शनिवार, 31 जनवरी 2015

फिल्‍म. निर्माण की प्रक्रिया:

 

 

 

 

डॉ. राम प्रकाश द्विवेदी

 




पहली बात- आइडिया की
(1) आइडिया या विचार-सूत्र की कौंध –One line story से ही फिल्‍म निर्माण की शुरूआत होती है। उदाहरण देंखें तो कहा जा सकता है कि अंबानी घराने की गूंज गुरु फिल्‍म में दिखाई देती है। प्रोड्यूसर के सामने कोई ऐसे ही एक लाइन का आइडिया लेकर जाता है और फिल्‍म बनाने का सिलसिला आगे बढ़ता है।

(2) इसी विचार-सूत्र को विकसित कर एक पूरी कहानी बनाई जाती है। निर्माता/निर्देशक द्वारा कहानी का चयन और परिवर्तन करने के बाद उसे स्‍वीकृत कर लिया जाता है। इसे हम फिल्‍म की कथा कह सकते हैं।

(3) कहानी के सामने आ जाने पर उसी के अनुसार मुख्‍य पात्रों (Hero & Heroines) का चयन निर्देशक करता है। सामान्‍यत: हीरो की स्‍वीकृति जरूरी मानी जाती है।ऐसा हो जाने पर फिल्‍म की प्रामाणिकता सिद्ध हो जाती है। यह बड़ा जोखिम का काम होता है। मसलन अशोका फिल्‍म में शाहरूख खान अपने अभिनय कौशल के बावजूद अशोक की भूमिका में फिट नहीं हो पाए।

(4) फिल्‍म की कथा को पटकथा में ढाले बिना फिल्‍म निर्माण बड़ा जटिल होता है।पटकथा लेखक/निर्देशक द्वारा कहानी की पटकथा (सिनेमा के फिल्‍मांकन के अनुरूप) तैयार की जाती है।दरअसल पटकथा एक नहीं अनेक होती हैं जिसमें कैमरा परसन और अभिनेताओं समेत सभी जरूरी लोगों के लिए आवश्‍यकता के अनुरूप पटकथाएँ तैयार की जाती हैं।
लेकिन,
लोचा यह है कि पटकथा लिखने से ज्‍यादा सुनने और बताने की चीज बन जाती है। बॉलीवुड में पटकथा लिखने के बजाय या फिर उस पर हू-ब-हू चलने के बजाय वह लगातार बदलती रहती है।
(5) पटकथा की तैयारी के साथ-साथ संवाद लेखक का आगमन होता है तथा र्निदेशक की सलाह से दृश्‍यों का ध्‍वनीकरण (spoken expression) करना तथा इससे जरूरी काट-छॉंट संभव हो जाती है और इससे पटकथा का नाटकीय विधान तन जाता है, उसमें कसाव पैदा होता है। पटकथा में स्‍पेसीफिक्स यानी समय, जगह और इनडोर तथा आउटडोर जैसी सूचनाएँ हमेशा इंगलिश में होते हैं।फिल्‍म के निर्माण में अनेक भाषा-भाषी लेाग काम करते हैं इसलिए आपसी बातचीत की भाषा हिंगलिश होती है।
(6) निर्माता द्वारा बजट (Budgeting) पर बातचीत तथा बजट के अनुरूप पटकथा का समायोजन एवं बदलाव जरूरी होता है।वास्‍तव में देखें तो बजट पटकथा पर दबाव बनाता है जिसके चलते पटकथा से कई दृश्‍य काट-छाँट दिए जाते हैं।
(7) फाइनेंसर और वितरक इसी दौरान स्‍टोरी सुनने आ जाते हैं। साथ ही वे तय करते हैं कि फिल्‍म में कितने गीत/नृत्‍य होंगे। इन दोनों की भूमिका कई बार निर्देशक की परिकल्‍पना को भी प्रभावित करने लगती है। अभिनेताओं के चयन में हेर-फेर भी इनके चलते कई बार करना पड़ता है।
(8) मुहूर्त की भारतीय सिनेमा में बड़ी भूमिका मानी जाती है। वास्‍तव में यह ऐसी शुभ प्रथा मानी जाती है जो फिल्‍म की शूटिंग का आगाज करती है। यह प्रोडयूसर का वित्‍त जुटाने का अवसर भी प्रदान करती है। कई बार तो वितरण के अधिकार भी इसी वक्‍त बिक जाते हैं।भारतीय फिल्‍म उद्योग में नारियल तोड़ने के साथ अनेक कार्य आरंभ किए जाते हैं।
(9) इसी दौरान संगीत निर्देशक के साथ पूरी तकनीकी यूनिट से संपर्क किया जाता है और संगीत और गीत रिकार्डिंग के काम के लिए समझौता(Contract) साइन कर लिया जाता है।कोरियोग्राफी का भूमिका भी जबर्दस्‍त होती है।गीत-नृत्‍य की शूटिंग अलग से की जाती है। भारतीय सिनेमा में गीत और संगीत फिल्‍म की सफलता की राह आसान बनाते हैं। आजकल बिना निश्चित संदर्भ के गाने भी जोड़े जाने का प्रचलन बढ़ा है। आयटम सांग का फिल्‍मों में समावेश इसी का परिणाम है।
(10) अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की सुविधा के अनुसार shooting की तारीखों और लोकेशन्‍स या स्‍टूडियों का निश्‍चय किया जाता है। स्‍टूडियो की शूटिंग एक समय सबसे महत्‍त्‍वपूर्ण मानी जाती थी लेकिन समानांतर फिल्‍मकारों ने इससे बाहर निकलकर वास्तविक लोकेशन्‍स पर ही फिल्‍मांकन को तवज्‍जो दी।इसमें धनागम (Flow of money) का भी ध्‍यान रखना पड़ता है। फिल्‍म कैसे और कहाँ और कितने समय तक शूट की जाए्गी यह बहुत कुछ धन की उपलब्‍धता पर भी निर्भर करता है। शूटिंग का कालखंड सामान्‍यत: छ: माह से साढ़े तीन वर्ष तक होता है। मुहूर्त से लेकर फिल्‍म के सिनेमाघर तक पहुँचने में एक से पाँच वर्ष तक लग जाते हैं।
(11) शूट की गई फिल्‍म के गैर तराशे अंशों को रशेस कहते हैं। इससे कहानी की क्रमिकता की पहचान की जा सकती है। संपादक तैयार Rushes को देखते हैं और अन्‍य फिल्‍मी हिस्‍सो से मिलान कर उनका संपादन कर लेते हैं।
(12) संपादक फिल्‍मों के रफ कट तैयार कर (शूटिंग के दौरान Gap में) निर्देशक को दिखाते
चलते हैं और जरूरी बदलावों को उसी समय नोट कर लिया जाता है। फाइनेंसर
और डिस्ट्रीब्‍यूटर को ये Rushes दिखाए जाते हैं जिसके आधार पर उनसे आगे पैसा लिया
जा सके।
(13) फिल्‍मांकन एक जटिल काम है।फिल्‍म की रील काफी मँहगी होती है, यह पूरे बजट का 10 प्रतिशत हिस्‍सा ले लेती है। अधिकांश एक्‍टर सेट पर ही अपनी रिहर्सल करते हैं और संवादों को वहीं दुहराते हैं। संवादों को बाद में अलग से डब किया जाता है जिससे शूटिंग के दौरान सिर्फ लिप-सिंक की जरूरत होती है।जब बार-बार की कोशिशों और रि-टेक से फिल्‍म शूट होकर, संपादित तथा देखकर एवं बहस- मुबाहिसों के बाद तैयार हो जाती है उसका फाइनल कट (Final cut) तैयार कर लिया जाता है।
(14) संगीत कंपोजर को पूरी फिल्‍म दिखाकर उसका संगीत रिकार्ड करवा लिया जाता
है। साथ ही, वह पार्श्‍व ध्‍वनियों का भी अभिलेखन(रिेकार्ड) कर लेता है।
(15) संपादक सारी पार्श्‍व ध्‍‍वनियों,संवादों और विशेष ध्‍वनि प्रभावों को फिल्‍म के साथ जोड़ (Fit) देता है। यह प्रकिया डबिंग कहलाती है। संवादों को डब करने के लिए हीरो और हीरोइन समेत सह अभिनेताओं को कई बार स्‍टूडियो आना पड़ता है।डबिंग पूरी होने पर इसे दृश्‍य फिल्‍म के साथ तकनीकी दक्षता से जोड़ दिया जाता है।इस नयी तैयार फिल्‍म को विवाहित प्रिंट कहा जाता है।इस Married Print में अभिनेताओं, फाइनेंसर और वितरकों की संतुष्टि का ख्‍याल रखा जाता है।
(16) फिल्‍म (Married Print) अब Censor Board के पास Certificate लेने हेतु भेजी
जाती है और सेंशर द्वारा सुझाए बदलावों को संपादक , निर्देशक की अनुमति से
समाहित कर लेता है।
(17) पूरी फिल्‍म का पुनर्अभिलेखन(रि-रिकार्डिंग) होता है। इस बीच गीतों और टी0वी0 शो तथा ट्रेलर आदि के जरिए फिल्‍म दर्शकों में जिज्ञासा जगा चुकी होती है।
(18) अब कर्इ Release Prints तैयार किया जाते हैं। वितरकों को समझौते के अनुसार ये प्रिट उपलब्‍ध कराए जाते हैं।
(19) प्रेस के लिए प्रदर्शन आयोजित किये जाते हैं। इससे प्रिंट मीडिया में भी फिल्‍म की समीक्षाएँ आनी प्रारंभ हो जाती हैं और फिल्‍म दर्शकों को खीचनें में कामयाब होती है।
(20) अनेक अन्‍य स्‍तरों मसलन पोस्‍टर आदि द्वारा भी व्‍यापक प्रचार-प्रसार अभियान चलाया है, और
(21) सिनेमा थिएटरों में फिल्‍म प्रदर्शित कर दी जाती है।

