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-श्याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’-
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बात तब की है तब में एक अंतर्राष्ट्रीय न्यूज चैनल के लिए अपने जिले का प्रतिनिधि संवाददाता हुआ करता था। सर्दी के मौसम में मेरे पास उक्त चैनल के राजस्थान हैड का फोन आया और ठंडक पर एक खबर करके भेजने को कहा जबकि उस समय बीकानेर में इतनी ठंड नहीं, थी परंतु हैड साहब ने मुझे यह कहकर समझाया कि मैं चार मफलर लूं और राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाकर किसी ऊॅंटगाड़े वाले को पकडूं और एक मफलर ऊॅंट को पहनाऊ एक गाड़े वाले को पहनाऊ और स्वयं पहनकर कर पीटीसी करूं कि बीकानेर में भयंकर ठंड का मौसम है। मैंने स्पष्ट तौर पर इस तरह की खबर करने से मना कर दिया लेकिन उस समय मेरे समझ में यह बात जरूर आ गई कि मीडिया में जो दिखता है वह होता नहीं है बल्कि वह दिखाया जाता है जो कि बिकता है। ऐसे कईं उदाहरण मेरे पिछले पत्रकारिता के जीवनकाल से जुड़े हैं जिसमें मैंने व्यक्तिगत तौर पर व काफी समीपता से मीडिया में फैले झूठ को देखा समझा और महसूस किया। मैं यहां यह जरूर कहना चाहूंगा कि यह झूठ इलेक्ट्रोनिक मीडिया और वेब मीडिया में प्रिंट मीडिया की अपेक्षा ज्यादा देखा जा रहा है। किसी भी तथ्य को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना और बात का बतंगड़ बनाना वर्तमान में मीडिया की आदत का शुमार हो गया है और मीडियाकर्मी ऐसा करना अपना धर्म मानते हैं। मैंने अपने साथ काम करने वाले एक मीडियाकर्मी से जब यह पूछा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हो तो उसने कहा कि ऐसा करने का मन तो नहीं होता परंतु करें क्या चटपटी व धमाकेदार खबर के बिना चैनल की चर्चा नहीं होती। झूठ के इस व्यापार में मीडिया के मालिकों से लेकर स्थानीय संवाददाताओं तक का हाथ होता है और बड़ी बेखूबी से यह व्यापार फल फूल रहा है। प्रसिद्ध समाचार पत्रों व प्रसिद्ध न्यूज चैनलों की वेबसाइट पर जाकर देखो तो पता चलता है कि न्यूज की हैडिंग इतनी जबरदस्त व मसालेदार लगाई जाती है कि कोई भी पाठक उस पर क्लिक करके उसको पढ़ेगा और पूरी न्यूज पढ़ कर भी उसको न्यूज की हैडिंग से मिलता जूलता कुछ भी न्यूज में नजर नहीं आएगा। इस तरह की झूठे शीर्षक जहां पाठकों को गुमराह करते हैं, वहीं मीडिया की विश्वसनीयता भी समाप्त करते हैं। यहां यह कहने में मुझे बिल्कुल भी हिचक नहीं है कि वर्तमान इलेक्ट्रोनिक न्यूज चैनल पर भरोसा करना पाठक की मुर्खता की निशानी है। 140 करोड़ की आबादी वाले इस देश में जितना झूठ और अस्पष्ट वर्तमान में मीडिया से निकलकर समाज में आ रहा है उतना और कहीं से भी नहीं आ रहा है।
बीच में यह एक फैशन चला था कि कुछ न्यूज भूतों की स्टोरी और भूतों की खबरें दिखाकर अपनी दुकान चलाते थे और उनका अपने लोकल संवाददाताओं पर यह दबाब रहता था कि वे जैसे तैसे करके भूतों की स्टेारी पर अपना सारा ध्यान केन्द्रित करें। इसका परिणाम यह हुआ कि उन दिनों में चैनलों को देखकर यह मालूम पड़ता था कि यह देश भूतों का देश है जहां पर भूतों का राज है। देश के प्रसिद्ध स्मारकों तक में भूत होने की खबरें उन दिनों बाजार में आई। इसी से जुड़ा किस्सा है कि हमारे शहर बीकानेर में भी संवाददाताओं ने भूतों की खबरों को करना शुरू कर दिया। उन दिनों बीकानेर में न्यू कोर्ट कैम्पस तैयार हो रहा था और निर्माण कार्य में एक मजदूर की मौत हो गई थी तो एक चैनल ने यह खबर चलाई थी कि न्यू कोर्ट कैम्पस में भूत है और जो मजदूर मरा है उसकी आत्मा यहां भटक रही है। इसी तरह बीकानेर के प्रसिद्ध तालाब व शिव मंदिर ‘फूलनाथ जी के तालाब’ के कैम्पस में भी भूत होने की खबर एक चैनल ने चलाई जिसका घोर विरोध हुआ और उक्त चैनल के रिपोर्टर को माफी मांगनी पड़ी। उसी दौरान गंगाशहर के बंगले में भूत की खबर चलाई गई। इसी तरह वर्तमान में राजनीति में झूठ की खबरें परवान पर है। देश के किसी भी हिस्से से राजनीतिक जोड़ तोड़ हो रहा है और कोई कुछ कह रहा है। जैसी अनाप शनाप खबरें इस देश में धड़ल्ले से बड़ी निरंकुशता से चल रही है।
लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ अगर इतना मदमस्त होकर निरंकुश हाथी की तरह विचरण करेगा तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अच्छा नहीं होगा। आज लोग मीडिया पर विश्वास रखते हैं और आम आदमी यह सोचता है कि उसने जो टीवी में देखा है या इंटरनेट पर पढ़ा है वह सच है लेकिन झूठी खबरों को अपने नीजी स्वार्थ के लिए खुलेआम फैलाकर वर्तमान मीडिया अपने सामाजिक सरोकारों से पीछे हट रहा है और इस देश में अराजकता का माहौल पैदा कर रहा है। मीडिया की यह गैर जिम्मेदारी देश की आने वाली पीढ़ी कोे गुमराह कर कर रही है, क्योंकि वर्तमान पीढ़ी के पास ज्ञानार्जन का तरीका ही इलेक्ट्रोनिक चैनल व इंटरनेट रह गया है।ऐसी स्थिति में देश का युवा जो देखता व पढ़ता है उसे ही सच मानता है। तो क्या यह मीडिया की जिम्मेदारी नहीं है कि भारत देश के युवाओं में झूठ की नींव न डालें और देश के भविष्य की ईमारत को कमजोर न करें। अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए और अंधे होकर आर्थिक लाभ कमाने की लालसा के लिए बड़े-बड़े धनकुबेर मीडिया के मालिक बन गए हैं और उनके लिए पत्रकारिता मिशन न होकर व्यापार रह गया है। एक व्यापारी की तरह जैसे तैसे करके लाभ कमाने की लालसा ने मीडिया को झूठ और वो भी चटपटा झूठ बोलने के लिए प्रेरित किया है।
क्या यह सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है कि वे इस तरह के फैल रहे झूठ पर अंकुश लगाए। भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 {1} {क} में दी गई वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह कभी मतलब नहीं है कि आप जो मन में आए वो बोलो बल्कि उसके मायने यह है कि आप जो भी बोलो वो जिम्मेदारी से बोलो । सरकारों को इस आजादी पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने का अधिकारी भी संविधान ने दिया है तो ऐसी स्थिति में लोकतांत्रिक व्यवस्था में तंत्र से उम्मीद की जाती है वे लोक में मीडिया के जरिये फैल रहे झूठ को रोकें और इस देश के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दें।

