शनिवार, 31 मई 2014

सविता भाभी / अश्लीलता का महिमा मंड़न


मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
कॉमिक्स की मुख्य पात्र सविता
सविता भाभी भारत में एक प्रसिद्ध या कहें कि एक बदनाम कार्टून पॉर्नोग्राफी वेबसाइट है, जिसमें सविता नामक एक कामुक गृहिणी और उसके कामुक प्रसंग मौजूद होते हैं। वो एक ऐसे पुरुष की विवाहिता है जो मूंछें रखता है। वो उसे यौन संबंधी संतुष्टि देने में असमर्थ पति है सो उसकी पॉर्न फिल्मों में आसक्ति है। यह पॉर्न साइट स्वतन्त्रता तथा भारत की उदारता का एक प्रतीक बन गई है।[1].
आरम्भ में कार्टून स्ट्रिप को नि:शुल्‍क देखा जा सकता था। लेकिन प्रतिबन्ध के पश्चात, कार्टून स्ट्रिप kirtu.com पर चली गयी तथा देखने के लिए सदस्‍यता शुल्‍क चुकाना पड़ता है। पुराने संस्करण आज भी नि:शुल्‍क देखे जा सकते हैं।

प्रतिबन्ध और उसकी आलोचना

"Wow, India has now joined the elite club of China, Iran, North Korea and suchlike in the area of Internet censorship."
ग्राफिक उपन्यासकार अमरेश कुमार सविता भाभी पर प्रतिबन्ध के बारे में.[2]
भारत, जो कि मुख्यतया एक परम्परावादी देश है,[3] पॉर्नोग्राफी का अधिकार नहीं है तथा पॉर्नोग्राफी अवैध है। भारत सरकार ने इस साइट को सेंसर कर रखा है। भारत के उदारवादी लेखक तथा पत्रकार अमित वर्मा ने इस सेंसरशिप की अपने ब्लॉग इण्डिया अनकट में आलोचना की है।[4]
आरम्भ में साइट के निर्माता ने अपना असली नाम छिपा कर रखा और स्‍वयं की पहचान छद्मनाम इण्डियन पोर्न अम्पायर से बनाई।[5] हालांकि जुलाई २००९ में, साइट के निर्माता पुनीत अग्रवाल ने अपनी पहचान का खुलासा कर दिया था।[6]
इसके प्रभाव की एक मामले में निन्दा की गई थी। इस मामले में बैंगलोर के एक विद्यार्थी ने अपनी अध्यापिका को एक कामुक पाठ सन्देश भेजा था,[7] तथा एक हालिया कॉमिक की भारतीय टीवी पर आलोचना की गयी जिसमें सविता तथा एक अन्य चरित्र जो कि प्रसिद्ध बॉलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन से बहुत मेल खाता था, के मध्य परिणय दिखाया गया था।[8] ३ जून २००९ को भारत सरकार ने साइट को प्रतिबन्धित किया था।
भारत के उदारतावादी पत्रकार अमित वर्मा ने भारतीय सरकार द्वारा लगाई गई सेंसरशिप की अपने ब्लॉग इण्डिया अनकट में आलोचना की है[4] इंटरनेट पर इस पर लगे प्रतिबंध को हटाने के लिए प्रयास किए गए।[2]

लोकप्रियता

साइट भारत में अब भी लोकप्रिय है। अलैक्सा के अनुसार यह वर्तमान में भारत में १००० सर्वाधिक लोकप्रिय साइटों में से है तथा साइट का ८% ट्रैफिक भारत से आता है। कॉमिक्स अंग्रेजी के अतिरिक्त १० विभिन्न भारतीय भाषाओं में छापी जाती है। प्लग्डइन नामक एक भारतीय स्टार्टअप ब्लॉग ने उनकी वृद्धि तथा स्ट्रेटजी पर एक केस स्टडी तक की है।[9]

इन्हें भी देखें

सन्दर्भ

बाहरी कड़ियाँ

दिक्चालन सूची

गुरुवार, 29 मई 2014

पत्रकारिता: जिम्मेदारी या बाजारू उत्पाद





लेखक- कुलदीप कुमार 
प्रस्तुति- निम्मी नर्गिस, शीरिन शेख

मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है. वह सिर्फ बाजार में बिकने वाला माल नहीं, लोगों की राय को प्रभावित करने वाला माध्यम है. अखबारों और चैनलों के मालिक इसे भूलते जा रहे हैं और उनकी नजर अब सिर्फ मुनाफे पर है.
पिछले दो दशकों के दौरान भारतीय मीडिया के स्वरूप और चरित्र में भारी बदलाव आया है और इस सच्चाई को काफी हद तक भुलाया गया है कि अखबार और टीवी चैनल एक उत्पाद या बाजार में बिकने वाला माल तो है, लेकिन उसमें और साबुन में बुनियादी फर्क है. मीडिया का सरोकार समाचारों और विचारों से है. इसलिए उसकी तुलना यदि किसी से की जा सकती है तो वह बाजार में बिकने वाली औषधि है क्योंकि औषधि की गुणवत्ता पर रोगी का ठीक होना या न होना निर्भर करता है.
इसीलिए अब मीडिया जनता की रुचि और विचारों का परिष्कार करने के बजाय उसकी दिलचस्पी का सामान जुटाने और उसके सामने पुरातनपंथी, दकियानूसी और अंधविश्वासी किस्म की सामग्री परोसने में व्यस्त रहता है. जब भी कोई नेता मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री पद की शपथ लेता है, हिन्दी अखबार और टीवी समाचार चैनल उसे अक्सर "राजतिलक", "राज्याभिषेक", "ताजपोशी" और "सिंहासन पर बैठना" आदि कहते हैं, बिना एक क्षण भी सोचे कि भारत एक लोकतांत्रिक देश हैं और राजशाही और सामंती शासन के दिन बहुत पहले ही लद चुके हैं. जब 26 मई को नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, तो दैनिक जागरण और राष्ट्रीय सहारा समेत अनेक छोटे-बड़े हिन्दी अखबारों ने अपने संस्करणों में अगले दिन राजतिलक, ताजपोशी और राष्ट्रतिलक जैसे शब्दों का प्रयोग किया. इससे ऐसा लगता है जैसे किसी लोकतांत्रिक देश में प्रधानमंत्री ने पद नहीं संभाला, बल्कि किसी राजतंत्र में सम्राट ने अपनी गद्दी संभाली है. क्या ऐसी रिपोर्टिंग पाठकों के मन में लोकतांत्रिक संस्कार भर सकती है? क्या वह उनके मन में सदियों से जड़ जमाये बैठे सामंती संस्कारों को ही पुष्ट नहीं करती?
सेलिब्रिटी की ओर विशेष ध्यान देना और देश के सामने खड़ी बड़ी बड़ी समस्याओं की अनदेखी करना भी इन दिनों मीडिया के चरित्र का अंग बनता जा रहा है. बड़े बड़े नेता और उनके पुत्र पुत्रियां, मशहूर क्रिकेट खिलाड़ी, फिल्म अभिनेता और अभिनेत्रियां, बड़े उद्योगपति, फैशन डिजाइनर, और गायक-गायिकाएं, ये सभी इन दिनों सेलिब्रिटी माने जाते हैं और मीडिया का इन पर खास फोकस रहता है. हिन्दी अखबार इस मामले में किसी से पीछे नहीं हैं. पहले हिन्दी अखबारों के रविवारीय संस्करण में साहित्य और अन्य कलाओं पर पठनीय सामग्री हुआ करती थी. संगीत, नृत्य, नाटक की प्रस्तुतियों और कला प्रदर्शनियों की समीक्षाएं छपा करती थीं, लेकिन अब इक्का दुक्का अखबारों को छोडकर शेष अखबार साहित्य एवं कला से पूरी तरह विमुख हो गए हैं.
टीवी चैनलों का हाल इससे भी बुरा है. अब समाचार चैनलों एवं मनोरंजन चैनलों के बीच अंतर करना मुश्किल होता जा रहा है. समाचार चैनलों पर ज्योतिष के लंबे कार्यक्रम, पौराणिक कथाओं पर आधारित तथाकथित वैज्ञानिक खोजों के कार्यक्रम और हास्य के बेहद फूहड़ कार्यक्रम प्रतिदिन कई कई घंटे देखे जा सकते हैं. कुछ साल पहले एक चैनल ने श्रीलंका में "रावण की ममी" खोज निकाली थी तो दूसरे ने "सशरीर स्वर्गलोक जाने की वैज्ञानिक खोज" के बारे में विस्तृत कार्यक्रम प्रस्तुत किया था. एक अन्य चैनल के कार्यक्रम का शीर्षक था: "यमलोक का रास्ता इधर से जाता है". अक्सर जब अंतरिक्ष में कोई ज्योतिर्विज्ञान संबंधी घटना होती है, मसलन चंद्रग्रहण या सूर्यग्रहण या इसी तरह की कोई और घटना, तो हिन्दी टीवी चैनल एक ज्योतिषी को भी उस घटना और उसके कारण पड़ने वाले ग्रहों के प्रभाव पर दर्शकों को ज्ञान देने के लिए आमंत्रित करते हैं.
यही कारण है कि 1990 के दशक में कई हिन्दी अखबारों ने राम जन्मभूमि आंदोलन की रिपोर्टिंग खुद कारसेवक बनकर की और इसके लिए उन्हें भारतीय प्रेस परिषद की कड़ी आलोचना भी झेलनी पड़ी. इसी तरह सांप्रदायिक दंगों की स्थिति में भी उनकी तटस्थता संदिग्ध रही. संक्षेप में कहें तो हिन्दी मीडिया आधुनिक जीवनदृष्टि को नहीं अपना पाया. आधुनिकता के नाम पर उसने फैशन और फिल्मों पर ही सामग्री छाप कर संतोष कर लिया.
हिन्दी अखबारों में विज्ञान, पर्यावरण और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम से संबंधित खबरें बहुत कम देखने में आती हैं. जो अंतरराष्ट्रीय खबरें छपती भी हैं, वे अधिकांशतः ब्रिटेन, अमेरिका और अन्य अंग्रेजीभाषी देशों के बारे में होती हैं, या फिर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बारे में. सीरिया हो या मिस्र, तुर्की हो या फलिस्तीन, हिन्दी मीडिया इन पर कभी विस्तार से कुछ ऐसा नहीं छापता या दिखाता जिससे पाठकों या दर्शकों की जानकारी और समझ में इजाफा हो. हॉलीवुड पर लगभग उतना ही ध्यान दिया जाता है जितना हिन्दी फिल्म जगत पर. लेकिन अन्य भारतीय भाषाओं के फिल्म जगत की खबरों से हिन्दी पाठक महरूम ही रहता है. उसे हॉलीवुड में बन रही फिल्मों के बारे में अधिक जानकारी होती है बनिस्बत मलयालम या तेलुगू में बन रही फिल्मों के.
चुनाव के दौरान भी हिन्दी मीडिया ने जिस प्रकार के अतिशय उत्साहातिरेक का प्रदर्शन करते हुए नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार की रिपोर्टिंग की, वह स्वयं में इस बात का प्रमाण थी कि हिन्दी मीडिया ने लोकतंत्र की मूल भावना से परे जाकर कितना लंबा रास्ता तय कर लिया है.
ब्लॉग: कुलदीप कुमार