समाचार के स्त्रोत

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    कभी भी कोई समाचार निश्चित समय या स्थान पर नहीं मिलते। समाचार संकलन के लिए संवाददाताओं को फील्ड में घूमना होता है। क्योंकि कहीं भी कोई ऐसी घटना घट सकती है, जो एक महत्वपूर्ण समाचार बन सकती है। समाचार प्राप्ति के कुछ महत्वपूर्ण स्रोत निम्न हैं-
    1. संवाददाता- समाचार-पत्रों में संवाददाताओं की नियुक्ति ही इसलिए होती है कि जिले में घूम-घूम कर दिन भर की महत्वपूर्ण घटनाओं का संकलन करें और उन्हें समाचार का स्वरूप दें।
    2. समाचार समितियाँ- देश-विदेश में अनेक ऐसी समितियाँ हैं जो विस्तृत क्षेत्रों के समाचारों को संकलित करके अपने सदस्य अखबारों को प्रकाशन के लिए प्रस्तुत करती हैं। मुख्य समितियों में पी.टी.आई. भारत, यू.एन.आई.भारत, ए.पी. अमेरिका, ए.एफ.पी. फ्रान्स, रायटर ब्रिटेन।
    3. प्रेस विज्ञप्तियाँ- सरकारी विभाग, सार्वजनिक अथवा व्यक्तिगत प्रतिष्टान तथा अन्य व्यक्ति या संगठन अपने से सम्बन्धित समाचार को सरल और स्पष्ट भाषा में लिखकर समाचार-पत्र के कार्यालयों में प्रकाशन के लिए भेजवाते हैं। सरकारी विज्ञप्तियाँ चार प्रकार की होती हैं।
    (अ) प्रेस कम्युनिक्स- शासन के महत्वपूर्ण निर्णय प्रेस कम्युनिक्स के माध्यम से समाचार-पत्रों को पहुँचाए जाते हैं। इनके सम्पादन की आवष्यकता नहीं होती है। इस रिलीज के बाएँ और सबसे नीचे कोने पर सम्बन्धित विभाग का नाम, स्थान और निर्गत करने की तिथि अंकित होती है।
    (ब) प्रेस रिलीज- शासन के अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण निर्णय प्रेस रिलीज के द्वारा समाचार-पत्र के कार्यालयों को प्रकाषनार्थ भेजे जाते हैं। जैसे रेल भाड़ा अथवा ब्याज-दरों में वृद्धि।
    (स) हैण्ड आउट- दिन-प्रतिदिन के मन्त्रालय के क्रिया-कलापों की सूचना हैण्ड-आउट के माध्यम से दी जाती है। यह प्रेस इन्फारमेशन ब्यूरो द्वारा प्रसारित किए जाते हैं।
    (द) गैर-विभागीय हैण्ड आउट- मौखिक रूप से दी गई सूचनाओं को गैर-विभागीय हैण्ड आउट के माध्यम से प्रसारित किया जाता है।
    4. पुलिस विभाग- सूचना का सबसे बड़ा केन्द्र पुलिस विभाग का होता है। पूरे जिले में होने वाली सभी घटनाओं की जानकारी पुलिस विभाग की होती है, जिसे पुलिस-प्रेस के प्रभारी संवाददाताओं को बताते हैं।
    5. सरकारी विभाग- पुलिस विभाग के अतिरिक्त अन्य सरकारी विभाग समाचारों के केन्द्र होते हैं। संवाददाता स्वयं जाकर खबरों का संकलन करते हैं अथवा यह विभाग अपनी उपलब्धियों को समय-समय पर प्रकाषन हेतु समाचार-पत्र कार्यालयों को भेजते रहते हैं।
    6. चिकित्सालय- शहर के स्वास्थ्य संबंधी समाचारों के लिए सरकारी चिकित्सालयों अथवा बड़े प्राइवेट अस्पतालों से महत्वपूर्ण सूचनाएँ प्राप्त होती हैं।
    7. कारपोरेट आफिस- निजी क्षेत्र की कम्पनियों के आफिस अपनी कम्पनी से सम्बन्धित समाचारों को देने में दिलचस्पी रखते हैं।
    8. न्यायालय- जिला अदालतों के फैसले व उनके द्वारा व्यक्ति या संस्थाओं को दिए गए निर्देश समाचार के प्रमुख स्रोत हैं।
    9. साक्षात्कार- विभागाध्यक्षों अथवा व्यक्तियों के साक्षात्कार समाचार के महत्वपूर्ण अंग होते हैं।
    10. समाचारों का फालो-अप या अनुवर्तन- महत्वपूर्ण घटनाओं की विस्तृत रिपोर्ट रुचिकर समाचार बनते हैं। पाठक चाहते हैं कि बड़ी घटनाओं के सम्बन्ध में उन्हें सविस्तार जानकारी मिलती रहे। इसके लिए संवाददाताओं को घटनाओं की तह तक जाना पड़ता है।
    11. पत्रकार वार्ता- सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थान अक्सर अपनी उपलब्धियों को प्रकाशित करने के लिए पत्रकारवार्ता का आयोजन करते हैं। उनके द्वारा दिए गए वक्तव्य समृद्ध समाचारों को जन्म देते हैं।
    उपर्युक्त स्रोतों के अतिरिक्त सभा, सम्मेलन, साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम, विधानसभा, संसद, मिल, कारखाने और वे सभी स्थल जहाँ सामाजिक जीवन की घटना मिलती है, समाचार के महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं।