गणेश शंकर विद्यार्थी: एक क्रांतिकारी पत्रकार / अंकुर विजयवर्गीय



vidyarthi 

अपनी बेबाकी और अलग अंदाज से दूसरों के मुंह पर ताला लगाना एक बेहद मुश्किल काम होता है। कलम की ताकत हमेशा से ही तलवार से अधिक रही है और ऐसे कई पत्रकार हैं, जिन्होंने अपनी कलम से सत्ता तक की राह बदल दी। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जिन पत्रकारों ने अपनी लेखनी को हथियार बनाकर आजादी की जंग लड़ी थी, उनमें गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम अग्रणी है। आजादी की क्रांतिकारी धारा के इस पैरोकार ने अपने धारदार लेखन से तत्कालीन ब्रिटिश सत्ता को बेनकाब किया और इस जुर्म के लिए उन्हें जेल तक जाना पड़ा। सांप्रदायिक दंगों की भेंट चढ़ने वाले वह संभवत: पहले पत्रकार थे।
विद्यार्थी जी का जन्म 26 अक्टूबर, 1890 को उनके ननिहाल प्रयाग (इलाहाबाद) में हुआ था। इनके पिता का नाम जयनारायण था। पिता एक स्कूल में अध्यापक थे और उर्दू व फारसी के जानकार थे। विद्यार्थी जी की शिक्षा-दीक्षा मुंगावली (ग्वालियर) में हुई। पिता के समान ही इन्होंने भी उर्दू-फारसी का अध्ययन किया।
आर्थिक कठिनाइयों के कारण वह एंट्रेंस तक ही पढ़ सके, लेकिन उनका स्वतंत्र अध्ययन जारी रहा। विद्यार्थी जी ने शिक्षा ग्रहण करने के बाद नौकरी शुरू की, लेकिन अंग्रेज अधिकारियों से नहीं पटने के कारण उन्होंने नौकरी छोड़ दी। पहली नौकरी छोड़ने के बाद विद्यार्थी जी ने कानपुर में करेंसी ऑफिस में नौकरी की, लेकिन यहां भी अंग्रेज अधिकारियों से उनकी नहीं पटी। इस नौकरी को छोड़ने के बाद वह अध्यापक हो गए।
महावीर प्रसाद द्विवेदी उनकी योग्यता के कायल थे। उन्होंने विद्यार्थी जी को अपने पास ‘सरस्वती’ में बुला लिया। उनकी रुचि राजनीति की ओर पहले से ही थी। एक ही वर्ष के बाद वह ‘अभ्युदय’ नामक पत्र में चले गए और फिर कुछ दिनों तक वहीं पर रहे। उन्होंने कुछ दिनों तक ‘प्रभा’ का भी संपादन किया। अक्टूबर 1913 में वह ‘प्रताप’ (साप्ताहिक) के संपादक हुए। उन्होंने अपने पत्र में किसानों की आवाज बुलंद की।
पत्रकारिता के क्षेत्र में क्रांतिकारी कार्य करने के कारण उन्हें पांच बार सश्रम कारागार और अर्थदंड अंग्रेजी शासन ने दिया। विद्यार्थी जी के जेल जाने पर ‘प्रताप’ का संपादन माखनलाल चतुर्वेदी व बालकृष्ण शर्मा नवीन करते थे। उनके समय में श्यामलाल गुप्त पार्षद ने राष्ट्र को एक ऐसा बलिदानी गीत दिया, जो देश के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक छा गया। यह गीत ‘झण्डा ऊंचा रहे हमारा’ है। इस गीत की रचना के प्रेरक थे अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी।
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं पर विद्यार्थी जी के विचार बड़े ही निर्भीक होते थे। विद्यार्थी जी ने देशी रियासतों द्वारा प्रजा पर किए गए अत्याचारों का तीव्र विरोध किया। पत्रकारिता के साथ-साथ गणेश शंकर विद्यार्थी की साहित्य में भी अभिरुचि थी। उनकी रचनाएं ‘सरस्वती’, ‘कर्मयोगी’, ‘स्वराज्य’, ‘हितवार्ता’ में छपती रहीं। ‘शेखचिल्ली की कहानियां’ उन्हीं की देन है। उनके संपादन में ‘प्रताप’ भारत की आजादी की लड़ाई का मुखपत्र साबित हुआ। सरदार भगत सिंह को ‘प्रताप’ से विद्यार्थी जी ने ही जोड़ा था। विद्यार्थी जी ने राम प्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा ‘प्रताप’ में छापी, क्रांतिकारियों के विचार व लेख ‘प्रताप’ में निरंतर छपते रहते थे।
महात्मा गांधी ने उन दिनों अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसात्मक आंदोलन की शुरुआत की थी, जिससे विद्यार्थी जी सहमत नहीं थे, क्योंकि वह स्वभाव से उग्रवादी विचारों के समर्थक थे। विद्यार्थी जी के ‘प्रताप’ में लिखे अग्रलेखों के कारण अंग्रेजों ने उन्हें जेल भेजा, जुर्माना लगाया और 22 अगस्त 1918 में ‘प्रताप’ में प्रकाशित नानक सिंह की ‘सौदा ए वतन’ नामक कविता से नाराज अंग्रेजों ने विद्यार्थी जी पर राजद्रोह का आरोप लगाया व ‘प्रताप’ का प्रकाशन बंद करवा दिया।
आर्थिक संकट से जूझते विद्यार्थी जी ने किसी तरह व्यवस्था जुटाई तो 8 जुलाई 1918 को फिर इसकी की शुरुआत हो गई। ‘प्रताप’ के इस अंक में विद्यार्थी जी ने सरकार की दमनपूर्ण नीति की ऐसी जोरदार खिलाफत कर दी कि आम जनता ‘प्रताप’ को आर्थिक सहयोग देने के लिए मुक्त हस्त से दान करने लगी।
जनता के सहयोग से आर्थिक संकट हल हो जाने पर साप्ताहिक ‘प्रताप’ का प्रकाशन 23 नवंबर 1990 से दैनिक समाचार पत्र के रूप में किया जाने लगा। लगातार अंग्रेजों के विरोध में लिखने से इसकी पहचान सरकार विरोधी बन गई और तत्कालीन दंडाधिकारी स्ट्राइफ ने अपने हुक्मनामे में ‘प्रताप’ को ‘बदनाम पत्र’ की संज्ञा देकर जमानत की राशि जप्त कर ली।
कानपुर के हिंदू-मुस्लिम दंगे में निस्सहायों को बचाते हुए 25 मार्च 1931 को विद्यार्थी जी भी शहीद हो गए। उनका पार्थिव शरीर अस्पताल में पड़े शवों के बीच मिला था। गणेश शंकर जी की मृत्यु देश के लिए एक बहुत बड़ा झटका थी। गणेश शंकर विद्यार्थी एक ऐसे साहित्यकार रहे हैं, जिन्होंने देश में अपनी कलम से सुधार की क्रांति उत्पन्न की।