सोमवार, 26 मई 2014

टैक्स चोरों का मददगार नहीं होगा अब स्विस बैंक






प्रस्तुति-- निम्मी नर्गिस, मनीषा यादव 

 

स्विस बैंकों का रहस्य खुलेगा

स्विट्जरलैंड ने अपनी बैंकिंग के रहस्यों पर पड़ा ताला तोड़ दिया है. टैक्स चोरों को धरने के लिए चल रही अंतरराष्ट्रीय मुहिम के तहत हुए समझौते पर दस्तखत के साथ स्विस बैंकों की गोपनीयता का फायदा अब टैक्स चोरों को नहीं मिलेगा.
ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कॉपरेशन एंड डेवलपमेंड यानी ओईसीडी में टैक्स मामलों के प्रमुख पास्कर सेंट अमान्स ने समाचार एजेंसी एएफपी से कहा, इसके साथ ही "बैंकों की गोपनीयता खत्म" हो गई है. 60 से ज्यादा देशों के बीच हुए समझौते में स्विट्जरलैंड का शामिल होना शायद इस समझौते के लिए सबसे अहम बात है, क्योंकि माना जाता है कि दुनिया भर के टैक्स चोर स्विस बैंकों में ही अपना काला धन रखते हैं. भारत और जर्मनी समेत दुनिया के तमाम देश भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई में स्विस बैंकों की गोपनीयता की वजह से परेशान हैं.
आपसी टैक्स सहयोग
ओईसीडी के महासचिव एंगेल गुरिया ने कहा कि टैक्स के मामलों में आपसी प्रशासनिक सहयोग पर बहुस्तरीय समझौते में स्विटजरलैंड का शामिल होना "इस बात का साफ और तगड़ा संकेत है कि वह उन देशों में शामिल हैं जो अंतरराष्ट्रीय टैक्स सहयोग को जरूरी मानते हैं." कई विकसित देशों के निर्देश पर फ्रांस में मुख्यालय वाले ओईसीडी ने टैक्स चोरी और काले धन के खिलाफ मुहिम शुरू की है. हालांकि अभी एक बड़ी बाधा को पार करना बाकी है. इस फैसले पर अभी स्विटजरलैंड की संसद की मुहर नहीं लगी है. जब तक इसकी वहां से पुष्टि नहीं हो जाती तब तक इस पर अमल नहीं हो सकता.
स्विस बैंकिंग की गोपनीयता की मौजूदा संरचना ने दूसरे विश्व युद्ध से पहले ही यह रूप हासिल कर लिया था. इसके जरिये नाजी शासन के पीड़ितों को अपनी संपत्ति को छिपा कर बचाने का एक जरिया मिला. स्विस बैंक अपने खाताधारकों के बारे में जानकारी देने के लिए प्रतिबद्ध नहीं हैं.
भारत भी प्रभावित
बाद में इसका इस्तेमाल दुनिया भर में टैक्स की चोरी करने और काले धन को छिपाने के लिये किया जाने लगा. माना जाता है कि भारत के टैक्स चोरों और भ्रष्टाचारियों ने भी कई लाख करोड़ की रकम स्विस बैंकों में जमा कर रखी है. 2008 में जब पूरी दुनिया में मंदी आई और इसके बात यूरोजोन कर्ज संकट में फंसा तब "टैक्सचोरों के स्वर्ग" स्विटजरलैंड की बैंकिंग नीतियों में बदलाव करने की मांग उठने लगी. अमेरिकी टैक्स विभाग ने खासतौर से स्विस बैंकों के खिलाफ बेहद कड़ा रुख अपनाया है. इसके साथ ही कई बड़े विवाद भी उठे जब स्विस बैंकों में खाता रखने वालों के बारे में कहीं और से जानकारी सामने आने लगी.
इस समझौते में फिलहाल दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों के समूह जी 20 के सदस्य देश और 40 दूसरे देश शामिल हैं. इन सभी देशों ने आपस में जानकारी साझा करने के साथ ही टैक्स की धोखाधड़ी रोकने के लिए साझा अभियान चलाने पर भी सहमति जताई है. अब तक होता यह था कि इस तरह के मामलों में जांच दूसरे देशों के कानून के जाल में उलझ जाती थी और टैक्स चोरों को इसका फायदा उठाने का मौका मिल जाता था.
यूरोप का बैंकिंग सुपरवाइजर
इसी बीच यूरोपीय संघ के अधिकारियों ने बैंकिंग सुपरवाइजर बनाने की योजना को मंजूरी दे दी. यह यूरोपीय सेंट्रल बैंक के जरिये संचालित होगा और यूरोपीय संघ के 130 बड़े बैंकों पर निगरानी रखेगा. 28 देशों के वित्त मंत्रियों की लग्जेमबर्ग में हुई बैठक में इसकी मंजूरी दी गई. उम्मीद की जा रही है कि यह अगले साल तक काम करने लगेगा और यूरोपीय बैंकों की बैलेंस शीट में संभावित पूंजी की कमी की पहचान करेगा. अगर सुपरवाइजर को लगा कि बैंक को मदद की जरूरत है तो बैंकों के बचाव वाली अथॉरिटी इसके लिए कदम उठाएगी. उसके पास इस काम के लिए एक फंड भी रहेगा.
इन सब उपायों को मिला कर यूरोपीय संघ का कथित बैंकिंग यूनियन तैयार हुआ है. यह एक कोशिश है यह तय करने की कि किसी एक देश के बैंक के फेल होने की स्थिति में उसका असर पूरे इलाके की स्थिरता पर ना पड़े. हालांकि अभी कुछ मुद्दों पर मंत्रियों के बीच समझौता होना बाकी है. खासतौर से बैंकों को बचाने वाली अथॉरिटी से जुड़े कई प्रावधानों के बारे में.
एनआर/एमजे(एएफपी,एपी)

