शनिवार, 28 जनवरी 2017

महेन्द्र सिंह धोनी के रांची में







अनामी शरण बबल


झारखंड की राजधानी रांची शहर को खासकर युवकों द्वारा आजकल  धोनी वाला रांची या धोनी का शहर भी कहा जाता है। मूलत: बिहारी होने के नाते रांची शहर को लेकर मेरे मन में कभी भी कोई खास रोमांच नहीं रहा था। बिहारी होने के बाद भी सबसे कम बिहार को ही मैने देखा है। इससे कहीं ज्यादा और कई कई बार यूपी हरियाणा पंजाब को देखने का सुयोग मिला। बिहार में रहते रांची जाने का पहला मौका 1983 में मिला था। इसके बाद रांची जाने के दो एक मौके और लगे जिसे जाना  या न जाना भी कहा जा सकता है।

पिछले साल सितम्बर माह में रहने के ख्याल से पहुंचा तो शहर के चारो तरफ रांची के छोरा पर बनी एमएस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी के पोस्टर लगे थे। झारखंड के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित अखबार रांची एक्सप्रेस में बतौर संपादक मैं अभी लोगों से मिल ही रहा था कि धोनी को लेकर अखबार के दफ्तर में चर्चों का बाजार गरम सा पाया। धोनी के कोच चंचल भट्टाचार्य को लेकर मेरे मन में भी बड़ा सेलेब्रेटी वाला आकर्षण था, और रांची एक्सप्रेस के सहकर्मियों से परिचित होते समय मैं उस समय दंग रह गया कि धोनी के कोच चंचल दा भी इसी अखबार में खेल संपादक है। मैं पूरे जोश उल्लास और बेपनाह खुशी के साथ चंचल दा मिला। चंचल दा की सरलता सादगी और विनम्रता मुझे हमेशा चौंकाती। उनका सादा जीवन और स्टारडम से दूर रहना मुझे भी भाया। उनकी यह सादगी मुझे लगातार यह प्रेरणा भी देती कि स्टार को पैदा करने वाला कोई कोच स्टार बनकर काम नहीं कर सकता। एक गुरू को हमेशा शांत निर्मल और सबके लिए एक समान बने रहना ही जरूरी होता है। स्टार बनकर तो कोई कोच फिर कोई नया धोनी पैदा नहीं सकता। आज तो ज्यादातर लोग थोडा सा धन और शोहरत पाते ही बोलचाल का लहजा अपना चाल चलन चेहरा और चरित्र तक बदल डालते हैं। मगर वहीं एक स्टार गुरू तो हमेशा सादा गुरू ही था। तभी तो स्टारों को ही पैदा करेगा। बच्चों को निखारेगा।

चंचल दा के साथ अक्सर दर्जनों बाल खिलाडियों की फौज भी रांची एक्सप्रेस के दफ्तर में आती रहती थी। दो बार तो चंचल दा के संकेत पर न जाने कितने और किन किन खेल के उभरते खिलाडियों नें संपादक जी के पैर छूए। जानता तो मैं किसी को नहीं था पर उनके उज्जवल भविष्य और नेशनल प्लेयर बनने की शुभकामनाएं देने के सिवा मेरे पास और कुछ भी नहीं था। जिसे मैने पूरी उदारता से सभी बच्चौं के सिर पर हाथ रखकर दे दिए।   

लगता है मानो एक जमाने में रांची एक्सप्रेस का दफ्तर भी क्रिकेट का कहवाघर सा रहा होगा। जहां पर क्रिकेट के बहसों का बाजार गरम रहा करता होगा। एक तरफ धोनी के कोच शांत नरम दिल बहुत ही सौम्य से चंचलजी तो दूसरी तरफ अपने जमाने के तूफानी बल्लेबाज रहे त पन दोर्राई थे। जिनकी लप्पेबाजी की गूंज और धमक सालों बीत जाने पर भी बनी हुई है। 65 साल के सबसे यंग सबसे अनुभवी पत्रकार के साथ क्रिकेटर कमेंटेटर और मल्टी सब्जेक्ट पर अधिकार रखने वाले उदय वर्मा थे। बकौल वर्मा तपन मूलत: हिटर था, मगर गेंद को उठाकर मारने की बजाय कम उच्चाई पर सीधे छक्का चौक्का मारने का कमाल केवल तपन ही करता था।

धोनी के बारे में रांची शहर के ज्यादातर लोगों के पास कोई न कोई अपना निजी किस्सा कहानी अनुभव मिलेगा। उदय जी के अनुसार स्टेडियम में हमलोग खेलते थे तो धोनी गेंद उठाकर लाने या पानी पीलाने के लिए या कोई न कोई बहाने साथ रहना चाहता था। लंबे लंबे बाल के कारण यह सबों का प्यारा भी था। धोनी की शरारतों पर रौशनी डालते हुए उदय जी ने बताया कि अमूमन वो स्कूल से सीधे मैदान में आता था तो कई बार हमलोगों के लंच खा लेता और बड़ी मासूमियत से बता भी देता था। धोनी के खेल के बारे में कहा कि यह अनगढ़ खिलाडी था। समय की मांग के साथ खुद धोनी ने खुद को बदला और विकेटकीपिंग की परम्परागत तरीके से अलग अपनी एक शैली विकसित की। बल्लेबाजी का भी यही हाल रहा, खासकर हेलीकॉप्टर शॉट जिसे धोनी शॉट की तरह भविष्य में मान लिया जाएगा। यह शॉट धोनी का अविष्कार है। शहरी खिलाडियों की तरह धोनी कॉपीबुक स्टाईल का प्लेयर ना होकर अपने अदांज में शॉट की नयी परिभाषा लिखने वाला खिलाडी है ।

एक तरफ अक्टूबर के पहले हफ्तें में धोनी रिलीज होने वाली थी तो लगा मानो पूरे शहर में उन्मादी हालत है। धोनी को गरियाने वाले भी काफी लोग मिले, मगर उन लोगों की भी तादात कम नहीं थी जो धोनी के स्टार बनने के बाद रांची शहर को एक जंपिग पैड सिटी की तरह देखते हैं। मुझे भी यह जानकर हैरानी हुई कि दिल्ली समेत आसपास, के कई राज्यों के दर्जनों लड़के आज रांची में ही कहीं न कहीं पर किसी न किसी से कोचिंग लेकर धोनी बनने का सपना देख रहे है। धोनी के बहाने रांची में कोडिंग का बाजार भी काफी गरम है। खिलाड़ी रह चुके करीब एक दर्जन पूर्व किलाडी कोचिंग अकादमी में कहीं न कहीं आगे पीछे से अपवी सेवाएं दे रहे हैं। रांची के कई खिलाड़ी तो आजकल दिल्ली के कई स्कूलों में बतौर कोच अपनी सेवा देने में लगे हैं।   

