मंगलवार, 30 अगस्त 2016

हिन्दी पत्रकारिता




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प्रस्तुति-  प्रियदर्शी किशोर 

हिन्दी पत्रकारिता की कहानी भारतीय राष्ट्रीयता की कहानी है। हिन्दी पत्रकारिता के आदि उन्नायक जातीय चेतना, युगबोध और अपने महत् दायित्व के प्रति पूर्ण सचेत थे। कदाचित् इसलिए विदेशी सरकार की दमन-नीति का उन्हें शिकार होना पड़ा था, उसके नृशंस व्यवहार की यातना झेलनी पड़ी थी। उन्नीसवीं शताब्दी में हिन्दी गद्य-निर्माण की चेष्ठा और हिन्दी-प्रचार आन्दोलन अत्यन्त प्रतिकूल परिस्थितियों में भयंकर कठिनाइयों का सामना करते हुए भी कितना तेज और पुष्ट था इसका साक्ष्य ‘भारतमित्र’ (सन् 1878 ई, में) ‘सार सुधानिधि’ (सन् 1879 ई.) और ‘उचित वक्ता’ (सन् 1880 ई.) के जीर्ण पृष्ठों पर मुखर है।
वर्तमान में हिन्दी पत्रकारिता में अंग्रेजी पत्रकारिता के दबदबे को खत्म कर दिया है। पहले देश-विदेश में अंग्रेजी पत्रकारिता का दबदबा था लेकिन आज हिन्दी भाषा का झण्डा चंहुदिश लहरा रहा है। ३० मई को 'हिन्दी पत्रकारिता दिवस' के रूप में मनाया जाता है।

अनुक्रम

भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता का आरम्भ और हिन्दी पत्रकारिता

भारतवर्ष में आधुनिक ढंग की पत्रकारिता का जन्म अठारहवीं शताब्दी के चतुर्थ चरण में कलकत्ता, बंबई और मद्रास में हुआ। 1780 ई. में प्रकाशित हिके (Hickey) का "कलकत्ता गज़ट" कदाचित् इस ओर पहला प्रयत्न था। हिंदी के पहले पत्र उदंत मार्तण्ड (1826) के प्रकाशित होने तक इन नगरों की ऐंग्लोइंडियन अंग्रेजी पत्रकारिता काफी विकसित हो गई थी।
इन अंतिम वर्षों में फारसी भाषा में भी पत्रकारिता का जन्म हो चुका था। 18वीं शताब्दी के फारसी पत्र कदाचित् हस्तलिखित पत्र थे। 1801 में 'हिंदुस्थान इंटेलिजेंस ओरिऐंटल ऐंथॉलॉजी' (Hindusthan Intelligence Oriental Anthology) नाम का जो संकलन प्रकाशित हुआ उसमें उत्तर भारत के कितने ही "अखबारों" के उद्धरण थे। 1810 में मौलवी इकराम अली ने कलकत्ता से लीथो पत्र "हिंदोस्तानी" प्रकाशित करना आरंभ किया। 1816 में गंगाकिशोर भट्टाचार्य ने "बंगाल गजट" का प्रवर्तन किया। यह पहला बंगला पत्र था। बाद में श्रीरामपुर के पादरियों ने प्रसिद्ध प्रचारपत्र "समाचार दर्पण" को (27 मई 1818) जन्म दिया। इन प्रारंभिक पत्रों के बाद 1823 में हमें बँगला भाषा के 'समाचारचंद्रिका' और "संवाद कौमुदी", फारसी उर्दू के "जामे जहाँनुमा" और "शमसुल अखबार" तथा गुजराती के "मुंबई समाचार" के दर्शन होते हैं।
यह स्पष्ट है कि हिंदी पत्रकारिता बहुत बाद की चीज नहीं है। दिल्ली का "उर्दू अखबार" (1833) और मराठी का "दिग्दर्शन" (1837) हिंदी के पहले पत्र "उदंत मार्तंड" (1826) के बाद ही आए। "उदंत मार्तंड" के संपादक पंडित जुगलकिशोर थे। यह साप्ताहिक पत्र था। पत्र की भाषा पछाँही हिंदी रहती थी, जिसे पत्र के संपादकों ने "मध्यदेशीय भाषा" कहा है। यह पत्र 1827 में बंद हो गया। उन दिनों सरकारी सहायता के बिना किसी भी पत्र का चलना असंभव था। कंपनी सरकार ने मिशनरियों के पत्र को डाक आदि की सुविधा दे रखी थी, परंतु चेष्टा करने पर भी "उदंत मार्तंड" को यह सुविधा प्राप्त नहीं हो सकी।

हिंदी पत्रकारिता का पहला चरण

1826 ई. से 1873 ई. तक को हम हिंदी पत्रकारिता का पहला चरण कह सकते हैं। 1873 ई. में भारतेन्दु ने "हरिश्चंद्र मैगजीन" की स्थापना की। एक वर्ष बाद यह पत्र "हरिश्चंद्र चंद्रिका" नाम से प्रसिद्ध हुआ। वैसे भारतेन्दु का "कविवचन सुधा" पत्र 1867 में ही सामने आ गया था और उसने पत्रकारिता के विकास में महत्वपूर्ण भाग लिया था; परंतु नई भाषाशैली का प्रवर्तन 1873 में "हरिश्चंद्र मैगजीन" से ही हुआ। इस बीच के अधिकांश पत्र प्रयोग मात्र कहे जा सकते हैं और उनके पीछे पत्रकला का ज्ञान अथवा नए विचारों के प्रचार की भावना नहीं है। "उदंत मार्तंड" के बाद प्रमुख पत्र हैं :
बंगदूत (1829), प्रजामित्र (1834), बनारस अखबार (1845), मार्तंड पंचभाषीय (1846), ज्ञानदीप (1846), मालवा अखबार (1849), जगद्दीप भास्कर (1849), सुधाकर (1850), साम्यदंड मार्तंड (1850), मजहरुलसरूर (1850), बुद्धिप्रकाश (1852), ग्वालियर गजेट (1853), समाचार सुधावर्षण (1854), दैनिक कलकत्ता, प्रजाहितैषी (1855), सर्वहितकारक (1855), सूरजप्रकाश (1861), जगलाभचिंतक (1861), सर्वोपकारक (1861), प्रजाहित (1861), लोकमित्र (1835), भारतखंडामृत (1864), तत्वबोधिनी पत्रिका (1865), ज्ञानप्रदायिनी पत्रिका (1866), सोमप्रकाश (1866), सत्यदीपक (1866), वृत्तांतविलास (1867), ज्ञानदीपक (1867), कविवचनसुधा (1867), धर्मप्रकाश (1867), विद्याविलास (1867), वृत्तांतदर्पण (1867), विद्यादर्श (1869), ब्रह्मज्ञानप्रकाश (1869), अलमोड़ा अखबार (1870), आगरा अखबार (1870), बुद्धिविलास (1870), हिंदू प्रकाश (1871), प्रयागदूत (1871), बुंदेलखंड अखबर (1871), प्रेमपत्र (1872) और बोधा समाचार (1872)।
इन पत्रों में से कुछ मासिक थे, कुछ साप्ताहिक। दैनिक पत्र केवल एक था "समाचार सुधावर्षण" जो द्विभाषीय (बंगला हिंदी) था और कलकत्ता से प्रकाशित होता था। यह दैनिक पत्र 1871 तक चलता रहा। अधिकांश पत्र आगरा से प्रकाशित होते थे जो उन दिनों एक बड़ा शिक्षाकेंद्र था और विद्यार्थीसमाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। शेष ब्रह्मसमाज, सनातन धर्म और मिशनरियों के प्रचार कार्य से संबंधित थे। बहुत से पत्र द्विभाषीय (हिंदी उर्दू) थे और कुछ तो पंचभाषीय तक थे। इससे भी पत्रकारिता की अपरिपक्व दशा ही सूचित होती है। हिंदीप्रदेश के प्रारंभिक पत्रों में "बनारस अखबार" (1845) काफी प्रभावशाली था और उसी की भाषानीति के विरोध में 1850 में तारामोहन मैत्र ने काशी से साप्ताहिक "सुधाकर" और 1855 में राजा लक्ष्मणसिंह ने आगरा से "प्रजाहितैषी" का प्रकाशन आरंभ किया था। राजा शिवप्रसाद का "बनारस अखबार" उर्दू भाषाशैली को अपनाता था तो ये दोनों पत्र पंडिताऊ तत्समप्रधान शैली की ओर झुकते थे। इस प्रकार हम देखते हैं कि 1867 से पहले भाषाशैली के संबंध में हिंदी पत्रकार किसी निश्चित शैली का अनुसरण नहीं कर सके थे। इस वर्ष 'कवि वचनसुधा' का प्रकाशन हुआ और एक तरह से हम उसे पहला महत्वपूर्ण पत्र कह सकते हैं। पहले यह मासिक था, फिर पाक्षिक हुआ और अंत में साप्ताहिक। भारतेन्दु के बहुविध व्यक्तित्व का प्रकाशन इस पत्र के माध्यम से हुआ, परंतु सच तो यह है कि "हरिश्चंद्र मैगजीन" के प्रकाशन (1873) तक वे भी भाषाशैली और विचारों के क्षेत्र में मार्ग ही खोजते दिखाई देते हैं।