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रविवार, 25 मई 2014

सशक्त समाज के लिए जरूरी है स्वतंत्र पत्रकारिता





 पत्रकार लेखक लोकेन्द्र सिंह की पुस्तक 'देश कठपुतलियों के हाथ में' विमोचम समारोह 

 प्रस्तुति- किशोर प्रियदर्शी, दक्षम द्विवेदी

 ग्वालियर, 24 मई।
 पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं का संप्रेषण नहीं होना चाहिए। पत्रकारिता में संवेदनशील लेखन होना चाहिए। आज देश में जिस प्रकार से पत्रकारिता और राजनीति में विकृतियां उत्पन्न हो रही हैं, उनके मूल में विदेशी पूंजी निवेश है। इसलिए सशक्त समाज के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता बहुत आवश्यक है। वर्तमान में पत्रकार परतंत्र हो गए हैं, जब तक पत्रकारों को लिखने की आजादी प्राप्त नहीं होगी तब तक हम सशक्त समाज का निर्माण नहीं कर सकते। यह बात गणेश शंकर विद्यार्थी मंच एवं जीवाजी विश्वविद्यालय दूरस्थ शिक्षण अध्ययनशाला के संयुक्त तत्वावधान में 'पत्रकारिता, राजनीति और देश' विषय पर आयोजित संगोष्ठी में आमंत्रित वक्ताओं ने कही। गालव सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के प्रोडक्शन सहायक लोकेन्द्र सिंह राजपूत की पुस्तक 'देश कठपुतलियों के हाथ में' का विमोचन भी किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि गांधीवादी विचारक एवं चिंतक रघु ठाकुर थे। जबकि अध्यक्षता मुंशी प्रेमचंद सृजनपीठ उज्जैन के निदेशक जगदीश तोमर ने की। विशिष्ट अतिथियों के रूप में आईटीएम विश्वविद्यालय के कुलाधिपति रमाशंकर सिंह, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष एवं राजनीतिक विश्लेषक संजय द्विवेदी उपस्थित थे। इस मौके पर स्वदेश के सम्पादक लोकेन्द्र पाराशर दूरस्थ शिक्षण अध्ययनशाला के उप निदेशक प्रो. हेमंत शर्मा एवं पुस्तक के लेखक लोकेन्द्र सिंह भी मंचासीन थे।
राजनीति और पत्रकारिता एक सिक्के के दो पहलू : रघु ठाकुर
गांधीवादी विचारक एवं चिंतक रघु ठाकुर ने कहा कि पत्रकारिता और राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इन्हें धर्म के रास्ते पर चलाना चाहिए। धर्म का तात्पर्य यह है कि वह समाज की पीड़ा को समझें। उन्होंने पत्रकारिता की आजादी की बात करते हुए कहा कि आज देश में लिखने वाले परतंत्र हो गए हैं। जब तक पत्रकारों को लिखने की आजादी नहीं होगी तब तक हम सशक्त समाज का निर्माण नहीं कर सकते। श्री ठाकुर ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज राजनीति और पूंजी में एक रिश्ता बन गया है। राजनीति और पूंजी के घालमेल के कारण आज समाज प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को ऐसा लेखन करना चाहिए जिससे समाज सही दिशा पा सके। उन्होंने कहा कि मीडिया संस्थानों के मालिक निजी स्वार्थ देखते हैं। पत्रकारों के भले के लिए मालिक नहीं सोच रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी अब तक देश के प्रमुख समाचार पत्रों ने मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू नहीं की हैं। मजीठिया से संबंधित कोई समाचार भी समाचार-पत्रों में भेजा जाए तो एक लाइन भी नहीं छपेगा। उन्होंने मीडिया के वर्तमान स्वरूप को रेखांकित करते हुए कहा कि आज के मीडिया के लिए खबर के मुख्य आधार हैं- क्राइम, कॉमेडी, क्रिकेट, सिनेमा और सेलेब्रिटी। सामाजिक सरोकार आज पत्रकारिता में कहीं पीछे छूट गए हैं। इसके साथ ही उन्होंने चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने आम चुनाव में खर्च की सीमा तय कर दी ७० लाख रुपए। ऐसे में क्या कोई आम आदमी चुनाव लड़ सकेगा। क्या आम आदमी चुनाव में खड़े होकर ७० लाख रुपए खर्च करने के क्षमता रखने वाले व्यक्ति से मुकाबला कर सकेगा।
सवालों से मजबूत होता है लोकतंत्र : संजय द्विवेदी
राजनीतिक विश्लेषक और माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने कहा कि हिन्दुस्तान को समझने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। उन्होंने कहा कि जनता को मीडिया और राजनेताओं से सवाल करते रहना चाहिए क्योंकि सवालों से ही लोकतंत्र मजबूत होता है। निष्पक्ष होकर पत्रकार को अपनी कलम चलानी चाहिए। किसी पार्टी विशेष से जुड़कर लिखेंगे तो उस लेखन में वह धार नहीं होगी। किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर लेखन करना भी ठीक नहीं। चुनाव के दौरान कई लेखक, पत्रकार और बुद्धिजीवी सुपारी लेकर कलम चला रहे थे कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री नहीं बनने देंगे। क्यों नहीं बनने देंगे, इसका किसी के पास वाजिब जवाब नहीं था। यह तरीका ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता, राजनीति और देश आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। पत्रकारिता देश हित में होनी चाहिए। श्री द्विवेदी ने मुजफ्फरनगर के दंगों का जिक्र करते हुए बताया कि मुजफ्फरनगर के दंगों की रिपोर्टिंग गलत तरीके से की गई। इसका नतीजा यहा रहा कि स्थितियां और अधिक बिगड़ीं।
स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है : रमाशंकर सिंह
कार्यक्रम के विशिष्ट आईटीएम विश्वविद्यालय के कुलाधिपति रमाशंकर सिंह ने कहा कि महात्मा गांधी भी मानते थे कि स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है। उन्होंने कहा कि आज मीडिया और राजनीति में गहरा रिश्ता हो गया है, जिसे समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आज शेयर बाजार, सट्टा और सर्वे कई गलत तस्वीरें समाज के सामने प्रस्तुत करते हैं, जिससे समाज प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान तभी आगे बढ़ेगा जब लोगों में सामाजिक न्याय के लिए भूख पैदा होगी। पत्रकारिता का यह दायित्व है कि लोगों में सामाजिक चेतना की भूख पैदा करे।
कठपुतलियों की डोर अपने हाथ में ले जनता : लोकेन्द्र पाराशर
स्वदेश के सम्पादक लोकेन्द्र पाराशर ने कहा कि मीडिया और पत्रकारिता में भिन्नता है लेकिन समाज को दोनों एक ही दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा कि अगर मीडिया प्रबंधन हो रहा है तो उसमें पत्रकारिता नहीं है। उन्होंने कहा कि समाज का दर्द लिखने के लिए लेखक या पत्रकार के मन में आग होनी चाहिए। यह आग एक से दूसरे के मन में जलनी चाहिए। पुस्तक का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि देश कठपुतलियों के हाथ में नहीं होना चाहिए। अगर कठपुतलियों के हाथ में देश है भी तो इन कठपुतलियों की डोर हमारे हाथ में होनी चाहिए, किसी और के हाथ में डोर नहीं होनी चाहिए।
लोकेन्द्र ने देश के मानस को झकझोरा है : जगदीश तोमर
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक एवं वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश तोमर ने पत्रकारिता और पत्रकार को समाज का महत्वपूर्ण अंग बताया। उन्होंने कहा कि आजादी के समय भी हर पत्रकार एक स्वतंत्रता सेनानी की भूमिका में था। पत्रकार अच्छे से काम कर सके, सकारात्मक पत्रकारिता कर सके इसके लिए समाज को उसका साथ देना चाहिए। पत्रकारिता के मूल्यों में समय के साथ कमी आई है लेकिन यह सही नहीं है कि पत्रकारिता में सब बुरा ही बुरा है। पत्रकारिता एकदम भ्रष्ट हो गई है। पत्रकारिता में अब भी अच्छे लोग हैं। उनका साथ देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता आज भी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और वह अपना धर्म आज भी निभा रही है। श्री तोमर ने 'देश कठपुतलियों के हाथ मेंÓ पुस्तक के लेखक एवं युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह को बधाई देते हुए कहा कि लोकेन्द्र ने अपने आलेखों के माध्यम से देश के मानस को झकझोरने की कोशिश की है। उनके लेखों में सकारात्मकता है। पत्रकारिता को सही मायने में एक विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए। लोकेन्द्र ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से उसी विपक्ष की भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि लोकेन्द्र सिंह के आलेख ही नहीं बल्कि उनकी कहानियां भी विचारोत्तेजक हैं। वे लेखक हैं, कहानीकार हैं, कवि हैं। लोकेन्द्र बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी हैं।
प्रबुद्धजन रहे मौजूद :
पुस्तक विमोचन समारोह और संगोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत सहकार्यवाह यशवंत इंदापुरकर, दूरदर्शन केन्द्र ग्वालियर के निदेशक संतोष अवस्थी, वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र श्रीवास्तव, सुरेश सम्राट, राकेश अचल, देव श्रीमाली, जनसम्पर्क विभाग के संयुक्त संचालक डॉ. एच.एल. चौधरी, सुभाष अरोरा, प्रो. ए.पी.एस. चौहान, डॉ. केशव ङ्क्षसह गुर्जर, प्रो. अयूब खान सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन कर किया गया। अतिथियों का स्वागत हरेकृष्ण दुबोलिया, विभोर शर्मा, गिरीश पाल, विवेक पाठक द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन जयंत तोमर ने एवं आभार दूरस्थ शिक्षण अध्ययन के उप निदेशक प्रो. हेमंत शर्मा ने व्यक्त किया।