विज्ञापन के मानवीय सन्दर्भ



 

 

विज्ञापन संस्कृतिः सामाजिक आर्थिक परिवर्तन के मानवीय सन्दर्भ

प्रस्तुति- राहुल मानव
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आज संस्कृति और मानवीय सभ्यता दोनों पर अधिक खतरे हैं। क्योंकि, मानव समाज की जो स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है, वह एक ऐसे मोड़ में मुड़ चुकी है, जो सीधे विनाश की ओर अग्रसर है। वर्तमान समय में हमारे समाज के सामने विभिन्न प्रकार के सिद्धांत, धर्म, विचारधाराएं व लक्ष्य हैं। एक सामान्य मनुष्य से लेकर बुद्धि सम्पन्न व्यक्ति के लिए यह निश्चित कर पाना कठिन होता जा रहा है कि वह कौन-से साधन को अपनाएं, स्वीकार करे।
इस संदर्भ में, संचार समाजीकरण का प्रमुख माध्यम है। संचार द्वारा सामाजिक और सांस्कृतिक परम्पराएं एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती है। ‘‘इतिहास के लम्बे दौर में मनुष्य का इन्द्रिय-प्रत्यक्षीकरण मानवजाति के रहन-सहन के तरीके के अनुसार बदलता रहा है। मनुष्य किस प्राकर से अपने इन्द्रिय-प्रत्यक्षीकरण को संगठित करे, किस माध्यम से वह इसे प्रभावित करे- ये बाते केवल प्रकृति द्वारा ही प्रभावित नहीं होती, बल्कि ऐतिहासिक व सामाजिक परिस्थितियों द्वारा भी।’’ चूकि मानव समाज के विकास में प्रकृति के साथ-साथ मानव द्वारा उत्पन्न परिस्थितियां भी उसके और सामाजिक परिवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं। इसलिए परिवर्तन की प्रक्रिया हिंसक हो या अहिंसक यह समस्या मानव विकास की जड़ों से जुड़ी हुई है। इसमें दुविधा यह है कि आदमी कौन-सा रास्ता अपनाएं, हिंसा का या अहिंसा का। क्योंकि, सामाजिक लक्ष्यों के अलावा व्यक्तिगत जीवन और इसमें पैदा होने वाली स्थितियों से वह सदैव उलझा रहता है। यह समस्या मानवीय व्यवहार से जुड़ी है और सामाजिक जीवन मूलतः व्यवहार पर आधारित है। मनुष्य का सामाजिक व्यवहार उसके संस्कारों और संचार के माध्यमों पर भी निर्भर करता है। ’’संस्कार आमतौर पर व्यक्ति के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों से बनते हैं। जब वह अपने अनुभवों से गुजरता हुआ, शिक्षा और अध्ययन के द्वारा अपने आलोचनात्मक विवके से अपने समय और समाज की नई समझ बनाता हुआ आगे बढ़ता है जिससे मनुष्य के संस्कारों और उसकी अभिरूचियों में भी अंतर आता है।’’ चूंकि, मानव संस्कार परिवर्तनशील है इसलिए मानव समाज में और उसके सामाजिक व्यवहार में गतिशीलता सदैव बनी रहती है। सामाजिक व्यवहार में गतिशीलता बनी रहे ताकि विकास अपनी सतत् क्रिया-प्रतिक्रिया में अग्रसर होता रहे। इसलिए समाज में सम्पे्रषण जरूरी है क्योंकि सम्पे्रषण ही मानव समाज की वह कड़ी है जो विकास में निरंतता को बनाए रखती है।

हमें उन सामाजिक आवश्यकताओं एवं बन्धनों के वातावरण को जानना जरूरी है जिनमें मानव प्राणी सम्पे्रषण करता है। सम्प्रेषण अपने आप में विकास एक माध्यम है। ’’सम्पे्रषण का तकनीकी माध्यम जिसके चार घटक प्रमुख हैं- संदेश प्रेषित करने वाला, संदेश को ग्रहण करने वाला, संदेश जिसे प्रेषित कया जाना है और माध्यम जिसके द्वारा संदेश को संप्रेषित करना है।’’ सूचना या संदेश को सम्पे्रेषित करने वाले माध्यमों पर धीरे-धीरे बहुत कम लोगों का एकाधिकार बढ़ रहा है, जो अपनी विचारधारा एवं लाभोपार्जन की नीति को ध्यान में रखते हुए उसका गलत लाभ उठाने में दिन-प्रतिदिन सक्रिय होते जा रहे हैं। एडुआर्डो गैलियानों लिखते है कि ‘‘संचार माध्यमों पर थोडे़ से ऐसे लोगों का एकाधिकार है जिनकी सब लोगों तक पहंुच है। इतने सारे लोग इतने थोड़े से लोगों द्वारा संचार की दृष्टि से बंधक बनाकर रखे गए हो, ऐसा कभी नहीं हुआ।….. ये लोगों पर ऐसी जीवन शैली थोप रहे हैं, जिसका आदर्श नागरिक एक दासवत उपभोक्ता और एक निष्क्रिय दर्शक है।’’
ब्रिटिश भारत से पहले की भारतीय सभ्यता की बात करें, तो भले ही यहां हमें मोटे रूप से वर्ण व्यवस्था दिखाई देती हो, लेकिन उस समय मानवीय मूल्य व सभ्यता के सकारात्मक उदाहरण भी हमें मिलते है। औद्योगिक क्रांति के नाम पर मची विश्व में लूट ने मानव को धीरे-धीरे भूमण्डलीकरण के सिद्धांत में व्यक्तिवादी पहले से कहीं ज्यादा बनाने में अपनी सहभागीता दी है। इस प्रसंग में गांधी की पुस्तक ‘हिन्दस्वराज’ पश्चिमी व भारतीय सभ्यता के टकराव पर आधारित है। इसमें बार-बार गांधी यह कहते हुए नजर आते हैं कि भारतीय सभ्यता पर परिचमी सभ्यता अपना प्रभाव छोड़ रही है, जो भारतीय सभ्यता के लिए सकारात्मक नहीं है। इस सभ्यता को गांधी ने ‘शैतानी सभ्यता‘, प्रेमचन्द ने ‘महाजनी सभ्यता‘ व टेगौर ने ‘सभ्यता का संकट’ कहा है।
भले ही 19वीं सदी में डार्विन ने प्रकृति से, माक्र्स ने समाज से और फ्रायर्ड ने मनुष्य की चेतना से ईश्वर को निकाल कर बाहर कर दिया हो, मगर गांधी इसी ईश्वर में निष्ठा रखते हुए विश्व का सबसे बड़ा अहिंसक व्यवहार मानव जाति के सामने रखते हैं। ‘‘गैर-पश्चिमी समाज तथा सभ्यता के बारे में पश्चिम की अभिधारण ;ंेेनउचजपवदेद्ध तथा आधार वाक्यों ;च्तमउपेमेद्ध को लेकर आलोचनात्मक जांच, व्याख्या तथाा मूल्याकंन की यह परम्परा गांधी से ही शुरू होती है। गांधी पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने भविष्य दृष्टा की तरह पश्चिमी सभ्यता में निहित अशुभ प्रवृत्तियों के खतरनाक संभाव्य शक्ति का पर्दापाश किया था। दूसरे चितकों ने उपनिवेशवाद के विरूद्ध आवाज उठायी थी, परन्तु किसी ने आधुनिकता के पश्चिमी मॉडल का विरोध नहीं किया था।’’
‘हिन्दस्वराज’ पुस्तक के पहले प्रश्न का उत्तर गांधी कुछ इस भाव में देते हुए नजर आते हैं कि ‘मीडिया का एक पहलू तो यह है कि लोगों की भावनायें जानना और उन्हें जाहिर करना, दूसरा काम लोगों में मानवीय भावनाएं पैदा करना और तीसरा काम है लोगों के दोष उन्हें बताना’- ताकि एक ऐसे समाज का निर्माण हो जिसमें केवल किसी एक वर्ग का नहीं अपितु पूरे समाज के नागरिकों का विकास हो सकें। गांधी ‘हिन्दस्वराज’ में मशीनीकरण, रेल, वकील, डॉक्टर आदि का विरोध करते हैं। आज के समय यदि गांधी रहते तो वे सबसे पहले संचार माध्यमों व इन पर हुकूमत रखने वालों का ही विरोध करते। क्योंकि, आज मीडिया एक ऐसी समाज रचना में अपनी अहम भूमिका दे रहा है जो किसी एक खास वर्ग द्वारा ही संचालित है।