हिंदी पत्रकारिता का दूसरा युग : भारतेन्दु युग

हिंदी पत्रकारिता का दूसरा युग 1873 से 1900 तक चलता है। इस युग के एक छोर पर भारतेन्दु का "हरिश्चंद्र मैगजीन" था ओर नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा अनुमोदनप्राप्त "सरस्वती"। इन 27 वर्षों में प्रकाशित पत्रों की संख्या 300-350 से ऊपर है और ये नागपुर तक फैले हुए हैं। अधिकांश पत्र मासिक या साप्ताहिक थे। मासिक पत्रों में निबंध, नवल कथा (उपन्यास), वार्ता आदि के रूप में कुछ अधिक स्थायी संपत्ति रहती थी, परंतु अधिकांश पत्र 10-15 पृष्ठों से अधिक नहीं जाते थे और उन्हें हम आज के शब्दों में "विचारपत्र" ही कह सकते हैं। साप्ताहिक पत्रों में समाचारों और उनपर टिप्पणियों का भी महत्वपूर्ण स्थान था। वास्तव में दैनिक समाचार के प्रति उस समय विशेष आग्रह नहीं था और कदाचित् इसीलिए उन दिनों साप्ताहिक और मासिक पत्र कहीं अधिक महत्वपूर्ण थे। उन्होंने जनजागरण में अत्यंत महत्वपूर्ण भाग लिया था।
उन्नीसवीं शताब्दी के इन 25 वर्षों का आदर्श भारतेन्दु की पत्रकारिता थी। "कविवचनसुधा" (1867), "हरिश्चंद्र मैगजीन" (1874), श्री हरिश्चंद्र चंद्रिका" (1874), बालबोधिनी (स्त्रीजन की पत्रिक, 1874) के रूप में भारतेन्दु ने इस दिशा में पथप्रदर्शन किया था। उनकी टीकाटिप्पणियों से अधिकरी तक घबराते थे और "कविवचनसुधा" के "पंच" पर रुष्ट होकर काशी के मजिस्ट्रेट ने भारतेन्दु के पत्रों को शिक्षा विभाग के लिए लेना भी बंद करा दिया था। इसमें संदेह नहीं कि पत्रकारिता के क्षेत्र भी भारतेन्दु पूर्णतया निर्भीक थे और उन्होंने नए नए पत्रों के लिए प्रोत्साहन दिया। "हिंदी प्रदीप", "भारतजीवन" आदि अनेक पत्रों का नामकरण भी उन्होंने ही किया था। उनके युग के सभी पत्रकार उन्हें अग्रणी मानते थे।

भारतेन्दु के बाद

भारतेन्दु के बाद इस क्षेत्र में जो पत्रकार आए उनमें प्रमुख थे पंडित रुद्रदत्त शर्मा, (भारतमित्र, 1877), बालकृष्ण भट्ट (हिंदी प्रदीप, 1877), दुर्गाप्रसाद मिश्र (उचित वक्ता, 1878), पंडित सदानंद मिश्र (सारसुधानिधि, 1878), पंडित वंशीधर (सज्जन-कीर्त्ति-सुधाकर, 1878), बदरीनारायण चौधरी "प्रेमधन" (आनंदकादंबिनी, 1881), देवकीनंदन त्रिपाठी (प्रयाग समाचार, 1882), राधाचरण गोस्वामी (भारतेन्दु, 1882), पंडित गौरीदत्त (देवनागरी प्रचारक, 1882), राज रामपाल सिंह (हिंदुस्तान, 1883), प्रतापनारायण मिश्र (ब्राह्मण, 1883), अंबिकादत्त व्यास, (पीयूषप्रवाह, 1884), बाबू रामकृष्ण वर्मा (भारतजीवन, 1884), पं. रामगुलाम अवस्थी (शुभचिंतक, 1888), योगेशचंद्र वसु (हिंदी बंगवासी, 1890), पं. कुंदनलाल (कवि व चित्रकार, 1891) और बाबू देवकीनंदन खत्री एवं बाबू जगन्नाथदास (साहित्य सुधानिधि, 1894)। 1895 ई. में "नागरीप्रचारिणी पत्रिका" का प्रकाशन आरंभ होता है। इस पत्रिका से गंभीर साहित्यसमीक्षा का आरंभ हुआ और इसलिए हम इसे एक निश्चित प्रकाशस्तंभ मान सकते हैं। 1900 ई. में "सरस्वती" और "सुदर्शन" के अवतरण के साथ हिंदी पत्रकारिता के इस दूसरे युग पर पटाक्षेप हो जाता है।
इन 25 वर्षों में हिन्दी पत्रकारिता अनेक दिशाओं में विकसित हुई। प्रारंभिक पत्र शिक्षाप्रसार और धर्मप्रचार तक सीमित थे। भारतेन्दु ने सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक दिशाएँ भी विकसित कीं। उन्होंने ही "बालाबोधिनी" (1874) नाम से पहला स्त्री-मासिक-पत्र चलाया। कुछ वर्ष बाद महिलाओं को स्वयं इस क्षेत्र में उतरते देखते हैं - "भारतभगिनी" (हरदेवी, 1888), "सुगृहिणी" (हेमंतकुमारी, 1889)। इन वर्षों में धर्म के क्षेत्र में आर्यसमाज और सनातन धर्म के प्रचारक विशेष सक्रिय थे। ब्रह्मसमाज और राधास्वामी मत से संबंधित कुछ पत्र और मिर्जापुर जैसे ईसाई केंद्रों से कुछ ईसाई धर्म संबंधी पत्र भी सामने आते हैं, परंतु युग की धार्मिक प्रतिक्रियाओं को हम आर्यसमाज के और पौराणिकों के पत्रों में ही पाते हैं। आज ये पत्र कदाचित् उतने महत्वपूर्ण नहीं जान पड़ते, परंतु इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने हिन्दी की गद्यशैली को पुष्ट किया और जनता में नए विचारों की ज्योति भी। इन धार्मिक वादविवादों के फलस्वरूप समाज के विभिन्न वर्ग और संप्रदाय सुधार की ओर अग्रसर हुए और बहुत शीघ्र ही सांप्रदायिक पत्रों की बाढ़ आ गई। सैकड़ों की संख्या में विभिन्न जातीय और वर्गीय पत्र प्रकाशित हुए और उन्होंने असंख्य जनों को वाणी दी।
आज वही पत्र हमारी इतिहासचेतना में विशेष महत्वपूर्ण हैं जिन्होंने भाषा शैली, साहित्य अथवा राजनीति के क्षेत्र में कोई अप्रतिम कार्य किया हो। साहित्यिक दृष्टि से "हिंदी प्रदीप" (1877), ब्राह्मण (1883), क्षत्रियपत्रिका (1880), आनंदकादंबिनी (1881), भारतेन्दु (1882), देवनागरी प्रचारक (1882), वैष्णव पत्रिका (पश्चात् पीयूषप्रवाह, 1883), कवि के चित्रकार (1891), नागरी नीरद (1883), साहित्य सुधानिधि (1894) और राजनीतिक दृष्टि से भारतमित्र (1877), उचित वक्ता (1878), सार सुधानिधि (1878), भारतोदय (दैनिक, 1883), भारत जीवन (1884), भारतोदय (दैनिक, 1885), शुभचिंतक (1887) और हिंदी बंगवासी (1890) विशेष महत्वपूर्ण हैं। इन पत्रों में हमारे 19वीं शताब्दी के साहित्यरसिकों, हिंदी के कर्मठ उपासकों, शैलीकारों और चिंतकों की सर्वश्रेष्ठ निधि सुरक्षित है। यह क्षोभ का विषय है कि हम इस महत्वपूर्ण सामग्री का पत्रों की फाइलों से उद्धार नहीं कर सके। बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, सदानं मिश्र, रुद्रदत्त शर्मा, अंबिकादत्त व्यास और बालमुकुंद गुप्त जैसे सजीव लेखकों की कलम से निकले हुए न जाने कितने निबंध, टिप्पणी, लेख, पंच, हास परिहास औप स्केच आज में हमें अलभ्य हो रहे हैं। आज भी हमारे पत्रकार उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं। अपने समय में तो वे अग्रणी थे ही।