शुक्रवार, 9 मई 2014

क्या विदर्भ होगा देश का 30 वां राज्य ?




 बुधवार, 5 मार्च, 2014 को 13:22 IST तक के समाचार 
प्रस्तुति-- पंकज सोनी, शीरिन शेख
वर्धा 
विदर्भ मोर्चा
नागपुर विधानसभा के सामने कुछ लोग हाथों में झंडे लिए विदर्भ को अलग राज्य का दर्जा देने की मांग के नारे लगा रहे हैं.
ये लोग यहां रोज़ आकर विदर्भ के पक्ष में नारे लगाते हैं. इसी तरह के नारे महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के कुछ दूसरे शहरों में भी लगाए जाते हैं. लेकिन विदर्भ राज्य की मांग के लिए जन आंदोलन नहीं शुरू हो सका है.
लेकिन क्लिक करें तेलंगाना के बाद क्या विदर्भ की बारी है? कम से कम नागपुर में आम लोगों से बातें करके ऐसा ही महसूस होता है.
नागपुर उन गिने चुने शहरों में से एक है जो कभी एक बड़े प्रांत की राजधानी होता था. लेकिन शायद ये एक अकेला ऐसा शहर है जो केवल साल में कुछ हफ़्तों के लिए महाराष्ट्र की राजधानी बनता है.
लेकिन भावनात्मक रूप से विदर्भ वाले इसे राजधानी से कम नहीं समझते. और समझें भी क्यों नहीं. यह विदर्भ के 11 ज़िलों में सब से अधिक विकसित है.

नागपुर की पहचान

एक राजधानी के लिए जो भी बुनियादी ढांचा चाहिए वो यहां मौजूद है. इसके अलावा कई कारणों से इसकी एक अलग पहचान है. ये संतरों का शहर है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस का मुख्यालय है. कपास की एक बड़ी मंडी भी यहां है.
यह एक साफ़ सुथरा शहर है जहां हरे पेड़ पौधों की कमी नहीं. सड़कें चौड़ी हैं और बाज़ार लोगों से भरे रहते हैं. लेकिन विदर्भ के दूसरे 10 शहर विकास से वंचित हैं.
विदर्भ मोर्चा
विदर्भ के गांवों की हालत और भी ख़राब है. ग़रीबी हर जगह नज़र आती है. क़र्ज़ों में डूबे यहां के किसान आज भी आत्महत्या कर रहे हैं. यहां के लोगों को यह शिकायत है कि उनके साथ भेदभाव होता है.
भेदभाव ही मुख्य कारण है विदर्भ के लिए अलग राज्य की मांग का. पिछले दिनों कराए गए एक ग़ैर-सरकारी जनमत संग्रह में 96 प्रतिशत लोगों ने विदर्भ को एक अलग राज्य बनाने का समर्थन किया.
क्लिक करें तेलंगाना के जन्म के बाद अब विदर्भ के लोगों में भी उम्मीद बंधी है किक्लिक करें विदर्भ भारत का तीसवां राज्य बन सकता है. समय-समय पर इसके पक्ष में सड़कों पर भी आवाज़ें सुनाई देती हैं.

बीजेपी-शिवसेना में ठनी

लेकिन इस मुद्दे के कारण भारतीय जनता पार्टी और उसकी सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी शिवसेना के बीच ठन गई है. विदर्भ में 10 लोकसभा सीटें हैं जिन पर साल 2009 के चुनाव में इन दोनों पार्टियों ने बढ़िया प्रदर्शन किया था.
जिस तरह से कांग्रेस ने तेलंगाना के लिए पैरवी की, ठीक उसी तरह से इस बार भाजपा ने यहां की सभी 10 सीटें जीतने के लिए शिवसेना से पुरानी दोस्ती को दांव पर लगा दिया है.
डॉक्टर गोविन्द वर्मा इंदिरा गांधी के ज़माने के कांग्रेसी रह चुके हैं और विदर्भ के लिए लड़ने वालों में सब से आगे हैं. विदर्भ के कारण वो भाजपा की झोली में जा गिरे हैं.
वो कहते हैं, "अब हमारा फ़र्ज़ ये रहेगा कि हर जगह कांग्रेस को गिराओ और भाजपा को लाओ". वो आगे कहते हैं, "जो विदर्भ देगा हम उसके लिए हैं."
गोविंद वर्मा विदर्भ
भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी यहां से लोकसभा चुनाव के भाजपा के उम्मीदवार हैं.
उन्होंने वर्मा को आश्वासन दिया है कि भाजपा सरकार में आते ही विदर्भ को एक अलग राज्य बनाने का प्रस्ताव लाएगी.
वर्मा ने कहा कि अगर भाजपा ने उन्हें धोखा दिया तो वो उसे छोड़ देंगे जिस तरह से कांग्रेस का साथ उन्होंने छोड़ दिया. लेकिन भाजपा को सब से अधिक विरोध का सामना अपने सहयोगी शिवसेना से करना पड़ेगा.

शिवसेना का विरोध

शिवसेना ने इशारों में कह दिया है कि अगर भाजपा ने इस मुद्दे को उछाला तो वो ये दोस्ती ख़त्म भी कर सकती है. शिवसेना के ज़िला प्रमुख शेखर सबर्बन्धे कहते हैं, "शिवसेना एक अखंड महाराष्ट्र चाहती है और महाराष्ट्र को दो टुकड़ों में बांटने नहीं देगी."
उन्होंने बताया, "शिवसेना यह समझती है कि मराठी बोलने वाले सभी इलाक़े एक रहें. सारे मराठी बोलने वालों का राज्य एक रहे और सारे मराठी लोग एक जगह राज्य करें ऐसी भावना शिवसेना की है."
शेखर सबर्बन्धे का यह भी दावा है कि खनिज संपन्न विदर्भ राज्य की मांग नेताओं में अधिक है, जनता में कम. अपने तर्क को साबित करने के लिए वो उन उम्मीदवारों का उदाहरण देते हैं जो विदर्भ के मुद्दे पर चुनाव लड़े और बुरी तरह से हार गए.
वो कहते हैं कि विदर्भ राज्य के लिए आंदोलन शिखर पर था साल 1971 से 1973 तक, जब आम आदमी भी इसकी मांग करने सड़कों पर उतर आया था.
विदर्भ मोर्चा
उन्होंने कहा, "आज आम आदमी को रोटी और रोज़गार की पड़ी है. लोग आज सड़कों पर आंदोलन करने नहीं आ रहे. नेताओं ने कोशिश की लेकिन तेलंगाना के लोगों की तरह आम आदमी में जोश नहीं दिखा."
वो आगे कहते हैं, "विदर्भ की जनता जानती है कि जो नेता एक अलग राज्य चाहते हैं उनका स्वार्थ क्या है. वो केवल अपने फ़ायदे के लिए इसकी मांग कर रहे हैं. इन सभी नेताओं के पास या तो उद्योग है या बड़ा कारोबार."