मेरठ का प्रकाशन उद्योग



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आरम्भ


सूर्य देव अपने रथ पर सवार, ज्वाला प्रकाश प्रेस, 1884
मेरठ के प्रकाशन उद्योग की यात्रा का आधुनि‍क मेरठ शहर के वि‍कास से गहरा नाता रहा है। लगभग दो सौ साल पहले 1806 में ब्रि‍तानि‍यों ने मेरठ में कैंट की स्‍थापना की। इसी समय को आधुनि‍क मेरठ शहर के सफरनामे की शुरुआत का भी माना जा सकता है। मेरठ में कैंट की स्‍थापना के आसपास ही मेरठ में प्रकाशन उद्योग की नींव पड़ी। मेरठ में पहला [छापाखाना]] कब स्‍थापि‍त हुआ, इसका फि‍लहाल कोई साक्ष्‍य नहीं मि‍ला है। हो सकता है आगे शोध के दौरान इसके बारे में कुछ मालूम हो सके।

1849 में समाचार पत्रों और मुद्रणालयों से संबंधि‍त एक रि‍पोर्ट प्रकाशि‍त हुई। यह रि‍पोर्ट वर्तमान उत्‍तर प्रदेश (तत्‍कालीन दक्षि‍णी उत्‍तरी भागों) की थी। इस रि‍पोर्ट के मुताबि‍क उस समय तक उत्‍तर प्रदेश (तत्‍कालीन दक्षि‍णी उत्‍तरी भागों) में 23 मुद्रणालय थे। इनमें पुस्‍तक मुद्रण के अति‍रि‍क्‍त 29 समाचार पत्र और पत्रि‍काएं छपते थे।

1850 तक तत्‍कालीन दक्षि‍णी उत्‍तरी भागों (इसमें लखनउ शामि‍ल नहीं है) में कुल 24 मुद्रणालय थे। इनमें आगरा में सात, बनारस चार, दि‍ल्‍ली में दो, मेरठ में दो, लाहौर में दो और बरेली, कानपुर, इंदौर व शि‍मला में एक-एक छापेखाने थे। मेरठ के प्रकाशन उद्योग के वि‍कास में हि‍न्‍दी और उर्दू दोनों सगी बहनों का बराबर का योगदान था। लेकि‍न शुरुआती सालों में मेरठ उर्दू प्रकाशन के ही जाना जाता था। मेरठ के छापेखानों में आज से सवा सौ साल पहले तक अधि‍कांश प्रकाशन उर्दू में ही होते थे। 1850 के आसपास मेरठ से एक समाचार पत्र जाम ए जम्‍शैदनि‍कलता था। हालांकि‍ यह अखबार कि‍स छापेखाने में छपता था और पत्र की सामग्री के वि‍षय में कुछ भी मालूम नहीं है।

मेरठ के ऐति‍हासि‍क कस्‍बे सरधना की बेगम समरु, जि‍न्होंने ईसाई धर्म स्‍वीकार कर लि‍या था, का भी प्रकाशन उद्योग के वि‍कास में सराहनीय योगदान है। बेगम समरु के ईसाई धर्म स्‍वीकार करने से सरधना रोमन कैथोलि‍क मि‍शनरि‍यों का केन्‍द्र बन गया। यहां ईसाई मि‍शनरि‍यों ने 1848 के आसपास एक मुद्रणालय खोला। इसका उद्देश्‍य धर्म प्रचार में योगदान करना था। इसमें 1850 से पहले उनकी धार्मि‍क पुस्‍तकें प्रकाशि‍त होती थीं इसके अलावा ईसाई पादरि‍यों के व्‍याख्‍यान और वार्तालाप फारसी और देवनागरी में छापे जाते थे।