तीसरा चरण : बीसवीं शताब्दी के प्रथम बीस वर्ष

बीसवीं शताब्दी की पत्रकारिता हमारे लिए अपेक्षाकृत निकट है और उसमें बहुत कुछ पिछले युग की पत्रकारिता की ही विविधता और बहुरूपता मिलती है। 19वीं शती के पत्रकारों को भाषा-शैलीक्षेत्र में अव्यवस्था का सामना करना पड़ा था। उन्हें एक ओर अंग्रेजी और दूसरी ओर उर्दू के पत्रों के सामने अपनी वस्तु रखनी थी। अभी हिंदी में रुचि रखनेवाली जनता बहुत छोटी थी। धीरे-धीरे परिस्थिति बदली और हम हिंदी पत्रों को साहित्य और राजनीति के क्षेत्र में नेतृत्व करते पाते हैं। इस शताब्दी से धर्म और समाजसुधार के आंदोलन कुछ पीछे पड़ गए और जातीय चेतना ने धीरे-धीरे राष्ट्रीय चेतना का रूप ग्रहण कर लिया। फलत: अधिकांश पत्र, साहित्य और राजनीति को ही लेकर चले। साहित्यिक पत्रों के क्षेत्र में पहले दो दशकों में आचार्य द्विवेदी द्वारा संपादित "सरस्वती" (1903-1918) का नेतृत्व रहा। वस्तुत: इन बीस वर्षों में हिंदी के मासिक पत्र एक महान साहित्यिक शक्ति के रूप में सामने आए। शृंखलित उपन्यास कहानी के रूप में कई पत्र प्रकाशित हुए - जैसे उपन्यास 1901, हिंदी नाविल 1901, उपन्यास लहरी 1902, उपन्याससागर 1903, उपन्यास कुसुमांजलि 1904, उपन्यासबहार 1907, उपन्यास प्रचार 19012। केवल कविता अथवा समस्यापूर्ति लेकर अनेक पत्र उन्नीसवीं शतब्दी के अंतिम वर्षों में निकलने लगे थे। वे चले रहे। समालोचना के क्षेत्र में "समालोचक" (1902) और ऐतिहासिक शोध से संबंधित "इतिहास" (1905) का प्रकाशन भी महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं। परंतु सरस्वती ने "मिस्लेनी" () के रूप में जो आदर्श रखा था, वह अधिक लोकप्रिय रहा और इस श्रेणी के पत्रों में उसके साथ कुछ थोड़े ही पत्रों का नाम लिया जा सकता है, जैसे "भारतेन्दु" (1905), नागरी हितैषिणी पत्रिका, बाँकीपुर (1905), नागरीप्रचारक (1906), मिथिलामिहिर (1910) और इंदु (1909)। "सरस्वती" और "इंदु" दोनों हिन्दी की साहित्यचेतना के इतिहास के लिए महत्वपूर्ण हैं और एक तरह से हम उन्हें उस युग की साहित्यिक पत्रकारिता का शीर्षमणि कह सकते हैं। "सरस्वती" के माध्यम से आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और "इंदु" के माध्यम से पंडित रूपनारायण पांडेय ने जिस संपादकीय सतर्कता, अध्यवसाय और ईमानदारी का आदर्श हमारे सामने रखा वह हिन्दी पत्रकारिता को एक नई दिशा देने में समर्थ हुआ।
परंतु राजनीतिक क्षेत्र में हिन्दी पत्रकारिता को नेतृत्व प्राप्त नहीं हो सका। पिछले युग की राजनीतिक पत्रकारिता का केंद्र कलकत्ता था। परंतु कलकत्ता हिंदी प्रदेश से दूर पड़ता था और स्वयं हिंदी प्रदेश को राजनीतिक दिशा में जागरूक नेतृत्व कुछ देर में मिला। हिंदी प्रदेश का पहला दैनिक राजा रामपालसिंह का द्विभाषीय "हिंदुस्तान" (1883) है जो अंग्रेजी और हिंदी में कालाकाँकर से प्रकाशित होता था। दो वर्ष बाद (1885 में), बाबू सीताराम ने "भारतोदय" नाम से एक दैनिक पत्र कानपुर से निकालना शुरू किया। परंतु ये दोनों पत्र दीर्घजीवी नहीं हो सके और साप्ताहिक पत्रों को ही राजनीतिक विचारधारा का वाहन बनना पड़ा। वास्तव में उन्नीसवीं शतब्दी में कलकत्ता के भारत मित्र, वंगवासी, सारसुधानिधि और उचित वक्ता ही हिंदी प्रदेश की रानीतिक भावना का प्रतिनिधित्व करते थे। इनमें कदाचित् "भारतमित्र" ही सबसे अधिक स्थायी और शक्तिशाली था। उन्नीसवीं शताब्दी में बंगाल और महाराष्ट्र लोक जाग्रति के केंद्र थे और उग्र राष्ट्रीय पत्रकारिता में भी ये ही प्रांत अग्रणी थे। हिंदी प्रदेश के पत्रकारों ने इन प्रांतों के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया और बहुत दिनों तक उनका स्वतंत्र राजनीतिक व्यक्तित्व विकसित नहीं हो सका। फिर भी हम "अभ्युदय" (1905), "प्रताप" (1913), "कर्मयोगी", "हिंदी केसरी" (1904-1908) आदि के रूप में हिंदी राजनीतिक पत्रकारिता को कई डग आगे बढ़ाते पाते हैं। प्रथम महायुद्ध की उत्तेजना ने एक बार फिर कई दैनिक पत्रों को जन्म दिया। कलकत्ता से "कलकत्ता समाचार", "स्वतंत्र" और "विश्वमित्र" प्रकाशित हुए, बंबई से "वेंकटेश्वर समाचार" ने अपना दैनिक संस्करण प्रकाशित करना आरंभ किया और दिल्ली से "विजय" निकला। 1921 में काशी से "आज" और कानपुर से "वर्तमान" प्रकाशित हुए। इस प्रकार हम देखते हैं कि 1921 में हिंदी पत्रकारिता फिर एक बार करवटें लेती है और राजनीतिक क्षेत्र में अपना नया जीवन आरंभ करती है। हमारे साहित्यिक पत्रों के क्षेत्र में भी नई प्रवृत्तियों का आरंभ इसी समय से होता है। फलत: बीसवीं शती के पहले बीस वर्षों को हम हिंदी पत्रकारिता का तीसरा चरण कह सकते हैं।
== आधुनिक युग ==विश्वविद्यालयों में हुआ और कुछ ऐसे कृती संपादक सामने आए जो अंग्रेजी की पत्रकारिता से पूर्णत: परिचित थे और जो हिंदी पत्रों को अंग्रेजी, मराठी और बँगला के पत्रों के समकक्ष लाना चाहते थे। फलत: साहित्यिक पत्रकारिता में एक नए युग का आरंभ हुआ। राष्ट्रीय आंदोलनों ने हिंदी की राष्ट्रभाषा के लिए योग्यता पहली बार घोषित की ओर जैसे-जैसे राष्ट्रीय आंदोलनों का बल बढ़ने लगा, हिंदी के पत्रकार और पत्र अधिक महत्व पाने लगे। 1921 के बाद गांधी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन मध्यवर्ग तक सीमित न रहकर ग्रामीणों और श्रमिकों तक पहुंच गया और उसके इस प्रसार में हिंदी पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण योग दिया। सच तो यह है कि हिंदी पत्रकार राष्ट्रीय आंदोलनों की अग्र पंक्ति में थे और उन्होंने विदेशी सत्ता से डटकर मोर्चा लिया। विदेशी सरकार ने अनेक बार नए नए कानून बनाकर समाचारपत्रों की स्वतंत्रता पर कुठाराघात किया परंतु जेल, जुर्माना और अनेकानेक मानसिक और आर्थिक कठिनाइयाँ झेलते हुए भी हिन्दी पत्रकारों ने स्वतंत्र विचार की दीपशिखा जलाए रखी।
1921 के बाद साहित्यक्षेत्र में जो पत्र आए उनमें प्रमुख हैं-
स्वार्थ (1922), माधुरी (1923), मर्यादा, चाँद (1923), मनोरमा (1924), समालोचक (1924), चित्रपट (1925), कल्याण (1926), सुधा (1927), विशालभारत (1928), त्यागभूमि (1928), हंस (1930), गंगा (1930), विश्वमित्र (1933), रूपाभ (1938), साहित्य संदेश (1938), कमला (1939), मधुकर (1940), जीवनसाहित्य (1940), विश्वभारती (1942), संगम (1942), कुमार (1944), नया साहित्य (1945), पारिजात (1945), हिमालय (1946) आदि।
वास्तव में आज हमारे मासिक साहित्य की प्रौढ़ता और विविधता में किसी प्रकार का संदेह नहीं हो सकता। हिंदी की अनेकानेक प्रथम श्रेणी की रचनाएँ मासिकों द्वारा ही पहले प्रकाश में आई और अनेक श्रेष्ठ कवि और साहित्यकार पत्रकारिता से भी संबंधित रहे। आज हमारे मासिक पत्र जीवन और साहित्य के सभी अंगों की पूर्ति करते हैं और अब विशेषज्ञता की ओर भी ध्यान जाने लगा है। साहित्य की प्रवृत्तियों की जैसी विकासमान झलक पत्रों में मिलती है, वैसी पुस्तकों में नहीं मिलती। वहाँ हमें साहित्य का सक्रिय, सप्राण, गतिशील रूप प्राप्त होता है।
राजनीतिक क्षेत्र में इस युग में जिन पत्रपत्रिकाओं की धूम रही वे हैं -
कर्मवीर (1924), सैनिक (1924), स्वदेश (1921), श्रीकृष्णसंदेश (1925), हिंदूपंच (1926), स्वतंत्र भारत (1928), जागरण (1929), हिंदी मिलाप (1929), सचित्र दरबार (1930), स्वराज्य (1931), नवयुग (1932), हरिजन सेवक (1932), विश्वबंधु (1933), नवशक्ति (1934), योगी (1934), हिंदू (1936), देशदूत (1938), राष्ट्रीयता (1938), संघर्ष (1938), चिनगारी (1938), नवज्योति (1938), संगम (1940), जनयुग (1942), रामराज्य (1942), संसार (1943), लोकवाणी (1942), सावधान (1942), हुंकार (1942) और सन्मार्ग (1943), जनवार्ता (१९७२)।
इनमें से अधिकांश साप्ताहिक हैं, परंतु जनमन के निर्माण में उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा है। जहाँ तक पत्र कला का संबंध है वहाँ तक हम स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि तीसरे और चौथे युग के पत्रों में धरती और आकाश का अंतर है। आज पत्रसंपादन वास्तव में उच्च कोटि की कला है। राजनीतिक पत्रकारिता के क्षेत्र में "आज" (1921) और उसके संपादक स्वर्गीय बाबूराव विष्णु पराड़कर का लगभग वही स्थान है जो साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी को प्राप्त है। सच तो यह है कि "आज" ने पत्रकला के क्षेत्र में एक महान संस्था का काम किया है और उसने हिंदी को बीसियों पत्रसंपादक और पत्रकार दिए हैं।
आधुनिक साहित्य के अनेक अंगों की भाँति हिन्दी पत्रकारिता भी नई कोटि की है और उसमें भी मुख्यत: हमारे मध्यवित्त वर्ग की सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक औ राजनीतिक हलचलों का प्रतिबिंब भास्वर है। वास्तव में पिछले २०० वर्षों का सच्चा इतिहास हमारी पत्रपत्रिकाओं से ही संकलित हो सकता है। बँगला के "कलेर कथा" ग्रंथ में पत्रों के अवतरणों के आधार पर बंगाल के उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यवित्तीय जीवन के आकलन का प्रयत्न हुआ है। हिंदी में भी ऐसा प्रयत्न वांछनीय है। एक तरह से उन्नीसवीं शती में साहित्य कही जा सकनेवाली चीज बहुत कम है और जो है भी, वह पत्रों के पृष्ठों में ही पहले-पहल सामने आई है। भाषाशैली के निर्माण और जातीय शैली के विकास में पत्रों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है, परंतु बीसवीं शती के पहले दो दशकों के अंत तक मासिक पत्र और साप्ताहिक पत्र ही हमारी साहित्यिक प्रवृत्तियों को जन्म देते और विकसित करते रहे हैं। द्विवेदी युग के साहित्य को हम "सरस्वती" और "इंदु" में जिस प्रयोगात्मक रूप में देखते हैं, वही उस साहित्य का असली रूप है। 1921 ई. के बाद साहित्य बहुत कुछ पत्रपत्रिकाओं से स्वतंत्र होकर अपने पैरों पर खड़ा होने लगा, परंतु फिर भी विशिष्ट साहित्यिक आंदोलनों के लिए हमें मासिक पत्रों के पृष्ठ ही उलटने पड़ते हैं। राजनीतिक चेतना के लिए तो पत्रपत्रिकाएँ हैं ही। वस्तुत: पत्रपत्रिकाएँ जितनी बड़ी जनसंख्या को छूती हैं, विशुद्ध साहित्य का उतनी बड़ी जनसंख्या तक पहुँचना असंभव है।