रांची एक्सप्रेस की तिकड़ी किसी मल्टीप्लेक्स में धोनी के पहले शो के बाद दफ्तर में आकर फिल्म की ही चर्चा कर रहे थे। उदय जी ने मुझे भी शो देखने का न्यौता दिया था। धोनी के कोच चंचल दा अमूमन धोनी को लेकर खामोश ही रहते थे। बाद में पता लगा कि पैसा कमाने में धोनी आज भले ही अरबों में खेल रहे हो, मगर धोनी पर ही चंचल दा के हजारों रूपए आज भी बाकी है, जिसे डूबा हुआ ही माना जाए। अलबता धोनी आज भी चंचल दा के पैर छूकर ही अपना सम्मान जताता है। केवल धोनी के कोच के कारण ही रांची में इनकी धमक भी है। फिर  धोनी ही क्यों झारखंड का शायद ही कोई खिलाड़ी ( किसी भी खेल का क्यों ना हो) दर्जनों ओलंपियन भी चंचल दा के चहेते है। चंचल दा की वजह से मैं भी दर्जोनों खिलाडियों से मिला और देखा। वरिष्ठ पत्रकार उदय वर्मा जी ने बताया कि सिनेमा में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे इसको धोनी का सही चित्रण माना जाए। चूंकि यह सिनेमा है इस कारण इसकी पटकथा में सफलता वाले आईटम को ही प्रमोट किया गया। रांची की पृष्ठभूमि पर धोनी की कहानी है मगर सिनेमा में रांची शहर ही नदारद है। धोनी के जीवन के असली पात्रों का न दिखाया जाना भी इसका सबसे कमजोर पक्ष है। मगर सिनेमा कैसी है इस पर बहस करने की बजाय यह माना जाना चाहे कि यह आज के एक सबसे लोकप्रिय खिलाड़ी की स्टोरी है, लिहाजा धोनी चलेगा धोनी के नाम से सिनेमा चलेगी।  फिल्म से ज्यादा धोनी का नाम चल रहा है। और इसतरह के बॉयोपिक पिक्चरों की यही खासियत भी होती है।

आज इडियट बॉक्स पर दो सप्ताह की पब्लिसिटी के बाद धोनी का प्रसारण हुआ। जिसे पावर सप्लाई कपनी      बीएसईएस (यमुना पावर) की आंख मिचौनी के बाद मैं केवल 50 फीसदी ही देख सका। इसके कुछ अंश को मैंने तपन जी के मोबाईल पर रांची में भी देखा था। सिनेमा के अंशों को दिखाने की जो ललक या उन्मादी इच्छा तपन जी में देखकर मैं दंग सा रह गया। फिल्म कैसी लगी इस पर कोई टिप्पणी करने से ज्यादा कुछ पुराने यादगार मैचों के मुख्यांश को देखना ही ज्यादा मनभावन लगा। खासकर पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति मुर्शरफ का धोनी और उनके बालों के प्रति दिखाएं गए प्यार वाले अंश को फिर से देखना भी काफी सुहावन लगा। अलबत्ता धोनी की दो दो लव स्टोरी में पहले प्रेम की दिवंगत नायिका का एकाएक ना रहना भी काफी मार्मिक दर्दनाक लगा। जो सुदंरता के मामले में धोनी की मौजूदा पत्नी साक्षी से भी अधिक सुदंर और मोहक थी। 