1857 के गदर से पहले देश के कई हि‍स्‍सों में जनमानस में ब्रि‍तानि‍यों के खि‍लाफ माहौल बन रहा था। मेरठ से प्रकाशि‍त होने वाली पुस्‍तकों, समाचार पत्रों, पंपलेटों आदि‍ ने यहां इस भूमि‍का को बखूबी नि‍भाया। 1857 में जमीलुद्दीन हि‍ज्र साहब मेरठ से अपना एक पत्र नि‍कालते थे। वह दि‍ल्‍ली के सादि‍क उल अखबार का भी संपादन करते थे। उनका यह अखबार शाही महल भी जाया करता था। 1857 के गदर के बाद जब मुगि‍लया सल्‍तनत के अंति‍म बादशाह बहादुरशहर जफर के खि‍लाफ ब्रि‍तानि‍यों ने मुकदमा चलाया, उसमें इस अखबार का जि‍क्र बार बार आया है। इसके चलते हि‍ज्र साहब को गि‍रफ्तार कि‍या गया। उनके खि‍लाफ भी मुकदमा चला और उन्हें तीन साल की सजा मि‍ली।

१९वीं सदी का अन्तिम काल : हिन्दी और देवनागरी में प्रकाशन में गति

उन्‍नीसवीं सती के अंति‍म दशकों से पहले खड़ी बोली के गढ़ मेरठ के प्रकाशन उद्योग में हि‍न्‍दी का प्रकाशन अपेक्षाकृत कम होता था। लेकि‍न सदी के अंति‍म दशकों में इसमें बदलाव हुआ। इसमें दयानन्द सरस्‍वती के आर्य समाज और मेरठ के ही स्‍थानीय नि‍वासी पंडि‍त गौरीदत्‍त शर्मा का भारी योगदान था। स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती के भाषणों से प्रभावि‍त होकर खुद को देवनागरी के प्रचार के लि‍ए समर्पि‍त कर देने वाले पंडि‍त गौरीदत्‍त शर्मा ने 1887 में एक मासि‍क पत्र 'देवनागरी गजट' और 1892 में देवनागरी प्रचारक ' नि‍काला। 1894 में नागरी प्रचारि‍णी सभा का गठन कर मासि‍क पत्र देवनागर का प्रकाशन कि‍या। ये सभी पत्र यही के छापेखानों में प्रकाशि‍त होते थे। इसके अलावा पंडि‍त जी ने एक उपन्‍यास देवरानी जेठानी की कहानी' भी लि‍खा था। पहली बार 1870 में इसका प्रकाशन मेरठ के जि‍याई छापेखाने में लीथो पद्धति से हुआ। इसकी प्रति‍ आज भी कलकत्‍ता के नेशनल लाइब्रेरी में सुरक्षि‍त है। हि‍न्‍दी के मशहूर साहि‍त्‍यकार आचार्य क्षेमचंद्र सुमन ने इसे खड़ी बोली हि‍न्‍दी का पहला उपन्‍यास कहा है। पंडि‍त जी ने अपने पत्रों के जरि‍ए देवनागरी को बढ़ावा देने के लि‍ए देवनागरी गजट में भजन और आरती प्रकाशि‍त कि‍ए। उनके भजन महि‍लाओं में काफी लोकप्रि‍य थे। पंडि‍त जी देवनागरी के प्रचार को लेकर इतने समर्पित थे कि‍ वे परस्‍पर अभि‍वादन में भी जय नागरी का प्रयोग करते थे।

आचार्य क्षेमचंद्र सुमन के मुताबि‍क हि‍न्‍दी का दूसरा उपन्‍यास वामा शि‍क्षकमुंशी कल्‍याणराय ने मुंशी ईश्‍वरी प्रसाद के साथ मि‍लकर 1872 में लि‍खा था। यह लगभग 11 साल बाद 1883 में मेरठ के वि‍द्या दर्पण छापेखाने में मुद्रि‍त हुआ था। इन साहि‍त्‍यकारों के प्रयास से खड़ी बोली के गढ़ जनपद मेरठ में उन्‍नीसवीं सदी के अंत में हि‍न्‍दी प्रकाशन भी बहुतायत में होने लगे।

शुरुआती दौर में मेरठ के पुरानी तहसील के आसपास ही अधिकांश प्रकाशक थे। इसके अलावा वर्तमान सुभाष बाजार ( सिपट बाजार ) भी प्रकाशन केन्‍द्र था।
मेरठ के प्रकाशन उद्योग में स्‍वामी तुलसीराम स्‍वामी का भारी योगदान था। उन्‍होंने 1885 में मेरठ में स्‍वामी प्रेस की स्‍थापना की। शुरुआती दौर में यहां लीथो पद्ध्‍ति से छपाई होती थी। तुलसीराम जी आर्यसमाज के अध्‍यक्ष थे। उन्‍होंने बुढ़ाना गेट आर्यसमाज की स्‍थापना भी की थी। साम्‍यवेद का भाष्‍य उनका बड़ा प्रमा‍णिक ग्रंथ माना जाता है। इसके अलावा भी उन्‍होंने कई पुस्‍तकें लिखीं और प्रकाशित कीं। ये सारी पुस्‍तकें स्‍वामी प्रेस से ही प्रकाशित हुई थीं। उस समय स्‍वामी प्रेस मतदाता सूचियों के प्रकाशन में काफी नाम रखता था। यहां लखनउ तक की मतदाता सूचियां प्रकाशित होती थीं। उनके पौत्र उमा शंकर शर्मा ने बताया कि उनके दादाजी के समय स्‍वामी प्रेस अपने समय की बहुत बड़ी प्रेस हुआ करती थी। उस समय उनके यहां करीब 200 कर्मी काम किया करते थे। अपनी पुस्‍तकों और मतदान सूचियों के अलावा भी स्‍वामी प्रेस में कई प्रकाशन समूहों की पुस्‍तकें और अन्‍य साम‍ग्रियां प्रकाशित होती थीं। तुलसीराम जी ने वैदिक धर्म के प्रचार के लिए वेद प्रकाश नामक मासिक पत्र भी निकाला। तुलसीराम का 42 साल की अवस्‍था में ही निधन हो गया। अब तो बस इस प्रेस की यादें ही कुछेक मेरठवासियों के जेहन में हैं।
आर्यसमाज के ही एक अन्‍य प्रतिष्ठित विद्वान घासीराम एमए एलएलबी ने भी मेरठ के प्रकाशन उद्योग के विकास में काफी योगदान दिया। उन्‍होंने कई पुस्‍तकें लिखी। इसके अलावा अंग्रेजी भाषा की कुछेक पुस्‍तकों का हिन्‍दी अनुवाद भी किया।