१९९० के बाद

90 के दशक में भारतीय भाषाओं के अखबारों, हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में अमर उजाला, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण आदि के नगरों-कस्बों से कई संस्करण निकलने शुरू हुए। जहां पहले महानगरों से अखबार छपते थे, भूमंडलीकरण के बाद आयी नयी तकनीक, बेहतर सड़क और यातायात के संसाधनों की सुलभता की वजह से छोटे शहरों, कस्बों से भी नगर संस्करण का छपना आसान हो गया। साथ ही इन दशकों में ग्रामीण इलाकों, कस्बों में फैलते बाजार में नयी वस्तुओं के लिए नये उपभोक्ताओं की तलाश भी शुरू हुई। हिंदी के अखबार इन वस्तुओं के प्रचार-प्रसार का एक जरिया बन कर उभरा है। साथ ही साथ अखबारों के इन संस्करणों में स्थानीय खबरों को प्रमुखता से छापा जाता है। इससे अखबारों के पाठकों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है। मीडिया विशेषज्ञ सेवंती निनान ने इसे 'हिंदी की सार्वजनिक दुनिया का पुनर्विष्कार' कहा है। वे लिखती हैं, “प्रिंट मीडिया ने स्थानीय घटनाओं के कवरेज द्वारा जिला स्तर पर हिंदी की मौजूद सार्वजनिक दुनिया का विस्तार किया है और साथ ही अखबारों के स्थानीय संस्करणों के द्वारा अनजाने में इसका पुनर्विष्कार किया है।
1990 में राष्ट्रीय पाठक सर्वेक्षण की रिपोर्ट बताती थी कि पांच अगुवा अखबारों में हिन्दी का केवल एक समाचार पत्र हुआ करता था। पिछले (सर्वे) ने साबित कर दिया कि हम कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं। इस बार (२०१०) सबसे अधिक पढ़े जाने वाले पांच अखबारों में शुरू के चार हिंदी के हैं।
एक उत्साहजनक बात और भी है कि आईआरएस सर्वे में जिन 42 शहरों को सबसे तेजी से उभरता माना गया है, उनमें से ज्यादातर हिन्दी हृदय प्रदेश के हैं। मतलब साफ है कि अगर पिछले तीन दशक में दक्षिण के राज्यों ने विकास की जबरदस्त पींगें बढ़ाईं तो आने वाले दशक हम हिन्दी वालों के हैं। ऐसा नहीं है कि अखबार के अध्ययन के मामले में ही यह प्रदेश अगुवा साबित हो रहे हैं। आईटी इंडस्ट्री का एक आंकड़ा बताता है कि हिन्दी और भारतीय भाषाओं में नेट पर पढ़ने-लिखने वालों की तादाद लगातार बढ़ रही है।
मतलब साफ है। हिन्दी की आकांक्षाओं का यह विस्तार पत्रकारों की ओर भी देख रहा है। प्रगति की चेतना के साथ समाज की निचली कतार में बैठे लोग भी समाचार पत्रों की पंक्तियों में दिखने चाहिए। पिछले आईएएस, आईआईटी और तमाम शिक्षा परिषदों के परिणामों ने साबित कर दिया है कि हिन्दी भाषियों में सबसे निचली सीढ़ियों पर बैठे लोग भी जबरदस्त उछाल के लिए तैयार हैं। हिन्दी के पत्रकारों को उनसे एक कदम आगे चलना होगा ताकि उस जगह को फिर से हासिल सकें, जिसे पिछले चार दशकों में हमने लगातार खोया।

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बाहरी कड़ियाँ

राजेन्द्र अवस्थी को याद करते हए कुछ प्रसंग







अनामी शरण बबल




जीवन में पहली बार मैं दिल्ली 1984 में आया था। फरवरी की कंपकपाती ठंड में उस समय विश्व पुस्तक मेला का बाजार गरम था। दिल्ली का मेरा इकलौता मित्र अखिल अनूप से अपनी मस्त याराना थी। कालचिंतन के चिंतक पर बात करने से पहले दिल्ली पहुंचने और दिल्ली में घुलने मिलने की भी तो अपनी चिंता मुझे ही करनी थी। उस समय हिन्दी समाज में कादम्बिनी और इसके संपादक का बड़ा जलवा था। इस बार की दिल्ली यात्रा में अवस्थी जी से मेरी एकाएक क्षणिक मुलाकात पुस्तक मेले के किसी एक समारोह में हुई थी। जिसमें केवल उनके चेहरे  को देखा भर था।

मगर 1984 में ही गया के एक कवि प्रवीण परिमल मेरे घर देव औरंगाबाद बिहार में आया तो फिर प्रवीण से भी इतनी जोरदार दोस्ती हुई जो आज भी है। केवल अपने लेखक दोस्तों से मिलने के लिए ही मैं एक दो माह में गया भी चला जाता था। इसी बहाने गया के ज्यादातर लेखक कवि पत्रकारों से भी दोस्ती सलामत हो गयी। जिसमें सुरंजन का नाम सबसे अधिक फैला हुआ था। दिल्ली से अनभिज्ञ मैं सुरंजन के कारण ही कादम्बिनी परिवार से परिचित हुआ।  जब भी दिल्ली आया तो पहुंचने पर कुछ समय कादम्बिनी के संपादकीय हॉल मे या कैंटीन में जरूर होता था। खासकर धनजंय सिंह सुरेश नीरव या कभी कभार प्रभा भारद्वाज दीदी  समेत कई लोग होते थे जिनके पास बैठकर या एचटी कैंटीन (जो अपने अखबार से ज्यादा कैंटीन के लिए ही आसपास में फेमस था) में कभी खाना तो कभी चाय नाश्ते का ही स्वाद काफी होता था।  

इस मिलने जुलने का एक बड़ा फायदा यह भी हुआ कि कादम्बिनी में उभरते युवा कवियों के लिए सबसे लोकप्रिय  दो पेजी स्तंभ प्रवेश में मेरी छह सात कविताएं लंबी प्रतीक्षा के बिना ही 1985 अक्टूबर में छप गयी । जिसके बाद औरंगाबाद और आसपास के इलाकों से करीब 100 से ज्यादा लोगों ने पत्र लिखकर मेरा हौसला बढाया । तभी मुझे कादम्बिनी की लोकप्रियता का अंदाजा लगा। देव के सबसे मशहूर लेखक पत्रकार और सासंद रहे शंकर दयाल सिंह (चाचा) का भी पटना से दिल्ली सफर के बीच लिखा पत्र भी मेरी खुशी में इजाफा कर गया।


दिल्ली लगातार आने जाने के चलते संपादक राजेन्द्र अवस्थी जी भी हमलोग को ठीक से पहचानने लगे थे। पहली बार कोई ( धनंजय सिंह सुरेश नीरव जी या कभी प्रभा जी) अवस्थी जी के कमरे में ले जाकर मुझे छोड़ देते थे। बारम्बार आने की वजह से अवस्थी जी से भी मैं खुल गया था । कई बार तो मैं अपन ज्यादा न समझ में आने के बाद भी उनके संपादकीय काल चिंतन पर ही कोई चर्चा कर बैठता तो कभी अगले तीन चार माह के भावी अंकों पर भी पूछ बैठता। कभी कभी मुझे अब लगता है कि इतने बड़े संपादक और साहित्यकात होने पर भी वे मेरे जैसे एकदम कोरा कागज से भी कितने सहज बने रहते थे। लेखक कवि से ज्यादा उत्साही साहित्य प्रेमी सा मैं उनके सामने बकबक कर देता तो भी वे मीठी मुस्कान के संग ही सरल बने रहते थे।