भूमण्डलीकरण व लोकतंत्र में यह दावा बार-बार किया जाता रहा है कि ‘हर व्यक्ति को निर्णय लेने का समान अधिकार है। इस अधिकार के सिद्धांत की वकालत करने वाले शायद यह भूल जाते हैं कि प्रत्येक मुनष्य में उत्कृष्टता हासिल करने की एक समान क्षमता नहीं होती और जिस क्षमता के साथ वह अपना निर्णय लेने में सफल होता है वो क्षमता उसकी न हो कर उसके आसपास के वातावरण में होती है, जो पूर्णतः संचार माध्यमों द्वारा प्रायोजित होती है। ’’संचार के साधनों का विकास तो मानव सभ्यता के साथ ही हुआ, लेकिन जिन्हें जनसंचार कहा जा रहा है, उसके विकास का संबंध पूंजीवादी विकास के साथ जुड़ा है। और जनमाध्यम किस तरह के होंगे, यह बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि समाज किस तरह का है और उसके विकास की दिशा क्या है।’’ पूंजीवादी देशों में पूंजी के द्वारा ही यह तय होता है कि जनसंचार के साधन व उद्देश्य क्या होंगे? पूंजीवाद का विस्तार सदैव अपनी राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर रहा है। यह ‘‘अब तक के मानव इतिहास में सबसे अधिक गतिमान उत्पादन का स्रोत रहा है। इसके गतिशील किन्तु इसके परस्पर विरोधी स्वभाव का परिणाम यह होता है कि उत्पादन इसके बढ़ते हुए सामाजीकरण के ही द्वारा होता है।’’
भले ही सामाजीकरण धर्म, राजनीति, विज्ञान, भाषा, जाति या आर्थिक स्थिति पर निर्भर हो, मगर आधुनिक समय में संचार माध्यम व संचार प्रणाली ने मानव की उपभोग शक्ति को बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। चूंकि उपभोक्ता, मांग और पूर्ति के सिद्धांत पर निर्भर है और मांग से ज्यादा आधुनिक पूंजीवाद (बाजारवाद) ने संचार प्रणाली से पूर्ति की मांग पूरी की है जो कहीं-न-कहीं उपभोक्तावादी प्रणाली को अत्यन्त बढ़ावा दे रही है।
पूंजीवाद ने अर्थव्यवस्था, राजनीति और संस्कृति पर संचार व संचार प्रणाली के अतिविकसित साधनों द्वारा अपना वर्चस्व बना लिया है। ‘‘पूंजीवाद के साधन के रूप में जब से लोकतंत्र पर संचार व सूचना प्रणाली इस्तेमाल होने लगी तभी से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बोलने की आजादी की आड़में लोगों की सोचने की आजादी तक को छीना जा रहा है। और यह दावा किया जाता है कि यह लोकतांत्रिक देश है। अमरीकी भाषा वैज्ञानिक और चिंतक नोम चोम्स्की ने तथाकथित लोकतांत्रिक समाजों में इन संचार के नए संसाधनों का इस्तेमाल किस तरह जनता के दिमाग पर नियंत्रण करने के लिए किया जा रहा है इस पर गहरा विचार किया है। पंूजीवाद एक विचारधारा है जिसमें इस सिद्धांत पर अत्याधिक बल दिया जाता है कि किसी भी तरह से लाभोपार्जन की नीति कायम रहे। इस नीति व लक्ष्य के लिए वे यह किसी भी अनैतिक व नैतिक साधनों को इस्तेमाल करने में नहीं झीझकते। स्वनपे ।सजीनेेमत की यह धारणा है कि ‘हम सभी विचारधारा के द्वारा बनाये जाते हैं। स्वनपे के अनुसार समाज की संरचना तीन स्तरों पर होती है-आर्थिक, राजनैतिक और वैचारिक। हालांकि, ये तीनों ही स्तर एक-दूसरे से जुडे़ हुए हैं। वे इस बात का तर्क रखते हैं कि वर्ग वस्तुतः औद्योगिक पूंजीवादी समाज का ही परिणाम है तथा विचारधारा इस वर्ग विभाजन को बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वह पूंजीवाद के लिए ’ैपदं फनं दवद’ है। विचारधार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सामाजिक व्यवस्था में अपनी दखल को बनाये रखती है।’’8 पाठक विचाराधाराओं को बनाए रखने में ‘सूचना क्रांति’ के बाद उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिले। ‘सूचना क्रांति’ या ‘सूचना विस्फोट’ के बाद टेलीविजन और सूचना प्रसारण ने समाज में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन किया जो मूलतः पूंजीवाद पर आधारित था। विकसित अर्थव्यवस्थाओं के बाजार पूरी तरह से भरे पडे़ हैं। इसी वजह से मार्केटिंग के जरिए कृत्रिम मांग पैदा करने की कोशिश आज व्यवसाय का अनिवार्य हिस्सा हो गयी है।.. अर्थात् माल कैसे बेचा जाए।
मार्केट की मांग बनी रहे और पूर्ति भी होती रहे इस धारणा को बनाए रखने में अर्थात् कृत्रिम मांग अधिक से अधिक हो, के साधन के रूप में संचार प्रणाली व माध्यमों में ‘विज्ञापन’ अपनी भूमिका में उल्लेखनीय है। विज्ञापन द्वारा व्यक्ति की इच्छा को बढ़ावा दिया जाता है, जिसके चलते यह मांग उत्पन्न करता है और उपभोगवादी प्रवृति में अपनी भूमिका रखता है। ‘विज्ञापन’ पंूजीवाद के विकास में एक ‘टूल्स’ के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। भले ही वह केवल ‘विज्ञापन’ न रह कर स्वयं एक व्यवसाय का रूप धारण कर चुका हो। विश्व की सबसे तेज बुद्धि आज इस क्षेत्र में लगती है।
‘संस्कृति उद्योग और ज्ञानोदय का भ्रम’ नामक लेख में ‘एम. हार्खाइमर’ लिखते है कि ‘‘विज्ञापन झूठ बोलने की कला का दूसरा नाम है। इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है और जैसा कि गोबेल्स कहा करता था कि, समझदारी के साथ इसका इस्तेमाल किया जाए तो यह सामाजिक शक्ति को व्यक्त करता है।’’ टेवीविजन पर दिखाई देने वाले विज्ञापनों का मानव पर मनोवैज्ञानिक असर इस हद तक प्रभावी होती है कि वह न चाहकर भी उसे हासिल करने की चेष्टा करता है। टी.डब्ल्यू. एडर्नो लिखते है कि ‘संस्कृति उद्योग में प्रचार की जीत यह है कि उत्पादों को खरीदने और उपयोग करने के लिए बाध्य हो जाते है।’’
इलेक्ट्रोनिक माध्यमों का असर छपे हुए शब्दों से अधिक गहरा होता है। ये माध्यम व्यक्ति के मनोविज्ञान को बदलने की शक्ति रखते हैं। इसलिए उसके कार्य-व्यवहार को संचालित करने की ताकत भी इनमें निहित है। भले ही हम आज एक ऐसे समाज में है जिसकी सारी सीमाएं प्रौद्योगिकी की सहायता से टूट गई हैं। लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था के अंग के रूप में विज्ञापन सामाजिक व्यवस्था को न्ययोचित ठहरानें एवं उसके पक्ष में आम सहमति बनाने का कार्य करता है। दि जर्मन आइडियोलाजी में’ माक्र्स लिखते है कि ‘जो वर्ग भौतिक उत्पादन के संसाधनों पर प्रभुत्व रखता है, वही मानसिक उत्पादन के संसाधनों पर भी नियंत्रण रखता है ताकि जिनके पास मानसिक उत्पादन के संसाधनों का आभाव है उनके विचारों पर भी नियंत्रण रखा जा सके।’