दो दो पूजा को 25 साल के बाद याद करते हुए





अनामी शरण बबल



पूजा यानी पूजा प्रार्थना मंदिर में जाकर भगवान की वंदना आराधना या अर्चना। मन पूजा को लेकर कैसे शांत हो भला। जब देवी भक्ति महिमा कीर्ति पूजा के नाम के आगे पीछे मनोहर नामों की इतनी लंबी महिमा हो। मंगला चरण से पहले इतने नामों का जंजाल। हां तो मैं इस समय एक नहीं  दो दो पूजा की बात कर रहा हूं। पूजा बेदी और पूजा भट्ट की.    
पिछले दिनों मैं पूजा बेदी की बिंदास बेटी आलिया इब्राहिम के बारे में कुछ सुना, तो मुझे पूजा बेदी यानी बोल्ड बिंदास एंड ब्यूटीफुल पूजा बेदी की याद आ गयी। पूजा बेदी के बारे में मैं सोच ही रही था कि एकाएक दूसरी पूजा यानी पूजा भट्ट यानी दिल है कि मानता नहीं कि हिरोईन और दिल फेंकने के मामले में किसी से कम नहीं और रूपहले पर्दे के नामी निर्देशक महेश भट्ट की पहली या सबसे बड़ी बेटी की भी याद ताजी हो गयी। नाम एक मगर दोनों बालाओं के पीछे टाईटल अलग है। नामी बाप की दोनो एकदम एकसाथ जवान हुई हॉट बिंदास बालाओं से मुझे एक ही साथ एक ही होटल के एक ही कमरे में एक ही समय एक साथ बातचीत करने का मौका मिला। कबीर बेदी और महेश भट्ट दोनो पुराने दोस्त हैं लिहाजा इन दोनों की बेटियं भी बचपन से दोस्त रही है। पारिवारिक संबंधों के चलते इनकी दोस्ती आम हीरोईनों से कहीं ज्यादा बेबाक और खुलेपन की थी।
यह बात कोई 25 साल पहले 1992 की है। अब तो मुझे यह भी ठीक से याद नहीं हैं कि दिल्ली में इनके पीआर को देखने वाले मुकेश से मेरी आखिरी मुलाकात कब हुई थी। मुकेश से मिले 15 साल से ज्यादा तो हो ही गए है। बगैर किसी फोटोग्राफर के आने की शर्तो पर ही दोनों पूजाएं बातचीत के लिए राजी हुई। जब रूपहले पर्दे पर पूजा भट्ट की पहली फिल्म दिल है कि मानता नहीं धूम मचा रही थी और इसके गाने चारो तरफ छाए हुए थे। उधर उसी समय पूजा बेदी की कोई फिल्म के रिलीज के पहले ही कामसूत्र कॉण्डम या कंडोम के विज्ञापनों से बाजार में तहलका मची थी।
कंडोम गर्ल के रूप में विख्यात से ज्यादा इस पहली बहुरंगी रंगीन कामसूत्र के रंगीन पेंच में सेक्स को लेकर मीडिया में खबरों लेखों और इसी बहाने हॉट कामुक फोटो को छापने और सेक्स यानी सेक्सी कंडोम की चर्चा को किसी भी तरह मंदा नहीं पड़ने दिया जा रहा था। कामसूत्र से कामसूत्र की करोड़ों की कमाई (यह आज से 25 साल पहले 1992-93 की कमाई है जनाब) से बाजार गरमाया हुआ था। कंडोंम गर्ल से ज्यादा कामसूत्र गर्ल या सेक्स बनाम सेक्सी गर्ल के रूप में पूजा बेदी की ही चर्चा सबसे ज्यादा हो रही थी या चारो तरफ होती थी।
ज्यादातर दुकानों में तो लोगों ने कंडोम की मांग केवल पूजा बेदी कहकर भी करने लगे थे। कंडोम यानी पूजा देना या पूजा बेदी देना। कंडोम मांगने की सार्वजनिक झिझक को मारकर कामसूत्र ने एकदम छैला टाईप एक लफंगा शैली जिसे अब मॉडर्न स्टाईल भी कहा जाने लगा है को ही मार्केट का टीआरपी बना दिया ।
कामसूत्र ने समाज में कंडोम को लेकर मन में बनी झिझक को असरदार तरीके से तार तार कर दिया है। अब तो ग्राहकों ने मुस्कान के साथ बिना किसी झिझक के ओए पूजा बेदी या पूजा देना की मांगकर कंडोम की डिमांड को ग्लैमरस कर दिया। यही कारण है कि तब कंडोम का सालाना बाजार एक हजार करोड के आस पास का हो गया है। यौन शक्तिवर्द्धक दवाओं के अर्थशास्त्र को भी एक ही साथ मिला दे तो इससे आदमी पावरफूल हुआ है या नहीं यह तो एक गोपनीय सर्वेक्षण का गहन शोधात्मक प्रसंग बन जाएगा मगर तीन दशक के भीतर केवल पावर बेचने वाले खुद को उम्मीद से ज्यादा कमाई करके पावरफूल जरूर बन गए। यौनवर्द्धक दवाओं का क्या आकर्षण है यह इसी से पत्ता या समझा जा सकता है कि इडियट बॉक्स पर रोजाना मल्टीनेशनल कंपनियों को गरियाने वाले रामदेव बाबा भले ही बाल ब्रह्मचारी हो, मगर पावर की शुद्ध देशी दवाईयों को बेचने के मामले में ये भी किसी से पीछे नहीं रहे है। इनकी दवाईयां या शिलाजीत कितनी पावरवाली है यह तो कोई उपयोग करके ही बता सकता है कि पैसा वसूल गेम है पतजंलि के नाम पर पैसे का गंगा स्नान भर है केवल। पावर मेडिसीन का ही इतना आर्कषण है कि बाबा भी इससे कहां बच पाए ?
कंडोम यानी निरोध, और निरोध का मतलब परिवार नियोजन। परिवार नियोजन का एक ही सामाजिक अर्थ होता है हम दो हमारे दो। कंडोम की समाज शास्त्रीय व्याख्या में गांव से लेकर शहर तक एक ही नेशनल शब्दार्थ होता है सुखी परिवार। सुखी परिवार के आईने में कंडोम यानी निरोध है। मगर अब कंडोम के बाजार में मौजूद दर्जनों ब्रांड है। कंडोम की अब बाजारी भाषा में मौज मौका मस्ती और मजा का मस्ताना अंदाज या मर्दाना अंदाज यानी केवल बेफिक्र आनंद मस्ती ही नयी परिभाषा बन गयी है। कंडोंम का अर्थ यानी ज्यादा मजा ज्यादा डॉट्स ज्यादा आनंद यानी सबकुछ आदि इत्यादि।
माफ करना पाठकों इन पूजाओं की कीर्ति पाठ करते करते मैं कुछ ज्यादा ही बक बक करने लगा। हां तो उनके पीआर मुकेश के साथ मैं होटल ताज में जा पहुंचा। मुकेश से यारी होने के कारण वह बार बार मुझे चेता रहा था कि ये सालियां दोनों मुंहफट है, इसलिए तरीके से बात करना नहीं तो बात का हंगामा करेंगी। लड़कियों से बात करने में कोई संकोच तो मैं भी नहीं करता था मगर बिना प्रसंग किसी लड़की से बात करना तो आज भी मेरे लिए सरल नहीं है, मगर जब बात करने का बहाना हो तो बात  बेबात ही सही बात तो करनी पड़ती है। फिर लंबी बात करने या किसी के पेट से कुछ निकलवाने के लिए तो पहले चारा डालकर असर देखना पड़ता है। खैर मैं फिल्म पीआर मुकेश के साथ इन देवियों से लगभग मिलने के करीब आ गया था। कोई फंटूश या छैला नहीं होने के कारण अपन दिल भी थोडा आशंकित था। भीतर ही भीतर मैं अपने आप को ही सांत्वना दे रहा था कि अरे ये सब हीरोईने ही तो हैं कोई आतंकवादी तो नहीं जो गोली मार देगा।  