वर्तमान समय में

मौजूदा समय में मेरठ का प्रकाशन उद्योग पूरी तरह से शैक्षिक प्रकाशनों का केन्‍द्र बन गया है। हालांकि 20वीं शताब्‍दी में ही मेरठ में इस तरह की पुस्‍तकों के प्रकाशन की शुरुआत हुई लेकिन 19वीं शताब्‍दी के अंतिम चरण में विषय संबंधी ज्ञान देने वाले कई पत्र प‍त्रिकाएं प्रकाशित हुईं। सर विलियम म्‍योर ( भूतपूर्व लैफिटनेंट गर्वनर उप्र) के संरक्षण में साप्‍ताहिक उर्दू पत्र का प्रकाशन मेरठ से होता था। यह सुल्‍तान उल मुद्रणालय में छपता था। इस पत्र में प्रकाशित सामग्री विद्यार्थियों के उपयोग की थी।
लगभग दौ सौ साल पहले शुरू मेरठ का प्रकाशन उद्योग अब प्रमुखतया शैक्षिक पुस्‍तकों के प्रकाशन तक केन्द्रित होकर रह गया है। आजादी के पहले तक मेरठ शैक्षिक पुस्‍तकों के विक्रय का प्रमुख केन्‍द्र था। उस समय मेरठ में कई बड़े पुस्‍तक विक्रेता थे, जिनका मुख्‍य व्‍यवसाय पुस्‍तक विक्रय था। साथ ही ये कुछ पुस्‍तकें भी प्रकाशित करते थे। इनमें रामनाथ केदारनाथ, जयप्रकाश नाथ एंड कंपनी, खैराती लाल, रस्‍तोगी एंड कंपनी, राजहंस प्रकाशन आदि प्रमुख थे। उस समय शैक्षिक पुस्‍तकों का प्रकाशन प्रमुख रूप से सरकारी प्रकाशन हाउस ही करते थे। उत्‍तर भारत के कई शहरों में मेरठ से ही पाठय पुस्‍तकें जाती थीं। आजादी के बाद स्थिति में बदलाव हुआ। मेरठ कालेज के एमए अर्थशास्‍त्र के छात्र राजेन्‍द्र अग्रवाल की पहल से मेरठ के प्रकाशन उद्योग के स्‍वरूप में बदलाव हुआ। राजेन्‍द्र अग्रवाल ने सर्वप्रथम मेरठ कालेज के हास्‍टल मदन मोहन से 1950 में भारत भारती के नाम से प्रकाशन व्‍यवसाय शुरू किया। बाद में कालेज प्रशासन की आपत्ति के बाद कचहरी रोड पर किराए पर आफिस लिया। उस दौर में मेरठ में पुस्‍तक विक्रय और प्रकाशन के सभी केन्‍द्र सुभाष बाजार में ही थे। सुभाष बाजार से बाहर उस समय प्रकाशन हाउस खोलने की बात भी नहीं सोची जा सकती थी। शुरू में तब के कई प्रकाशकों ने राजेन्‍द्र अग्रवाल को समझाने का प्रयास किया। लेकिन बाद में धीरे-धीरे कमोबेश सभी बड़े प्रकाशक कचहरी रोड पर ही आ गए। अब तो कचहरी रोड को प्रकाशन मार्ग भी कहा जाता है। इस समय कचहरी रोड पर चित्रा प्रकाशन, नगीन प्रकाशन, प्रगति प्रकाशन, जीआर बाटला एंड संस, भारत भारती प्रकाशन आदि मेरठ के बड़े प्रकाशनों के आफिस बने हैं। आज मेरठ में शैक्षिक प्रकाशनों के कई बड़े नाम हैं। मात्र दस साल पहले शुरू अरिहंत प्रकाशन प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रकाशन में पूरे देश में अग्रणी है। अभी हालात यह हैं कि शायद ही पूरे देश में कोई ऐसी दुकान होगी जहां मेरठ से प्रकाशित पुस्‍तकें न हों। मेरठ को प्रकाशनों का शहर भी कहा जा सकता है। मेरठ के प्रकाशनों की कोई आधिकारिक गिनती तो नहीं की गई है लेकिन मेरठ के प्रकाशन उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि मेरठ में छोटे बड़े तकरीबन 75 प्रकाशन हैं। उद्योग से जुड़े लोग इसका सालाना टर्नओवर तकरीबन दो सौ करोड़ मानते हैं। इस व्‍यवसाय में प्रत्‍यक्ष एवं अप्रत्‍यक्ष रूप से तकरीबन एक लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है। व्‍यवसाय को इस स्थिति में पहुंचाने के लिए मेरठ के प्रकाशकों ने जी तोड़ मेहनत की है।

खोजी पत्रकारिता पर एक नजरिया






-सुग्रोवर||

दूर के ढोल सुहावने होने ‘की कहावत खोजी पत्रकारिता पर सोलहों आने लागू होती है. यदि आप सत्ताधीशों से मेलजोल रखना चाहते हैं, “पेज थ्री” पार्टियों में आमंत्रित होना चाहते हैं, तबादलों, नियुक्तियों, सरकारी ठेकों और लाइजनिंग के ज़रिये अथाह धन अर्जित करना चाहते हैं, सरकारी सम्मान पाना चाहते हैं तो मुआफ करें, आपका जन्म खोजी पत्रकारिता के लिए नहीं हुआ है. यह तो ऐसा कार्य है जिसके हो जाने के बाद आपको कोई धन्यवाद भी नहीं देगा. हाँ, यदि आपके पास पुख्ता जानकारियां नहीं हैं तो आप मानहानि के मुकद्दमें में भी फंस सकते हैं. यही नहीं जान पर भी बन सकती है, आपके खिलाफ पुलिस में झूठे मामले भी बनाये जा सकते हैं या फिर दबंगई का भी शिकार होना पड़ सकता है, यहाँ तक कि ताकतवर जमातें आपके विरोध में लामबंद हो सकती है.investigative journalism
खोजी पत्रकारिता आपको अपने लिखे से मानसिक संतुष्टि तो देती है साथ ही साथ आपको शक्तिशाली लोगों और समूहों की नाराज़गी का पात्र भी बना देती है. धमकियाँ भी मिलती हैं, परोक्ष-अपरोक्ष हमले भी होते हैं. इसका मतलब यह भी नहीं कि इस नाराज़गी के भय से खोजी पत्रकारिता से परे रहा जाये. हाँ, किसी भी मामले की पड़ताल करते समय कई सावधानियां बरतने की जरूरत होती है. खास तौर पर यह भी देखा जाना चाहिए कि मामला जनहित का हो. कहीं ऐसा तो नहीं कि आपके सूत्र आपका इस्तेमाल कर रहे हों. क्योंकि एक पक्ष का नुकसान होने पर किसी दूसरे पक्ष को फायदा भी पहुंचता है. यदि वह फायदा जायज़ है तो कोई दिक्कत नहीं मगर नाजायज़ है तो आप सांपनाथ को होने वाला फायदा नागनाथ को दिलवा कर समाज का कोई भला नहीं करते. बस थोड़ी सी सनसनी भर फैला कर एक का रायता बिखेर देते हैं और दूसरे को थाली परोस देते हैं.
हर खोज़ी पत्रकार को दुष्यंत कुमार की यह पंक्तियाँ सदा अपने ज़ेहन में रखनी चाहिए कि
“सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.”