1990 के बाद सामाजिक एवं सांस्कृतिक समस्याएं तेजी से उभर कर सामने आयी क्यांेकि टी.वी. पर दिखाई देने वाले विज्ञापनों में सेक्स व हिंसा को बढ़ावा मिला, आज टीवी पर दिखाई देने वाले विज्ञापन इन्ही पर आधारित होते हैं। प्रसिद्ध अमरिकी समाजशास्त्री हरवर्ट आई. शिलर लिखते है कि ‘‘विश्वव्यापी बाजार और निर्वाध मुनाफे को सुनिश्चित करने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ये (विज्ञापन) प्रत्येक सांस्कृतिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकते है।’’
विज्ञापन के केन्द्रबिंदू ‘पूंजीवाद’ में लोभ, लाभोपार्जन, मांग और पूर्ति, उपभोग तथा साध्य प्रमुख रहते हैं। पूंजीवाद ने जिस तरीके से समाज (लोकतंत्र) पर पकड़ बनाई है जिसे वह और मजबूती से जकड़ रहा है। आधुनिक विमर्श में भले ही इसे जगह मिली हो, लेकिन आम आदमी की पकड़ से यह बात दूर है कि ‘पूंजीवाद और जनकल्याणकारी राज्य’ में गठजोड़ हो चुका है। इस गठबंधन के उदाहरण हमें अक्सर विज्ञापन के माध्यम से देखने को मिलते हैं।
विज्ञापन की थीम तथा प्रस्तुत उत्पाद से प्रायः आम आदमी गायब रहता है। चूंकि, विज्ञापन को देखना, समझना, उक्त उत्पाद को खरीदना तथा अपने साथियों के बीच उस पर चर्चा करना, एक निश्चित वर्ग की जीवन शैली का अभिन्न हिस्सा हो सकता है। विज्ञापन के जरिए हमें अधिकारों के प्रति थोड़ा सचेत किया जाता है, लेकिन यहां कर्तव्य हमेशा गौण ही रहते है।
पूंजीवाद में कर्तव्यों की जगह लाभ हो स्थान दिया जाता है जिससे एक पूंजीवादी संचार व्यवस्था को समाज में एक बड़ा क्षेत्र मिलता है, जिसके माध्यम से समाज की व्यवस्था-प्रशासन को दिन-प्रतिदिन लाचार बनाया जा रहा है। विज्ञापन में जनकल्याण का सिद्धांत या व्यवहार अपनी पैठ, समाज में नहीं बना सकता है, और समाज(राज्य) पर यदि एक बार किसी तरह पूंजीवाद विचारधारा का नियंत्रण हो गया तो इस नियंत्रण स्थापित करने की प्रक्रिया में पूरे कर्जखोर समाज की संस्थाओं का पूरा तंत्र उसकी चपेट में आ जाता है। क्योंकि पैठ कैसी बनानी है और साधन क्या होगा, इसका निर्णय पैठ बनाने वाली शक्तियां तय करती है जो पूरी तहर से लाभोपार्जन के सिद्धांत पर पूंजीवाद व्यवस्था के कब्जे में है।
व्यवस्था की इस पद्धति को बनाए जाने के साथ ही अत्यंत उन्नत तकनीक और मनोवैज्ञानिक ढंग से राज्य के जरिए पूंजीवाद अपने को व्यावसायिक बनाए रखने का परिदृश्य हमारे सामने रहता है। व्यवस्था का यह भाव राज्य में भेदभाव और प्रतियोगिता को जन्म देता है तथा हमारे निर्णय लेने व काम को व्यवहारिक रूप देने में गलत विचारों को प्रायः तैयार रखता है जो वस्तुतः गैर-राजनैतिक, निष्पक्ष नहीं होते। इस पूरी व्यवस्था में हमें भले ही लगे कि हम आज विकसित समाज में रहते है, परन्तु यह विकास वास्तविक रूप में हमारा न होकर इसी व्यवस्था का एक और नया हथियार
विज्ञापन की इस प्रसारण प्रक्रिया ने राज्य पर एक दबाव और डाला जिसने हमारे राज्य-सांगठनिक ढांचे के बदलाव में प्रतिरोध खड़ा दिया। हमारे राज्य के साथ पूंजीवादी व्यवस्था के गठजोड़ का उदाहरण हमे आज स्पष्ट दिखाई देने लगा है, विज्ञापन के माध्यम से यही व्यवस्था-प्रक्रिया हमें अच्छी दिखाई जाती है, हमारे राज्य को लाचार और बेबस दिखाया जाता है, जहां हमें यह सोचने के बजाय कि क्या करें-कौन उचित है? कि जगह सीधे एक मात्र उपाय इस व्यवस्था से जुड़ना ही दिखाता है। निजीकरण के दौर में राज्य का हस्तक्षेप दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है। निजीकरण के नाम पर भले ही हमें ऊपरी तौर पर व्यवस्थाएं ठीक लगती हो, लेकिन अंदर तो खोखलापन है। हमें विकल्प की जगह व्यवस्था को बदलना होगा। तभी हम मानव के समुदाय की रचना कर पाएगें।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (ॅभ्व्) द्वारा जारी स्वास्थ्य को लेकर चलने वाले कार्यक्रम-राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम, पोलियो, एड्स, टीकाकरण, टीवी निवारण, कुष्ठ रोग निवारण आदि कार्यक्रम भारत में एक लम्बी यात्रा हमेशा से ही करते रहे है लेकिन सफलता इन्हे ‘छळव्’ ‘गैर-सरकारी संगठन’ के बाद हाथ लगी। इसके पीछे कारण यह कि हमारा राज्य हमारी मांगें पूरी नहीं कर पाता है, राज्य के जिम्मेदारी के काम प्रतिदिन कम हो रहे हें तथा यहां भी निजीकरण के बाद जनता की जरूरतें बाद की श्रेणी में आती है। जो संचार माध्यमों की अपनी एक प्रौद्योगिकी के बाद तैयार की जाती है।
विश्व पूंजीवादी व्यवस्था अपने अर्थव्यवस्था के जरिए विश्व के उत्पीड़ित देशों के शासक वर्गो की सहयोगी भूमिका को बराबर इसलिए बनाए रखती है कि यही एक शसक्त माध्यम है जिसके चलते वह सांस्कृतिक घुसपैठ की एकतरफा प्रक्रिया पर अपना कब्जा करती है। फिर इसी माध्यम से राज्य के केन्द्र में बैठे सीमित लोगों पर अपनी पकड़ करते हुए, खास अभियान को व्यवहारिक रूप देती है। और एक समय ऐसा आता है कि इसी व्यवस्था के माध्यम से बहुराष्ट्रीय निगमों के कानून-नियम तैयार होते हैं, इन्ही के माध्यम से इस व्यवस्था में ऊर्जा का संचार होता है, और विश्व व्यवस्था के केन्द्र में बैठे शासक वर्गो की संस्कृति पूरे व्यवस्था के माध्यम से राज्य की आखरी ईकाई की चेतना तक एक विश्व बाजार का रूप निर्धारण कर लेती है।
अमरीकी विज्ञानी लिअन कास ने लिखा है कि ‘‘हमारे पास बुद्धि कम है, इसलिए सावधानी हमारी फौरी जरूरत है। दूसरे शब्दों में ‘अंतिम बुद्धि’ के अभाव में हम इतना ही बुद्धिमान हो सकते हैं कि इतना भर जान लें कि हमारे पास पर्याप्त बुद्धि नहीं है तो बुद्धिमानी इसी में है कि काम न किया जाए। बुद्धिमानी सिर्फ इसी में हैं कि सावधानी, संयम, विलंब और (प्रक्रिया से ) बिलगाव, जैसे कदम मानव अभियंत्रणा के बारे में उठाए जाए।’’