तीसरे तल पर हमलोग इन अभिनेत्रियों के कमरे के बाहर तक पहुंच गए। उस समय सुबह के 11 बज रहे थे। तब मुकेश ने मुझे दो मिनट बाहर ही खड़ा रहने को कहकर कॉलबेल बजाते हुए अंदर चला गया । दूसरे ही पल वह बाहर आया और मेरा हाथ पकड़ कर अपने साथ ही कमरे के अंदर पहुंच गया। अप्रैल का महीना था और दोनों शॉट्स पहन रखी थी। पूजा बेदी एक्सरसाईज कर रही थी तो पूजा भट्ट अपनी बालों को संवार रही थी। मेरे को देखते ही वे दोनों खिलखिला पड़ी। एकाएक खिलखिलाहट पर मैं भी संकोच में पड़ गया और मुकेश भी थोडा नर्वस सा था। मुकेश ने पूछा क्या बात है मैडम। अपनी हंसी को रोकते हुए पूजा बेदी बोली अरे मैं तो समझ रही थी कि कोई पत्रकार को ला रहे हो, मगर तुम तो किसी कॉलेजी लड़के को उठाकर ले आए। फौरन संयमित होकर मुकेश ने मेरे बारे जरा बढा चढाकर कसीने कसे। बकौल मुकेश क्या बात कर रही है आप। कितने दिनों तक तो दोस्ती का वास्ता देकर मैंने अनामी को इंटरव्यू के लिए राजी किया है और आप मजाक बना रही है। अनामी अईसा है वईसा है आप दिल्ली में तो रहती नहीं हो न, नहीं तो अनामी के नाम से आप पहले चहक जाती। खैर मुकेश की बात सुनकर दोनों पूजाएं लगभग एक साथ ही बोल पड़ी अरे नहीं पत्रकार के नाम पर तो मैं समझी कि दिल्ली वाला जर्नलिस्ट थोड़ा उम्रदराज और चश्मे वाला होगा। पर तुम तो टीशर्ट वाले किसी लड़के को ले आए। हो।फिर जोर जोर से दोनों हंसने लगी। सॉरी जर्नलिस्टजी माफ करना यार। बड़े बिंदास माहौल में मुझे छोड़कर बाहर जा रहे मुकेश ने कहा रिसैप्शन पर मैं आपका इंतजार करूंगा।  
कमरे में अकेला पाते ही मैं बैठने के लिए जगह और साधन देखने लगा। दो अलग अलग बेड के बीच में कुर्सी को घसीटा और धम्म से बैठ गया। मेरे बैठते ही पूजा भट्ट ने कहा कि आप तो कहीं से भी जर्नलिस्ट नहीं लग रहे। इस पर मैं खिलखिला उठा। मेरे हंसने पर व दोनों अवाक सी होकर बोली क्या हुआ मैने तुरंत पलटवार किया कि आपलोग को देखते ही मेरे मन में भी यही सवाल उठा था कि ये दोनों किसी भी तरह हीरोईन सी नहीं लग रही है।  इस पर तेज लहजे में दोनों बोल पड़ी क्या लग रही हूं बताओ न प्लीज। मैं फिर हंसने लगा तो तेज स्वर में इस बार पूजा बेदी चीखी अरे कुछ बोलो भी। तो।  मैने अपने पत्ते फेंके अरे मैं भी तो हीरोईनों से बात करने आया था मगर आपलोग तो एकदम स्कूली बेबी लग रही हो। फोटो तो बहुत हॉट होती है, मगर सामने तो आपलोग हो एकदम नहीं। मेरी बात सुनकर दोनों के चेहरे का पूरा तनाव खत्म हो गया। एक दूसरे को देखकर दोनो ने मुझसे कहा और तुम भी गुड बॉय हो। यह सुनते ही मैं जरा नाराजगी जताने के लहजे में कहा यदि संग में फोटोग्राफर लाने देती तो गुड बॉय भी दोनों गुड गर्ल के साथ अपना फोटू खिंचवा कर जमाने भर को बताता कि ये देखो मैंने दोनों पूजा से बात की है। मगर मेरे पास तो आपलोग से मिलने का कोई सबूत ही कहां है। कि लोगों को बता सकूं कि दोनों देखने में एखदम स्कूली लड़की सी है। मेरी बात सुनकर दोनों खिलखिला पड़ी। (दोस्तों इन हॉट हीरोईनों से मेरी यह बातचीत 1992 अप्रैल माह में हुई थी और उस समय तक जमाने में कम्प्यूटर तो था मगर इंटरनेट गूगल बाबा और मोबाइल नामक खिलौने का अविष्कार नहीं हुआ था। बातचीत करने का एकमात्र साधन ले दे के केवल अंगूली डालकर नंबर घुमाने वाले फोन के मार्फत ही बातचीत होती थी और उस समय दिन में तीन सेकेण्ड जी हं तीन सेकेण्ड बात करने पर सरकार को एक रूपया 31 पैसे देने पड़ते थे। यानी जमाना दादा आदम का था।  
मेरे को आप कहने में दोनों को बड़ी दिक्कत हो रही थी। अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी धड्डले से बोल रही इनलोगों ने मुझे भी आप की बजाय तुम कहने का निवेदन किया ताकि तुम संबोधन कर वे आसानी में बात कर सके।  इस पर मैने उन्हें कहा कि आप बेहिचक मेरे को जो मन में आए कह सकती है । मगर मैं आपलोग को आप ही कहूंगा। हर पेशे का अपना सिद्धांत सीमा और शालीनता होती है। कोई 20-25 मिनट तो हल्की बातों में ही कट गयी। पसंद नापसंद स्टार के बेटे बेटी होने के दुख सुख खानपान और इनकी आदतों से लेकर मीडिया सहित घरेलू टेंशन पर भी बात की। किसी सिनेमा के प्रीमियर से पहले के टेंशन पर भी चर्चा की। यानी जब बातों की रेल स्पीड पकड़ने लगी और किसी में भी कोई संकोच या हिचक नहीं रही तो मैने दोनों से पूछा तो क्या अब हमलोग बात शुरू करे ?
मेरी इस बात पर दोनों एकदम चौंक सी गयी। बात कर ले क्या मतलब ? हम बातचीत ही तो कर हैं। मै भी हैरान होते हुए कहा कि अभी कहां बात कर रहा हूं अभी तो मै केवल आपलोग से जान पहचान कर रहा हूं। कि  कैसा होता है किस तरह की होती है आपलोग की जिंदगी ?  और कैसा है रहन सहन बस्स। मैने आपलोग की हीरोपंथी और उसके अनुभव पर तो कुछ जाना ही नही। इस पर फिर रूठने का अभिनय करती हुई बेदी बोली कि और यदि हमलोग ना बात करे तो। इस पर मैं फिर खिलखिला उठा। तब गुस्से में भट्ट बोलती हैं आप बात बेबात पर हंसते कुछ ज्यादा है। इस पर मैं फिर खिलखिला उठा हो सकता है जैसे आप एक्टिंग करती हो तो मैं क्या मुस्कुरा भी नहीं सकता। दोनो ने एक बार फिर एक दूसरे को देखा और बोली तो अब बस्स करे। बिना कुछ कहे मैने अपना नोटबुक बंद करते हुए कहा कोई बात नहीं बहुत मशाला आ गया है काम हो जाएगा।
एकाएक बात खत्म होते देख दोनों व्यग्र सी हो उठी। अरे आपने तो बात ही खत्म कर ली. मैं तो यूं ही मजे ले रही थी। मगर मैं तो मजे नहीं ले रहा हूं । मै तो देश की सुपर स्टार बेटियों से बात कर रहा हूं. आप कोई मेरी दोस्त तो हो नहीं कि जबरन बात करू। इस पर तुनकते हुए पूजा भट्ट ने पूछा कि मान लो तुम्हारी कोई दोस्त होती तो क्या करते। बताइए न प्लीज बताइ न। इस पर दोनों पूजा बच्चों सी मचल उठी। मैंने कहा कि मेरी कहां किस्मत कि आपलोग से दोस्ती करूं पर मेरी कोई दोस्त होती न तो कान पकड़कर पहले खडा करता और फिर जबरन बात करता। एक साथ दोनों बोल पड़ी तो बात करो न कोई रोक रहा है क्या ?