 मेरी आलतू फालतू बातों या नकली चापलूसी की बजाय सीधे भावी कार्यक्रमों योजनाओं पर या सामान्य अंक के बाद किस तरह किसी विशेष अंक  की रूपरेखा बनाते और तैयारी पर मेरा पूछना भी उनको रास आने लगा था । दो एक बार वे मुझसे पूछ बैठते कि भावी अंको को लेकर इतनी उत्कंठा क्यों होती है  ? इस पर मैं सीधे कहता था कि यदि अंक को लेकर मन में जिज्ञासा नहीं होगी तो उसे खरीदना पढना सहेजना या किसी अंक की बेताबी से इंतजार या दोस्तों में चर्चा क्यों करूंगा ? मेरा यह जवाब उनको हमेशा पसंद आता था। मैं अब महसूस करता हूं कि वे भी बड़ी चाव से अपने विशेष अंकों के बारे में ही मुझे बताते थे। कभी उबन सा महसूस नहीं करते।


उनदिनों 1987 में वे साप्ताहिक हिन्दुस्तान पत्रिका के संपादन का काम भी संभाल रहे थे। एक बार मैं अचनक टपका तो वे दो चार मिनट में ही बोल पड़े आज काफी बिजी हूं फिर आइएगा। मैने उठने की चेष्टा के साथ पूछ बैठा कोई खास अंक की रणनीति बना रहे है  क्या ?  उनके हां कहते ही मैंने मौके की गंभीरता और नजाकत को समझे बगैर ही कह डाला कि इसके लिए सर आप संपादकीय टीम के साथ बैठकर फाईनल टच दे और सबको इसमें सुझाव देने को पर जोर दे। इससे कई नए सुझाव के बाद तो विशेषांकों में और निखार आएगा। मेरी बात सुनकर वे एकटक मुझे देखने लगे। मुझे लगा कि मुझसे कोई गलती हो गयी। तो मैं हकलाते हुए पूछा मैने कुछ गलती कर दी क्या ? इस पर वे खिलखिला पड़े और हंसते हुए कहा बैठो अनामी बैठो तुम बैठो। मैं भी एकदम भौचक्क कि कहां तो वे मुझे देखते ही भगाने के फिराक में थे और अब ठहाका मारते हुए बैठने का संकेत कर रहे है। उन्होने पूछा कि चाय पीओगे क्या मेरी उत्कंठा और बढ़ गयी। चाय का आदेश देते हुए उन्होने कहा यार मुझे तुम जैसे ही लड़कों की जरूरत है। मैं एक पल गंवाए बिना ही तुरंत कह डाला कि सर तो वीकली में मुझे रख लीजिए न फिर कुछ सबसे अलग हटकर नया रंग रूप देते है। उन दिनों मैं दिल्ली में iimc-hj/1987-88 का छात्र थआ।  मेरी सादगी या बालसुलभ उत्कंठा पर मुस्कुराते हुए कहा जरूर अनामी तुम पर ध्यान रखूंगा पर साप्ताहिक हिन्दुस्तान तो अब केवल एक साल का बच्चा रह गया है।  इसको बंद किया जाना है लिहाजा मैं मैनेजमेट को कह नहीं सकता और साप्ताहिक के अंक तो बस पूंजीपतियों के लाभ हानि के हिसाब किताब के लिए छप रहा है।  पर अनामी मुझे तुम बहुत उत्साही लगते हो और मैं तुमको बहुत पसंद भी करता हूं। अपने उत्साह को किसी भी हाल में कभी मरने नहीं देना । यही आपकी पूंजी है जो कभी मौका मिलने पर आपको नया राह दिखाएगी। पहले तो मैं उनकी बाते सुनकर जरा उदास सा हो गया था, पर अवस्थी जी ,से अपनी तारीफ सुनकर मन पुलकित हो उठा।  मैने उनसे पूछा कि आप मेरे मन को रखने के लिए कह रहे है, या वाकई इन बातों से कुछ झलकता है ? मेरी बात सुनकर उन्होने कहा इसका फैसला समय पर छोड दो अनामी।


भारतीय जनसंचार संस्थान में नामांकन के बाद पूरे कादम्बिनी परिवार से महीने में दो एक बार मुलाकात जरूर कर लेता था। उस समय दिल्ली आज की तरह हसीन शहर ना होकर गंवार सा थका हुआ शहर था। जिंदगी में भी न रफ्तार थी न दुकानों में ही कोई खास चमक दमक ।  दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) का मासिक बस पास हम छात्रों को 13 रूपए में मिलता था। पूरी दिल्ली में घूमना एकदम आसान था । और दिल्ली के कोने कोने को जानने की उत्कंठा ही मुझे इधर उधर घूमने और जानने को विवश करती थी।

पत्रकारिता के पाठ्यक्रम के दौरान एक प्रोजेक्ट बनाना था। इसके लिए मुझे किसी एक संपादक से साक्षात्कार लेना था। और जाहिर है कि राजेन्द्र अवस्थी हमारे हीरो संपादक थे। फोन करके समय लिया और एकदम समय पर मैं उनके कमरे के बाहर खड़ा था। कमरे के भीतर गया तो हमेशा की तरह चश्मे के पीछे से मुस्कुराता चेहरा और उन्मुक्त हास्य के साथ स्वागत करने की उनकी एक मनोहर शैली थी। बहुत सारे सवालों के साथ मैं श्री अवस्थी की पत्रकारिता संपादकीय कौशल लेखन से लेकर आदिवासियों पर किए गए शोधपरक काम और घोटूल ( अविवाहित आदिवासी युवा लड़के लड़कियों का नाईट क्लब) जहां पर वे आपस में जीवन साथी पसंद करते है) पर अपनी जिज्ञासा सहित बहुत कुछ जानने की मानसिक उतेजना के साथ हाजिर था।

बहुत सारे सवालों का वे सटीक और सारगभित उतर दिया। तभी वे एकाएक खिलखिला पड़े अरे अनामी आपने मुझे कितना पढा है ? मैने तुरंत कहा कि कथा कहानी उपन्यास तो एकदम नहीं पर आपके संपादकीय कालचिंतन और इधर उधर के समारोह सेमिनारों में जो आपने विचार रखे हैं उसकी करीब 20-22 कटिंग के अलावा करीब एक दर्जन आपके इंटरव्यू का कतरन भी मेरे पास है और सबों को मिलाकर आपका पूरा लेखकीय छवि मेरे पास है। मेरी बात सुनकर वे फिर हंस पड़े। उन्होने कहाकि आदिवासियों पर काम करने वाला मैं हिन्दी का पहला साहित्यकार हूं इससे जुड़े सवाल को सामने रखे ताकि उसके बहाने मैं अपनी मेहनत और कार्य को फोकस कर सकूं।

मेरे पास इस संदर्भ से जुड़े तो कोई खास सवाल और गहन जानकारी थी नहीं। मेरे हथियार डालने पर कमान उन्होने खुद थाम ली। इस बाबत तब एक तरह से जानकारी देने के लिए अवस्थी जी खुद ही कोई सवाल करते और सुविधा जनक  तरीके से आदिवासियों के जनजीवन रहन सहन पर जवाब भी देकर बताने लगे। एकदम रसिक भाव से आदिवासी महिलाओं के देह लावण्य शारीरिक सौष्ठव से लेकर अंग प्रत्यंग पर रौशनी डालते हुए मुझे भी आदिवासी सौंदर्य पर मोहित कर डाला। घोटुल और उनकी काम चेतना पर भी अवस्थी जी ने मोहक प्रकाश डाला। करीब एक घंटे तक श्री अवस्थी जी अपना इंटरव्यू खुद मेरे सामने लेते देते रहे और मैं उनकी रसीली नशीली मस्त बातों और आदिवासी महिलाओं की देह और कामुकता का रस पीता रहा। और अंत में खूब जोर से ठठाकर हंसते हुए श्री अवस्थी जी ने इंटरव्यू समापन के साथ ही अपने संग मुझे भी समोसा और चाय पीने का सुअवसर प्रदान किया।


एक बार उन्होने पूछा आपने मेरा उपन्यास जंगल के फूल पढा है ? ना कहने पर फौरन अपने बुक सेल्फ से एक प्रति निकालकर मुझे दे दी। मगर इस उपन्यास पर अपनी बेबाक राय बताने के लिए भी कहा। इस बहुचर्चित उपन्यास को मेरे ही किसी उस्ताद मित्र ने गायब कर दी। तो सालों के बाद अवस्थी जी ने मुझे इसकी दूसरी प्रति 11 सितम्बर 1997 को फिर से दी। और हस्ताक्षर युक्त यह बहुमूल्य प्रति आज भी मेरे किताबों के मेले की शोभा है। और करीब एक माह के बाद इस किताब की बेबाक समीक्षा मैने उनके दफ्तर में ही उन्हें सुना दी।