यह तभी हो सकता है कि खोजी पत्रकार स्वयं की नज़रों में खुद को नैतिक रूप से मज़बूत पाता हो, यहीं से आत्मविश्वास पनपता है. आपमें तथ्यों का पोस्टमार्टम करने की उत्सुकता का होना खोजी पत्रकारिता का सबसे जरूरी तत्व है. उत्सुकता आपको मामले की तह तक पहुँचाने में महती भूमिका निभाती है.
चूँकि खोजी पत्रकारिता के साथ कई तरह के खतरे जुड़े होते हैं और कानूनी तौर पर भी अपने आपको मज़बूत बनाये रखने के लिए आपको हर छोटे से छोटे तथ्य की तह तक जाकर बारीकी से पड़ताल करनी होती है ताकि रिपोर्ट में किसी तरह की गलती न रहे, कोई भी लूप होल रह जाने पर काफी मेहनत से तैयार की गई रिपोर्ट अविश्वसनीय ठहराई सकती है और आपकी रिपोर्ट का निशाना बन रहे ताकतवर लोग आपको झूठा साबित कर सकते हैं.
कई बार हम अपने अनुसन्धान या पड़ताल के दौरान खुद को एक गहरी और अँधेरी गुफा में पाते हैं जहाँ से आगे बढ़ने का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता. आगे बढ़ने का कोई सूत्र नहीं. ऐसे में हार नहीं मान लेनी चाहिए. अपनी रिसर्च एक बार फिर नए सिरे से शुरू करनी चाहिए और उन सारे कोणों से मामले को देखा जाना चाहिए जो पिछली बार अनदेखे रह गए.
कई बार हमें अपनी पड़ताल के दौरान कुछ अन्य लोगों की सहायता लेनी पड़ती है मगर रिपोर्ट की गोपनीयता को बनाये रखना भी बहुत जरूरी है. गोपनीयता के प्रति हमेशा सावचेत रहें मगर यह भी ध्यान रहे कि आपकी इस पड़ताल की सहायता करने वाली टीम को आपका आशय अच्छी तरह समझ में आये ताकि आपको बिलकुल सही सूचना मिल सके.
किसी भी खोजी रिपोर्ट पर काम करने से पहले उस विषय में अच्छी तरह से जानकारी हासिल कर लेनी चाहिए ताकि किसी से सवाल करते समय उसके जवाबों में उलझे बिना सत्य की तह तक पहुच सकें. यह जानकारी इन्टरनेट के जरिये भी आसानी से हासिल की जा सकती है तो किताबों से भी या फिर किसी विषय विशेषज्ञ से भी दक्षता हासिल की जा सकती है.
आपके जितने ज्यादा विश्वसनीय सम्पर्क होंगे आपकी रिपोर्ट उतनी ही बेहतर बनेगी, जोकि कई अलग अलग जगहों से जांची हुई होगी.
एक अच्छा खोजी पत्रकार वही होता है जो अपने विषय से सम्बंधित पक्ष की सुरक्षा का पूरा ध्यान रख सके, अपने सम्पर्क सूत्रों की गोपनीयता बरक़रार रख सके. साथ ही खुद को भी नैतिकता के दायरे में बाँध कर रख सके. न कि किसी लालच के वशीभूत हो.
किसी भी विषय पर पड़ताल करने से पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि जिस विषय को आप उठाने जा रहे हैं वह जनहित से जुड़ा हो ना कि किसी संस्था, राजनैतिक दल, कॉर्पोरेट या व्यक्ति विशेष के हित से.
दस्तावेजी सबूतों के रूप में हमेशा फोटो कॉपी मिलती है, असल दस्तावेज देखने को नहीं मिलते. अब फोटो कॉपी मेन्युप्लेट नहीं हुई, इसकी क्या गारंटी? बेहतर होगा इन सबूतों के अलावा भी सबूत जमा करें. यह लोगों के मौखिक बयान भी हो सकते हैं. ऐसे किसी भी बयान की विडियो रिकॉर्डिंग जरूर करें, वह भी बयान देने वाले की जानकारी में लाकर. वीडियो रिकॉर्ड ना कर सकें तो ऑडियो रिकॉर्डिंग जरूर करें. बिना रिकॉर्डिंग बयान बदल भी सकते हैं. रिकॉर्डिंग करते समय बयान देने वाले को बता दें कि आप अपनी सहूलियत के लिए इस बातचीत को रिकॉर्ड कर रहे हैं ताकि वक्त जरूरत काम आ सके. इसी सूरत में आपकी रिकॉर्डिंग कानूनी तौर पर वैध होगी. निजता के अधिकार का सम्मान करें. रिकॉर्डिंग के लिए अच्छी गुणवत्ता के मोबाइल फोन का भी इस्तेमाल किया जा सकता है पर उच्च गुणवत्ता की रिकॉर्डिंग महंगे फोन से ही हो सकती है.
सबूत जमा करने की प्रक्रिया में जब एक से अधिक व्यक्तियों के बयान लिए जाएँ तो जाँच लें कि बयान विरोधाभासी ना हों. विरोधाभासी बयान रिपोर्ट की सत्यता पर सवालिया निशान लगा देंगें.
आरोपों की पुष्टि के लिए विभिन्न स्रोत्रों का इस्तेमाल करें. कभी भी एक सूत्र के हवाले से रिपोर्ट तैयार ना करें. यदि आपने एक सूत्र पर विश्वास कर रिपोर्ट बना दी तो वह खोजी रिपोर्ट नहीं गॉसिप होगी.
अपनी रिपोर्ट में कभी भी अजीबो गरीब शब्दों का प्रयोग न करें. “कुछ समय बाद” और “एक बड़ी राशि” या “किसी इलाके में” जैसे जुमलों के साथ पूरे किये गए वाक्य रिपोर्ट को अधकचरी जानकारी का तमगा दिलवा देंगें. तथ्यों को पुख्ता करने वाले तथ्य एक के बाद एक सामने रखते जाएँ.
रिपोर्ट लिखते समय अपने शब्दों को अपने नियंत्रण में रखें. आरोपी के लिए कभी अपनी रिपोर्ट में “अपराधी” या अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल न करें. निष्कर्ष निकालने का काम पाठकों या दर्शकों पर छोड़ दें. यदि आपकी रिपोर्ट में दम है तो बाकि का काम आपके पाठक और दर्शक कर देंगें.
आरोपी से उसका पक्ष जानना बहुत जरूरी है. यदि आरोपी अपना पक्ष ना रखना चाहे तो आप किसी भी तरह उसका पक्ष जानें और अपनी रिपोर्ट में शामिल करें.
रिपोर्ट सार्वजनिक करने से पहले एक बार फिर से अपनी रिपोर्ट गौर से पढ़ें और देखें कि आपकी रिपोर्ट में कहीं पर भी ऐसा संकेत ना हो जिससे आपके सूत्रों का पता चलता हो, आपके सूत्रों की पहचान उजागर हो सकती हो. क्योंकि आरोपी सबसे पहले यही सोचेगा कि इस पत्रकार को यह बात कौन कौन बता सकता है. यदि ऐसा है तो उसे तुरंत दुरुस्त करें.
जब तक आपके पास आरोप प्रमाणित करने वाले पक्के सबूत न हों कभी भी रिपोर्ट न लिखें. अपनी रिपोर्ट प्रसारित या प्रकाशित करने से पहले इसे अपने विश्वस्त वकील को दिखवा लेने से आप कानूनी पचड़ों से बच सकते हैं.
यदि आपको लगता है कि आरोप तो सही हैं मगर सबूत नहीं हैं तब स्टिंग ऑपरेशन का सहारा लिया जा सकता है. स्टिंग ऑपरेशन करते समय आपको अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ेगी.
 यह आलेख पिंकसिटी प्रेस क्लब के मुखपत्र पाती में भी प्रकशित हो चुका है
(सुग्रोवर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा. उसी दौरान राजस्थान में अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय)