इसी तरह के हास्य वातावरण में मैंने पूछा कि पूरी दुनिया अब आपको कंडोम गर्ल के रूप में पहचानती है?  इतनी कम उम्र में सेक्स संभोग वाले इस एड को करने में कोई हिचक या संकोच नहीं लगा?  इसका ऑफर कैसे मिला?  मेरी बात सुनते ही बेदी शरमा गयी। फिर बोली मैं तो इस एड के बारे में जानती नहीं थी पर पापा के मार्फत ही यह एड कामसूत्र वाला मैंने की। पापा से यह सुनकर पहले तो मै शरमा रही थी, मगर पापा ने हिम्मत दी और कहा कि आगे देखना पांच सुपर हिट सिनेमा के बाद जो यश और शोहरत अर्जित होता है वो केवल इस एड से ही संभव हो जाएगी। बाद में मेरी मम्मी (प्रोतिमा बेदी) ने भी इस एड को लेकर हिम्मत दी और इसकी स्क्रिप्ट में मम्मी पापा ने बहुत संशोधन किए। कंडोम के बारे में आप क्या जानती हो?  मेरे इस सवाल पर हंसती हुई पूज बेदी ने कहा कि कुछ और बात करो। इस पर मैं हैरान रह गया। दो टूक कहा एक कंडोम गर्ल से तो केवल यही सब बातें की जा सकती है। मेरी बातों को सुनकर वे मुंह से जोर की आवाज निकालती हुई हंस पडी। पूजा बेदी ने मुझसे पूछा कि तुम कामसूत्र के बारे में क्या जनते हो? इस पर मैंने अपने बैग से कामसूत्र से दो तीन पैकेट निकाल कर उसके सामने फेंक दिए। जिसे देखकर भी नजर अंदाज करती हुई मुंह से केवल जोरदार सीटी निकालती हुई खिलखिला पड़ी।    
पूरे तमाशे पर पूजा भट्ट हंसते हंसते लोटपोट सी हुई जा रही थी। बेदी मुझसे पूछती है कैसा है। मैने कहा कि अरे यह कोई खाने की तो चीज है नहीं पर आकार में कुछ ज्यादा लंबा है, इसकी लंबाई कम होनी चाहिए थी। इस पर एकदम बेबाक होकर फटाक से बेदी बोल पड़ी तुम्हारा छोटा होगा। एक क्षण तो मैं भी यह सुनकर स्तब्ध सा रह गया और फौरन खुद को संभाला। नहीं पूजा जी मैं तो इंसान हूं। आदमी हूं और इंसानों के तमाम आकार प्रकार को और इसकी लंबाई को इंची टेप से नाप कर ही तो मैं यह कह रहा हूं। चूंकि आप इसकी एड कर रही हो और अगले दो एक साल में मुझे भी इसकी जरूरत पड़ेगी तब तो उस समय मैं केवल आपके चेहरे के कारण इसको नहीं खरीद सकता। आप इसकी एडगर्ल हो तभी मैं इसकी कमी बता रहा हूं। एकाएक मेरी बातें सुनकर वो खूब हंसी। फिर मुझसे पूछी कि कुछ और बात करनी है या मेरा चैप्टर खत्म। उनकी बातें सुनकर मैं हंस पड़ा और खड़ा होकर पूरे अदब से अपनीअंगूली उपर करके कहा आउट।   
दूसरे ही पल जब मैने पूजा भट्ट की तरफ ताका तो उन्होने कुछ कहने की बजाय मेरी आंखों में आंखे डालकर अपनी अंगूलियों को  नचाते हुए संकेतो के मार्फत अपने बारे मे पूछी। मैंने फौरन कहा यदि आदेश हो तो अब आपके साथ बतकही का श्री गणेश करे। मैने फौरन जोडा दिल है कि बात करने से मानता नही। मेरी बातें सुनकर दोनों मुस्कुरा पड़ी।
एक स्टार पुत्रों के अलावा डायरेक्टर के पुत्र पुत्री होने के क्या लाभ और नुकसान है।इस पर दोनो एक साथ बात करनी चाही, तो इस बार भट्ट ने बेदी को कहा यार तू चुप्प भी तो रह मेरे हिस्से में भी कुछ रहने दे ना। भट्ट के कहने पर बेदी जोर से हंसती हुई बोली जा अब मैं ना बोलूंगी तू लगी रह। भट्ट ने कहा स्टारडम के बहुत सारे फायदें और नुकसान होते है। आपको स्ट्रगल नहीं करना पड़ता। आपके पास मौके होते हैं और परिवार भी दो तीन रिस्क लेने का रेडी रहता है। मगर काम पाने के बाद भी हमलोग काम के प्रति गंभीर नहीं होती। जितना एक स्ट्रगलर स्ट्रगल करके कोई दूसरा उपर पहुंचता है, उतना सफर तो हमलोग की जेब में है। कुछ याद करती हुई एकाएक हंस पड़ी। एक कहावत है न कि चांदी क चमच्च लेकर ही स्टारसंस पैदा होते हैं। मगर जनता की कसौटी पर हम ज्यादातर संस एंड गर्ल ठहर नहीं पाते। हमारी योग्यता पर घंमड का गरूर का इतना घना घुन लगा होता है जिसे हमलोग चाहकर उतार नहीं पाती। भट्ट ने कहा कि आगे बॉलीवुड में मेरा फ्यूचर क्या होगा यह मुझे भी पता नहीं, मगर इसकी चिंता हमें नहीं। मेरा बाप मुझसे ज्यादा चिंतित रहता हैं पर ज्यादातर लोग बाजी खत्म होने से पहले होश में नहीं आती। मैं अपनी फिजिक जानती हूं आठ दस सिनेमा करके अंत में पापा की ही मदद करूंगी। डायरेक्शन ही मेरी रुचि और ड्रीम है। हम ज्यादातर लोग एक समान ही है, मगर यहां तो किसी को किसी के पास किसी के लिए समय नहीं है। हम घर में रहकर भी अकेली ही है। स्टारडम का अलग दर्द है जो ज्यादातर लोग नहीं जानते या मानते हैं।
इसी तरह दो चार और सवालों के बाद हमलोग की बातचीत का समापन हुआ। कोई 80 मिनट तक  बातचीत का सिलसिला चला। और अंत में जाने के लिए जब उठा तो बेड पर से उठकर दोनो बालाओं ने हाथ मिलाने के ले अपने हाथ को आगे कर दी। मैने दोनों से हाथ मिलाते हुए कहा कि आपलोग की बातों से ज्यादा नरम और मुलायम तो आपके हाथ है। दोनो बालाओं ने मेरी तारीफ में कहा कि तुमसे बात करती हुई कभी नहीं लगा कि हमलोग दिल्ली वाले किसी जर्नलिस्ट से बात कर रही हो। मैने तुरंत टिप्पणी की इतनी बुरी बात तो मैने नहीं की। तो वे दोनों फिर कह बैठी कि एकदम याराना माहौल में तुमने बात की यह दिल्ली की खासियत है कि मन की सारी बातें हो गयी और बुरी भी नहीं लगी। कमरे के बाहर निकलते समय दोनों पूछ बैठी क्या कभी दोबारा तुमसे मिलना होगा। इस पर मैं क्या कहूं आपलोग का जब मन करे कि इंटरव्यू देना है तो मुकेश को कह सकती है। बात मुझ तक पहुंच जाएगी। और इस तरह दो दो पूजा से मेरी बातचीत के इस यादगार सिलसिले का  पटाक्षेप हुआ। इन दोनों के इंटरव्यू को मैने कई फीचर एजेंसी को दिए।  जिससे ये सैकड़ों पेपरों में छा सी गयी। हालांकि भट्ट से ज्यादा बेदी के जलवों की धूम अधिक रही। अलबत्ता मुकेश के मार्फत कई बार उनके थैंक्स मेरे पास जरूर पहुंचे। मगर दोबारा मिलने का संयोग कभी नहीं बन पाया। और मैं 25 साल पहले की ज्यादातर बातें आपको एक बार फिर रखने की जद्दोजहद में लगा हूं, या बेमानी सी हो गयी इन बातों को आप तक शेयर कर रहा हूं।