पहले तो मेरे मन में श्री अवस्थी को लेकर एक छैला वाली इमेज गहरा गयी मगर दूसरे ही पल उनकी सादगी और निश्छलता पर मन मोहित भी हुआ कि मुझ जैसे एकदम नए नवेलों के साथ भी इतनी सहजत सरलता और आत्मीयता से बात करना इनके व्यक्तित्व का सबसे सबल और मोहक पक्ष है। इस इंटरव्यू समापन के बाद उनकी ही चाय और समोसे खाते हुए मैने पूछा कि आदिवासी औरतों के मांसल देहाकार पर आपका निष्कर्ष महज एक लेखक की आंखों का चमत्कार है या आपने कभी स्पर्श सुख का भी आनंद लिया है। मेरे सवाल पर झेंपने की बजाय  एकदम उत्सुकता मिश्रित हर्ष के साथ बताया कि मैं इनलोगों के साथ कई माह तक रहा हूं तो मैं सब जान गया था।

बात को पर्दे में रखने की कला का तो आदर करने के बाद भी घोटुल प्रवास पर रौशनी डालने को कहा, तो  इस सवाल को लेकर भी वे काफी उत्साहित दिखे। उन्होने कहा कि आदिवासी समाज में कई वर्जनाओं (प्रतिबंधों) नहीं है। घोटुल भी इस समाज की आधुनिक सोच मगर सफल और स्वस्थ्य प्रेममय दाम्पत्य जीवन की सीख और प्रेरणा देती है। मैने उनसे पूछा कि आमतौर पर आदिवासी इलाकों में अधिकारियों या कर्मचारियों द्वारा अपने साथ परिवार या पत्नी को लाने जाने वालों को मूर्ख क्यों समझा या माना जाता है  ? इस सवाल पर वे हंस पड़े और सेक्स को लेकर खुलेपन या बहुतों से शारीरिक संबंध को भी समाज में बुरा नहीं माना जाना ही इनके लिए अभिशाप बन गया है।

दिल्ली  विवि के हंसराज कॉलेज की वार्षिक पत्रिका हंस को किसी तरह अपने नाम करके और प्रेमचंद की पत्रिका हंस नाम का चादर ओढ़ाकर विख्यात कथाकार राजेन्द्र यादव और हंस का दरियागंज की एक तंग गली में जब पुर्नजन्म हुआ हंस के जन्म (1986 तक) से पहले तक  तो दिल्ली के लेखक और पाठकों के बीच कादम्बिनी नामक पत्रिका का ही बड़ा जलवा था। श्री अवस्थी जी को लेकर मेरे मन में आदर तो था पर उनके रोमांस और महिला मित्रों के चर्चे भी साहित्यिक गलियारे में खूब होती थी। कभी कभी तो मैं उन लेखकों को देखकर हैरत में पड़ जाता कि जो लोग अवस्थी जी को दिल खोलकर गरियाते और दर्जनों लेखिकाओं के साथ संबंधों का सामूहिक आंखो देखा हाल सुनाकर लोगों को रसविभोर कर देते थे। मगर  इसी तरह के कई लेखक जब कभी अवस्थी जी के सामने जाते या मिलते तो एकदम दास भक्ति चारण शैली में तो बेचारे कुत्ते को भी शर्मसार कर देते दिखे। और यह देख मेरी आंखे फटी की फटी रह जाती। शहरिया कल्चर और आधुनिक संबंधों की मस्तराम शैली ने मुझे एक तरह से महानगरीय  अपसंस्कृति से अवगत कराया। वही यह भी बताया कि किसी भी खास मौके पर किसी को भी बातूनी चीरहरण कर देना या चरित्रहनन कर देना किसी को अपमानित भले लगे मगर इन बातों से लेखकीय समाज में इनकी रेटिंग का ग्राफ हमेशा बुलंदी पर ही रहता। और नाना प्रकार के गपशप के बीच अवस्थी जी एचटी दरबारके
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मोहक मदिरा को कोई न कहो बुरा


ई समाज में पता नहीं क्यों लोग दारू और दारूबाजों को ठीक नजर से नहीं देखते हैं। मेरा मानना है कि संयम के साथ किसी भी चीज के सेवन बुराई क्या है ? सामान्य लोग मानते हैं कि यह दारू मदिरा शराब से आदमी बिगड. जाता है। अपन परिवार भी कुछ इस मामले में तनी पुरानी सोच वाला ही है। खैर इस पारिवारिक बुढ़ऊंपन सोच के कारण गाहे बेगाहे दर्जनों मौकों पर अपने दारूबाज दोस्तों की नजर में मेरा जीवन बेकार एकदम अभिशाप सा हो गया। इन तगमों उलाहनों और प्रेम जताने के नाम पर दी जाने वाली मनभावन रिश्तों वाली गालियों को सहन के बाद भी दारू कभी मुझे अपनी तरफ आकर्षित नहीं कर सकी। मेरी धारणा है कि दारू को कोई नहीं पीता अंतत दारू ही सबको पी जाती है। इन तमाम पूर्वाग्रहों और गंवईपन वाली धारणा के बाद भी एक घटना ने मेरी आंखे खोल दी। चाहे शराब की जितनी भी हम निंदा करे, मगर शराब कुछ मामलों में संजीवनी से कम नहीं।

सुरंजन के साथ मैं सहारनपुर में ही था।  तभी लांयस क्लब वालो नें अपने सालाना जलसे में खास तौर पर अवस्थी जी को बुलाया था। अपने परम सहयोगी सुरेश नीरव  के साथ पूरे आदर सम्मान के साथ वे सहारनपुर पधारे। कहना बेमानी होगा कि इनका किस तरह का स्वागत किया गया होगा। बढ़िया होटेल में इनको और नीरव जी को ठहराया गया। रंगारंग कार्यक्रम के बीच रात में खानपान भी था। और इनसे मिलिए कार्यक्रम में अवस्थी जी को शहर की गणमान्य महिलाओं और महिला लेखको से मिलना था। उनके दिल्ली से आते ही हमलोग की सहारनपुर में एकाध घंटे की मुलाकात हो गयी थी। नीरव जी के संग गपशप के अलावा अवस्थी जी भी हम दोनों को यहां देखकर बहुत खुश हुए।

 रंगारंग कार्यक्रम निपट गया था और इनसे मिलिए का आयोजन भी समापन के बाद खाने और पीने का दौर चलने लगा था। अवस्थी जी भी नशे मे थे। दारू का रंग दिखने लगा था। तभी एकाएक पता नहीं सुरंजन एकाएक क्यों सनक गया और करीब 25-30 मिनट तक अवस्थी जी को गालियां देने लगा । दर्जनो लांछनों के साथ सुरंजन ने अपनी अश्लील भाषा में कहे तो अवस्थी जी को बेनकाब कर दिया। चारो तरफ सन्नाटा सा हो गया। मगर किसी क्लब वालों ने सुरंजन को पकड़ने या मौके से बाहर ले जाने की कोई कोशिश नहीं की। एक तरफ कई सौ लोग खड़े होकर इस घटना को देख रहे थे और दूसरी तरफ सुरंजन के गालियों के गोले फूट रहे थे। खुमार में अवस्थी जी बारबार सुरंजन को यही कहते क्यों नाराज हो रहे हैं सुरंजन इस बार आपकी कविता कवर पेज पर छापूंगा। तो बौखलाहट से तमतमाये सुरंजन ने मां बहिन बीबी नानी बेटी आदि को दागदार करते हुए कुछ इसी तरह कि गाली बकी थी तू क्या छापेगा आदि इत्यादि अनादि।

मैं दो चार बार अवस्थी सुरंजन कुरूक्षेत्र में जाकर सुरंजन को पकड़ने रोकने की पहल की। कईयों को इसके लिए सामने आने के लिए भी कहा पर बेशर्म आयोजक अपने मुख्य अतिथि का अपने ही शहर में बेआबरू होते देखकर भी बेशर्म मुद्रा में खड़े रहे। वहीं मैं एकदम हैरान कि जिस सुरंजन के साथ मैं अपना बेड और रूम शेयर कर रहा हूं वो भीतर से इतना खतरनाक है। खाल नोंचने का भी कोई यह तरीका है भला।

इस बेशर्म वाक्या का मेरा प्रत्यक्षदर्शी होना मेरे लिए बेहदअपमान जनक सा था। इस घटना के बाद रात में ही मेरे और सुरंजन के बीच अनबन सी हो गयी और मैने जमकर इस गुंडई की निंदा की। वो मेरे उपर ही बरसने की कोशिश की। मैने देर रात को फिलहाल प्रसंग बंद रात काटी। और अगले दिन सुबह तैयार होकर होटेल जाने लगा। इस घटना के बाद सुरंजन की भी बोलती बंद थी. हमलोग होटेल पहुंचे। मेरे मन में  यह आशंका और जिज्ञासा थी कि अवस्थी जी कैसे होगे?
मगर यह क्या ? कमरे में हमलोग को देखते ही अवस्थी जी मुस्कुरा पड़े और आए आइए कहकर स्वागत किया। कमरे में नीरव जी पहले से ही विराजमान थे। हमलोग को देखते ही अवस्थीजी ने हमलोग को अपने साथ ही खिलाया चाय कॉफी में भी साथ रखा। माहौल ऐसा लग रहा था मानो कल रात कुछ हुआ ही न था या कल रात की बेइज्जती का उन्हें कोई आभास नहीं था।