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कार्टूनिस्ट बाल ठाकरे



Bal Thackeray at 70th Master Dinanath Mangeshkar Awards (1) (cropped).jpg

शिव सेना के संस्थापक और अध्यक्ष

जन्म २३ जनवरी १९२६
पुणे,[1] बंबई प्रेसीडेंसी
मृत्यु १७ नवम्बर २०१२
मुंबई
राजनीतिक दल शिव सेना
जीवन संगी मीना ठाकरे
बच्चे बिन्दुमाधव ठाकरे, जयदेव ठाकरे,
उद्धव ठाकरे
निवास मुंबई, भारत
बालासाहेब केशव ठाकरे (२३ जनवरी १९२६ - १७ नवम्बर २०१२)[2] भारत के महाराष्ट्र प्रदेश के प्रसिद्ध राजनेता थे जिन्होने शिव सेना के नाम से एक प्रखर हिन्दू राष्ट्रवादी दल का गठन किया था। उन्हें लोग प्यार से बालासाहेब भी कहते थे। वे मराठी में सामना नामक अखबार निकालते थे। इस अखबार में उन्होंने अपनी मृत्यु से कुछ दिन पूर्व अपने सम्पादकीय में लिखा था-"आजकल मेरी हालत चिन्ताजनक है किन्तु मेरे देश की हालत मुझसे अधिक चिन्ताजनक है; ऐसे में भला मैं चुप कैसे बैठ सकता हूँ?"
उनके अनुयायी उन्हें हिन्दू हृदय सम्राट कहते थे।[3]
ठाकरे ने अपने जीवन का सफर एक कार्टूनिस्ट के रूप में शुरू किया था। पहले वे अंग्रेजी अखबारों के लिये कार्टून बनाते थे। बाद में उन्होंने सन १९६० में मार्मिक के नाम से अपना एक स्वतन्त्र साप्ताहिक अखबार निकाला और अपने पिता केशव सीताराम ठाकरे के राजनीतिक दर्शन को महाराष्ट्र में प्रचारित व प्रसारित किया। सन् १९६६ में उन्होंने शिव सेना की स्थापना की।[4]
मराठी भाषा में सामना के अतिरिक्त उन्होंने हिन्दी भाषा में दोपहर का सामना नामक अखबार भी निकाला। इस प्रकार महाराष्ट्र में हिन्दी व मराठी में दो-दो प्रमुख अखबारों के संस्थापक बाला साहब ही थे।[5] खरी-खरी बात कहने और विवादास्पद बयानों के कारण वे मृत्यु पर्यन्त अखबार की सुर्खियों में बराबर बने रहे।[4]
१७ नवम्बर २०१२ को मुम्बई में अपने मातुश्री आवास पर दोपहर बाद ३ बजकर ३३ मिनट पर उन्होंने अन्तिम साँस ली।

अनुक्रम

संक्षिप्त जीवन

बालासाहेब का जन्म २३ जनवरी १९२६ को पुणे में केशव सीताराम ठाकरे के यहाँ हुआ था।[1] उनके पिता केशव चान्द्रसेनीय कायस्थ प्रभू परिवार से थे।[6] वे एक प्रगतिशील सामाजिक कार्यकर्ता व लेखक थे जो जातिप्रथा के धुर विरोधी थे। उन्होंने महाराष्ट्र में मराठी भाषी लोगों को संगठित करने के लिये संयुक्त मराठी चालवाल (आन्दोलन) में प्रमुख भूमिका निभायी और बम्बई को महाराष्ट्र की राजधानी बनाने में १९५० के दशक में काफी काम किया।
बालासाहेब का विवाह मीना ठाकरे से हुआ। उनसे उनके तीन बेटे हुए-बिन्दुमाधव, जयदेव और उद्धव ठाकरे[7] उनकी पत्नी मीना और सबसे बड़े पुत्र बिन्दुमाधव का १९९६ में निधन हो गया।[8]
बतौर आजीविका उन्होंने अपना जीवन बम्बई के प्रसिद्ध समाचारपत्र फ्री प्रेस जर्नल में कार्टूनिस्ट के रूप में प्रारम्भ किया। इसके बाद उन्होंने फ्री प्रेस जर्नल की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और १९६० में अपने भाई के साथ एक कार्टून साप्ताहिक मार्मिक की शुरुआत की।[9]

राजनीतिक जीवन

१९६६ में उन्होंने महाराष्ट्र में शिव सेना नामक एक कट्टर हिन्दूराष्ट्र वादी संगठन की स्थापना की। हालांकि शुरुआती दौर में बाल ठाकरे को अपेक्षित सफलता नहीं मिली लेकिन अंततः उन्होंने शिव सेना को सत्ता की सीढ़ियों पर पहुँचा ही दिया। १९९५ में भाजपा-शिवसेना के गठबन्धन ने महाराष्ट्र में अपनी सरकार बनाई। हालांकि २००५ में उनके बेटे उद्धव ठाकरे को अतिरिक्त महत्व दिये जाने से नाराज उनके भतीजे राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़ दी और २००६ में अपनी नई पार्टी 'महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना' बना ली। बाल ठाकरे अपने उत्तेजित करने वाले बयानों के लिये जाने जाते थे और इसके कारण उनके खिलाफ सैकड़ों की संख्या में मुकदमे दर्ज किये गये थे।

मुद्दे एवं कृत्य

  • १४ फ़रवरी २००६ को वेलेण्टाइन दिवस पर शिवसैनिकों द्वारा नाला सोपारा में एक महिला पर हाथ उठाये जाने पर बाल ठाकरे ने इसकी भर्त्सना की और शिवसैनिकों की ओर से खुद माफ़ी माँगी।![10]