बुधवार, 25 जनवरी 2017

जनता के संपादक बलबीर दत्त / अनामी शरण बबल








अनामी शरण बबल




राजनीति के जंगल में आजकल ज्यादातर पुरस्कार और सरकारी सम्मान पांव पैसा पहुंच पौव्वा और जुगाड़ के चलते ही हासिल किया जाता है। पुरस्कार देने का जमाना और मान सम्मान अब कहां? मगर दिल्ली की चकाचौंध से 1500 किलोमीटर दूर रांची के अपर बाजार के एक साधारण से दफ्तर में बैठकर क्षेत्रीय पत्रकारिता के  मान ज्ञान सम्मान केऔर जनहितों के लिए संघर्ष का जो सत्ता विरोधी चेहरा समाज के सामने रखा, वह वंदनीय है। इन्होने रांची से प्रकाशित इस अखबार को जो प्रतिष्ठा दिलाई है इसके लिए इनको और इनकी साधनहीन पूरी टीम की जितनी भी तारीफ की जाए वह कम है। ये इस तरह की फौज के कमांडर थे जहां पर बहुत सारी सुविधाओं की चूक हो जाने के बाद भी पत्रकारिता की मान और शान के लिए सब एकजुट हो जाते थे।
आमतौर पर किसी सम्मान या पुरस्कार को अर्जित करके लोग महान और सम्मानित से हो जाते हैं। मगर क्षेत्रीय पत्रकारिता के इस पुरोधा संपादक बलवीर दत से ज्यादा पद्मश्री  का सम्मान सम्मानित होकर गौरव का सूचक बना है।
पिछले साल मुझे भी कुछ माह रांची एक्सप्रेस से संपादक का ऑफर आया। यह एक पत्रकार के रूप में मेरे मित्र सुधांशु सुमन ने दिया था। एक टेलीविजन पत्रकार के रूप मं मैंइनको 20 साल से जानता रहा हूं। हालांकि उन्होने मुझे दिल्ली संस्कतरण में संपादक का ऑफर दिया था।  रांची एक्सप्रेस और बलबीर दत के नाम का इतना तेज मेरे मन में था कि दिल्ली में रहते हुए 27 साल हो जाने के बाद भी मैने खुद रांची में पांच छह माह तक रहने की इच्छा जाहिर की। दो तीन किस्तों में दिल्ली रांची आते जाते करीब ढाई तीन माह तक मैं रांची में रहा।

नयी सत्ता नयी व्यवस्था और नए हालात में देखा जाए तो जिन सपनों और बदलाव की योजनाओं और इच्छाओं के साथ गया था,उसमें कुछ खास नहीं हो पाया। इस बीच पहाड़ी इलाके की कंपकंपी वाली ठंड को देखते हुए मैने दो तीन माह तक दिल्ली लौटने की इच्छा जाहिर की और तमाम कठिनाईयों दिक्कतों के बाद भी मेरे तमाम नखड़़ो को  प्रबंधन ने सिर माथे लिया और मुझे दिल्ली जाने का टिकट थमा दिया। हमलोग में कोई शिकायत नहीं है क्योंकि यह अखबार तो इनके पास अभी सामने आया है, मगर हमारा नाता इनसे 20 साल से एक पत्रकार वाला सबसे प्रमुख रहा था।