हमलोग उनके साथ करीब दो घंटे तक साथ रहा और उनकी विदाई के साथ ही सुरंजन के साथ वापस दफ्तर लौटा। मेरे दिमाग में कई दिनों तक यह घटना घूमती रही। सुरंजन भी एकाध माह के अंदर ही कुछ विवाद होने के बाद विश्वमानव अखबार छोड़कर वापस दिल्ली लौट गया। मगर मैं 11 दिसम्बर 1988 तक सहारनपुर में ही रहा। एक सड़क हादसे में बुरी तरह घायल होने के बाद दिल्ली में करीब एक माह तक इलाज हुआ.। मगर जैसे आदमी अपने पहले प्यार को जीवनभर भूल नहीं पाता ठीक उसी तरह पहली नौकरी की इस शहर को 28 साल के बाद भी मैं भूल नहीं पाया हूं। आज भी इस शहर में बहुत सारे मित्र है जिनकी यादें मुझे इस शहर की याद और कभी कभार यहां जाने के लिए विवश कर देती है।

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एक प्यार ऐसा भी  


अनामी शरण बबल

यह घटना या हादसा जो भी कहें या नाम दें  यह 21 साल पहले 1995 की है। एकदम सही सही माह और दिनांक तो याद नहीं हैं।  मैं उन दिनों राष्ट्रीय सहारा में था। किसी सामयिक मुद्दे पर एक  लघु साक्षात्कार या टिप्पणी के लिए मैं शाम के समय विख्यात साहित्यकार और कादम्बिनी पत्रिका के जगत विख्यात संपादक राजेन्द्र अवस्थी जी के दफ्तर में जा पहुंचा। उनके कमरे में एक 42-43 साल की  महिला पहले से ही बैठी हुई थी। मैं अवस्थी जी से कोई 20 मिनट में काम निपटा कर जाने के लिए खड़ा हो गया। तब उन्होने चाय का आदेश एक शर्त पर देते हुए मुझसे कहा कि आपको अभी मेरा एक काम करके ही दफ्तर जाना होगा। मैने बड़ी खुशी के साथ जब हां कह दी तो वे मेरे साथ में बैठी हुई महिला से मेरा परिचय कराया। ये बहुत अच्ची लेखिका के साथ साथ बहुत जिंदादिल भी है। ये अपने भाई के साथ दिल्ली आई हैं पर इनके भाई कहीं बाहर गए हैं तो आप इनके साथ मंदिर मार्ग के गेस्टहाउस में जाकर इनको छोड़ दीजिए। ये दिल्ली को ज्यादा नहीं जानती है। श्रीअवस्थी जी के आदेश को टालना अब मेरे लिए मुमकिन नहीं था। तब अवस्थी जी ने महिला से मेरे बारे मे कहा कि ये पत्रकार और साहित्य प्रेमी  लेखक हैं। अपनी किताबें इनको देंगी तो ये बेबाक समीक्ष भी अपने पेपर में छपवा देंगे। उन्होने मुस्कन फेंकते हुए किताबें फिर अगली बार देने का वादा की। अवस्थी जी की शर्तो वाली चाय आ गयी तो हमलोग चाय के बाद नमस्कार की और महिला लेखिका भी मेरे साथ ही कमरे से बाहर हो गयी।

याद तो मुझे लेखिका के नाम समेत शहर और राज्य का भी है मगर नाम में क्या रखा है । हिन्दी क्षेत्र की करीब 42-43 साल की लेखिका को लेकर मैं हिन्दुस्तान टाईम्स की बिल्डिंग से बाहर निकला तो उन्होने कस्तूरबा गांधी मार्ग और जनपथ को जोड़ने वाली लेन तक पैदल चलने के लिए कहा। उन्होने बताया कि यहां की कुल्फी बर्फी बहुत अच्छी होती है, क्या तुमने कभी खाई है ।  इस पर मैं हंस पड़ा दिल्ली में रहता तो मैं हूं और कहां का क्या मशहूर है यह सब जानती आप है। मैं तो कभी सुना भी नहीं थ। चलो यार आज मेरे साथ खाओ जब भी इस गली से गुजरोगे न तो तुमको मेरी याद जरूर आएगी। मैं भी इनके कुछ खुलेपन पर थोड़ा चकित था। फिर भी मैंने मजाक में कहा कि आप तो अवस्थी जी के दिल में रहती है उसके बाद भला हम छोटे मोटे लेखकों के लिए कोई जगह कहां है। इस पर वे मुस्कुराती रही और उनके सौजन्य से कुल्फी का मजा लिया गया। बेशक इस गली से हजार दफा गुजरने के बाद भी प्रेम मोटर्स की तरफ जाने वाली गली के मुहाने पर लगी मिठाई की छोटी सी दुकान की कुल्फी से अब तक मैं अनभिज्ञ ही था।

 कस्तूरबा गांधी मार्ग से ही हमलोग ऑटो से मंदिर मार्ग पहुंचे ऑटो का किराया उन्होने दिया और हमलोग मंदिर कैंपस में बने गेस्टहाउस में आ गए। एक कमरे का ताला खोलकर वे अंदर गयी। मैं बाहर से ही नमस्ते करके जब मैं जाने की अनुमति मांगी तो वे चौंक सी गयी। अरे अभी कहां अभी तो कुछ पीकर जाना होगा। अभी तो न नंबल ली न नाम जानती हूं । चाय लोगे या कुछ और...। मै उनको याद दिलाय कि चाय तो अभी अभी साथ ही पीकर आए हैं। कुल्फी का स्वाद मुहं में है । अभी कुछ नहीं बस जाने की इजाजत दे। लौटने के प्रति मेरे उतावलेपन से वे व्यग्र हो गयी। अरे अभी तो तुम पहले बैठो फिर जाना तो है ही। मेरे बारे में तो कुछ जाना ही नहीं। थोड़ी बात करते हैं तो फिर कभी दिल्ली आई तो तुमको बता कर बुला लूंगी। उन्होने अपने शहर में आने का भी न्यौता भी इस शर्त पर दी कि मेरे घर पर ही रूकना होगा। मैने उनसे कहा कि इतना दूर कौन जाएगा और ज्यादा घूमने में मेरा दिल नहीं लगता।

मैं कमरे में बैठा कुछ किताबें देख रह था। तभी वे न जाने कब बाथरूम में गयी और कपड़ा चेंज कर नाईटी में बाहर आयी। बाथरुम से बाहर आते ही बहुत गर्मी है दिल्ली की गरमी सही नहीं जाती कहती हुई दोनों हाथ उठाकर योग मुद्रा में खुद को रिलैक्स करने लगी। मैं पीछे मुड़कर देखा तो गजब एक तौलिय हाथ में लिए पूरे उतेजक हाव भाव के साथ मौसम को कोस रही थी। मैने जब उनकी तरफ देखने लगा तो वे पीछे मुड़कर पानी लगे बदन पर तौलिया फेरने लगी। अपनापन जताते हुए उन्होने बैक मुद्रा मे ही कहा यदि चाहो तो बबल तुम भी बाथरूम में जाकर हाथ मुंह धोकर फ्रेश हो जाओ। मैं इस लेखिका के हाव भाव को देखते ही मंशा भले ना समझा हो पर इतनी घनिष्ठता पर एकदम हैरान सा महसूस करने लगा था। मैने फौरन कहा अरे नहीं नहीं हमलोग को तो दिल्ली के मौसम की आदत्त है । मैं एकदम ठीक हूं। यह कहकर मैं फिर से बेड पर अस्त व्यस्त रखी पत्र पत्रिकों को झुककर देखने लगा।
बिस्तर पर झुककर बैठा मैं किसी पत्रिकाओं को देख ही रहा था कि एकाएक वे एकाएक मुझ पर जानबूझ कर गिरने का ड्रामा किया या पैर फिसलने का बहाना गढ़ लिया पर एक बारगी पेट के बल बिस्तर पर पूरी तरह मैं क्या गिरा कि उनका पूरा बदन ही मेरे पीठ के उपर आ पड़ा। एकाएक इस हमले के लिए मैं कत्तई तैयार नहीं था। एक दो मिनट तो मेरे पूरे शरीर पर ही अपने पूरे बदन का भार डालकर संभलने का अभिनय करने लगी। उनकी बांहें पीछे से ही मेरे को पूरे बल के साथ दबोचे थी। दो चार पल में ही मैं संभल सा गया। नीचे गिरने और अपने उपर कम से कम 70-72 किलो के भारी वजन को पीछे धकेलते हुए जिससे वे पेट के बल बिस्तर पर उलट सी गयी। दो पल में ही मैं उनको अपने से दूर धकेलते हुए बिस्तर से उठ फर्श कहे या जमीन पर खड़ा हो गया। वे दो चार पल तो बिस्तर पर निढाल पड़ी रही। कुछ समय के बाद भी उठने की बजाय बिस्तर पर ही लेटी  मुद्रा में ही कहा मैं अभी देखती हूं किधर चोट लगी है तुम्हें। बारम्बार गिरने के बारे में असंतुलित होने का तर्क देती रही। उनको उसी हाल में छोड़कर मैं कुर्सी पर पैर फैलाकर बैठा उनके खड़े होने का इंतजार करता रहा।