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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Journalism as a craft, a profession



School of DistanceEducation History ofJournalism
5
Unit-I
INTRODUCTION
ORIGIN OF JOURNALISM
Journalism as a craft, a profession and even
as a trade or business, is over two centuries old.It
was made possible bycoming together of a number
of technologies as well as several social
andpolitical and economic developments.Themain tec
hnologies that facilitated thedevelopment of
large-scale printing anddistribution of print material were theprinting press and the railways.
As a craft Journalism involvessp
ecialisation in one area (editorial, design, printing); for the
reporters and thesub-editors for instance, it entails writing toa deadline, following routines in
aconveyor-belt like workplace, whilerespecting the division of labour in thenewsroom and the
printing press. In earlier times, knowledge of ty
pe writing and shorthand were the main skills
demanded; today computing and DTP skills are in demand for all areas of Journalism.Also the
divisions among thedifferent areas have become blurred.
Difference between Journalism and Other Professions
As a profession it is markedly differentfrom ot
her established professions likelaw, medicine,
engineering, managementor teaching.While the
established professions requiresome specialised
educationalqualifications and training to be re
cruitedto them, Journalism doesnot make anysuch
requirement essential.There is no bar to an
yone entering theprofession no matter what ones
educational background or professionalexperience
is. From the very beginningJournalism (like the
other mediaprofessions such as Advertising,
PublicRelations, Film, Television, Theatre,
andPublishing) has been and still remains, an ope
n profession.Further, Journalism has no distinct
body of knowledge that defines the profession andm
arks its relationship with its clients (readers,
advertisers, advertisingagencies, public relati
ons officials’ andothers
) and other professions.
Debate over journalism
Opinions vary on whether journalism is acalling
, a public service, anentertainment, a cultural
industrymotivated by profit, or a tool fo
r propoganda, public relations and advertising.
Answers to the doubts
Journalism can be a combination of all these or each of this separately.Opinions are not sovaried
about the other professions. As a business and tr
ade, Journalism involvespublishing on a regular
basis for profit, withnews considered as the primar
y product.Hence the need to attract advertisers,
andreaders, through marketing strategies wh
ichfocus on circulation and readership.
What is Journalism?
The word JOURNALIST ́, JOURNAL ́and
JOURNALISM ́ is derived from theFrench
JOURNAL ́, which in turn comesfrom th
e Latin term ‘DIURNALIS ́ or ‘DAILY ́.

School
of
Distance
Education
History
of
Journalism
6
Journalism is a form of writing that tells pe
ople about things that reallyhappened, but that they
might not have known about already.People who write journalism are called “journalists.” They
might work at newspapers,magazines, and websites
or for TV or radio stations.The most important
characteristic shared by good journalists is
curiosity
. Good journalistslove to read and want to find
out as much as they can about the world around them.
Journalism comes in several different forms:
I. News
A. Breaking news: Telling about an event as it happens.
B. Feature stories: A detailed look at some
thing interesting that's not breaking news.
C. Enterprise or Investigative stories: Storie
s that uncover information that few people knew.
II. Opinion
A. Editorials: Unsigned articles that express a publication's opinion.
B. Columns: Signed articles that express the writer's reporting and his conclusions.
C. Reviews: Such as concert, restaurant or movie reviews.
Online, journalism can come in the forms listed above, as well as:
Blogs: Online diaries kept by individuals or small groups.
Discussion boards: Online question and answer pages where anyone can participate.
Wikis: Articles that any reader can add to or change.
The best journalism is easy to read, and just sounds like a nice, smart person telling you
somethinginteresting.
Reporting
How do you get the facts for your news story? By reporting!
There are three main ways to gather information for a news story or opinion piece:
1. Interviews: Talking with people who know something about the story you are reporting.
2. Observation: Watching and list
ening where news is taking place.
3. Documents: Reading stories, reports,
public records and other printed material.
The people or documents you use when reporting a story are called your “sources.” In your story,
youalways tell your readers what sources you've used. So you must remember to get the exact
spelling ofall your sources' names. You want everything in your story to be accurate, including the
names of thesources you quote.Often, a person's name is not enough information to identify them in
a news story. Lots of people havethe same name, af
ter all. So you will also want to write down your
sources' ages, their hometowns,their jobs and any ot
her information about them that is relevant to