बना चुनावी मुद्दा

बाज़ारों और देहातों में हमने आम जनता से अलग राज्य पर उनकी राय ली लेकिन अधिकतर ने कहा उनको कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता, यानी कि राज्य बन जाए तो विरोध नहीं करेंगे लेकिन इस मांग के लिए सड़कों पर भी नहीं आएंगे.
कोयले के भारी मात्रा में उत्पादन के लिए जाने जाने वाले विदर्भ के लिए अलग राज्य के आंदोलन से जुड़े कई लोग यह स्वीकार करते हैं कि विदर्भ के हक़ में सभी तत्व अलग-अलग बातें करते हैं. 50 साल से अधिक समय से चले आ रहे इस आंदोलन में शामिल नेताओं के बीच आपसी फूट के कारण लोगों ने इन्हें गंभीरता से लेना छोड़ दिया है.
नागपुर
नागपुर साल 1853 से 1861 तक 'नागपुर प्रॉविंस' की राजधानी रहा. इसके बाद मध्य प्रांत और बरार का साल 1950 तक. इसके बाद मध्य प्रदेश राज्य का जन्म हुआ और नागपुर एक बार फिर इसकी राजधानी बना. लेकिन 1960 में महाराष्ट्र राज्य के निर्माण के बाद इस शहर ने यह रुतबा खो दिया और तब से इसके रुतबे को वापस लाने के लिए एक आंदोलन जारी है.
वर्मा इसीलिए कहते हैं, "हम एक नए राज्य की मांग नहीं कर रहे हैं बल्कि नागपुर के खोए हुए दर्जे को वापस बहाल करने की मांग कर रहे हैं."
क्या नागपुर को एक बार फिर राजधानी बनने का सम्मान हासिल होगा? क्या विदर्भ भारत का 30वां राज्य बन सकेगा? इन सवालों का उत्तर किसी के पास नहीं. हां, यह आगामी आम चुनाव का मुद्दा यहां ज़रूर बन गया है.
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गुरुवार, 8 मई 2014

मीडिया संवाद विमर्श








आपातकाल की हिन्दी पत्रकारिता का अनुशीलन

25 जून 1975 भारत के इतिहास में एक ऐसा काला दिवस रहा है जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर भय, आतंक और दहशत का माहौल बना दिया। 19 महीनों तक चले आपातकाल के काले बादल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी छाए और इंदिरा गांधी ने प्रेस पर भी सेंसरशिप थोप दी। आपातकाल के चलते पत्रिका के स्वरूप में बड़ा बदलाव देखा गया और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया तानाशाही का शिकार हुआ।
वर्ष 1974 तक पत्रकारिता के माध्यम से सत्ता और सरकार की सर्वत्र आलोचना हो रही थी। देश में भ्रष्टाचार, शैक्षणिक अराजकता, महंगाई और कुव्यवस्था के विरोध में समाचार-पत्रों में बढ़-चढ़ कर लिखा जा रहा था। गुजरात और बिहार में छात्र-आंदोलन ने जनांदोलन का रूप ले लिया था जिसके नेतृत्व का भार लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने अपने कंधों पर ले लिया। उन्होंने पूरे देश में संपूर्ण क्रांति आंदोलन का आह्वान कर दिया था। दूसरी ओर लंबे समय तक सत्ता में बने रहने, सत्ता का केंद्रीयकरण करने, अपने विरोधियो को मात देने और बांग्लादेश बनाने में अपनी अहम भूमिका के कारण इंदिरा गांधी में अधिनायकवादी प्रवृत्तियां बढ़ती चली गईं और जब इलाहबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद अपने-आपको सत्ता से बेदखल होते पाया तो उन्होंने अपने कुछ चापलूसों के परामर्श से आपातकाल की घोषणा का निर्णय ले लिया। 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्षी नेताओं की जनसभा से श्रीमती गांधी घबरा गईं और उन्होंने आपातकाल की घोषणा कर दी।
आपातकाल के दौरान एक ओर जहां सत्ता और सरकार की चापलूसी करने वाले पत्रकार थे, वहीं दूसरी ओर प्रेस की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले पत्रकारों की भी कमी नहीं थी। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर, देवेंद्र स्वरूप, श्याम खोसला, सूर्यकांत बाली, के.आर. मलकानी जैसे पत्रकारों ने तो जेल की यातनाएं भी भोगीं। इसके विपरीत ऐसे पत्रकारों की भी कमी नहीं थी, जिन्होंने सेंसरशिप को स्वीकार किया और रोजी-रोटी के लिए नौकरी को प्राथमिकता दी। यही स्थिति साहित्यकारों के साथ भी थी।
स्वतंत्र भारत में वर्ष 1975 में आपातकाल की घोषणा के साथ ही पत्र-पत्रिकाओं पर सेंसरशिप लगा दी गई, किंतु तमाम प्रतिबंधों के बावजूद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पूरी तरह ग्रहण नहीं लग सका। पत्र-पत्रिकाओं पर सेंसर लगा तो भूमिगत बुलेटिनों ने कुछ हद तक इसकी क्षतिपूर्ति की। कुछ संपादकों ने संपादकीय का स्थान खाली छोड़कर तो कुछ ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में महापुरूषों की उक्तियों को छापकर सरकार का विरोध किया।
सेंसरशिप और अन्य प्रतिबंधों के कारण सरकार और समाज के बीच सूचनाओं का प्रसारण इकतरफा हो रहा था। सरकार की घोषणाओं और तानाशाही रवैये की खबर तो किसी न किसी रूप में जनता तक पहुंच जाती थी, किंतु जनता द्वारा आपातकाल के विरोध और सरकारी नीतियों की आलोचना की खबर सरकार तक नहीं पहुंच पाती थी। सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों के सहारे ही अखबारों में अधिकतर समाचार छप रहे थे। इकतरफा पक्ष की बार-बार प्रस्तुति से पत्र-पत्रिकाओं की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया था। इसलिए इकतरफा संचार के कारण आपातकाल के 19 महीनों तक सरकार गलतफहमी में रही, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा।