 मैं सिगरेट तो पीता नहीं हूं पर टेबल पर रखे सिगरेट पैकेट को देखकर मैने एक सिगरेट सुलगा ली और बिना कोई कश लिए अपने हाथों में जलते सिगरेट को घूमाता रहा। जब आधी से ज्यादा सिगरेट जल गयी तो फिर मैं यह कहते हुए बाकी बचे सिगरेट को एस्ट्रे मे फेंक दिया माफ करना सिगरेट भाई कि मैं पीने के लिए नहीं बल्कि अपने हाथ में सुलगते सिगरेट को केवल देखने के लिए ही तेरा हवन कर रहा था। वे खड़ी हो गयी और मेरे बदन पर हाथ फेरते हुए व्यग्रता से बोली जरा मैं देखूं कहीं चोट तो नहीं लगी है। मैने रूखे स्वर में कहा कि बस बच गया नहीं तो घाव हो ही जाता।  मेरी बात सुनकर वे हंसने लगी। चोट से तो घाव ठीक हो जाते है यह कहते हुए उन्होने फिर एक बार फिर मुझे आलिंगनबद्ध् करने की असफल कोशिश की। मैने जोर से कहा आपका दिमाग खराब है क्या?  क्या कर रही हैं आप। एकदम सीधे बैठे और कोई शरारत नहीं। आपको शर्म आनी चाहिए कि अभी मिले 10 मिनट भी नहीं हुए कि आप अपनी औकात पर आ गयी।

अरे कुछ नहीं तो अवस्थी जी का ही लिहाज रखती। यदि उन्होने कहा नहीं होता तो क्या मैं किसी भी कीमत पर आपके साथ आ सकता था।  मैं अपनी मर्यादा के चलते किसी का भी रेप नहीं कर सकता पर मैं किसी को अपना रेप भी तो नहीं करने दे  सकता । यह सुनकर वे खिलखिला पड़ी, यह रेप है क्या? मैने सख्त लहजे में कहा कि क्या रेप केवल आप औरतों का ही हो सकता है कि सती सावित्री देवी कुलवंती बनकर जमाने को सिर पर उठा ले । यह शारीरिक हिंसा क्या मेरे लिए उससे कम है। यह सब चाहत मन और लगाव के बाद ही संभव होता है। जहां पर प्यार नेह का संतोष और प्यार की गरिमा संतुष्ट होती है। आप तो इस उम्र में भी एकदम कुतिया की तरह मुंह मारती है। मेरे यह कहते ही वे बौखला सी गयी। तमीज से बात करो मैं कॉलेज में रीडर हूं और तुम बकवास किए जा रहे हो। मैं पुलिस भी बुला सकती हूं। मैने कहा तो फिर रोका किसने है मैं तो खुद दिल्ली का क्राईम रिपोर्टर हूं। कहिए किसको बुलाकर आपको जगत न्यूज बनवा दूं। मैने उनसे कहा कि कल मैं अवस्थी जी को यह बात जरूर बताउंगा। बताइए क्या इरादा है पुलिस थाना मेरे साथ चलेंगी या फिर मैं अभी थोड़ी देर तक और बैटकर आपको नॉर्मल होने का इंतजार करूं। मेरे मन में भी भीतर से डर था कि कहीं यह लेखिका महारानी  सनक गयी और किसी पुलिस वाले को बुला ली या मेरे जाने के बाद भी बुला ली तो हंगामा ही खड़ा हो जाएगा,
 मगर पत्रकार होने का एक अतिरिक्त आत्मविश्वास हमेशा और लगभग हर मुश्किल घड़ी में संबल बन जाता है। सिर आई बला को टाल तू की तर्ज पर मैने उनको सांत्वना दी। उन्होने अपना सूर बदलते हुए कहा कि तू मेरा दोस्त है न ?  जब कभी भी मैं दिल्ली आई और तुमसे मिलना चाही तो तुम आओगे न ? मैने भी हां हूं कहकर भरोसे में लिया। फिर मैने कहा कि खाली ही रखेंगी कि अब कुछ चाय आदि मंगवाएंगी। मैने चाय पी और चाय लाने वाले छोटू का नाम पूछा और 10 रूपए टीप दे दी ताकि वो गवाह की तरह भी कभी आड़े समय काम आ सके।  फिर मैने उनसे कहा बाहर तक चलिए ऑटो तो ले लूं। मैने ऑटो ले ली और मेरे बैठते ही उन्होने ऑटो वाले को 50 रूपये का नोट थमा दी। मेरे तमाम विरोध के बाद भी वे बोली कि आप मुझे छोडने आए थे तो यह मेरा दायित्व है।

बात सहज हो जाने के बाद अगले दिन मैं इस उहापोह में रहा कि कल की घटना की जानकारी श्री अवस्थी जी को दूं या नहीं। मगर दोपहर में हम रिपोर्टरों की डेली मीटिंग खतम् होते ही मैं पास वाले हिन्दुस्तान टाईम्स की ओर चल पड़ा। कादिम्बनी के संपादक राजेन्द्र अवस्थी के केबिन के बाहर था। बाहर से पता चला कि वे खाना खा रहे हैं तो मुझे बाहर रुककर इंतजार करना ज्यादा नेक लगा, नहीं तो इनके भोजन का स्वाद भी खराब हो जाता। खाने की थाली बाहर आते ही मैं उनके कमर में था। मेरे को देखते ही मोहक मुस्कान के साथ हाल चाल पूछा और एक कप चाय और ज्यादा लाने को कहा। चाय पीने तक तो इधर उधर की बातें की, मगर चाय खत्म होते ही कल एचटी से बाहर निकलने से लेकर मंदिर मार्ग गेस्टहाउस में शाम की घटना का आंखो देखा हाल सुना दिया। मेरी बात सुनकर वे शर्मसार से हो गए। उनकी गलती के लिए एकदम माफी मांगने लगे। तो यह मेरे लिए बड़ी उहापोह वाली हालत बन गयी। मैने हाथ जोड़कर कहा कि सर आप हमारे अभिभावक की तरह है। मैं आपके प्यार और स्नेह का पात्र भी हूं लिहाजा यह बताना जरूरी लगा कि पता नहीं वे कल किस तरह कोई कहानी गढकर मेरे बारे में बात करे। मैने अवस्थी जी को यह भी बताया कि मैंने कल शाम को ही उनको कह दिया था कि इस घटना की सूचना अवस्थी जी को मैं जरूर दूंगा। बैठे बैठे अवस्थी जी मेरे हाथओं को पकड़ लिए और पूछा कि आपने इस घटना को किसी और से भी शेयर किया है क्या ? मेरे ना कहे जाने पर अवस्थी जी ने लगभग निवेदन स्वर में कहा कि अनामी इसको तुम अपने तक ही रखना प्लीज।  मैं कुर्सी से खड़ा होकर पूरे आदर सम्मान दर्शाते हुए कहा कि आप इसके लिए बेफिक्र रहे सर।
इस घटना के कोई दो साल के बाद अवस्थीजी का मेरे पास फोन आया कहां हो अनामी ? उनके फोन पर पहले तो मैं चौंका मगर संभलते हुए कहा दफ्तर में हूं सर कोई सेवा। ठठाकर हंसते हुए वे बोले बस फटाफट आप मेरे कमरे में आइए मैं चाय पर इंतजार कर रहा हूं। उनके इस प्यार दुलार भरे निमंत्रण को भला कैसे ठुकराया जा सकता था। मैं पांच मिनट के अंदर अंबादीप से निकल कर एचटी हाउस में जा घुसा। कमरे में घुसते ही देखा कि वही मंदिर मार्ग वाली महिला लेखिका पहले से बैठी थी। मुझे देखते ही वे अपनी कुर्सी से उठकर खड़ी होकर नमस्ते की, तो अवस्थी जी मुस्कुराते हुए मेरा स्वागत किया। उन्होने कहा कि माफ करना अनामी मैने तुम्हें नहीं बुलाया बल्कि ये बहुत शर्मिंदा थी और तुमको एक बार देखना चाहती थी। अवस्थी जी की इस सफाई पर भला मैं क्या कहता। मैने हाथ जोड़कर नमस्ते की और हाल चाल पूछकर बैठ गया। वे बोली क्या तुम नाराज हो अनामी ? मैने कहा कि मैं किसी से भी नाराज नहीं होता। जिसकी गलती है वो खुद समझ ले बूझ ले यही काफी है । मैं तो एक सामान्य सा आदमी हूं नाराज होकर भला मैं अपना काम और समय क्यों खराब करूंगा?  करीब आधे घंटे तक बातचीत की और दोनों से अनुमति लेकर बाहर जाने लगा तो अवस्थी जी ने फिर मुझे रोका और महिला लेखिका को बताया कि अनामी को मैने ही कहा था कि इस घटना को तीन तक ही रहने देना। इस पर मैं हंसने लगा सर यदि आप मुझे नहीं रोकते तो 10-20 लोग तक तो यह बात जरूर चली जाती पर सब मेरे को भी तो दोषी मान सकते थे। मैने किसी को यह बात ना कहकर अपनी भी तो रक्षा की। इस पर एक बार फिर खड़ी होकर लेखिका ने मेरे प्रति कृतज्ञता जाहिर की, तो मैं उनके सामने जा हाथ जोड़कर नमस्ते की और इसे भूल जाने का आग्रह किया।
इस घटना के बाद अवस्थी जी करीब 13 साल तक हमसबों के बीच रहे। निधन हुए भी अब करीब आठ साल हो गए और लेखिका महोदया अब कहां पर हैं या नहीं या रिटायर होकर कहां पर है यह सब केवल भगवान जानते है। तब मुझे लगा लगा कि करीब 21 साल पहले की इस घटना को अब याद कर लेने में भी कोई हर्ज नहीं है। तो यह थी एक घटना जहां पर सावधान और बुद्धि कौशल साहस को सामने रखकर ही खुद को बचाया जा सकता था या बदनामी और खुद अपने रेप से खुद को किसी तरह बचाया ।