School
of
Distance
Education
History
of
Journalism
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the story.Whenever you are interviewing someone, observing something happening or reading
about something,you will want to write down the answers to the “Five Ws” about that source:
Who
are they?
What
were they doing?
Where
were they doing it?
When
they do it?
Why
did they do it?
Many good reporters got their start by keeping a
diary. Buy a notebook, and start jotting down
anythinginteresting you hear, see or read each day. You might be surprised to discover how many
good storiesyou encounter each week!
Writing
Here are the keys to writing good journalism:
Get the facts. All the facts you can.
Tell your readers where you got every bit of information you put in your story.
Be honest about what you do not know.
Don't try to write fancy. Keep it clear.
Start your story with the most important thing that happened in your story. This is called your
“lead.” Itshould summarize the whole story in one sentence.From there, add details that explain or
illustrate what's going on. You might need to star
t with somebackground or to “set the scene” with
details of your observation. Again, write the stor
y like you weretelling it to a friend. Start with
what's most important, and then add background or details as needed.
When you write journalism, your paragraphs will
be shorter than you are used to in classroom
writing.Each time you introduce a new source, you will start a new paragraph. Each time you bring
up a newpoint, you will start a new paragraph. Again, be sure that you tell the source for each bit of
informationyou add to the story.Whenever you quote someone's exact words, you will put them
within quotation marks and provide“attribution” at
the end of the quote. Here's an example:“I think
Miss Cherng's class is really great,” te
n-year-old McKinley student Hermione
Grangersaid.Commas go inside the closing quote mark when you are providing
attribution.Sometimes, you can “paraphrase” what a source says. That means that you do not use
the source's exactwords, but reword it to make it s
horter, or easier to understand. You do not use
quote marks around aparaphrase, but you still need to write who said it. Here's an example:Even
though the class was hard, students really liked it,
McKinley fourth-grade
r HermioneGranger said.
Journalism
is a work of collecting, writing, editing and publishing material in newspapers and
magazines or on television and radio for general inform
ation. In a broader sense, it also refers to
works of persons professionally involved in
mass communications, a
dvertising, and public
relations.

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Education
History
of
Journalism
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Journalism in its limited sense of reporting incide
nts and dissemination of information was there in
Bengal and other parts of India even in ancient and
medieval periods. In ancient India, inscriptions
engraved on rocks or pillars served as a medium of information. Emperor Asoka, for example, had
his Rock Edicts and Pillar Edicts posted all over his empire and even beyond. He engaged spies and
overseers to collect information. During the Sultanate period, the
Barid-i-Mamalik
or commissioner
of intelligence used to serve the authorities with the information of the empire. The
munhis
or spies
of Sultan Alauddin Khalji communicated even the most trivial things to the Sultan. The Mughal
government had a network of news-services-the
waqai-navis, sawanih-navis,
and
khufia-navis
. In
addition to them there were
harkarah
and
akhbar-navis
for serving the royalties with general
information. The
bhats, kathaks
and
narasundars
provided the people with social and cultural
information. However, due to despotic form
s of government and impossibility of reporting
objectively, the proto-journalism of Mughal Bengal
could never grow into journalism in its proper
sense.
Journalism with its modern characteristics originat
ed from Europe in the eighteenth century. Due to
colonial reasons, however, it began in Bengal ahead of all countries of Asia. The history of modern
journalism in Bengal was inaugurated by Augustus Hicky by publishing a weekly journal, Hicky's
Bengal gazette, at Calcutta in January 1780. An advertisement of the paper read, "A weekly
political and commercial paper opens to
all parties, but influenced by none".
The year 1818 marks the beginning of Bengali journa
lism. This year witnessed the publication of
three Bangla newspapers-
Bengal Gazeti (
Calcutta)
,
Digdarshan
(
Calcutta)andSamachar
Darpan(Serampore)
. Bengal Gazeti
is said to have been published first which was followed by
Samachar Darpan
and digdarshan. The first Bangla newspaper,
Samachar Darpan,
was published
from serampore in 1818. The first weekly within the territory of today's Bangladesh,
Rangpur
Bartabaha,
was published in 1847 from rangpurand the first weekly from Dhaka,
Dacca News,
was
published in 1856. The long lasting Dhaka prakashwas first published in 1861 and
Dhaka Darpan
in 1863.
Journalism as a profession took a new turn from the beginning of the twentieth century. Nationalist
agitation, rise of Muslim nationalism, the Firs
t and Second World Wars and the introduction of
representative government contributed to the rapi
d increase in newspaper readership. The Partition
of Bengal in 1947 and emergence of Dhaka as the
capital of East Bengal was another important
factor that contributed to the growth of journalism in Eastern Bengal. At present, about 1,800
newspapers and periodicals are published from different
parts of Bangladesh. It speaks of a massive
development in the field of journalism since 1947.
Until very recently, journalism was practised by people who rarely had any formal training in the
profession. The craft of journalis
m is learnt through apprenticeship and long association with the
profession. Training in journalism originates from
the USA and now it is an established institution
in Bangladesh as well. Most universities of the
country teach journalism and related subjects in
independent departments. In addition to this, journalism is taught and journalists are trained in
several public institutes and centres.
Journalists have general and branch-wise associa
tions not only for promoting professional interests
but also for developing professiona
l potentialities and ethics. In Bangladesh, most journalists are
members of professional trade unions that work
as pressure groups in protecting their rights and