सेंसरशिप के कड़े प्रतिबंधों और भय के वातावरण के कारण अनेक पत्र-पत्रिकाओं को अपने प्रकाशन बंद करने पड़े। इनमें सेमिनार और ओपिनियन के नाम उल्लेखनीय हैं। आपातकाल के दौरान 3801 समाचार-पत्रों के डिक्लेरेशन जब्त कर लिए गए। 327 पत्रकारों को मीसा में बंद कर दिया गया। 290 अखबारों के विज्ञापन बंद कर दिए गए। विदेशी पत्रकारों को भी पीडि़त-प्रताडि़त किया गया। ब्रिटेन के टाइम और गार्जियन के समाचार-प्रतिनिधियों को भारत से निकाल दिया गया। रायटर सहित अन्य एजेंसियों के टेलेक्स और टेलीफोन काट दिए गए। आपातकाल के दौरान 51 पत्रकारों के अधिस्वीकरण रद्द कर दिए गए। इनमें 43 संवाददाता 2 कार्टूनिस्ट तथा 6 कैमरामैन थे। 7 विदेशी संवाददाताओं को भी देश से बाहर जाने को कहा गया।
प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश डालने के लिए समाचार-समितियों का विलय किया गया। आपातकाल के पूर्व देश में चार समाचार-समितियां थीं – पी.टी.आई., यू.एन.आई., हिंदुस्थान समाचार और समाचार भारती जिन्हें मिलाकर एक समिति समाचार का गठन किया गया था जिससे यह पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में रहे। आपातकाल के दौरान आकाशवाणी और दूरदर्शन पर से जनता का विश्वास उठ चुका था। भारत के लोगों ने उस समय बी.बी.सी. और वायस आफ अमेरिका सुनना शुरू कर दिया था।
आपातकाल की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री के द्वारा ली गई पहली ही बैठक में प्रस्ताव आया कि प्रेस-परिषद् को खत्म किया जाए। 18 दिसंबर, 1975 को अध्यादेश द्वारा प्रेस-परिषद् समाप्त कर दी गई। आपातकाल के दौरान भूमिगत पत्रकारों ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया था। भूमिगत संचार-व्यवस्था के द्वारा एक समानांतर प्रचार-तंत्र खड़ा किया गया था। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो जन-जीवन को एकपक्षीय समाचार ही मिल पाता और सच्ची खबरों से वह वंचित रह जाते। आपातकाल में संचार अवरोध का खामियाजा जनता पर नहीं पड़ सका, किंतु सत्ता और सरकार आपातकाल विरोधियों की मनोदशा को नहीं समझ पाए। संचार अवरोध का कितना बड़ा खामियाजा सत्ता को उठाना पड़ सकता है, यह वर्ष 1977 के चुनाव परिणाम से सामने आया।
संपादकों का एक समूह चापलूसी की हद किस तरह पार कर रहा था, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दिल्ली के 47 संपादकों ने 9 जुलाई 1975 को श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा उठाए गए सभी कदमों में अपनी आस्था व्यक्त की, जिसमें समाचार-पत्रों पर लगाया गया सेंसर भी शामिल है। सेंसरशिप के कारण दिनमान एकपक्षीय खबर छापने को बाध्य हुई। दिनमान ने सेंसरशिप लगाए जाने का विरोध भले ही न किया हो, किंतु सेंसरशिप हटाए जाने पर संपादकीय अवश्य लिखा है।
आपातकाल की लोकप्रिय पत्रिका साप्ताहिक हिन्दुस्तान भी सेंसरषिप लागू होते ही सरकार की पक्षधर हो गई। यह पत्रिका सरकार की कितनी तरफदारी कर रही थी इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि चुनाव की घोषणा के बाद 6 फरवरी, 1977 के अंक में राजनीतिक शतरंज के पुराने खिलाड़ी और नए मोहरे, शीर्षक से प्रकाशित आलेख में कांग्रेस का पलड़ा भारी होना सुनिश्चित किया गया है, जबकि वास्तविकता यह है कि वर्ष 1977 के चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह से हार हुई थी।
आपातकाल के पूर्व सरिता में चुटीले बेबाक और धारदार लेख तथा संपादकीय छपा करते थे। सत्ता की मनमानी पर कड़ा प्रहार किया जाता रहा, किंतु आपातकाल लगने के बाद सेंसरशिप के कारण यह सिलसिला टूट गया। सेंसरशिप थोपे जाने और सत्ता के तानाशाही रवैये के कारण सरिता ने 6 महीनों मे संपादकीय कालम लिखना छोड़ दिया।
सारिका का जुलाई 1975 का अंक सेंसरशिप का पालन कड़ाई से किए जाने का जीवंत दस्तावेज बन गया है। सेंसर अधिकारी द्वारा सारिका के पन्नों पर काला किए गए वाक्यों और शब्दों को संपादक ने विरोध-स्वरूप वैसे ही प्रकाशित कर दिया था। इस अंक के पृष्ठ संख्या 27-28 को तो लगभग पूरी तरह काला कर दिया गया था। इसके बाद के अंकों में संपादकीय विभाग इतना संभल गया कि सेंसर अधिकारी को पृष्ठ काला करने की नौबत ही नहीं आई। लोकराज के 5 जुलाई 1975 के अंक में आपातघोषणा शीर्षक से संपादकीय छपा है। इस संपादकीय में कहा गया है कि कुछ लोगों के अपराध के लिए संपूर्ण प्रेस-जगत् को सेंसरशिप क्यों झेलना पड़े\ लोकराज के 12 जुलाई, 1975 के अंक में अनुशासन-पर्व शीर्षक से एक संपादकीय छपा जिसमें आपातकाल की घोषणा का स्वागत किया गया था।
इस प्रकार हम देखते हैं कि सेंसरशिप की कैंची ने पत्रकारिता के स्वरूप को ही बिगाड़ दिया था। दहशत और आतंक के माहौल में अधिकतर पत्र-पत्रिकाओं ने सेंसरशिप को स्वीकार कर लिया था। संपादकीय खाली छोड़ने और पृष्ठों के काले अंश को हू-ब-हू छापने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बच गया था।
आपातकाल की यह अवधि पत्रकारिता की दृष्टि से ऐसी रही कि यह अलग पहचान लिए है। आपातकालीन हिंदी पत्रकारिता के संबंध में आज अधिक सामग्री उपलब्ध नहीं है। ऐसे में डा. अरूण कुमार भगत द्वारा आपातकाल की हिंदी पत्रकारिता का अनुशीलन विषय पर किया गया शोध कार्य महत्वपूर्ण है।
डा. अरूण भगत, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, पीएचडी (सन्-2009)
सितम्बर अंक २०११