 रांची पहुंचते ही जब मैं अपने एक प्रिय सहकर्मी  नवनीत नंदन के साथ जब बलवीर जी के घर पर पहुंचा तो अवाक रह गया। उनके स्टड़ी रूम में चारों तरफ हजारों किताबों का अंबार लगा था। स्टडी कमरे में चारो तरफ किताबें ठूंसी पड़ी थी। सैकड़ों फाईलों और हजारों कतरनों को देखकर तो मैं दंग रह गया। मैने उनके पांव छूए और उस अखबाक की कमान थामने से पहले आशीष मांगा । मैने कहा कि सर आपके अनुभव लेखन और संपादकीय दक्षता के सामने तो मैं कहीं पासंग भर भी नहीं हूं। मगर यह मेरा सौभाग्य भरा संयोग है कि मैं भी उसी रांची एक्सप्रेस का चालक बन रहा हूं जिसको आपने बुलेट ट्रेन बना रखा था।

 पूरे झारखंड में बलबीर दत को बच्चा बच्चा (जो अखबार पढने वाला हो) जानता है। यह अखबार पूरे शहर समेत झारखंड का अपन अखबार सा है। हालांकि जमाने की चमक दमक और बाजारी मारामारी वाले इस राज्य के बलवीर दत्त यहां के  इकलौते संपादक हैं जिनको उपराज्यपाल से लेकर रांची शहर का एक एक रिक्शा वाला भी जानता और अपना मानता है। पत्रकारिता में ये यहां के इकलौते सोशल संपादक का सर्वमान्य चेहरा की तरह स्थापित है। संपादक का मुखौटा लगाकर तो मैं या मेरे जैसे ही दर्जनों लोग रांची में सक्रिय हैं, मगर किसी की भी धमक जनता में नहीं बनी है। और मैं तो अपर बाजार से फिरायालाल चौक के बीच रास्ते में ही सही राह की खोज में भटकता रह गया।  

इस समय रांची से दर्जन भर अखबार निकल रहे हैं मगर रविवार वाले हरिवंश जी के प्रभात खबर से अलग होने के बाद किस पेपर का संपादक कौन है यह सब मुझ समेत ज्यादतरसपादकभी संभवत नहीं जानते होंगे। मैं भी ढाई माह में यह नहीं जान पाया कि तमाम अखबारों के संपादक कौन है। या यों कहे कि पाठकों की नजर में मेरी तरह ही सब अनाम हैं ।

रांची एक्सप्रेस में बलवीर दत्त जी के साथ काम करने वाले आ. उदय वर्मा जी ने भी  इनकी वीरता धीरता और जनता के लिए अंगद की तरह अडिग हो जाने की दर्जनों किस्से कहानियोंको सामने रखा। रांची एक्सप्रेस में मेरी एक संक्षिप्त पारी रही। इसके बावजूद मुझे इस बात का हमेशा गौरवबोध रहेगा कि मैने भी उनको देखा और स्नेह प्यार का पात्र बना ।

एक पाठक के रूप में इनकी सजगता देखकर मैं दंग रह गया। यह इस तरह के दीर्घजीवी  संपादक हैं जो अपने रिपोर्टरों को अपनी संपति और अनमोल निधि की तरह सहेजते और संवारते थे। पीछे खड़ा होकर बिना कुछ कहें अपने सहकर्मियों को निखारते थे। इन पर मैं यही कहूंगा कि ये एक अनमोल संपादक पत्रकार हैं जो अपने साथ साथ एक पूरी पीढी को भी संवारते हुए सुरक्षित रखते थे। किसी भी पत्रकार की कोई रपट लेख या कॉलम के छपने पर  सुबह सुबह ये खुद फोन करके वाहवाही दे उसे और बेहतर करने का सुझाव देते। मुझे भी यह सुख कई बार मिला। इतना उदार और बड़े दिल का संपादक भला और कहां मिलेगा ?

सोमवार, 23 जनवरी 2017

जल्लीकट्टू





प्रस्तुति -- विकिपीडिया 
जल्‍लीकट्टू
Madurai-alanganallur-jallikattu.jpg
एक युवक एक बैल का नियंत्रण लेने की कोशिश
उपनाम चढ़ाई आलिंगन, मंजू मुक्त
सबसे पहले खेला गया 400-100 BC [1]
विशेषताएँ
मिश्रित लिंग नहीं
स्थल खुला मैदान
ओलंपिक नहीं
जल्‍लीकट्टू (Jallikattu) तमिल नाडु के ग्रामीण इलाक़ों का एक परंपरागत खेल है जो पोंगल त्यौहार पर आयोजित कराया जाता है और जिसमे बैलों से इंसानों की लड़ाई कराई जाती है.[2] जल्लीकट्टू को तमिलनाडु के गौरव तथा संस्कृति का प्रतीक कहा जाता है। ये 2000 साल पुराना खेल है जो उनकी संस्कृति से जुड़ा है. [3]

इस खेल पर पाबंदी लगाने

जानवरों की सुरक्षा करने वाली संस्था पेटा इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले गयी. अदालत ने 2014 में इस खेल पर पाबंदी लगाने का फैसला सुनाया.[2]

सन्दर्भ


कहीं बेटा बाप बन गया तो कहीं बाप के लिए बेटा बन गए।




अनामी शरण बबल 


 राजनीति में संबंधों का कोई भूगोल नहीं होता। कौन कब कहां कैसे और किस तरह संबंधोंं में क्यों लोचा मार दे यह भगवान भी नहीं जानते। राजनीति से अरूचि रखने वाले जिस नासमझ शरीफ बेटे को नेताजी ने अंगूली पकड़कर सांसदी से लेकर सीएम तक बना कर छोड़ा य़ा दम लिया। वहीं बेटा एकाएक ज्ञानी ,ध्यानी अंतरजामी बनकर बाप की सालों की मेहनत को पल भर में ही हथिया लिया। बाप को गद्दी से उतारकर नयी पार्टी और सपा के पुराने सिंबल समेत पूरी पार्टी को ही हथिया लिया। बाप की विरासत के हस्तांतरण का भी अपने नेताजी पिताजी मयस्सर नहीं किया।  अपने बापू को पूरी तरह दरकिनार धकेल दिया़ा। अपनी नाक बचाने के लिए बापू नेताजी ने भी आत्मसमर्पण कर खामोशी की चादर ओढ़ ली। अरे बेटा है, क्या फांसी पर चढा दूं का एक बाप विलाप के साथ ही सपा के तुर्रम खान नेताजी ने अपनी गद्दी खाली कर कमान सौंप दी। करीब तीन माह के इस समाजवादी महाभारत से सबकी इज्जत धूमिल(? ) हुई। हालांकि  पार्टी बिरासत के इस महाभारत में पूत समेत नेताजी की भी जीत ही हुई। सपा को गोतियों की पार्टी बनाने की अपेक्षा अपन खानदानी पार्टी बनाकर छोड़ा। इसे विवशता (माने) कहे या मिलीभगत किि दोदशक तक चले मुलायम अमर प्रेम कहानी का भी पुत्र के प्रेशरकुकर के चलते ही सार्वजनिक तौर पर पटाक्षेप हो (करना) गया या पड़ा। मगर इस खेल में नेताजी अपनी साख  मतदाताओं के बाजार में गंवा बैठे।