खराब स्वास्थ्य और मृत्यु

बाला साहेब को उनके निरन्तर खराब हो रहे स्वास्थ्य के चलते साँस लेने में कठिनाई के कारण २५ जुलाई २०१२ को मुम्बई के लीलावती अस्पताल में भर्ती किया गया।[11] १४ नवम्बर २०१२ को जारी बुलेटिन के अनुसार जब उन्होंने खाना पीना भी त्याग दिया तो उन्हें अस्पताल से छुट्टी दिलाकर उनके निवास पर ले आया गया और घर पर ही सारी चिकित्सकीय सुविधायें जुटाकर केवल प्राणवायु (ऑक्सीजन) के सहारे जिन्दा रखने का प्रयास किया गया।[12] उनके चिन्ताजनक स्वास्थ्य की खबर मिलते ही उनके समर्थकों व प्रियजनों ने उनके मातुश्री आवास पर, जहाँ अन्तिम समय में उन्हें चिकित्सकों की देखरेख में रखा गया था, पहुँचना प्रारम्भ कर दिया।[13]
तमाम प्रयासों, दवाओं व दुआओं के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका और अखिरकार उनकी आत्मा ने १७ नवम्बर २०१२ को शरीर त्याग दिया। चिकित्सकों के अनुसार उनकी मृत्यु हृदय-गति के बन्द हो जाने से हुई।[14][15]
भारत के प्रधानमन्त्री डॉ॰ मनमोहन सिंह ने उनकी मृत्यु पर भेजे शोक-सन्देश में कहा - "महाराष्ट्र की राजनीति में बाला साहेब ठाकरे का योगदान अतुलनीय था। उसे भुलाया नहीं जा सकता।" लोक सभा में प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने भी उनके निधन पर गहरा दुख प्रकट किया।[16]
उनकी शव यात्रा में एक रिपोर्ट के मुताबिक २० लाख लोग शामिल हुए जिनमें नेता, अभिनेता, व्यवसायी वर्ग के अलावा हिन्दू, मुस्लिम, सिक्खईसाई - सभी समुदायों के लोग थे।[कृपया उद्धरण जोड़ें] शिवाजी मैदान पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि की गयी। इस अवसर पर लालकृष्ण आडवानी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, नितिन गडकरी, मेनका गांधी, प्रफुल्ल पटेल और शरद पवार के अतिरिक्त अमिताभ बच्चन, अनिल अंबानी भी मौजूद थे।

सन्दर्भ



  • Arnold P. Kaminsky; Roger D. Long (30 सितंबर 2011). India Today: An Encyclopedia of Life in the Republic: An Encyclopedia of Life in the Republic. ABC-CLIO. प॰ 694. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-313-37463-0. अभिगमन तिथि: 7 सितंबर 2012.

  • "6 महीने के भीतर बेटे, पत्‍नी को खोने के बाद टूट गए थे ठाकरे". दैनिक भास्कर. १७ नवम्बर २०१२. अभिगमन तिथि: १९ नवम्बर २०१२.

  • Ram Puniyani (1 जनवरी 2006). Contours of Hindu Rashtra: Hindutva, Sangh Parivar, and Contemporary Politics. Gyan Publishing House. प॰ 123. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7835-473-6. अभिगमन तिथि: 14 नवम्बर 2012.

  • Kaminsky, Arnold P.; Long, Roger D. (2011). India Today: An Encyclopedia of Life in the Republic (illustrated ed.). ABC-CLIO. pp. 693–4. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-313-37462-3.

  • "India". अभिगमन तिथि: 30 सितंबर 2012.

  • "Comparative Studies of South Asia, Africa and the Middle East". South Asia Bulletin (University of California, Los Angeles) 16 (2): 116. 1996. अभिगमन तिथि: 15 नवम्बर 2012.

  • "A political saga of a cartoonist". Andhra Wishesh. 15 नवम्बर 2012. अभिगमन तिथि: 17 नवम्बर 2012.

  • IANS (17 नवम्बर 2012). "Shiv Sena chief Bal Thackeray passes away". IANS. अभिगमन तिथि: 17 नवम्बर 2012.

  • http://raviwar.com/dailynews/d2774_bal-thackeray-and-shiv-sena-20121115.shtml बाल ठाकरे के बाद शिव सेना

  • "वैलंटाइंस डे पर हमले के लिए ठाकरे ने माफी मांगी". नवभारत टाइम्स. वार्ता (मुंबई). १८ फ़रवरी २००६. अभिगमन तिथि: २० नवम्बर २०१२.

  • "Bal Thackeray in hospital". 25 जुलाई 2012.

  • "Bal Thackeray on oxygen, not eating anything". अभिगमन तिथि: 14-11-2012.

  • "Shiv Sainiks shut shops in Mumbai". Dnaindia.com. अभिगमन तिथि: 2012-11-15.

  • Bal Thackeray passes away thehindu.com. Retrieved 17 नवम्बर 2012

  • Shiv Sena chief Bal Thackeray, champion of Maharashtra's cause, dies at 86 hindustantimes.com. Retrieved 17 नवम्बर 2012