हिन्दी पत्रकारिता की दशा और दिशा

वर्तमान समय में हिन्दी भाषा को और व्यापक रूप देने के लिए जो संघर्ष चल रहा है उससे सभी भली-भांति परिचित हैं। क्या आपको लगता है कि पत्रकारिता जगत में भी हिन्दी भाषा का जो प्रयोग हो रहा है वह सही प्रकार से नहीं हो रहा है? इसमें भी कहीं कुछ त्रुटियां या अशुद्धियां व्याप्त है, क्या हिन्दी भाषा के वर्तमान प्रयोग की स्थिति पूरी तरह से उचित और अर्थ पूर्ण है?
वर्तमान में जो मीडिया में हिन्दी का स्तर गिरता जा रहा है, उसके पीछे सबसे बड़ा कारण पाश्चात्य संस्कृति का बढ़ता स्तर है। हर व्यक्ति अपने को अंग्रेजी भाषा बोलने में गौरवान्वित महसूस करता है। इसके उत्थान के लिए सबसे पहले हमें ही शुरूआत करनी होगी क्योकि जब हम शुरूआत करेंगे तभी दूसरा हमारा अनुसरण करेगा।
सोहन लाल भारद्वाज, राष्ट्रीय उजाला
संस्कृत मां, हिन्दी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है, ऐसा कथन डा. फादर कामिल बुल्के का है, जो संस्कृत और हिन्दी की श्रेष्ठता को बताने के लिए सम्पूर्ण है। मगर आज हमारे देश में देवभाषा और राष्ट्रभाषा की दिनों-दिन दुर्गति होती जा रही है। या यूं कह लें कि आज के समय में मां और गृहिणी पर नौकरानी का प्रभाव बढ़ता चला जा रहा है तो गलत नहीं होगा। टीवी के निजी चैनलों ने हिन्दी में अंग्रेजी का घालमेल करके हिन्दी को गर्त में और भी नीचे धकेलना शुरू कर दिया और वहां प्रदर्शित होने वाले विज्ञापनों ने तो हिन्दी की चिन्दी की जैसे नीम के पेड़ पर करेला चढ़ गया हो। इसी प्रकार से रोज पढ़े जाने वाले हिन्दी समाचार पत्रों, जिनका प्रभाव लोगों पर सबसे अधिक पड़ता है, ने भी वर्तनी तथा व्याकरण की गलतियों पर ध्यान देना बंद कर दिया और पाठकों का हिन्दी ज्ञान अधिक से अधिक दूषित होता चला गया। मैं ये बात अंग्रेजी का विरोध करने के लिए नहीं कह रहा हूं, बल्कि मेरी ये बात तो हिन्दी के ऊपर अंग्रेजी को प्राथमिकता देने पर केन्द्रित है।
अवनीश सिंह राजपूत, हिन्दुस्थान समाचार
हिन्दी पत्रकारिता स्वतंत्रता पूर्व से ही चली आ रही है और आजादी के आंदोलन में इसका बहुत बड़ा योगदान भी रहा है, लेकिन आज जो मीडिया में हिन्दी का स्तर गिरता दिखाई दे रहा है, वह पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा के बढ़ते प्रभाव के कारण हो रहा है। आज मीडिया ही नहीं बल्कि हर जगह लोग अंग्रेजी के प्रयोग को अपना भाषाई प्रतीक बनाते जा रहे हैं। इसके लिए सभी को एकजुट होकर हिन्दी भाषा को प्रयोग में लाना होगा।
धर्मेन्द्र सिंह, दैनिक हिन्दुस्तान
अगर आज आप किसी को बोलते है कि यंत्र तो शायद उसे समझ न आए लेकिन मशीन, शब्द हर किसी की समझ में आएगा। इसी प्रकार आज अंग्रेजी के कुछ शब्द प्रचलन में हैं, जो सबके समझ में है। इसलिए यह कहना कि पूर्णतया हिन्दी पत्रकारिता में सिर्फ हिन्दी भाषा का प्रयोग ही हो यह तर्क संगत नहीं है। हां, यह जरूर है कि हमें अपनी मातृभाषा का सम्मान अवश्य करना चाहिए और उसे अधिक से अधिक प्रयोग में लाने का प्रयास करना चाहिए।
नागेन्द्र, दैनिक जागरण
हिन्दी दिवस मतलब चर्चा-विमर्श, बयानबाजी, मानक हिन्दी बनाम चलताऊ हिन्दी। हिन्दी के ठेकेदार और पैरोकार की लफ्फाजी। बस करो यार! भाषा को बांधो मत, भाषा जब तक बोली से जुड़ी है, सुहागन है। जुदा होते ही वह विधवा के साथ-साथ बांझ बन जाती है। वह शब्दों को जन्म नहीं दे पाती। बंगाली, मराठी, गुजराती, उर्दू, फारसी, फ्रेंच, इटालियन कहीं से भी हिन्दी से मेल खाते शब्द मिले, उसे उठा लो। बरसाती नदी की तरह। सबको समेटते हुए। तभी तो हिन्दी समंदर बन पाएगी। रोक लगाओगे तो नाला, नहर या बहुत ज्यादा तो डैम बन कर अपनी ही जमीं को ऊसर करेगी। कॉर्पोरेट मीडिया तो इस ओर ध्यान दे नहीं रहा। हां, लोकल मीडिया का योगदान सराहनीय जरूर है। अरे हां, ब्लॉगरों की जमात को भी इसके लिए धन्यवाद।
चंदन कुमार, जागरण जोश.कॉम
हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है और हमें इसका सम्मान करना चाहिए लेकिन समाज में कुछ ऐसे लोग हैं जो हिन्दी के ऊपर उंगली उठाकर हिन्दी का अपमान करते रहते हैं। बात करें पत्रकारिता की तो हिन्दी पत्रकारिता में आजकल हिन्दी और इंग्लिश का मिला जुला रूप प्रयोग किया जा रहा है जो कि हमारे हिसाब से सही नहीं है। मैं आपको बता दूं कि हिन्दी के कुछ ऐसे शब्द हैं, जिनका इस्तेमाल न करने से वह धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं जो हमारे लिए शर्म का विषय है। मैं अपने हिन्दी-भाषियों से निवेदन करता हूं कि हिन्दी को व्यापक रूप देने में सहयोग करें और हिन्दी को गर्व से अपनी राष्ट्रभाषा का दर्जा दें।
आशीष प्रताप सिंह, पीटीसी न्यूज
भाषाई लोकतंत्र का ही तकाजा है कि नित-नए प्रयोग हों। हां, पर वर्तनी आदि की गलतियां बिल्कुल अक्षम्य है। त्रुटियां-अशुद्धियां तो हैं ही। उचित और अर्थपूर्ण तो जाहिर है कि नहीं है। लेकिन यह सवाल इतना महत्वपूर्ण नहीं है। इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है भाषा के अर्थशास्त्र का सवाल। हिन्दी दिवस पर इस बारे में बात होनी चाहिए।
कुलदीप मिश्रा, सीएनईबी
पत्रकारिता के क्षेत्र में हिंदी का प्रयोग अपनी सहूलियत के हिसाब से होता रहा है। यह जो स्थिति है उसका एक कारण हिंदी के एक मानक फान्ट का ना होना भी है। ज्यादातर काम कृति फान्ट में होता है लेकिन जगह-जगह उसके भी अंक बदल जाते है। कहीं श्रीदेव है तो कहीं ४सी गांधी और न जाने कितने फान्ट्स की भरमार है। अब पत्रकारिता में काम करने वाला कोई भी व्यक्ति एक संस्थान से दूसरे संस्थान में जाते समय फान्ट की समस्या से रूबरू होता है। इसलिए यहां हिंदी का प्रयोग सहूलियत के अनुसार हो रहा है, लेकिन पिछले कुछ दिनों में यूनिकोड के आने से कुछ स्थिरता जरूर आई है। दूसरी बड़ी समस्या यह है कि हम अभी भी यही मानते हैं कि अंग्रेजी हिंदी से बेहतर है। इसलिए जान- बूझकर हिंदी को हिंगलिश बना कर काम करना पसंद करते हैं और ऐसा मानते हैं कि अगर मुझे अंग्रेजी नहीं आती तो मेरी तरक्की की राह दोगुनी मुश्किल है। पत्रकारिता भी आम समाज से अलग नहीं है, उसने भी अन्य बोलियों के साथ-साथ विदेशी भाषा के शब्दों को अपना लिया है।
विकास शर्मा, आज समाज