उधर हंस हंस कर किसी को भी बेआबरू करने में माहिर और जल्लादों की तरह हमला करके उस पर पील पड़ने वाले नवजोत सिंह सिद्दू रिश्तों के मामले में एकदम भोला और ईमानदार निकले। गेदबाजों की कुटाई करने के लिए कुख्यात क्रिकेट बैकग्राउण्ड वाले महारथी आजकल टीवी संसार और क्रिकेट कॉमेंट्री में शेरो शायरी के लिए ज्यादामशहूर है। भाजपा से नाराज चल रहे ज्यादा बोलने में उस्ताद नवजोत ने एकाएक राज्यसभा सांसदी को उछाकर कमल के मुंह पर फेंकते हुए पल भर में ही पार्टी से नाता तोड लिया। आप के भरोसे ही शेर बनने वाले नवजोत को आप ही ने औंधे मुंह गिराकर चौराहे पर अकेले छोड़ दिया। मगर पंजाब के पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदरसिंह ने एक जलसे में नवजोत को बेटा कह कर संबोधितकिया। बेटे के संबोधन का मान रखते हुए अव क्रिकेटर नवजोत ने छक्का मारते हुए कहा कि जब उन्होने बेटा कहा है तो मैं भी एक बेटा का मान रखूंगा। अपने पिता पर किसी तरह की आंच आने से पहले मैं उनके सामने खड़ा रहूंगा। पुत्र की तरह ही अपने पिता के साथ हमेशा खड़ा रहूंगा। उनको बचाना और मिलकर काम करना ही मेरा फर्जहै। उन्होने तो अपनी पारी में मेरे विश्वास को जीता है, मगर अब बारी मेरी है। राजनीति में रहकर भी मैं रिश्तों को सार्थक बनाकरदिखाउंगा। लप्पेबाजी के लिए मशहूर नवजोत को अपने बयानों पर ही कुछ दिनों के बाद .संभवत यकीन हो या ना हो ? मगर फिलहाल 72 साला पूर्व सीएम को एक चहकता बेटा तो नसीब हो ही गया है, जो फिलहास अपने पिता के बारे में यह भी कह ही रहा हैं कि एक बेटा बाप से कभी बड़ा नहीं हो सकता। यानी नवजोत के इस चौके में दर्द है या उल्लास इसका फैसला तो समय नामक अंपायर ही करेगे जिसे सर्वमान्य भी माना जाएगा । फिलहाल तो नवजोतकी नॉट आउट की पारी से सबको यानी पंजे को भी बड़ी उम्मीदें है।


शनिवार, 21 जनवरी 2017

मल्टीमीडिया की परिभाषा




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मल्टीमीडिया (बहुमाध्यम) अंग्रेजी के multi तथा media शब्दों से मिलकर बना है। Multi का अर्थ होता है 'बहु' या 'विविध' और Media का अर्थ है 'माध्यम'। मल्टीमीडिया एक माध्यम होता है जिसके द्वारा विभिन्न प्रकार की जानकारियों को विविध प्रकार के माध्यमों जैसे कि टैक्स्ट, आडियो, ग्राफिक्स, एनीमेशन, वीडियो आदि का संयोजन (combine) कर के दर्शकों/श्रोताओं (audience) तक पहुँचाया जाता है।
आजकल मल्टीमीडिया मीडिया का प्रयोग अनेक क्षेत्रों जैसे कि मल्टीमीडिया प्रस्तुतीकरण (Multimedia Presentation), मल्टीमीडिया गेम्स (Multimedia Games) में बहुतायत के साथ होता है क्योंकि मल्टीमीडिया किसी वस्तु के प्रस्तुतीकरण का सर्वोत्तम साधन है।

मल्टीमीडिया का व्यावसायिक प्रयोग

रचनात्मक उद्योगों में - रचनात्मक उद्योग ज्ञान, कला, मनोरंजन, पत्रकारिता आदि के लिये मल्टीमीडिया का प्रयोग करते हैं।
व्यापार में - व्यापारी विज्ञापन के लिये मल्टीमीडिया का प्रयोग करते हैं।
खेल तथा मनोरंजन में - यह तो हम सभी जानते हैं कि खेलों के लिये वीडियो गेम्स के रूप में मल्टीमीडिया का प्रयोग अत्यन्त लोकप्रिय है। सिनेमा जैसे मनोरंजन के क्षेत्र में स्पेशल इफैक्ट देने के लिये मल्टीमीडिया का प्रयोग किया जाता है।
शिक्षा के क्षेत्र में - विद्यार्थियों को आसानी के साथ कम से कम समय में शिक्षा प्रदान करने के लिये मल्टीमीडिया एक वरदान साबित हुई है।
ये तो मल्टीमीडिया के प्रयोग मात्र कुछ ही उदाहरण हैं वरना आज ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं होगा जिसमें मल्टीमीडिया का प्रयोग न किया जाता हो।

मल्टीमीडिया का इतिहास

संभवत अखबार ही पहला जनसंपर्क माध्यम था, जिसमें मल्टीमीडिया का प्रयोग हुआ। 1895 में मारकोनी ने बेतार रेडियो संदेश भेजा था, फिर 1901 में टेलीग्राफ का प्रयोग रेडियो के द्वारा शुरु हुआ, आज भी रेडियो तंरग ऑडियो प्रसारण में प्रयोग हो रहा है।

बाहरी कड़ियाँ