  • भारतीय कार्टूनिस्ट




    कार्टूनिस्ट-के शंकर पिल्लई





    प्रस्तुति--- प्यासा रुपक, प्रवीण परिमल


    के शंकर पिल्लई (मलयालम: കെ ശങ്കര് പിള്ള.) (1902-26 जुलाई 1989 31 दिसंबर), बेहतर शंकर के रूप में जाना, एक भारतीय कार्टूनिस्ट था। उन्होंने भारत में राजनीतिक cartooning के पिता के रूप में माना जाता है। [1] उन्होंने 1948 में शंकर वीकली, भारत पंच स्थापना, Utara भी अबू अब्राहम, रंगा और कुट्टी तरह कार्टूनिस्टों उत्पादित, वह नीचे 1975 में पत्रिका बंद होने के कारण इमरजेंसी को फिर पर वह बच्चों के काम पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित. लेकिन अपने समय से बच्चों, यह भारत में हो या दुनिया में कहीं और, उसे अपने चाचा जो कुछ किया है बनाने के लिए प्रोटोटाइप हँसते हैं और जीवन का आनंद के रूप में देखते हैं। उन्होंने 1976 में भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सरकार द्वारा दिए गए साहब में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। भारत की. [2] आज वह सबसे ऊपर के बच्चों की पुस्तक 1957 में स्थापित ट्रस्ट और शंकर 1965 में अंतर्राष्ट्रीय गुड़िया संग्रहालय. [3] स्थापित करने के लिए याद किया जाता है सामग्री [छिपाने] 1 प्रारंभिक जीवन और शिक्षा 2 कैरियर 3 निजी जीवन 4 लिगेसी 5 सम्मान और पुरस्कार 6 इसके अलावा पढ़ना 7 सन्दर्भ 8 बाहरी लिंक प्रारंभिक जीवन और शिक्षा [संपादित करें]
    शंकर 1902 में Kayamkulam, केरल में हुआ था। उन्होंने Kayamkulam और Mavelikkara में स्कूलों में भाग लिया। एक अपने शिक्षकों में से एक की नींद की मुद्रा में अपनी पहली कार्टून था। वे उसे अपने क्लासरूम में आकर्षित किया। इस प्रधानाध्यापक नाराज कर दिया. लेकिन तब वह अपने चाचा जो उस पर एक कार्टूनिस्ट के रूप में महान क्षमता को देखा द्वारा प्रोत्साहित किया गया था। [4] स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने रावी Mavelikara पर चित्रकारी के वर्मा ने स्कूल में पेंटिंग का अध्ययन किया। शंकर नाटकों में गहरी रुचि ले लिया है, स्काउटिंग, साहित्यिक आदि गतिविधियों. उन्होंने बाढ़ राहत कोष की ओर संग्रह के लिए आश्चर्यजनक अच्छा अभियान था। गरीबों के लिए यह चिंता का विषय है और उसके जीवन के माध्यम से सभी व्यथित लोगों को जारी रखा और अपने कार्टून में परिलक्षित. विज्ञान के महाराजा कॉलेज (अब यूनिवर्सिटी कॉलेज) से स्नातक होने के बाद, त्रिवेंद्रम, 1927 में, वह उच्च शिक्षा के लिए बंबई (अब मुंबई) के लिए छोड़ दिया और लॉ कॉलेज में शामिल हो, लेकिन अपने कानून पढ़ाई छोड़ने शामिल हो गए और मिडवे काम शुरू कर दिया. कैरियर [संपादित करें]
    शंकर कार्टून फ्री प्रेस जर्नल और बॉम्बे क्रॉनिकल में प्रकाशित किए गए थे। Pothen यूसुफ, हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक उसे एक कर्मचारी कार्टूनिस्ट के रूप में दिल्ली से लाया, 1932 में और के रूप में अपने स्टाफ कार्टूनिस्ट 1946 तक जारी रहेगा. इस प्रकार वह और उसके परिवार के अंत में दिल्ली में बस गए। शंकर कार्टून प्रभु Willington और प्रभु लिनलिथगो की तरह भी वायसराय को आकर्षित किया। इस समय के दौरान, शंकर लंदन में लगभग 14 महीने के लिए प्रशिक्षण का एक मौका था। उन्होंने विभिन्न कला विद्यालयों में अवधि खर्च किए, को cartooning में उन्नत तकनीक के अध्ययन का अवसर का उपयोग. उन्होंने यह भी बर्लिन, रोम, वियना, जिनेवा और पेरिस का दौरा किया। जब वह भारत लौटे, देश की आजादी की लड़ाई की मोटी में था। पसंदीदा विवरण के डॉन भी एक अलग आवधिक के लिए शंकर ड्रीम्स. सत्य का विचार तब आया जब पंडित जवाहर लाल नेहरू शंकर वीकली, खुद शंकर द्वारा संपादित जारी किया। लेकिन उनके भी बने रहे तटस्थ अक्सर अपने काम के लिए महत्वपूर्ण कार्टून, उल्लेखनीय एक मई 17, 1964 को प्रकाशित कार्टून, पंडित नेहरू की मृत्यु से पहले सिर्फ 10 दिन, एक क्षीण और थक पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दिखाया है, हाथ में एक टॉर्च के साथ, के अंतिम चरण चल रहा है पार्टी Gulzari लाल नंदा, लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, कृष्णा मेनन और टो में इंदिरा गांधी के नेताओं को जो नेहरू ने टिप्पणी की, के साथ एक दौड़, "मुझे नहीं छोड़ेंगे, क्या शंकर". [5] प्यार बच्चों और संगठित शंकर शंकर 1949 में शंकर अंतर्राष्ट्रीय बाल महोत्सव शुरू कर दिया और इसका एक भाग के रूप में, शंकर पर-the-स्पॉट 1952 में बच्चों के लिए चित्रकला प्रतियोगिता. उन्होंने 1978 में बच्चों की पुस्तकों के लेखकों के लिए एक वार्षिक प्रतियोगिता की शुरूआत की. बहासा शुरुआत के साथ इस प्रतियोगिता अब हिंदी में भी आयोजित किया। यह बाद में दुनिया भर से बच्चों को ड्राइंग शुरू हुआ। शंकर वीकली से वार्षिक पुरस्कार प्राइम मंत्रियों द्वारा प्रस्तुत किए गए। उन्होंने यह भी नेहरू सदन में बहादुर नई दिल्ली में शाह जफर Haris पर 1957 में बच्चों बुक ट्रस्ट की स्थापना की. 1965 में बाद में, अंतर्राष्ट्रीय गुड़िया संग्रहालय भी यहाँ स्थित हो गया। इस प्रकार नेहरू हाउस बने नई दिल्ली के लिए जा रहे बच्चों के लिए आइटम 'का दौरा करना चाहिए'. अब यह एक बच्चों के पुस्तकालय और वाचनालय, डॉ॰ के रूप में जाना गया है बीसी रॉय मेमोरियल बच्चों के पुस्तकालय और कक्ष और पुस्तकालय और एक गुड़िया के विकास और उत्पादन केंद्र पढ़ना. निजी जीवन [संपादित करें]
    शंकर की पत्नी का नाम Thankam था। वह दो बेटे और तीन बेटियां सीमा. भारत सरकार ने 1991 में दो डाक टिकटें जारी की है, उनके दो कार्टून के चित्रण. उन्होंने केरल ललित कला अकादमी के सदस्य थे। उन्होंने यह भी एक आत्मकथात्मक काम प्रकाशित किया है, मेरे दादाजी, 1953, एक बच्चे बुक ट्रस्ट के प्रकाशन के साथ 'लाइफ. [संपादित करें] विरासत
    2002 में 'ड्रीम्स की एक सिम्फनी', एक के लिए उसके जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में प्रदर्शनी, ललित कला अकादमी, दिल्ली में आयोजित किया गया। [3] सम्मान और पुरस्कार [संपादित करें]
    पद्मश्री, 1956 पद्म भूषण, 1966 [6] पद्म विभूषण, 1976 मुस्कुराओ के आदेश (1977), पोलिश बच्चों की एक समिति से एक न्यायाधीश डी. लिट. (मानार्थ) दिल्ली विश्वविद्यालय के द्वारा. इसके अलावा पढ़ना [संपादित करें]
    के.एच. शंकर पिल्लई हमारे नेताओं, 11 वॉल्यूम. बच्चों बुक ट्रस्ट, 8170119553 ISBN. 149-174 पी. संदर्भ [संपादित करें]
    ^ Khorana, मीना (1991). बच्चों और युवा वयस्कों के लिए साहित्य में भारतीय उपमहाद्वीप. ग्रीनवुड पब्लिशिंग ग्रुप. 0313254893 ISBN. ^ पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित ^ अब शंकर हिंदू, 2 अगस्त 2002 के लिए श्रद्धांजलि. पचास ^ और गिनती चालू! हिन्दू, 15 अक्टूबर 2007. ^ 'मुझे नहीं छोड़ेंगे, क्या शंकर': कार्टून प्रदर्शनी एक अग्रणी करने के लिए श्रद्धांजलि देता है हिंदू, 5 अगस्त 2009. ^ पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित [संपादित करें]
    भारतीय कार्टून कला के पितामह कहे जाने वाले केशव शंकर पिल्लई का जन्म ३१ जुलाई १९०२ को केरल में हुआ। शिक्षा के लिए मुंबई और फ़िर अपनी कार्टूनिस्ट की नौकरी के चलते शंकर सपरिवार दिल्ली में बस गए। २६ दिसम्बर १९८९ को शंकर का देहांत हुआ।

    अनुक्रम

    शिक्षा

    स्कूली शिक्षा के बाद कानून की पढ़ाई करने के लिए मुंबई आए शंकर ने सालभर बाद ही पढ़ाई छोड़कर एक शिपिंग कंपनी में नौकरी कर ली।

    कार्टून की शुरुआत

    मुंबई में पढ़ाई दौरान शंकर ने कई समाचारपत्रों में अपने कार्टून भेजना शुरू कर दिए थे जिनमें फ्री प्रेस जनरल, क्रोनिकल, वीकली हेराल्ड प्रमुख थे। १९३२ में द हिन्दुस्तान टाईम्स ने शंकर को पहला स्टाफ कार्टूनिस्ट नियुक्त किया।

    प्रकाशन

    १९४२ में शंकर ने द हिंदुस्तान टाईम्स की नौकरी छोड़ अपनी तरह के पहली और अनोखी पत्रिका शंकर्स वीकली की शुरुआत की। शंकर्स वीकली राजनितिक कार्टूनों पर आधारित एक साप्ताहिक पत्रिका थी जो बहुत लोकप्रिय हुई और कई कार्टूनिस्टों के लिए सीखने व कार्य करने का माध्यम बनी। २७ साल बाद १९७५ में शंकर्स वीकली का प्रकाशन बंद हो गया। बच्चों से बेहद लगाव के चलते शंकर ने बच्चों के लिए चिल्ड्रन्स वर्ल्ड नामक मासिक पत्रिका का भी प्रकाशन किया।

    पुरस्कार

    शंकर पिल्लै को कला के क्षेत्र में सन १९६६ में भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। ये दिल्ली से हैं। इसके अलावा उन्हें पद्मश्री, पद्मविभूषण भी प्रदान किये गए थे।

    बाहरी कड़ियाँ

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