सितम्बर अंक २०११

वाद, विवाद, अनुवाद की छाया से मुक्त हो हिन्दी पत्रकारिता

हिन्दी के सर्वप्रथम दैनिक उदन्त मार्तण्ड के प्रथम और अंतिम संपादक पंडित युगल किशोर शुक्ल ने लिखा था-
इस उदन्त मार्तण्ड, के नांव पढ़ने के पहिले पछाहियों के चित का इस कागज न होने से हमारे मनोर्थ सफल होने का बड़ा उतसा था। इसलिए लोग हमारे बिन कहे भी इस कागज की सही की बही पर सही करते गये पै हमें पूछिए तो इनकी मायावी दया से सरकार अंगरेज कम्पनी महाप्रतापी की कृपा कटाक्ष जैसे औरों पर पड़ी, वैसे पड़ जाने की बड़ी आशा थी और मैंने इस विषय में यथोचित उपाय किया पै करम की रेख कौन मेटै। तिस पर भी सही की बही देख जो सुखी होता रहा अन्त में नटों कैसे आम आदमी दिखाई दिए इस हेत स्वारथ अकारथ जान निरे परमारथ को कहां तक बनजिए अब अपने व्यवसायी भाइयों से मन की बात बताय बिदा होते हैं। हमारे कुछ कहे सुने का मन में ना लाइयो जो देव और भूधर मेरी अंतर व्यथा और इस गुण को विचार सुधि करेंगे तो ये गुण मेरे ही हैं। शुभमिति।
यह उद्धरण उस समय का है जब उदन्त मार्तण्ड लगभग अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था। आज इस घटना को लगभग 183 वर्ष होने को हैं लेकिन हालात बहुत कुछ नहीं बदले हैं। बस इतना सा अंतर आया है कि तब पंडित युगल किशोर शुक्ल व्यापारियों से आगे आने को कह रहे थे और आज व्यापारी वर्ग आगे तो आ चुका है मगर आगे आने का उसका एकमात्र उद्देश्य मुनाफा कमाना है। उसे हिन्दी, हिन्दी भाषियों और हिन्दी की पत्रकारिता से कोई भावनात्मक लगाव नहीं है।
यही वजह है कि हर साल हिन्दी दिवस के मौके पर इस भाषा के बढ़ते बाजार, हिन्दीभाषियों की संख्या, इसकी तकनीकी क्षमता के विस्तार और इस प्रकार के तमाम आंकड़ों के सुर्खियों में आने के बावजूद हिन्दी पत्रकारिता अपने स्वतंत्र अस्तित्व के लिए जूझती दिखती है। कहने को हिन्दी पत्रकारिता के बाजार का विस्तार हो रहा है, इसमें निवेश बढ़ रहा है लेकिन साथ ही यह भी कटु सत्य है कि अपनी शुरुआत के 185वें वर्ष में प्रवेश करने के बाद भी हिन्दी पत्रकारिता वाद, विवाद और अनुवाद की छाया से मुक्त नहीं हो पा रही है जिसके कारण सार्थक परिणाम भी नहीं दे पा रही है।
वाद और विवाद सिर्फ हिन्दी की समस्याएं नहीं है बल्कि ये अनुवाद के रास्ते ही हिन्दी जगत में आयी हैं। दरअसल, अनुवाद पर आश्रित होने की वजह से ही हिन्दी पत्रकारिता अंग्रेजी की ही तरह भ्रामक वादों और तुच्छ विवादों में घिरकर अपने मूल उद्देश्य को लगभग भुला चुकी है। इसलिए आज सबसे बड़ी जरूरत उसे अनुवाद की इस छाया से मुक्त करने की है ताकि हिन्दी की पत्रकारिता अपना मौलिक ढांचा विकसित कर सके और हिन्दी के अनुकूल व्यवस्थाएं तैयार हो सकें।
शुक्ल जी ने ही उदन्त मार्तण्ड के प्रथम अंक में लिखा था-
यह उदन्त मार्तण्ड अब पहिले पहल हिन्दुस्तानियों के हित हेतु जो आज तक किसी ने नहीं चलाया पर अंग्रेजी ओ फारसी ओ बंगले में जो समाचार का कागज छपता है उसका सुख उन् बोलियों के जान्ने ओ पढ़ने वालों को ही होता है। ……… देश के सत्य समाचार हिन्दुस्तानी लोग देखकर आप पढ़ ओ समझ लेंय ओपराई अपेक्षा जो अपने भावों के उपज न छोड़े, इसलिए बड़े दयावान करुणा ओ गुणनि के निधान सबके विषय श्रीमान् गवरनर जेनेरल बहादुर की आयस से अैसे चाहत में चित्त लगाय के एक प्रकार से यह नया ठाट ठांटा ………
आज हिन्दी को जान्ने ओ पढ़ने वालों’ के लिए उनकी बोली में काम करने वाले संस्थानों की कमी नहीं है। परंपरागत अखबारों, पत्रिकाओं से लेकर टीवी और इंटरनेट तक सब जगह इनकी मौजूदगी है और संख्यात्मक रूप से कहें तो दमदार मौजूदगी है। देश के सर्वाधिक बिकने वाले अखबारों की सूची में अपना दबदबा होता है लेकिन बस इसलिए कि हिन्दी जानने-समझने वालों के लिए इसे समझना आसान है। मौलिकता की खोज में पाठकों/दर्शकों को एक बार फिर से अंग्रेजी का ही रूख करना पड़ता है। आखिर इसकी वजह क्या है, इसकी सबसे बड़ी वजह अनुवाद पर निर्भर रहने की विवशता है।
आय और लाभांश के मामले में हिन्दी मीडिया संस्थानों की हालत जो भी हो, ढांचागत हालत यही है कि उनके पास उतनी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं जितनी अंग्रेजी के पास हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि हिन्दी में भी अव्वल रहने वाले ज्यादातर संस्थान सिर्फ हिन्दी के नहीं हैं। ये द्विभाषिक या बहुभाषी संस्थान हैं और अंग्रेजी को ही इन्होंने अपना चेहरा बना रखा है। सारी मौलिक व्यवस्थाएं और सुविधाएं अंग्रेजी को प्राप्त हैं और शेष भाषाओं की शाखाएं उनके अनुवाद तक सीमित हैं।
प्रिंट से इलेक्ट्रानिक तक हिन्दी की स्थिति यही है। अखबारों, संवाद समितियों और चैनलों तक में जोर अंग्रेजी पर है। संस्थान अपनी ऊर्जा का अधिकतम हिस्सा अंग्रेजी पर खर्च कर रहा है और हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं से उनका वास्ता काम चलाने भर का है। देश में बड़े स्तर के कार्यक्रम हों, विदेश दौरों का मामला हो या फिर कोई अन्य खर्चीला काम, कवरेज के लिए प्राथमिकता अंग्रेजी के पत्रकारों को दी जाएगी या फिर अगर आप हिन्दी के हैं तो आप इसी शर्त पर भेजे जाएंगे कि अंग्रेजी को भी आप पर्याप्त सेवाएं दें। अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद नियति है लेकिन हिन्दी से अंग्रेजी अनुवाद की जहमत नहीं उठायी जाएगी। यही स्थिति बुनियादी सुविधाओं और कई जगह तो वेतन ढांचों के मामले में भी देखने को मिलती है। कई बार देखा जाता है कि एक ही संस्थान में हिन्दी के पत्रकारों का औसत वेतन उसी संस्थान के अंग्रेजी के पत्रकारों के मुकाबले आधे से भी कम है।
इस परिप्रेक्ष्य में यह बात स्पष्ट तौर पर कही जा सकती है कि हिन्दी इन संस्थानों के लिए दुधारू गाय जरूर मालूम पड़ती है लेकिन उसे चारा देने में सबको परहेज है। हाल के वर्षों तक ऐसा होता था कि बड़े पत्र समूहों में किसी एक संस्करण से प्राप्त होने वाली अच्छी आय का उपयोग नये संस्करण प्रकाशित करने या अखबारों की गुणवत्ता सुधारने में होता था लेकिन अब ऐसी प्रवृति पनप रही है कि हिन्दी का उपयोग केवल राजस्व प्राप्ति के लिए हो और उस राजस्व का इस्तेमाल अन्य खर्चों की पूर्ति के लिए किया जाए। ताज्जुब होता है यह सुनकर कि हिन्दी का एक प्रसिद्ध और काफी पुराना दैनिक इन दिनों अपने विज्ञापन कारोबार से मिलने वाली रकम का भी जायदादी कारोबार में निवेष कर रहा है। बिल्डरों के मीडिया में आने की प्रवृति कुछ वर्ष पहले तक देखी जा रही थी लेकिन मीडिया वालों की बिल्डर बनने या अन्य कारोबार में घुसने की कोशिश कहीं से भी शुभ संकेत नहीं है, खासकर, हिन्दीभाषी मीडिया के मामले में उसकी ढांचागत कमजोरियों के मद्देनजर यह बात ज्यादा प्रभावी दिखती है।
यह तो बात थी अनुवाद की। पत्रकारिता के मूलतः बौद्धिक कार्य होने के कारण इसके पेशेवरों के बीच वैचारिक वादों के प्रति विशेष अनुराग की संभावना हमेशा बनी रहती है। हिन्दी पत्रकारिता के साथ भी ऐसा हो रहा है और वादों के प्रति अनुराग के अतिरेक में इसके पत्रकार कई बार सूचक की अपनी भूमिका से उठकर प्रवक्ता की भूमिका में आने को विकल मालूम पड़ते हैं। इस वजह से बारंबार उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। मार्क्सवाद से उग्र राष्ट्रवाद तक और यथास्थितिवाद से आधुनिकतावाद तक वैचारिक मंथन के मोर्चों पर कई बार पत्रकारों की तटस्थता संदिग्ध होती रही है। इस स्थिति का खामियाजा कहीं न कहीं पत्रकारिता को ही उठाना पड़ेगा। हिन्दी के साथ विडम्बना यह है कि उसके अधिकतर पत्रकार या तो इन वादों के मोहपाश में हैं या तात्कालिक लाभों के अनुकूल अलग-अलग वादों का चोला बदलते रहते हैं और जो लोग बौद्धिकता के इस ज्वर से पीडि़त नहीं हैं उनके लिए विवाद ही खबर है।
जैसा कि पहले कहा गया कि वाद और विवाद की समस्या भी हिन्दी में आयातित है। भारतीय मीडिया का मौलिक चरित्र अंग्रेजी का मीडिया ही तय करता है और इस वजह से अंग्रेजी की ही तरह हिन्दी में भी तुच्छ विवादों को खबर बनाने की कोशिश होती है। अंग्रेजी का टीवी मीडिया तो इस बीमारी से उबरने की बहुत हद तक कोशिश कर रहा है लेकिन अब तक अबोधपन से गुजर रही हिन्दी मीडिया के लिए यह समस्या विकराल ही होती जा रही है। ग्लैमर की दुनिया के बेसिरपैर विवाद प्रिंट से इलेक्ट्रानिक तक में कई बार मुख्य खबर बनकर महत्वपूर्ण खबरों को धकिया रहे हैं। सीएमएस मीडिया लैब समेत कई शोध संस्थान अपनी रिपोर्टों में इस बात की पुष्टि कर चुके हैं। ऐसी सतही खबरों में उलझकर रहने की हिन्दी मीडिया की अनावश्यक विवशता भी कहीं न कहीं उसकी दुर्गति का कारण है। इसलिए अब हिन्दी मीडिया को अपने बेहतर भविष्य से उबरने के लिए वाद, विवाद और अनुवाद की छाया से मुक्त होकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व स्थापित करने के लिए पहल करनी होगी।
ऋतेष पाठक, अगस्त अंक, २०११